
आशीष सागर दीक्षित-
बांदा (बुंदेलखंड)। बाघेश्वर धाम के कथावाचक पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की हनुमंत कथा जहां चमत्कार, पर्ची और आस्था के दावों के साथ चल रही है, वहीं कथा स्थल और उसके आसपास आम लोगों की परेशानियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। ताजा मामला स्थानीय दैनिक हिंदुस्तान के छायाकार, ग्राम गुरेह निवासी मनोज कुमार का है, जिनका पर्स गुम हो गया है। पीड़ित अपनी शिकायत लेकर नगर कोतवाली के चक्कर काट रहा है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।
शहर में यह सवाल उठ रहा है कि जिस आयोजन में हर समस्या का समाधान पर्ची के जरिए बताए जाने का दावा किया जाता है, वहां किसी का पर्स, किसी की सोने की चेन, किसी की मंगलसूत्र और यहां तक कि किसी की वृद्ध मां तक गुम हो रही है—तो इन सबकी पर्ची आखिर कौन निकालेगा? क्या चमत्कारी कथावाचक उर्फ ‘पर्ची बाबा’ इन पीड़ितों की व्यथा सुनकर समाधान करेंगे या फिर अपनी आईटी टीम, कैमरा एक्सपर्ट्स और प्रोफेशनल लॉबी के साथ लक्जरी कथा स्थल पर भौकाल कायम रखने में ही व्यस्त रहेंगे?
बीते दिनों कलश यात्रा के दौरान महिलाओं के साथ हुई चेन स्नेचिंग की घटनाएं पहले ही सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर चुकी हैं। अब एक पत्रकार का पर्स गुम होने और उसे थाने के चक्कर लगाने पर मजबूर होना, इस पूरे आयोजन के दौरान प्रशासनिक दावों की पोल खोल रहा है।
आमजन में यह भी चर्चा है कि क्या इस पूरे मामले पर कोई यूपी सरकार का जिम्मेदार जनप्रतिनिधि संज्ञान लेगा या फिर मंच का चरणोदक ग्रहण कर विधानसभा चुनाव 2027 की सियासी तैयारी में ही व्यस्त रहेगा। कथावाचक की कथा में उमड़ रही भीड़, भारी पुलिस बल की तैनाती और सरकारी मशीनरी की सक्रियता के बीच अगर आम लोगों की बुनियादी समस्याएं यूं ही अनसुनी रहेंगी, तो यह आयोजन आस्था से ज्यादा अव्यवस्था का प्रतीक बनता जाएगा।
बुंदेलखंड के बांदा में 16 से 20 जनवरी तक चल रही इस कथा को लेकर सोशल मीडिया पर भी लगातार प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब हर समस्या का समाधान मंच से बताया जाता है, तो जमीन पर गुम हुई चेन, पर्स और इंसानों की जिम्मेदारी आखिर किसकी है। फिलहाल इन सवालों के जवाब न कथा मंच से मिल रहे हैं और न ही प्रशासन की ओर से कोई संतोषजनक कार्रवाई नजर आ रही है।


बांदा। बाघेश्वर धाम के कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की हनुमंत कथा को लेकर बांदा में आध्यात्म से ज्यादा विवाद, राजनीति और अव्यवस्था की चर्चा हो रही है। सोलह से बीस जनवरी तक आयोजित कथा से पहले 15 जनवरी को शहर में निकली कलश यात्रा के दौरान सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुल गई, जब कई प्रतिष्ठित महिलाओं के गले से सोने की चेन, मंगलसूत्र और हीरे के लॉकेट छीन लिए गए।
चेन स्नेचिंग की शिकार पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष विनोद जैन, बीना जैन, मालती गुप्ता सहित अन्य महिलाएं बनीं। हैरानी की बात यह है कि यह घटनाएं उस वक्त हुईं जब प्रशासन ने कलश यात्रा के लिए चाक-चौबंद इंतजाम का दावा किया था। शहर के मुख्य मार्गों से होकर निकली इस भव्य और भीड़भाड़ वाली यात्रा में अराजक तत्व महिलाओं को निशाना बनाकर आसानी से वारदात को अंजाम देते रहे और पुलिस व्यवस्था मूकदर्शक बनी रही।
इन घटनाओं को लेकर शहर में सवाल उठ रहे हैं कि जिस कथा के मंच से चमत्कार और पर्ची के जरिए लोगों के जीवन की समस्याएं सुलझाने के दावे किए जाते हैं, उसी कथा से जुड़ी यात्रा में हुई चोरी और चेन स्नेचिंग पर कोई चमत्कार क्यों नहीं दिखा। लोग व्यंग्यात्मक लहजे में कह रहे हैं कि यदि चेन छीनने वालों की पर्ची ही निकाल दी जाती तो पुलिस प्रशासन का बोझ भी कम हो जाता और जनता को चमत्कार का प्रत्यक्ष प्रमाण भी मिल जाता।
इस बीच कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का एक विवादित बयान भी सुर्खियों में है, जिसमें उन्होंने कहा कि जब तक बच्चे वेद नहीं पढ़ेंगे, जावेद और नावेद बनते रहेंगे। इस बयान को बांदा की कथा से जोड़कर मुख्यधारा के अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। इसके बाद शहर में यह चर्चा और तेज हो गई कि क्या कलश यात्रा के दौरान हुई चेन स्नेचिंग की घटनाओं को भी इसी तरह साम्प्रदायिक चश्मे से देखा जाएगा या फिर यह सच सामने आएगा कि अपराध का कोई धर्म नहीं होता।
कथावाचक ने बांदा में आयोजित प्रेसवार्ता के दौरान हिंदुओं से कम से कम चार बच्चे पैदा करने की अपील भी की। उन्होंने सरकारी परिवार नियोजन नीति पर सवाल उठाते हुए दूसरे धर्मों की जनसंख्या वृद्धि का हवाला दिया। इस बयान को लेकर भी राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है, खासकर तब जब वर्ष 2027 में देश में प्रस्तावित जनगणना को लेकर पहले से ही बहस तेज है।
विरोधाभास यह भी है कि जनता को मायामोह से दूर रहने की सीख देने वाले कथावाचक खुद हूटर लगी लक्जरी गाड़ियों के लंबे काफिले के साथ कथा स्थल तक पहुंचे। एक्सप्रेस-वे से लेकर शहर की आम सड़कों तक उनके काफिले के कारण यातायात प्रभावित रहा, जिससे आमजन में नाराजगी भी देखी गई। कई लोगों का कहना है कि आध्यात्मिक आयोजन कम और शक्ति प्रदर्शन ज्यादा नजर आया।
हनुमंत कथा को समरसता का प्रतीक बताया गया, लेकिन शहर में लगे होर्डिंग्स ने इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए। शहर के प्रमुख चौराहों, यहां तक कि महाराणा प्रताप चौराहे तक पर कथावाचक और आयोजक की तस्वीरों के साथ एक ही राजनीतिक दल से जुड़े नेताओं के पोस्टर और होर्डिंग्स छाए रहे। अन्य दलों या सामाजिक प्रतिनिधियों को कहीं जगह नहीं दी गई, जिससे कथा के राजनीतिकरण के आरोप और गहरे हो गए।
सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों की सक्रियता, बड़े पैमाने पर प्रचार और राजनीतिक संरक्षण के बीच यह आयोजन आध्यात्मिक कम और मीडिया मार्केटिंग का बड़ा इवेंट ज्यादा प्रतीत हुआ। उधर छतरपुर के ग्राम गढ़ा में बाघेश्वर धाम से जुड़ी जमीनों को लेकर उठे पुराने विवादों और आदिवासियों की जमीन छीने जाने जैसे गंभीर आरोपों पर इस पूरे आयोजन के दौरान कोई चर्चा नहीं हुई।
कुल मिलाकर बांदा की यह हनुमंत कथा धार्मिक आस्था से ज्यादा विवादित बयानों, सुरक्षा में चूक, राजनीतिक प्रदर्शन और भौकाली जीवनशैली के कारण चर्चा में रही। शहर में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या ऐसे आयोजनों का उद्देश्य सच में सामाजिक समरसता है या फिर आने वाले चुनावों से पहले धार्मिक मंचों के जरिए सियासी जमीन मजबूत करने की कोशिश।



