प्रशांत पाठक-
दर्द समझिए शनिवार की रात का, धर्मेंद्र सिंह… नाम शायद बहुत बड़ा नहीं था, एटा से हरदोई आए, पत्रकारिता में पहचान बनाने की कोशिश की पर सच ये है कि पत्रकारिता में नाम से ज्यादा जद्दोजहद मिलती है।
वो खबरें बांटते थे मोबाइल से कहते थे “केवल आपको दी है”, जबकि खबर सबको देते थे, सबके पास होती थी। चाहे वो न्यूज़ चैनल हो या अखबार ऐसा कोई न होगा जिसने धर्मेंद्र से खबर न ली हो या उसने दी न हो, इसी खबर के लेनदेन में उनकी खबरें सुर्खियाँ बनती तो उसी बदौलत उसने अस्पताल से लेकर पुलिस तक अपनी छोटी-सी पकड़ बनाए रखी.. किसी का काम कराते-कराते, अपना जीवन भी किसी तरह चलाते रहे।
अस्पताल में कोई भी काम हो धर्मेंद्र करा देते चाहे मरीज दिखाना हो या डॉक्टरी बनवानी हो, गड़बड़ होने पर डांट खाकर भी कुछ न कहते, काम की फीस भी बहुत मामूली होती, शारीरिक रूप से कमजोर थे पैर से विकलांग कुछ दिन पहले दिल में वाल्व डला लेकिन जिंदगी ने साथ नहीं दिया।चार दिन से मेडिकल कॉलेज में भर्ती थे और शनिवार रात चुपचाप दुनिया छोड़ गए।

सबसे दर्दनाक बात क्या रही…? इतने दिन साथ काम करने वाले, उनके बारे में ठीक से जानते भी नहीं थे। क्योंकि धर्मेंद्र भी इस मामले में गुमराह किये रहते थे, उनकी मौत की खबर भी परिवार तक बड़ी मुश्किल से पहुंची, परिवार के नाम पर केवल भाई , मौके पर पहुंचे पत्रकारों ने एम्बुलेंस के जरिये एक पत्रकार के साथ मेडिकल कालेज के विजय तिवारी के सहयोग से शव को गांव भिजवाया, संस्कार के लिए आर्थिक सहयोग भी दिया।
शव गांव भेजा गया और उसी अस्पताल के गेट पर जिस पर धर्मेंद्र सुबह नौ बजे से रात के नौ बजे तक मौजूद रहते थे जहां कुछ देर पहले उनके लिए लोग खड़े थे… अचानक एक बड़ी खबर आई बस और कार में आग लग गई।
और फिर… सब भाग पड़े माइक, कैमरा और “ब्रेकिंग न्यूज़” के पीछे। धर्मेंद्र वहीं छूट गए… जैसे वो जिंदगी भर छूटते रहे।
यही है पत्रकारिता का सच… यहां खबर ज़िंदा रहती है…और पत्रकार अक्सर चुपचाप मर जाता है। धर्मेंद्र सिंह को विनम्र श्रद्धांजलि… ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।
मनोज तिवारी-
अंतिम विदा:हरदोई में जिस मेडिकल कॉलेज की धड़कनें नापते थे, वहीं थम गई पत्रकार साथी धर्मेंद्र की अपनी सांसें….
हरदोई। कल तक जो शख्स हरदोई मेडिकल कॉलेज की हर हलचल पर पैनी नजर रखता था, आज उसी अस्पताल के गलियारे उसकी खामोशी पर रो पड़े। बेहद मिलनसार, मृदुभाषी और हम सबके छोटे भाई समान पत्रकार धर्मेंद्र सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहे। फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे धर्मेंद्र ने आज दिल का दौरा पड़ने के बाद अपनी अंतिम सांस ली।
धर्मेंद्र सिर्फ एक पत्रकार नहीं थे, वे हरदोई के पत्रकार जगत के ‘संकटमोचक’ थे। किसी साथी को मदद चाहिए हो या मेडिकल कॉलेज में किसी लाचार का काम अटका हो, धर्मेंद्र हमेशा अगली कतार में खड़े मिलते थे। विडंबना देखिए, जिस संस्थान की खबरों को उन्होंने अपनी कलम से सींचा, आज उसी संस्थान ने उन्हें हमेशा के लिए विदा कर दिया।
धर्मेंद्र का जाना एक ऐसे सन्नाटे को छोड़ गया है जिसकी भरपाई मुमकिन नहीं। परिवार के नाम पर केवल एक भाई है जो एटा में रहता है। भाई-चारे और पत्रकारिता के धर्म को निभाते हुए पत्रकार मित्र साथी आज उनके पार्थिव शरीर को लेकर एटा की ओर निकल पड़े हैं। यह सफर धर्मेंद्र का अपनी कर्मभूमि से जन्मभूमि की ओर आखिरी सफर है।
अलविदा धर्मेंद्र भाई! तुम्हारी बेबाक मुस्कान और वो हर वक्त काम आने वाला जज्बा हरदोई के गलियारों में हमेशा याद किया जाएगा बस हर आंख नम है और हर जुबां पर तुम्हारी यादें हैं।
ईश्वर पुण्य आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दे और परिजनों व मित्रों को यह असीम कष्ट सहने की शक्ति प्रदान करे। भावभीनी श्रद्धांजलि! ॐ शांति।
अभिनव-

आख़िर किस्सों में ही सिमट गया ‘D’.. कई बरस पहले एक कृशकाय शरीर का, अधेड़ उम्र का दिखता, एक पैर से कमजोर, लंगड़ाता हुआ दौड़ता सा एक व्यक्ति दिखाई दिया था एक हाँथ में हैंडीकैम (छोटा वाला अतीत में चला गया अब कैमरा) पकड़े हुए किसी कार्यक्रम की कवरेज के दौरान। उस वक़्त देखकर अजीब लगा था। हम साथी लोग मुस्कराए भी थे।
वो धर्मेंद्र था। धर्मेंद्र कौन था, कहाँ से आया था ये बरसों तक एक पहेली बनी रही। बोल कर ब्रेकिंग के फार्मेट में टाइप करना और उसमें अर्थ का अनर्थ कर देना धर्मेंद्र की पहचान थी। देर रात अक्सर धर्मेंद्र वॉयस मैसेजेस से भजन सुनाता था ग्रुप में। सबको ख़बर देता था और सभी से कहता था कि ‘दादा बस आपको दी है’। धर्मेंद्र शरीर से कमजोर था पर कलेजे का बहुत मजबूत था, बेधड़क था। हर पल हर किसी की अपने अंग-अंग के जोर के स्तर पर जाकर मदद करना उसका शगल था, बड़े-बड़े मूर्धन्यों की उसने मदद की अस्पताल के मामलों में।
कल रात धर्मेंद्र जिसे हम D कहते थे नहीं रहा। अपनी ब्रेकिंग, अपनी आवाज, अपने रहस्यों को छोड़कर चला गया D। दूर जिले में उसका एक भाई रहता है ये पता भी हाल में ही चला था, सभी पत्रकारों ने उसके मृत सोते हुए शरीर को उसके गांव तक भिजवाया और उसे अंतिम विदाई अपनी मिट्टी में मिले इसका ख्याल रखा। कौन गांव के हो सही बताओ D से अक्सर लोग पूछते थे, अपने गांव की ही मिट्टी में समा गया D अंत में और लोगों को बता भी गया वो कि कौन गांव का था वो।
पत्रकार यूँ ही चुपचाप मर जाता है, उसकी ब्रेकिंग ज़िंदा रहती है, उसकी ख़बर ज़िंदा रहती है। अलविदा D, याद रहोगे हमेशा तुम।
राजेश कश्यप-
मेरे एक्सीडेंट से दो से 3 महीने पहले धर्मेंद्र सिंह (पत्रकार) ने मुझे फोन किया और कहा राजेश दादा मेरे हार्ट का ऑपरेशन होना है, मेरे पास पैसा नहीं है, आप सांसद जयप्रकाश रावत जी से कहकर मुख्यमंत्री सहायता कोष से पैसा दिलवा दीजिए, मैं धर्मेंद्र भाई को साथ लेकर कुछ दिन बाद सांसद जयप्रकाश रावत जी के पास पहुंचा और सांसद जी को स्थिति की पूरी जानकारी दी, सांसद जी ने इस्टीमेट बनवाकर लाने के लिए कहा, फिर उसके कुछ दिन बाद जब इस्टीमेट बना तब फिर सांसद जी से हम दोनों लोग मिले, सांसद जी ने लेटर पैड लिखा और हर संभव मदद का वादा किया जिसके बाद धर्मेंद्र को हार्ट के ऑपरेशन के लिए शायद 2.5 लाख रुपए मिले और उसका ऑपरेशन हो गया, धर्मेन्द्र ठीक हो गया और जब भी मिलता था तो कहता था दादा आपने मुझे बचा लिया लेकिन कुछ महीनों के बाद उसे सांस की दिक्कत हो गई।
धर्मेंद्र यह भी कह रहा था कि उसे टीवी हो गई है, अभी परसों या उसके एक दो दिन पहले मै जब फेसबुक पर लाइव था तो धर्मेंद्र भी लाइव में जुड़ा और बोला कि दादा अब हमारा आपका साथ शायद ज्यादा दिन नहीं चल पाएगा, और कल रात उसकी बात सच साबित हो गई, धर्मेंद्र सबको छोड़कर परलोक चला गया, धर्मेंद्र के लिए आज अच्छा लिखने वाले लोगों ने उसे खूब बुरा भला कहा, खूब सताया, उसका खूब मजाक बनाया।
यही दुनिया का सच है, जहां जिंदा आदमी की कोई कद्र नहीं और मरने के बाद उसकी शान में कसीदे पढ़े जाते हैं, जाने वाला तो चला गया अब क्या फायदा किसी की सहानुभूति का…अलविदा धर्मेंद्र..विनम्र श्रद्धांजलि

सिर्फ खबर.. फेसबुक पेज का पोस्ट-
हरदोई के पत्रकार धर्मेंद्र सिंह नहीं रहे
हरदोई। जिस शख्स की नजरें कल तक हरदोई मेडिकल कॉलेज की हर हलचल पर रहती थीं, आज उसी अस्पताल के गलियारे उनकी खामोशी पर नम हो उठे। मिलनसार, मृदुभाषी और सभी के प्रिय पत्रकार धर्मेंद्र सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे धर्मेंद्र ने आज दिल का दौरा पड़ने के बाद अंतिम सांस ली।
धर्मेंद्र सिर्फ एक पत्रकार नहीं थे, बल्कि हरदोई के पत्रकार जगत के ‘संकटमोचक’ थे। किसी साथी की मदद हो या मेडिकल कॉलेज में किसी जरूरतमंद का काम, वे हमेशा सबसे आगे खड़े मिलते थे।
विडंबना यह रही कि जिस संस्थान की खबरों को उन्होंने अपनी कलम से जीवंत किया, आज उसी ने उन्हें अंतिम विदाई दी। उनके निधन से पत्रकारिता जगत में एक ऐसा सन्नाटा छा गया है, जिसकी भरपाई संभव नहीं। परिवार में उनके एक भाई हैं, जो एटा में रहते हैं। पत्रकार साथियों ने भाईचारे की मिसाल पेश करते हुए उनके पार्थिव शरीर को एटा के लिए रवाना किया — यह उनकी कर्मभूमि से जन्मभूमि की ओर अंतिम यात्रा है। अलविदा धर्मेंद्र भाई!
आपकी मुस्कान, आपका सहयोग और आपका जज्बा हमेशा हरदोई की गलियों में याद किया जाएगा। आज हर आंख नम है और हर दिल में आपकी यादें हैं। ईश्वर पुण्य आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और परिजनों को इस दुख को सहने की शक्ति प्रदान करें। भावभीनी श्रद्धांजलि! ॐ शांति।



