दैनिक जागरण की यह खबर दूसरे अखबारों में क्यों नहीं है?

Sanjaya Kumar Singh : आज के हिन्दी अखबारों में सिर्फ दैनिक जागरण ने खबर छापी है, “ईरान में 250 भारतीय कोरोना वायरस की चपेट में” हैं। हिन्दी के जो अखबार मैं देखता हूं उनमें ज्यादातर ने भारत में कोरोना की स्थिति से संबंधित खबर को लीड बनाया है और इसमें खास बात यह है कि देश में कोरोना से तीसरी मौत मुंबई में हुई।

नवभारत टाइम्स ने, “प्राइवेट लैब में भी होगा कोरोना टेस्ट” को लीड बनाया है। हिन्दुस्तान की इस खबर का शीर्षक है, “कोरोना : एनसीआर में खौफ, मुंबई में मौत”। ऐसे में जागरण की खबर अनूठी है। दिलचस्प यह है कि विदेश मंत्रालय ने इस खबर की पुष्टि नहीं की है इसके बावजूद जागरण ने इसे सात कॉलम में फैला दिया है। मेरा मानना है कि ऐसी खबरों के मामले में अखबारों को बहुत विवेक से संयमित होकर काम करने की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि विदेश मंत्रालय खबर की पुष्टि नहीं करे तो खबर न छपे पर ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि अपुष्ट खबर छप जाए। जागरण की खबर अगर सिर्फ उन लोगों के लिए है जो दूसरा अखबार नहीं पढ़ते हैं तो निश्चित रूप से उन्हें एक अपुष्ट खबर मिलेगी और खबर में ऐसा कुछ नहीं लिखा है जिससे पता जले कि अखबार ने इसकी पुष्टि की है कि नहीं या अखबार को यह खबर मिली कहां से? ऐसा नहीं है कि यह खबर मिल ही नहीं रही हो। यह खबर है लेकिन दूसरे अखबारों में इतनी प्रमुखता से नहीं है।

ईरान गए भारतीय तीर्थ यात्रियों के कोरोना से संक्रमित होने की खबर इंडिया टुडे ने पांच दिन पहले (वेबसाइट पर) दी थी। तब उनकी संख्या 120 थी और वे 13 मार्च को जैसलमर वापस पहुंचने वाले थे। आज की खबर दूसरे तीर्थ यात्रियों के बारे में है या वही यह स्पष्ट नहीं है। अखबार ने भारत की स्थिति के साथ ईरान गए भारतीयों की खबर का ऐसा घालमेल किया है कि खबर समझना मुश्किल है। जो दूसरा अखबार नहीं देखते हैं उनकी लाचारी का अनुमान इस खबर से लगाया जा सकता है। खबर में लिखा है, “ईरान में कोरोना वायरस से संक्रमित ज्यादातर भारतीयों में तीर्थयात्री हैं। भारत सरकार ने ईरान से इन सभी के लिए अलग क्वारंटाइन सेंटर देने को कहा है। ईरान के विभिन्न प्रांतों में करीब छह हजार भारतीय हैं, जिनमें लद्दाख, जम्मू-कश्मीर व महाराष्ट्र से गए 1100 तीर्थयात्री शामिल हैं। इनके सैंपल जांच के लिए भारत लाए गए थे। सरकार ने लैब के उपकरणों के साथ डॉक्टरों व चिकित्साकर्मियों का दल भी ईरान भेजा है, हालांकि, अभी लैब स्थापित नहीं हो सकी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने गत दिनों संसद में कहा था कि ईरान में जिन लोगों की जांच रिपोर्ट निगेटिव पाई जाएगी, उन्हें भारत लाया जाएगा। चार बैच में चार सौ भारतीय वापस भी लाए गए हैं। जिन भारतीयों की जांच रिपोर्ट पॉजिटिव मिलेगी, उन्हें ईरान में ही विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुरूप स्थापित आइसोलेशन सेंटर में रखा जाएगा और स्वस्थ्य होने पर ही उन्हें भारत लाने के बारे में फैसला होगा।”

मुझे लगता है कि इस खबर से कोरोना के मामले में स्थिति जानने से ज्यादा आप यह जानेंगे कि भारत सरकार ईरान के मामले में क्या कर रही है। इसमें खबर का स्रोत नहीं है और इसकी पुष्टि नहीं की गई है। खबर पुरानी जानकारी पर आधारित है और इसमें नया कुछ नहीं है। इस समय आपके काम की सूचना यह होगी कि कोरोना से बचने के लिए आपको क्या करना चाहिए, भारत सरकार आपके संदर्भ में क्या कर रही है आदि। भारत से कहां गए लोग कितनी संख्या में पीड़ित या संक्रमित हैं और भारत सरकार उनके मामले में क्या काम कर रही है यह खबर तो है पर ऐसी नहीं कि आपको देश में क्या हो रहा है यह नहीं बताया जाए। या ऐसे बताया जाए कि आप ढूंढ़ भी न पाएं। इसी तरह, कोरोना टेस्ट प्राइवेट लैब में भी होगा (नवभारत टाइम्स) कोई खबर नहीं है। क्यों नहीं होगा या नहीं हो रहा होता तो खबर होती। होगा यह तो सामान्य जरूरत है। इतने दिन लग गए यह तय होने में या आदेश देने में खबर वह भी होती।

नवभारत टाइम्स में विशेष संवाददाता की खबर है, “कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए केंद्र सरकार ने प्राइवेट लैब को भी इस बीमारी की जांच का अधिकार देने का फैसला किया है। प्राइवेट लैब से यह जांच फ्री में करने और संक्रमण फैलने से रोकने के लिए घर से ही सैंपल उठाने का आग्रह किया गया है। अभी सरकार इस टेस्ट को फ्री में कर रही है। पहले टेस्ट की 1500 और दूसरे पर 3 हजार रुपये लागत है। फार्मा कंपनी बायोकॉन की फाउंडर किरण मजूमदार शॉ ने कहा कि सरकार को टेस्टिंग में कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) फंड के इस्तेमाल की भी इजाजत देनी चाहिए।” खबर के इस पैराग्राफ में पहले तो कहा गया है कि अधिकार देने का फैसला किया है। जैसे बीमारी की जांच करना कोई ऐसा अधिकार है जो इन प्रयोगशालाओं को पहले से नहीं था अब दिया गया है। निजी प्रयोगशालाओं पर अगर सरकार को भरोसा नहीं है तो वे हैं क्यों और उन्हें पैसे लेकर जांच करने क्यों दिया जाता है। अगर ऐसा है तो यह अलग खबर है। पर दूसरे वाक्य में लिखा है, घर से ही सैंपल उठाने का आग्रह किया गया है। इससे लगता है कि मामला अधिकार देने का नहीं पैसे देने या नहीं देने का है। खबर से यह स्पष्ट नहीं है। विशेष संवादादाता की खबर ऐसे गोल-मोल नहीं होनी चाहिए। अभी सरकार इस टेस्ट को फ्री में कर रही है – ऐसी सूचना नहीं है कि छह कॉलम के लीड के पहले पैराग्राफ में हो। बाकी की बातें या सूचनाएं भी ऐसी ही हैं। इस शीर्षक या इंट्रो में ऐसा कुछ नहीं है कि इसे छह कॉलम में ताना जाए।

दैनिक भास्कर में भी कोरोना की ही खबर लीड है पर इसमें देश में कोरोना की मौजूदा स्थिति बताई गई है। फिर तीन कॉलम की दो खबरें हैं। एक तैयारी की और दूसरी रात की। एक में बताया गया है कि एक लाख जांच किट है , 20 लाख और मंगाई गई हैं। राहत के तहत बताया गया है कि रैंडम सैम्पलिंग की रिपोर्ट निगेटिव यानी फैलाव बेकाबू नहीं है। वैसे तो यह खबर दैनिक जागरण समेत सभी अखबारों में है पर यह प्रस्तुति वाकई राहत देने वाली है। ईरान में भारतीय को कोरोना होने की खबर इसमें भी कहीं नहीं है। इस खबर में तो नहीं ही, पहले पन्ने पर भी नहीं। पहले पन्ने की पहली खबर के बारे में यह बताना दिलचस्प होगा कि द टेलीग्राफ में आज यह खबर है, कोलकाता के अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ की आज की पहली खबर का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस प्रकार होता, इंग्लैंड से वापस आया कोलकाता का किशोर वायरस पॉजिटिव पाया गया। और अखबार ने इस एक मरीज की खबर को पांच कॉलम में दो लाइन के शीर्षक के साथ छापा है। बीच में वीरान सड़क की फोटो है पर खबर के साथ बताया गया है कि यह बंगाल में पहला मरीज है जिसे वायरस पीडि़त होना पक्का हो गया है। अखबार ने यह भी लिखा है कि राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने यह जानकारी दी। खबर में यह भी बताया गया है कि राज्य सरकार अब क्या कर रही है।

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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