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दिव्य हिमाचल अख़बार की बड़ी हार, माली को सौ फीसदी वेतनमान के साथ बहाली के आदेश

शशिकांत सिंह-

हिमाचल प्रदेश के दैनिक समाचार पत्र दिव्य हिमाचल के प्रबंधन की लेबर कोर्ट धर्मशाला में चल रहे अवैध सेवा समाप्‍ति के मामले में बड़ी हार हुई है। सुनील कुमार बनाम मैसर्ज दिव्य हिमाचल प्रकाशन प्राईवेट लि. मामले में कोर्ट ने माली के पद पर तैनात सुनील कुमार के मौखिक सेवा समाप्‍ति और उसे अपना कर्मचारी ना स्वीकारने के मामले में लेबर कोर्ट धर्मशाला ने 31 जुलाई को फैसला सुनाया था।

लेबर कोर्ट में माली के पद पर तैनात इस गरीब कर्मचारी के मामले की पैरवी वरिष्ठ पत्रकार एवं न्यूज पेपर इम्लाइज यूनियन आफ इंडिया के अध्यक्ष रविंद्र अग्रवाल ने बतौर एआर की। उन्होंने वादी श्रमिक का पक्ष मजबूती के साथ रखा और एक लैंडमार्क जजमेंट हासिल करने में सफलता पाई। ज्ञात रहे कि सुनील कुमार को प्रतिवादी कंपनी ने माली के पद पर बिना किसी नियुक्ति पत्र के जुलाई 2011 में अपने मुख्यालय में रखा था, मगर उसका नाम नियमित कर्मचारियों के रिकार्ड में शामिल नहीं किया था। ना तो उसे सैलरी स्लिप दी जाती थी और ना ही पीएफ व अन्य वेतन लाभ दिए जाते थे। सैलरी उसे कैश इन हैंड ही दी जाती थी। एक छदम रिकार्ड के जरिये कई अन्‍य कर्मचारियों की तरह उसे भी तैनात करके रखा गया था ताकि उसे नियमित अखबार कर्मचारियों को मिलने वाले लाभों और श्रमजीवी पत्रकार एवं गैर पत्रकार कर्मचारियों के लिए घोषित मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतनमान से महरूम रखा जाए।

वादी ने अपने क्‍लेम में यह भी वाद उठाया था कि उसकी सेवासमाप्‍ति मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतनमान मांगे जाने के चलते की गई। उसने 24 अप्रैल, 2018 को मजीठिया वेजबोर्ड के तहत संबंधित प्राधिकारी के पास वर्किंग जर्नलिस्‍ट एक्‍ट की धारा 17(1) के तहत रिकवरी का केस फाइल किया था। कंपनी को दिनांक 03 मई, 2018 को संबंधित प्राधिकारी ने नोटिस जारी करके जवाब मांगा, तो प्रतिवादी ने वादी पर रिकवरी का केस वापस लेने का दबाव बनाया, मगर वह नहीं माना। इस पर प्रतिवादी ने दिनांक 15 मई, 2018 को वादी को नौकरी से हटा दिया और वादी का संस्‍थान में प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया।

वादी के लेबर कोर्ट में दाखिल क्‍लेम के जवाब में कंपनी का लिखित उत्‍तर था कि वादी उसका कर्मचारी है ही नहीं, उसे तो कंपनी के सीएमडी ने घर पर निजी नौकर के तौर पर रखा था और वही उसे अपनी जेब से ही मेहनताना देते थे। जबकि इस केस में अहम साक्ष्य के तौर पर वादी द्वारा लोन लेने के लिए कंपनी से मांगी गई फरवरी, 2012 की एक मात्र सेलरी स्लिप ने डूबते के लिए तिनके का सहारा बनने का काम किया। यह सेलरी स्लिप भी उस बैंक के रिकार्ड में लगी हुई थी, जिससे उसने लोन लिया हुआ था। सेलरी स्‍लीप को लेकर प्रतिवादी ने अजीब तर्क था कि यह तो वादी को लोन देने के लिए मानवीय आधार पर जारी की गई थी।

वहीं बैंक के मैनेजर ने वादी के गवाह के तौर पर कोर्ट में उपस्‍थित होकर इस सेलरी स्लिप को प्रूव किया, जिसमें सुनिल कुमार के नाम और पद के अलावा उसकी डेट ऑफ ज्वाइनिंग नवंबर, 2011, विभाग का नाम और वेतनमान लिखा गया था और कंपनी की अथॉरिटी के हस्ताक्षर व मुहर भी लगी हुई थी।

इसके अलावा वादी कर्मचारी ने तीन पूर्व कर्मचारियों की गवाही भी करवाई। वहीं इन गवाहों में से एक पूर्व कर्मचारी ने अपनी गवाही में बताया कि किस तरह कंपनी अपने कर्मचारियों का छद्म रिकार्ड बनाती है, जैसा कि उसके साथ किया गया था। कंपनी ने गवाह के इसी लेबर कोर्ट में लंबित मामले में यह तो स्वीकार किया था, वह उसका कर्मचारी है, मगर कर्मचारियों के रिकॉर्ड में ना तो उसका नाम था और ना ही उसे बैंक के माध्यम से सेलरी दी जाती थी। उसे पहले बैंक अकाउंट के माध्यम में सेलरी दिए जाने के बाद अचानक बंद कर दिया गया था और कैश इन हैंड सेलरी दी जाने लगी थी। इससे साबित हुआ कि कंपनी ने कर्मचारियों का रिकॉर्ड नियमानुसार नहीं रखा है। साथ ही कंपनी के स्टैंडिंग ऑर्डर भी सत्यापित नहीं हैं। वहीं जो रिकॉर्ड कोर्ट में दाखिल किया गया वो भी नियमानुसार नहीं तैयार किया गया था।

इस तरह कोर्ट ने सभी गवाहों और साक्ष्यों के आधार पर पाया कि कर्मचारी ने खुद को प्रतिवादी कंपनी का कर्मचारी साबित करने के लिए जरूरी प्रारंभिक सक्ष्या मुहैया करवाने का अपना भार या दायित्व पूरा किया है। वहीं कंपनी की ओर से कोर्ट में प्रस्तुत एक मात्र गवाह के माध्‍यम से कंपनी अपना पक्ष रखने में विफल रही। वहीं जिस गवाह को कोर्ट में उतारा गया, उसकी नियुक्‍ति ही कर्मचारी की सेवासमाप्‍ति के बाद हुई थी, जिसनेे जिरह में ही स्‍वीकार कर लिया था कि वह अपनी नियुक्‍ति से पूर्व के कंपनी के मामलों के बारे में परिचित नहीं है। उसकी नियुक्‍ति अक्‍तूबर 2019 में हुई है।

वहीं कंपनी यह भी साबित नहीं कर पाई कि वादी को कंपनी के सीएमडी ने निजी नौकरी के तौर पर रखा था। इस फैसले में लेबर कोर्ट ने वादी को जहां आईडी एक्‍ट की धारा 2(एस) के तहत कर्मचारी माना तो वहीं वर्किंग जर्नलिस्‍ट एक्‍ट की धारा 2(डीडी) की धारा के तहत गैर पत्रकार अखबार कर्मचारी मानाते हुए मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतनमान का हकदार भी बताया है।

कोर्ट ने अपने फैसले में कर्मचारी की दिनांक 15.5.2018 से की गई सेवासमाप्‍ति को निरस्‍त करते हुए वादी को वरिष्‍ठता और सेवा में निरंतरता के लाभ सहित 15.5.2018 सेे लेकर नौकरी बहाली तक की पूरा वेतनमान तीन माह के भीतर जारी करने के आदेश दिए हैं। ऐसा ना करने पर प्रतिवादी को अवार्ड की तिथि से लेकर आदेश के पालन तक 6 फीसदी ब्‍याज के साथ ये लाभ देने पड़ेंगे।

देखें कोर्ट ऑर्डर...

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