
संजय कुमार सिंह-
देश-राजनीति की हालत, संसद में भाजपा की दबंगई, ईवीएम का ‘जिन्दा’ होना, आरएसएस की प्रशंसा
आज के अखबारों में भी वायनाड की खबर ही लीड है। इसमें एक दिलचस्प बात यह है कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है, और हिन्दुस्तान टाइम्स ने पहले पन्ने पर छापा है, “केरल सरकार ने शुरुआती चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया”। मुख्यमंत्री ने जवाब दिया है पर मुद्दा वह नहीं है। मुद्दा यह है कि आज के अखबारों में पहले पन्ने पर छपी तस्वीरों से पता चलता है कि कुछ घंटे की बारिश में दिल्ली फिर डूब गई। नये बने संसद भवन के आस-पास और अंदर भी पानी नजर आया। गुजरात में महाराष्ट्र के घातक वायरस से 56 लोगों की मौत हो चुकी है, अहमदाबाद के स्लम क्षेत्र में दवाई डाली जा रही है। दिल्ली नगर निगम के मामले में हाईकोर्ट ने विचित्र जांच को रेखांकित किया है और कहा है कि कोचिंग के छात्रों की मौत संरचनाओं के ध्वस्त होने का नतीजा है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने आज इस खबर को पहले पन्ने से पहले अधपन्ने पर छापा है और एक तस्वीर भी है जिसका कैप्शन बताता है कि फोटो एनएच 24 पर मयूर विहार के पास की है।
इसमें सड़क (नये बने एनएच 24) पर पानी भरा हुआ है और कम से कम एक बस तथा कार फंसी हुई है। पीछे जो गाड़ियां हैं सो अलग। जाहिर है, दिल्ली में अब यह कोई नई बात नहीं है और ऐसा हर बारिश के बाद होता रहता है। सरकारों और दूसरी एजेंसियों ने इससे कोई सीख नहीं ली है। हालांकि, कोचिंग संस्थान के तीन छात्रों की मौत के बाद दिल्ली सरकार ने कोचिंग सेंटर के नियमन और परिचालन के नियम तय करने के लिए कानून बनाने की योजना की घोषणा की है और समय पर की गई यह घोषणा प्रशंसनीय है। जहां तक दिल्ली में पानी भरने का मामला है, टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर का शीर्षक है, “दिल्ली नगर निगम ने, सीवर से संबंधित कोई मामला नहीं है कहने के 36 घंटे बाद ही खुद को गलत साबित किया”।
यह तो हुई सामान्य प्रशासन की हालत। इससे संबंधित और खबरें आगे हैं लेकिन उसपर आने से पहले देश में राजनीति की स्थिति समझ लें। इसके लिए आज द हिन्दू में एक अच्छी खबर है। राजनीति और उससे संबंधित स्थिति दूसरे अखबारों में भी है लेकिन मैं जैसे बताना चाहता हूं वैसे द हिन्दू में है इसलिए उसी को ले रहा हूं। इसमें बताया गया है कि संसद की कार्यवाही का कैसे मजाक बनाया जा रहा है। ओम बिरला का पक्षपात अपनी जगह है और सार्वजनिक है। आज राज्यसभा के सभापति से संबंधित मामला भी अखबारों में है। द हिन्दू की खबर का शीर्षक है, संसद की कार्यवाही से सांसद की टिप्पणी नहीं हटाने पर विवाद; वीडियो के लिए पीएम के खिलाफ विशेषाधिकार नोटिस – इस खबर में कहा गया है, मंगलवार को केंद्रीय बजट पर बहस के दौरान सदन में भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर की जाति संबंधी टिप्पणी को लेकर विपक्षी सांसदों के हंगामे के कारण लोकसभा की कार्यवाही बुधवार को स्थगित कर दी गई।
आश्वासन के बावजूद, उनकी टिप्पणियों को संसदीय रिकॉर्ड से नहीं हटाया गया है। यह तब स्पष्ट हुआ जब कांग्रेस सांसद और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने अपने एक्स अकाउंट पर श्री ठाकुर के भाषण का लिंक पोस्ट करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोकसभा अध्यक्ष को विशेषाधिकार हनन का नोटिस सौंपा; कांग्रेस ने दावा किया कि लिंक किए गए वीडियो में भाषण के ‘निकाले गये’ हिस्से शामिल हैं। जबकि लोकसभा में उस समय आसन पर विराजमान जगदंबिका पाल ने कहा था कि उन्हें हटा दिया जाएगा। बाद में लोकसभा द्वारा जारी विज्ञप्ति में जाति पर विशिष्ट टिप्पणियों को नहीं हटाया गया। हालाँकि, लोकसभा की वेबसाइट पर बहस से पता चलता है कि टिप्पणियों को हटाने का आश्वासन कार्यवाही के पाठ में मौजूद था। यह संसद की कार्यावाही में भाजपा की दबंगई का उदाहरण है जो अखबारों में कायदे से तो नहीं ही है कल सोनिया गांधी ने जो कहा वह भी आज प्रमुखता से नहीं है।
द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर प्रकाशित एक खबर के अनुसार सोनिया गांधी ने कहा है, भ्रमजनक मोदी सरकार ने कोई सीख नहीं ली है। नई दिल्ली डेटलाइन से अनीता जोशुआ ने इसमें कहा है, कांग्रेस संसदीय दल (सीपीपी) की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बुधवार को कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार का शीर्ष नेतृत्व “भ्रम में बना हुआ है” और उसने लोकसभा चुनाव के फैसले से कोई सबक नहीं सीखा है। सीपीपी को संबोधित करते हुए सोनिया ने कहा, “हमें उम्मीद थी कि मोदी सरकार लोकसभा चुनावों में अपनी महत्वपूर्ण हार से सही सबक लेगी। इसके बजाय, वे समुदायों को विभाजित करने और भय व दुश्मनी का माहौल फैलाने की अपनी नीति पर कायम हैं।” द टेलीग्राफ का आज का कोट भी सोनिया गांधी का यही कथन है। सोनिया गांधी ने आरएसएस के लिए नियमों में बदलाव की भी चर्चा की और कहा कि यह खुद को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है पर पूरी दुनिया जानती है कि यह भाजपा का राजनीतिक और वैचारिक आधार है।
हाल दिल्ली पुलिस का
टाइम्स ऑफ इंडिया में आज एक शीर्षक है, हाईकोर्ट ने पूछा, क्या यह दिल्ली पुलिस के हाथ से निकल गया है। एक और है, दिल्ली पुलिस कर क्या रही है? आप जानते हैं कि दिल्ली नगर निगम पर आम आदमी पार्टी का कब्जा है। भाजपा को नहीं मिला पर उसके लोग तो वहां हैं ही, उसका काम और शहर की हालत तथा दिल्ली पुलिस से हाईकोर्ट के ये सवाल जो केंद्र सरकार के तहत है – राजनीतिक मायने वाले हैं पर वह अलग मुद्दा है। राजधानी में कानून व्यवस्था और पुलिस के नियंत्रण का आलम है कि अभी तक तो सड़क पर कार वाले लड़ते-मरते थे कल एक स्कूटी चालक ने मोटर साइकिल से टक्कर के बाद मोटरसाइकिल सवार महिला को गोली मार दी। पूर्वी दिल्ली के गोकुलपुरी फ्लाईओवर के नीचे इस वारदात का हत्यारा फरार है, पुलिस उसकी पहचान में लगी है जबकि उसने चेहरा ढंक रखा था।
हैकरों से समस्या
आज खबर है कि छोटे आकार के करीब 300 कर्जदाताओं के ग्राहकों के लिए एटीएम से पैसे निकालना या यूपीआई का उपयोग करना संभव नहीं हो रहा है क्योंकि संबंधित टेक्नालॉजी प्रदाता के यहां रैनजमवेयर का हमला हुआ है। मोटे तौर पर उसका सिस्टम हैक कर लिया गया है। छोटे कारोबारों के लिए डिजिटल जमाने में वेबसाइट जरूरी है पर उसे मेनटेन करना भारी मुसीबत है। सरकार की तरफ से कोई सुरक्षा नहीं और हैकरों पर कोई नियंत्रण नहीं है। कुछ साल पहले मेरा वेबसाइट हैक करके डीफेस कर दिया गया था। पैसों की कमी से मैं दोबारा अपना साइट नहीं बनवा पाया। कुछ मित्रों ने मुफ्त में बनाने की पेशकश की तब भी क्योंकि उसे संभालना भी महंगा औऱ मुश्किल भरा है। अर्थव्यवस्था की खराब हालत ऐसे छोटे और साधारण कारणों से भी है पर कोई देखने-समझने वाला नहीं है। वेबसाइट तो भाजपा का भी हैक हो गया और ठीक करने में कई दिन लग गये थे पर यह पुरानी बात है।
बैंकों की हालत
मोदी राज में बैंकों में रखा धन भी सुरक्षित न होने, अचानक नोटबंदी के कारण लाइन में मर जाने, खाता के पैसे गायब होने, बैंक बंद होने जैसा क्या कुछ नहीं हुआ है। इसके बावजूद हाल में खबर थी कि न्यूनतम बैलेंस न होने के कारण बैंकों ने 8500 करोड़ रुपए की फीस वसूली है। जाहिर है यह पैसा उन लोगों से वसूला गया है जिनके पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं पर बैंक में खाता रखने की मजबूरी है। सबको पता है कि बैंक में खाता खोलने के लिए पैन कार्ड होना चाहिये, पैन कार्ड हो तो रिटर्न फाइल करना जरूरी है और यह सब बेकार का खर्च है। मान लीजिये आप कोई छोटा मोटा काम करते हैं। पैसों के लेन-देन के लिए बैंक खाता जरूरी है, टीडीएस कटेगा और उसे वापस लेने के लिये भी खाता जरूरी है। अगर आप पकौड़े की अपनी दुकान को कोई नाम दें तो चालू खाता खोलना होगा। टीडीएस वापस लेने के लिए आपको अपने नाम से खाता खोला जरूरी होगा। यानी धंधा एक, आदमी एक पर खाते दो। यह भी नियम इस लोकप्रिय सरकार ने बनाया है। पहले टीडीएस रिफंड संयुक्त खाते में आ जाता था पर मुझे अलग खाता खोलना पड़ा। काला धन खत्म करने के नाम पर बहुत कुछ ऐसा हुआ है जिससे कम कमाने वालों की मुश्किलें बढ़ी हैं। दूसरी ओर पैसों वालों के पास 20,000 करोड़ रुपये का निवेश किसका है पता नहीं है, बताना नहीं है, जानना नहीं है और पूछने वालों के साथ जो हुआ वह आप जानते हैं। शेल कंपनियां और विदेशी चंदे का मामला तो फिर भी कमाने-खाने वालों का है।
इंफोसिस की जांच
ऐसा नहीं है कि अच्छा कमाने वाले या बड़े व्यावसायी चैन से हैं। चंदा दो, धंधा लो का मामला आप जानते हैं। आज ही खबर है कि 32000 करोड़ रुपये की कथिच जीएसटी चोरी के लिए इंफोसिस की जांच चल रही है। कंपनी का कहना है कि उसने जीएसटी चुकाये हैं और यह देय नहीं है और अभी उसे नोटिस से पहले की चिट्ठी मिली है। खबर के अनुसार यह गड़बड़ी (अगर है तो) जुलाई 2017 से मार्च 2022 के बीच हुई है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह, “ना खाउंगा ना खाने दूंगा” के एलान के बावजूद हुआ है। गड़बड़ी अगर हुई तो 2017 में पकड़ी जानी चाहिये थी पांच साल चलती कैसे रही? और चलती रही तो अधिकारी जिम्मेदार क्यों नहीं हैं। या उसकी जांच क्यों नहीं? वैसे भी, जीएसटी तो अच्छी व्यवस्था है उसमें गड़बड़ी, वह भी इतने समय तक और कार्रवाई भी व्यवसायी के ही खिलाफ तो अच्छा क्या है? यही नहीं, 2017 से 2022 तक पांच साल चली कथित ‘गड़बड़ी’ अगर पकड़ में नहीं आई तो अपने अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कीजिये, आगे के लिए नोटिस दीजिये। अब जांच के नाम पर परेशान करने का क्या मतलब? समझना मुश्किल नहीं है कि यह जांच तब इलेक्टोरल बांड की उम्मीद में नहीं की गई गई होगी या सूचना पर कार्रवाई नहीं की गई होगी। वरना अधिकारियों से सहानुभूति का क्या कारण है? कायदे से, कंपनी के खिलाफ जांच से पहले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू होनी चाहिये थी।
नीट-यूजी का खेल
नीट यूजी 2024 की परीक्षा प्रश्नपत्र लीक और दूसरी अनियमितताओं की शिकायतों के बावजूद रद्द नहीं हुई। रद्द करने की मांग सुप्रीम कोर्ट से भी की गई थी पर अदलत ने भी परीक्षा रद्द नहीं की क्योंकि उसे पर्याप्त सबूत नहीं मिले। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेश और दूसरे कारणों से परीक्षा परिणाम पूरी तरह उलट पलट गये। न सिर्फ टॉपर की संख्या बहुत कम रह गई बल्कि सैकड़ों परीक्षार्थियों के रैंक भी बदल गये। यही नहीं, कुछ खास केंद्रों में सफल छात्रों की संख्या असामान्य पाई गई जबकि पूर्व में परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी एनटीए ने एक विशेषज्ञ संस्थान के हवाले से इसे सामान्य बताया था। कुल मिलाकर, परीक्षा की पवित्रता और साख दोनों भंग हुई है।
गुजरात में कमाल
टाइम्स ऑफ इंडिया में आज प्रकाशित एक खबर के अनुसार नीट की परीक्षा में कुल 720 की जगह 705 अंक पाने वाली गुजरात की एक छात्रा 12वीं बोर्ड की परीक्षा फेल कर गई। यही नहीं, इसके बाद आयोजित सप्लीमेंट्री में भी फेल कर गई और इसका नतीजा यह होगा कि नीट में चुने जाने के बावजूद उसे मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं मिलेगा। इस खबर के बराबर में पूजा खेदकर की खबर है। इसके अनुसार, यूपीएससी ने खेदकर की उम्मीदवारी रद्द कर दी है और उसे भविष्य की परीक्षाओं से प्रतिबंधित कर दिया है। उसपर अपनी पहचान बदलकर मान्य सीमा से ज्यादा प्रयास करने और सफलता पाने का आरोप है। कोई भी समझ सकता है कि आज के समय में (आधार के बाद) पहचान बदलना कितना मुश्किल है। इसके बावजूद यूपीएससी के आरोप माने जायें तो उसने न सिर्फ अपना नाम बदल लिया बल्कि अपने माता-पिता के नाम, अपनी फोटो, हस्ताक्षर, ई-मेल आईडी, मोबाइल नंबर और पता सब बदल लिया। कहीं किसी को पता नहीं चला, शक नहीं हुआ और उम्मीदवार को चुन लिया गया।
पूजा खेदकर का मामला
मुझे लगता है कि यह सब बदलना जितनी बड़ी बात है उससे बहुत बड़ी बात यह है कि पता नहीं चला, पकड़ा नहीं गया। सरकारी अफसर अपने काम करते हुए सेवा नियमों के अनुसार सुरक्षित रहते हैं औऱ बिना अनुमति उनपर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। ऐसे में पूरी संभावना है कि जिन अधिकारयों की जिम्मेदारी इसे पकड़ने की थी उन्होंने बेईमानी या लापवाही की होगी। दोनों ही बड़ी चूक है और व्यवस्था का मामला है। भविष्य में ऐसा नहीं हो और पूर्व में हुआ है कि नहीं, यह बड़ा और गंभीर मामला है। नीट और एनटीए के साथ यूपीएससी से सबंधित इस मामले की भी निष्पक्ष जांच जरूरी है। पर इसकी जांच कैसे होगी जब नीट की नही हो रही है।
मणिपुर में 59,000 विस्थापित
मणिपुर के मुख्यमंत्री ने विधानसभा में जानकारी दी है गये साल मई से राज्य में 226 लोग मारे गये हैं, 39 लापता हैं और 59,000 से ज्यादा विस्थापित लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं। राज्य में 11133 घर जलाये गये हैं और 4569 अन्य नष्ट हुए हैं। भाजपा के मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई है, प्रधानमंत्री देखने नहीं गये हैं और शांति स्थापित करने की कोई अपील की हो जो मुझे याद नहीं है। ऐसे में खबर यह भी है कि विधानसभा सत्र में भाजपा के सात आदिवासी विधायकों ने हिस्सा नहीं लिया। आप समझ सकते हैं कि मणिपुर में भाजपा की सरकार है तब यह हालत है और एक साल से ज्यादा से है। सरकार को चुनाव हारने का डर नहीं है या जीतने के लिए प्रधानमंत्री के दौरे या मरहम लगाने वाले बयान-ट्वीट की भी जरूरत नहीं है तो आप समझ सकते हैं सरकार आपकी सेवा कब करेगी या किसके लिए काम करती है।
ईवीएम जिन्दा है
आश्चर्य की बात है कि यह और ऐसी व्यवस्था देने वाली सरकार फिर भी लोकप्रिय है। जरा सी बारिश में पानी भर जाने और लोगों की जान का कोई महत्व नहीं होने के बावजूद दिल्ली एनसीआर की सारी सीटें इस लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली हैं और ईवीएम तथा चुनाव आयोग की निष्पक्षता मुद्दा नहीं है। यहां तक कि चुनाव में सीटें कम आने, बनारस में जीत का अंतर कम होने के बावजूद बैसाखियों के सहारे सरकार बन जाने का यकीन होने पर प्रधानमंत्री ने व्यंग किया था, … ईवीएम जिन्दा है कि मर गया। प्रधानमंत्री का मतलब जो भी रहा हो, ईवीएम (और चुनाव) की निष्पक्षता तथा पवित्रता को कायम करने के लिए संघ परिवार समर्थित भाजपा और नरेन्द्र मोदी की सरकार ने कुछ नहीं किया है। उनके बनाये या चुने चुनाव आयुक्तों की भूमिका भी सर्वविदित है। अब तो मतदान के बाद बढ़े मतों की भारी संख्या और उससे भाजपा को कई सीटों पर लाभ होने की खबरें (आंकड़े) हैं पर सुनवाई – कार्रवाई जैसा कुछ नहीं है। इससे लगता है कि संघ परिवार और भाजपा ने मिलकर पूरी व्यवस्था को अपने नियंत्रण में ले लिया है और इसका पता न सिर्फ दही-चीनी खाने-खिलाने से लगता है, उपराष्ट्रपति के कल के व्यवहार से भी चलता है। उन्होंने आरएसएस का जैसा बचाव किया उसकी कोई जरूरत नहीं थी। वे एक निष्पक्ष पद पर बैठे हैं और कोई जरूरत नहीं थी कि आरएसएस को जानते हुए उसकी प्रशंसा करते। इसके बिना भी वे अपनी बात कह सकते थे। कल की संबंधित खबर आज टाइम्स ऑफ इंडिया में पेज 15 पर है। पहले पन्ने पर इसकी सूचना है।


