Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

साहित्य

तानाशाहों का भी सिलसिला और कबीला होता है, अशोक कुमार पांडेय की बहुचर्चित किताब से गुज़रते हुए ये समझ में आता है!

21वीं सदी के आइने में बीसवीं सदी के तानाशाह!

राजशेखर त्रिपाठी-

तानाशाहों को कभी ख़ुद के तानाशाह होने का ग़ुमान नहीं होता। वो खुद को मुल्क के मसीहा, नॉन बायोलॉजिकल लीडर और ईश्वरीय अवतार की तरह देखते हैं। तानाशाह अपने ही बनाए ‘बबल’ में जीता है; और मरते दम तक इससे बाहर नहीं निकल पाता। उनकी क़रीबी कोटरी इस मिथ्या भ्रम को और बढ़ाती है, और उन्हें ऐसा ‘सुप्रीम लीडर’ साबित करती है जो दैवीय गुणों की खान है। तानाशाह एंटायरली अंगूठा टेक हो या महज दसवीं पास, कोटरी उसे पूरी लाइब्रेरी खंगाले विद्वान की तरह पेश करती है।

बीसवीं सदी के ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ एडॉल्फ हिटलर को ही लीजिए। उसके प्रोपेगैंडा मिनिस्टर जोसेफ गोएबल्स ने योरप की आधा दर्जन यूनिवर्सिटीज़ से डिग्रियां ले रखी थीं। हाइडेलबर्ग यूनिवर्सिटी से पीएचडी था, मगर हिटलर की छवि ऐसी पेश करता था कि – फ्यूहरर के पास छह हज़ार किताबें हैं, और उसने सारी पढ़ रखी हैं। मज़े की बात ये कि हर दौर के हिटलर को गोएबल्स जैसे अंधभक्त ‘इमेज मेकर’ मिल ही जाते हैं।

दरअसल तानाशाहों का भी सिलसिला और कबीला होता है, ये आपको तब समझ में आएगा जब आप इतिहास अध्येता अशोक कुमार पांडेय की ताज़ा और बहुचर्चित किताब बीसवीं सदी के तानाशाह से गुज़रते हैं। चार्ली चैप्लिन ने अपनी 1940 की फिल्म में हिटलर को तंज़ करते हुए ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ कहा। मगर वो सचमुच डिक्टेटरशाही का ऐसा ‘रिप्रजेंटेटिव आयकन’ है जिसके अंश लगभग हर तानाशाह में दिखते हैं। वो तानाशाह होने की हर शर्त पूरी करता है, जो नहीं पूरी करता समझिए वो तानाशाह का लक्षण है ही नहीं।

पुस्तक बीसवीं सदी के तानाशाह के लेखक अशोक कुमार पांडेय जी

अशोक इस किताब में एक और स्थापना रखते हैं। तानाशाह पैदा नहीं होते, हालात उनकी एंट्री का माहौल बनाते हैं। जर्मनी में फासीवाद सिर्फ हिटलर का चमत्कार नहीं था। इसके ऐतिहासिक और सामाजिक कारण थे, वर्ना हिटलर भी संविधान और चुनाव के सहारे ही आया था।

1932 के चुनाव में उसे सिर्फ 37 फीसदी वोटरों का समर्थन मिला, 63 फीसदी ने उसे वोट नहीं किया। मगर वो चांसलर की गद्दी तक पहुंचा, क्योंकि उसके विरोधी बुरी तरह बिखरे हुए थे। अब इसे संयोग कहिए या प्रयोग मगर मुड़कर 2014 में अपने आम चुनावों के नतीजे देख लीजिए। बीजेपी समेत एनडीए को कुल 38 फीसदी वोट मिले, बाकी 62 फीसदी में कांग्रेस समेत सारे दल समा गए।

जब आप इस नज़रिए से बीसवीं सदी के तानाशाह को पढ़ते हैं तो आपकी समझ में आता है, कि इक्कीसवीं सदी के अघोषित तानाशाहों को पहचानने के लिए बीसवीं सदी के घोषित तानाशाहों को समझना क्यों जरूरी है! अब यूं ही नहीं पहले अध्याय में अशोक ट्रंप के नारे ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ को हिटलर के नारे ‘मेक जर्मनी ग्रेट अगेन’ के बरक्स खड़ा करते हैं। ये जो मुल्क को महान बनाने की बात है, वो बुरे से बुरे हाल में जी रहे आदमी को एक झूठा गर्व तो दे ही सकती हैं। अशोक दो टूक कहते हैं कि ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ और ‘हिंदू खतरे में है’ जैसे नारे ही हैं जो ग़रीबी, बेरोज़गारी, स्कूल, अस्पताल के ज़रूरी सवालों को फ़ेहरिस्त से ग़ायब कर देते हैं।

दूसरी ओर इस हिस्टीरिया को भुनाने के लिए एक काल्पनिक दुश्मन की जरूरत थी और उसे दो-दो मिल गए – यहूदी और कम्युनिस्ट। हिटलर तो कम्युनिज़्म को भी यहूदियों की साज़िश करार देकर एक ही दुश्मन के दो चेहरे बता देता है। कार्ल मार्क्स भी एक पीढ़ी पहले तक यहूदी ही था, उसके पिता ईसाई हो गए थे। हिटलर ने तो तख्ता पलट के पहले ही मुकदमे में अपना मकसद साफ कर दिया था – मार्क्सवाद का ख़ात्मा! हिटलर को शुरुआत में फैलने का मौका भी इसीलिए मिला कि यूरोप का सामंती समाज, चर्च और यहां तक कि फ़ौज़ी अफसर भी कम्युनिज़्म के प्रेत से लड़ रहे थे।

अब बात कम्युनिस्ट स्टालिन की, लेनिन का पट्ट शिष्य और उनके बाद रूस की सत्ता पर काबिज़ हुआ जोसेफ स्टालिन। अशोक की किताब में भी स्टालिन दूसरे नंबर पर ही है। मगर हिटलर के साथ कामरेड स्टालिन को दूसरे नंबर पर रखा जाना हमारे यहां के बूढ़े मार्क्सवादियों को रास नहीं आया। उन्होंने किताब पढ़े बग़ैर इस मसले पर शोरगुल मचाया, और मुंह की खायी। हालांकि पश्चिम का बौद्धिक समाज इस मामले में ज़्यादा ईमानदार है। यूरोप वर्ल्ड वॉर का थिएटर रहा, और वहीं से दर्जन भर ऐसी किताबें सामने आयीं जो टू डिक्टेक्टर्स, टू टायरेंटस कह कर हिटलर और स्टालिन की स्टडी एक साथ करती हैं। इनमें से कई का संदर्भ अशोक ने अपनी किताब में भी दिया है।

लेनिन ने तो मृत्युशैय्या से पार्टी नेताओं को लिखे खत में ख़ुद कहा कि ‘स्टालिन ने महासचिव बनने के बाद अपने हाथों में बहुत ज्यादा ताक़त इकट्ठा कर ली है, मुझे यक़ीन नहीं कि वो इसका उपयोग सावधानी से कर पाएंगे’। बाद में तो वो स्टालिन को हटाने का रास्ता खोजने की अपील तक कर डालते हैं। हिटलर ने तो अपने विरोधियों को रास्ते से हटाने के लिए एक बार ‘नाइट ऑव लॉन्ग नाइव्स’ अभियान चलाया, मगर स्टालिन का सफाया अभियान तो जर्मनी से जंग के दौरान भी जारी रहा। जो आज स्टालिन के क़रीब दिख रहा है कल कहां होगा किसी को नहीं पता था। जब हिटलर की फ़ौज़ ने स्टालिनग्राद घेर लिया तो पार्टी के कुछ नेताओं ने अनुभवी फ़ौज़ी क़यादत के सफ़ाए के लिए उसे ज़िम्मेदार ठहराया।

स्टालिन बैक फुट पर था तो उसने सुन लिया, लेकिन थोड़े ही दिन बाद ये लोग भी गोलियों से उड़ा दिए गए। लेनिन के दौर का एक शख़्स नहीं बचा जो कत्ल नहीं कर दिया गया। उन 16 लोगों का मुक़दमा तो ग़ज़ब है, जिन्हें 15 दिन के भीतर ही फ़ैसला सुना कर मौत के घाट उतार दिया गया। दरअसल तानाशाहों को अपनी मुख़ालफ़त ज़रा भी बर्दाश्त नहीं होती। जर्मनी के पास्टर निमोलर का किस्सा तो नज़ीर है, जो हिटलर के अंधभक्त थे मगर चर्च पर कब्ज़े के उसके अभियान के खिलाफ़ मुंह खोला तो फिर तब तक जेल में रहे जब तक हिटलर ने खुदकुशी नहीं कर ली।

बहरहाल, अशोक ने इस किताब में आधा दर्जन तानाशाहों की स्टडी की है। हर स्टडी ये बताती है कि दौर बदलता है, तानाशाहों का डीएनए नहीं बदलता, बस अंदाज़ बदल जाता है।

राजशेखर त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई बड़े न्यूज़ चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। संपर्क- +91 98187 98194


इसे भी पढ़ें-

यह तो भारत की ही दास्तान है, ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी तुर्की से मार्गदर्शन प्राप्त कर रहे हैं! https://www.bhadas4media.com/kya-bharat-tanashahi-ki-taraf-ja-raha-hai/

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन