विमल दीक्षित-
ऐसा कैसे हो सकता है कि रिपोर्टर अपने मालिक को ना पहचाने। मगर मेरे साथ तो ऐसे ही हुआ। कभी मिले ही नहीं थे तो पहचानते क्या। हां, उनके बड़े भाई जो प्रधान संपादक थे उनकी तस्वीर जरूर देख रखी थी सामने आते शायद पहचान लेते। पर यहां तो मेरठ और देहरादून संस्करण के मालिक कम डायरेक्टर से कभी सामना ही नहीं हुआ। हां, यह जरूर था कि उनकी आदतों के बारे में विस्तृत जानकारी सहकर्मियों ने दे रखी थी। काफी तुनक मिजाज थे। बात-बात में बौखलाना उनका शगल था। कब क्या फैसला ले लें कुछ पता नहीं। अखबार में काम करने वाले लोग उनके सामने जाने से नजरें बचाते थे। यह सारी खूबियां हमको बता रखी गई थीं।
हमारे साथ जो किस्सा हुआ वह यह था कि समाचार पत्र के अपराध संवाददाता एक सप्ताह की छुट्टी पर थे। हमसे कह दिया गया था की अपराध से संबंधित समाचार आप देख लीजिए। जब की क्राइम रिपोर्टिंग में मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं था। मगर संपादक जी कह रहे थे तो करना ही पड़ा। उस समय उत्तराखंड राज्य नहीं बना था। संभावना लग रही थी की कभी भी उत्तराखंड राज्य की घोषणा हो जाएगी और देहरादून उसकी राजधानी बनेगी। यह सोचकर नंबर एक कहे जाने वाले समाचार पत्र ने अपनी यूनिट देहरादून में लगा दी थी। वही हम पत्रकार के रूप में मजदूरी करते थे।
उस समय देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आनंद कुमार थे जो अभी कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश के डीजी पद से रिटायर हुए हैं। एक शाम खबरों के सिलसिले में आनंद कुमार के साथ बैठा हुआ था। गपशप चल रही थी। तभी इंटरकॉम की घंटी बजी। कुमार साहब ने इंटरकॉम पर कहा कि उन्हें अंदर भेज दीजिए। उनके यह कहते ही दो लोग अंदर आए और कुर्सियों पर बैठ गए। मगर हमें इससे क्या कौन आया कौन नहीं। हम जल्दी-जल्दी कॉफी पीने में लगे थे कि कॉफी जल्दी खत्म हो और हम दफ्तर की ओर भागे। अपनी बीट की खबरें तो लिखनी ही थीं। क्राइम को अलग से झेलना था।
तभी अचानक आनंद कुमार ने एक लंबे से शख्स की ओर इशारा करके कहा कि इन्हें पहचानते नहीं। हमने तब उन सज्जन को बड़े ध्यान से देखा और जवाब दिया कि नहीं। कभी नहीं देखा ना कभी मुलाकात हुई। आनंद कुमार की आंखें चौड़ी हो गई। शायद सोचने लगे यह कैसा बंदा है कि जो अपने अखबार के मालिक को नहीं पहचान रहा।
एक मिनट सोचने के बाद वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने हमसे कहा यह तुम्हारे समाचार पत्र के डायरेक्टर कम संपादक हैं। आनंद कुमार के यह शब्द सुनते एकदम से हमें करंट लगा। अब हमारे बौखला जाने की बारी थी। टांग पर टांग हम चढ़ाए बैठे थे। बिल्कुल सीधी मुद्रा में आ गए। हमने उनको नमस्कार किया और नाम बताया। जवाब में उन्होंने न सर हिलाया ना कोई प्रतिक्रिया दी। अब रुकना वहां ठीक नहीं था। हमने आनंद कुमार से इजाजत ली और जल्दी से वहां से खिसक लिए।
बाहर निकल कर हमने तुरंत समाचार पत्र के महाप्रबंधक अजय मिश्रा जी को फोन किया। सारा घटनाक्रम बताया। मिश्रा जी ने हताश होकर कहा कि तुमसे तो ऐसी उम्मीद रहती है कुछ ना रोज जरूर बवाल होगा। बोले देखते हैं तुम्हारी नौकरी कैसे बचती है पूरी कोशिश होगी नौकरी न जाए। तुम जल्दी ऑफिस पहुंचो।
जब हम ऑफिस पहुंचे तो सब में हमारी चर्चा और हंसी के ठहाके गूंज रहे थे। अंदेशे के मुताबिक डायरेक्टर महोदय का फोन महाप्रबंधक के पास पहुंचा। तमाम लानत मलानत दी गई। कहा कि कैसे गधों को भर्ती कर लिया है जो अपने मालिक को नहीं पहचानते। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के सामने हमें काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ी।
महाप्रबंधक ने कहा यूनिट के अधिकांश लोग आपको नहीं पहचानते होंगे क्योंकि कभी आपसे उनका वास्ता ही नहीं पड़ा। विमल दीक्षित का कभी आपसे वास्ता नहीं पड़ा। ऐसा इसलिए हो गया। बहरहाल, राम-राम करते किसी तरीके से यह मसला निपटा और नौकरी बची रही।
हरिद्वार में पोस्टिंग हुए हफ्ते दस दिन बीते थे कि देहरादून से टेलीफोन आया कि प्रधान संपादक हरिद्वार के एक आश्रम में रुकेंगे। रात्रि वहीं बिताएंगे और सुबह विश्वविद्यालय के भूमि पूजन पर विशिष्ट अतिथि के तौर पर शामिल होंगे। भूमि पूजन की बेहतर कवरेज होनी चाहिए। समस्त संस्करणों में यह समाचार जाना है।
यहां तक तो सब ठीक था लेकिन शाम होते-होते ऐसी अफरातफरी मची लगा कि जरा सी चूक हुई तो नौकरी बचाना मुश्किल हो जाएगा। देहरादून से तत्कालीन संपादकीय प्रभारी दिनेश चंद भी हरिद्वार पहुंच चुके थे। अचानक देहरादून से संदेश आया के प्रधान संपादक आश्रम में नहीं रुकेंगे। वहां का शौचालय उनके योग्य नहीं है। तुरंत उनके रुकने की व्यवस्था की जाए। हम हरिद्वार के लिए बिल्कुल नए थे, कोई नहीं जानता था सिवाय स्टाफ के। दिनेश जी भी माथा पकड़कर बैठ गए। रात हो रही है और अचानक कहां प्रधान संपादक के रुकने की व्यवस्था की जाए।
तभी नाम याद आया संकट मोचन गोपाल रावत का। गोपाल रावत कई दशक से दैनिक जागरण से जुड़े थे और हरिद्वार में उनकी गिनती वरिष्ठतम पत्रकारों में थी। तत्काल गोपाल जी को फोन किया और कहा प्रधान संपादक के लिए ठहरने का अच्छे से अच्छा प्रबंध तुरंत करें। गोपाल जी ने बिना देर लगाए समस्या चुटकी में सुलझाई और बोले की वर्ल्ड बैंक के गेस्ट हाउस में संपादक जी के ठहरने की व्यवस्था करा रहे। 2 मिनट में गोपाल जी का फिर फोन आ गया कि व्यवस्था हो गई है प्रधान संपादक जी को मैसेज करवा दें।
थोड़ी देर में हम लोग भी गेस्ट हाउस पहुंच गए। कुछ मिनट में प्रधान संपादक जी भी आ गए। अंदर जाकर कमरा देखा। संपादक जी कमरे की व्यवस्था से संतुष्ट थे। अचानक बोले हमको छाछ पीने की आदत है सुबह उसकी व्यवस्था कर दें। अब यह एक और आफत सिर आ गई थी कि सुबह-सुबह कहां से छाछ इनको उपलब्ध कराई जाए। गोपाल जी फिर संकट मोचन बने। बोले सुबह छाछ की व्यवस्था हो जाएगी।
खैर हम लोगों की भी एक सरकारी गेस्ट हाउस में किसी तरह रात बीती और सुबह होते ही वर्ल्ड बैंक के गेस्ट हाउस की तरफ चल पड़े। प्रधान संपादक कम अखबार के मालिक बाहर ही टहलते लान में मिले। हम लोगों को देखकर संपादक जी भड़क गए। बोले कहां ठहरा दिया। रात भर मच्छरों ने सोने नहीं दिया। बहुत गंदी व्यवस्था है यहां की। हम बेचारे क्या बोलते। फिर बोले छाछ का प्रबंध हो गया। गोपाल जी ने तुरंत डब्बा और गिलास पकड़ा दिया। ठीक है मैं अंदर जा रहा हूं थोड़ी देर बाद मिलना।
10 -15 मिनट बाद वह बाहर आए। चलो हर की पैड़ी पर चलना है। गंगा नहाऊंगा। सुबह के समय हर की पैड़ी पर भीड़ भाड़ होती है। उस दिन भी भीड़ थी। उनका ड्राइवर ब्रीफकेस लिए आगे-आगे। उसके पीछे संपादक जी और हम दोनों। घाट पहुंच कर फिर बोले। गंगा तो नहा लूंगा लेकिन कपड़े कहां चेंज करूंगा। हमने कहा कि यहां पर चेंजिंग रूम नहीं है। सब ऐसे ही नहाते और तौलिया से अपने कपड़े बदल लेते हैं। आप भी नहाने के बाद तौलिया से अंडरवियर बदल लेना और कपड़े पहन लीजिएगा। उनका मूड उखड़ गया। कहा ऐसी जगह क्या नहाना जहां चेंजिंग रूम ना हो। कोई देख लेगा तो भारी बदनामी होगी हमें नहीं नहाना है चलो वापस चलो।
हम क्या कर सकते थे। बोल भी नहीं सकते थे नौकरी जो बचानी थी। हर की पैड़ी से बाहर निकलकर आए और अपनी कार में बैठ गए। उनकी गाड़ी आगे-आगे हम दूसरी गाड़ी में पीछे-पीछे। तकरीबन 2 किलोमीटर जाकर गाड़ी अचानक रुक गई। गाड़ी का सीसा खोलकर बोले हमें कपड़े बदलने हैं कहीं पर कपड़े बदलने की व्यवस्था करो। खैर बगल में ही एक धर्मशाला थी। वहां के मैनेजर से रिक्वेस्ट कर एक रूम खुलवा दिया। प्रधान संपादक जिन्हें कानपुर में होनोलूलू वाले संपादक जी भी कहा जाता था। कमरे के अंदर गए और करीब 10 मिनट बाद वहां से कपड़े बदलकर बाहर निकले।
इस बार उनका बिल्कुल बदला हुआ रूप था। उनके शरीर पर चमचमाती क्रीम कलर की मलमल की धोती और कुर्ता था। स्मार्ट से लग रहे थे। बोले विश्वविख्यात आश्रम वालों का विश्वविद्यालय खुल रहा है इसलिए हमें भी उस तरह से कपड़े पहनने चाहिए। हमने भी यही सोचकर धोती कुर्ता पहना। चलिए अब प्रोग्राम में चलना है। कहीं भी नहीं रुकना है। 10 मिनट के भीतर हम सभी लोग भूमि पूजन स्थल में पहुंच गए। उनकी गाड़ी पार्क हुई। पीछे से हमारी भी गाड़ी पार्क हुई। प्रधान संपादक जी कार से उतरे। हम और दिनेश जी भी जल्दी से अपनी गाड़ी से उतरे और संपादक जी के समक्ष खड़े हो गए।
उन्होंने हम लोगों को देखा। हम लोगों को देखते ही उनका फिर मूड ऑफ हो गया। भड़क गए और बोले। अब क्यों पिंड पड़े हो मेरे। अब तो मुझे मुक्ति दो और जाओ यहां से। हम बोले सर यहां पर विश्वविद्यालय का भूमि पूजन है और हम लोगों को इसकी कवरेज भी करनी है। हां-हां ठीक है करो कवरेज। लेकिन हमसे अब बात करने की जरूरत नहीं है हम यहां से निकलकर सीधे दिल्ली जाएंगे। यह कहकर लंबे डग भरते मंच की ओर बढ़ गए। आयोजकों की नजर उन पर पड़ी तो वह संपादक जी की खिदमत में लग गए।
आधे एक घंटे में कार्यक्रम खत्म हुआ और हमको और दिनेश जी को वहां से मुक्ति मिली। प्रबंध तंत्र के अलग से सांसें अटकी थीं। कहीं कुछ गड़बड़ ना हो जाए। ऑफिस पहुंचकर प्रबंधन को बता दिया संपादक जी दिल्ली की ओर रवाना हो गए। इस संदेश से उनको भी तसल्ली मिली। इस तरह से थी हमारी प्रधान संपादक से खट्टी मीठी मुलाकात। हम लोग जब भी मिलते इस घटना का जिक्र जरूर करते और हंसी के ठहाके लगाते कि कैसी उसे रोज आफत आ गई थी।


