मनीष दुबे-
न्यूज़ मीडिया इंडस्ट्री एक बड़े संक्रमण काल से गुजर रही है। टीवी न्यूज़ चैनलों की रेवेन्यू लाइन लगातार गिरावट पर है और दर्शकों की हिस्सेदारी (TV Share) दिन-ब-दिन सिमटती जा रही है। वहीं डिजिटल प्लेटफॉर्म्स तेज़ी से आगे बढ़ते हुए पूरे मीडिया बाज़ार पर हावी होते दिख रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या डिजिटल का यह उभार स्थायी है, या यहां भी वही चक्र दोहराया जाएगा जो टीवी के साथ हुआ?
मीडिया इंडस्ट्री से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि टीवी न्यूज़ की गिरती विश्वसनीयता और घटते विज्ञापन राजस्व ने ब्रांड्स और पब्लिक रिलेशन (PR) एजेंसियों को डिजिटल और इंफ्लुएंसर इकोनॉमी की ओर मोड़ दिया है। आज कॉरपोरेट कम्युनिकेशन का बड़ा हिस्सा यूट्यूब, इंस्टाग्राम, एक्स और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय इंफ्लुएंसर्स के ज़रिये किया जा रहा है, जिनकी पहुंच सीधे ‘मास ऑडियंस’ तक है।
हालांकि, इसी बदलाव के बीच एक गंभीर चेतावनी भी उभर रही है। मीडिया एनालिस्ट्स सवाल उठा रहे हैं कि जिस तरह टीआरपी की दौड़ में टीवी न्यूज़ ने अपनी साख खोई, क्या वही संकट डिजिटल मीडिया और इंफ्लुएंसर आधारित पीआर मॉडल के सामने भी खड़ा है? फॉलोअर्स, व्यूज़ और रीच के पीछे भागते डिजिटल प्लेटफॉर्म्स में भी अगर विश्वसनीयता और सत्यता कमजोर होती है, तो ब्रांड्स का भरोसा वहां से भी डगमगा सकता है।
वरिष्ठ मीडिया प्रोफेशनल्स का कहना है कि अगर डिजिटल माध्यम भी “रीच ओवर क्रेडिबिलिटी” के जाल में फंसा, तो आने वाले समय में पब्लिक रिलेशन फिर से अपने मूल स्वरूप—वर्ड ऑफ माउथ—की ओर लौट सकता है। यानी भरोसेमंद व्यक्ति, वास्तविक अनुभव और सीमित लेकिन विश्वसनीय संवाद, जो किसी भी प्लेटफॉर्म से ज़्यादा असरदार साबित हो सकता है।
यह बहस अब केवल टीवी बनाम डिजिटल की नहीं रही। यह सवाल मीडिया की आत्मा से जुड़ा है—क्या दर्शक और उपभोक्ता अंततः उसी माध्यम पर भरोसा करेंगे, जहां सच्चाई, पारदर्शिता और जिम्मेदारी होगी? अगर नहीं, तो चाहे टीवी हो या डिजिटल, दोनों के लिए भविष्य एक जैसा चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
मीडिया और पीआर इंडस्ट्री के लिए यह वक्त आत्ममंथन का है—क्योंकि तकनीक बदल सकती है, प्लेटफॉर्म बदल सकते हैं, लेकिन भरोसे का संकट अगर गहराया, तो पूरी व्यवस्था को फिर से ज़ीरो से शुरू करना पड़ सकता है।


