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आज के अखबार : दस साल में प्रधान सेवक ने क्या किया बताने की बजाय आरएसएस के ‘वटवृक्ष’ होने का प्रचार

वटवृक्ष जैसे आरएसएस प्रचारक के शासन में देश की संस्कृति चाहे जितनी बची हो, लोग अपने बच्चों को न सिर्फ अंग्रेजी माध्यम में, बल्कि विदेशी स्कूलों में पढ़ाकर उनका भविष्य ‘फ्यूचर सेफ’ कर रहे हैं। यह विडंबना ही है कि ऐसे समय की सरकार दक्षिण में हिन्दी थोपने में लगी है और दक्षिण वाले इसका विरोध कर रहे हैं।

संजय कुमार सिंह

आज कई अखबारो में आरएसएस की प्रधानमंत्री की प्रशंसा लीड है। कहने की जरूरत नहीं है कि गुजरात के मुख्यमत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी की कथित सफलता और गुजरात मॉडल की लोकप्रियता के बाद आरएसएस ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार चुना था। संघ के समर्थन से 10 साल प्रधानमंत्री रह लेने के बाद अब नरेन्द्र मोदी अगर आरएसएस की प्रशंसा कर रहे हैं तो वह वैसे भी बहुत महत्वपूर्ण नहीं है और वैसे ही है जैसे सरकार से कोई पद या ईनाम पाने के बाद कोई सरकार की तारीफ करे। भले ही मोदी का मकसद आरएसएस का समर्थन पाते रहना ही हो। ठीक है कि आम पाठक इसे नहीं समझेगा पर संपादक नहीं समझें या समझकर भी लीड बना दें तो चिन्ता की बात है खासकर तब जब आरएसएस की तारीफ में कहा जाये कि, “संघ की राष्ट्रीय चेतना का विचार आज अमर संस्कृति का अक्षयवट बना” (अमर उजाला का शीर्षक)। सबको पता है कि पिछले 10 साल से ज्यादा समय से भारत में आस्था और अवैज्ञानिक सोच का भारी विकास हुआ है और उत्तर प्रदेश में कुम्भ के नाम पर जो सब हुआ उसके बाद नमाज पर रोक का कोई मतलब नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के बावजूद बुलडोजर न्याय रुक नहीं रहा है और हर अखबार की लीड आरएसएस की तारीफ है। द टेलीग्राफ के शीर्षक में भाजपा ने सत्ता का खेल शुरू किया, प्रधानमंत्री ने आरएसएस की तारीफ के पुल बांधे और जो कुछ कहा उसका अघोषित मकसद था मेरा समर्थन करें और इसलिये यह कोष्ठक में है। लेकिन नवोदय टाइम्स में लीड का शीर्षक है, मोदी बोले, संघ वट वृक्ष। उपशीर्षक है, प्रधानमंत्री बनने के 11 साल बाद आरएसएस मुख्यालय पहुंचे मोदी। इंडियन एक्सप्रेस ने भी इस बात को फ्लैग शीर्षक बनाया है – 2014 के बाद से संघ मुख्यालय का मोदी का पहला दौरा। आप जानते हैं कि देश में इस समय जो स्थितियां और संबंध हैं तथा पहले जो सब प्रचार किया गया है उसमें संघ मुख्यालय को मोदी का घर कहा जा सकता है। इसमें महत्वपूर्ण है कि देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशल बलिराम हेडगेवार के घर जा चुके हैं। यहां से पूर्व सीजेआई बोबडे सीधे संघ मुख्यालय पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और संघ के पूर्व सहकार्यवाह भैयाजी जोशी से भी हुई। कलकत्ता हाईकोर्ट के जज भाजपा टिकट पाकर चुनाव जीत चुके हैं।  

ऐसे में प्रचारक से प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी 10 साल संघ मुख्यालय नहीं गये यह संघ के लोगों के लिए तो खबर हो सकती है देश के लोगों के लिए इसका क्या महत्व है? सब जानते हैं कि अच्छी, बड़ी या दूर देश में नौकरी मिलने के बाद बच्चे घर नहीं जा पाते हैं। फिर भी यह खबर तो है ही। मेरी चिन्ता सिर्फ यह है कि इसे लीड बनाकर देश के पूरे माहौल को आरएसएस मय बनाने की कोशिश हो रही है जबकि देश पहले से आरएसएस मय है। दूसरी ओर, देश के प्रधानमंत्री ने इस दौरे के दौरान भी आरएसएस का प्रचारक होने की अपनी भूमिका ही निभाई है। 11 साल अगर प्रधानमंत्री आरएसएस मुख्यालय नहीं गये तो यह संघ और प्रधानमंत्री का निजी मामला है। इस दौरान यह सार्वजनिक किया जा चुका है कि प्रधानमंत्री छुट्टी नहीं लेते, रोज 18 घंटे काम करते हैं आदि। ऐसे में वे घर जाते तो छुट्टी लेनी पड़ती जबकि वे हार्डवर्क या परिश्रम को हावर्ड से बेहतर बता रहे थे। इसलिए नहीं गये होंगे और यह इतनी बड़ी बात तो नहीं है कि देश के ढेर सारे अखबारों में लीड बन जाये। मुद्दा यह था कि चौकीदार या प्रधानसेवक होने का दावा करने वाले ने देश के लिए क्या किया।  

रोज सुबह अखबार पलटते हुए मैं यही सोचता हूं कि अखबारों ने अपना काम पूरी तरह छोड़ दिया है और प्रचारक की भूमिका में हैं। ज्यादातर अखबार जब भाजपा आरएसएस के मुखपत्र की तरह काम कर रहे हैं तो सोशल मी़डिया का कितना महत्व है और उसे नियंत्रित करने के सरकार के प्रयासों का क्या मतलब है, समझना मुश्किल नहीं है। ऐसे समय में जो मीडिया संस्थान जनता के पैसों से चल रहे हैं वो अपनी खबरें पूरी तरह सार्वजनिक नहीं करते और सिर्फ पैसे देने वालों के लिए उपलब्ध है। उसमें एक खबर आई कि किरण बेदी ने 2003 में अपनी बेटी की निगरानी (सरकारी खर्च पर जासूसी) करवाई थी। उसमें उसके फर्जी वीजा रैकेट में शामिल होने के साथ 2003 के स्विस राजनयिक से बलात्कार के अनसुलझे मामले का सुराग मिला और इन सबपर कोई कार्रवाई नहीं हुई (खबर नहीं है)। किरण बेदी पर अपने रसूख से निजी मामले की जांच कराने के आरोपों को नजरअंदाज भी कर दिया जाये तो स्विस राजनयिक से बलात्कार के साथ वीजा बनवाने का रैकेट भी कम गंभीर नहीं है और इसकी जांच की कोई मांग या जरूरत समझने की खबर नहीं है।

मुझे लगता है कि किरण बेदी भाजपा राज में राज्यपाल रही हैं और पहले भी सरकार की दुलारी तो रही ही हैं। इसलिए इस मामले की जांच होनी चाहिये और सरकार को अपना पक्ष स्पष्ट कर देना चाहिये। दूसरी ओर, तथ्य यह है कि 2014 के बाद देश में तमाम मामलों की जांच नहीं हुई है और कई मामलों में सरकार बिना जांच सिर्फ आरोंपों पर भी कार्रवाई करती है और इसमें मुख्यमंत्री समेत अन्य निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को जेल भेजा जाना शामिल है। विपक्षी नेताओं को अपनी पार्टी में लेकर पद देना और वाशिंग मशीन पार्टी बन जाना अलग तमगा है जो किसी काम का नहीं है। दूसरी ओर, सरकार विरोधों को सुप्रीम कोर्ट से भी जमानत नहीं मिलना ओर अर्नब गोस्वामी को हफ्ते भर में जमानत मिल जाना भी उल्लेखनीय है। जज बीके लोया के निधन की जांच नहीं होना और झारखंड में एक जज की सड़क दुर्घटना में मौत के मामले की जांच कुछ ही साल में हो जाना जजों के राजनीतिकरण का उदाहरण लगता है।

यह सब छोड़कर सरकार की (और अखबारों की भी) चिन्ता दिल्ली हाईकोर्ट के जज के घर नकद मिलने की खबर है। मैं नहीं कहता कि यह कोई साधारण मामला है या इसकी जांच अथवा इसके तह में जाने की जरूरत नहीं है लेकिन इस मामले के सामने आने के बाद से ही उपराष्ट्रपति जैसे एनजेएसी को लेकर सक्रिय हुए हैं उससे लगता है कि सरकार मौके का फायदा उठाना चाहती है। दूसरी ओर, न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने जो कहा है उसका मतलब यही है कि उन्हें फंसाने की कोशिश हो सकती है। मेरा मानना है कि जनहित में ऐसे मामले तुरंत स्पष्ट होने चाहिये वरना कल ही खबर थी कि, चंडीगढ़ की अदालत ने 2008 के भ्रष्टाचार मामले में जस्टिस निर्मल यादव को बरी किया। अगर जज के मामले में भ्रष्टाचार का मामला निपटने में 17 साल लगेंगे तो न्याय किसे मिलेगा या मिल रहा है क्योंकि न्याय के मामले में कहा जाता है कि देर से मिला न्याय, न्याय नहीं होता है। न्यायमूर्ति यादव के खिलाफ मामला तब शुरू हुआ था, जब 15 लाख रुपये से भरा एक बैग ‘गलती से’ एक अन्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति निर्मलजीत कौर के घर पर पहुंच गया था। कल की खबरों से यह पता चो चला कि न्यायमूर्ति यादव आरोपों से बरी हो गई हैं पर वो पैसे किसके लिए थे इसकी जानकारी खबरों में नहीं है।

इस मामले में मुख्य आरोपी का देहांत हो चुका है। इस तरह किसी ने 15 लाख रुपये लगाकर न्यायमूर्ति को बदनाम करने में कामयाबी हासिल कर ली और व्यवस्था यह है कि निर्मल यादव, निर्मल कौर और निर्मल सिंह के साथ पैसे भेजने वाले का विवाद नहीं सुलझा और कहानी साफ नहीं हुई कि सही पैसा किसी का किसी को चला गया, फंसाने के लिए ही किया गया या फंसाना किसी को था, कोई और फंस गया जैसे मामले साफ नहीं हुए और भाविष्य में भी ऐसा करने की गुंजाइश रखी गई है। यही नहीं, इतना समय लग गया, पीड़ित को किसी तरह की भरपाई नहीं होगी। दूसरी ओर, अगर आप सार्वजनिक तौर पर पूछ लें कि हर चोर का नाम XXXX क्यों होता है तो कोई XXXX आपके खिलाफ मुकदमा कर सकता है और आपको अधिकतम सजा दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा लड़ने की हैसियत नहीं हो तो जेल भोगनी होगी और कोई अमित शाह जैसा गृहमंत्री हो तो सजा होने के बाद चारा चोर कह सकेगा क्योंकि बाकी मामलों में क्लीन चिट दिये और लिये जाते रहे हैं।

कानूनन लागू यादव सजा होने के बाद चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। आज अमित शाह के इस बयान की खबर को हिन्दुस्तान टाइम्स ने पहले पन्ने पर दो कॉलम में छापा है। शीर्षक है, बिहार चुनाव के लिए जोर लगाने के क्रम में अमित शाह ने लालू यादव पर हल्ला बोला, राजग नेताओं से मुलाकात की। जाहिर है, सरकार को लालू यादव से नहीं, उनके बेटे की चिन्ता है और इसलिए वह जनहित के इन मामलों से ज्यादा चिन्ता एनजेएसी की कर रही है। न्यायमूर्ति यशंवत वर्मा पर लगा दाग सही हो या नहीं, धुले या नहीं – सरकार की प्राथमिकता में नहीं है क्योंकि कॉलेजियम से उसे चुनाव आयुक्त या सीबीआई / ईडी प्रमुख बनाने जैसे अधिकार नहीं मिल रहे हैं।  और अधिकार हासिल करना जरूरी है। क्यों? बताने की जरूरत नहीं है। यह सब तब जब मीडिया अगर एक साथ तय कर ले तो जनहित मुद्दा हो सकता है लेकिन उसने सरकार और मोदी हित साधने का ही फैसला किया हुआ है। यही नहीं, सरकार के इरादे भी स्पष्ट हैं। आज इंडियन एक्सप्रेस की सेकेंड लीड का शीर्षक है, जज विवाद के बीच कांग्रेस न्यायिक जिम्मेदारी पर एक विधेयक के पक्ष में है लेकिन एनजेएसी को पुनर्जीवित किये जाने को लेकर चिन्तित भी है। द हिन्दू में प्रधानमंत्री और आरएसएस के प्रचार की खबर लीड नहीं है। यहां उड़ीशा में रेल दुर्घटना की खबर लीड है। इसमें ट्रेन पटरी से उतर जाने और एक व्यक्ति के मारे जाने की खबर लीड है। आज जब ज्यादातर अखबारों में प्रधानमंत्री द्वारा आरएसएस का प्रचार लीड है और कई अखबारों ने उनके कहे अनुसार आरएसएस को वटवृक्ष बताया है तब द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर खासतौर से दिलचस्प है। इसका शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, भारत अब अंतरराष्ट्रीय स्कूलों का दूसरा सबसे बड़ा मेजबान क्योंकि अभिभावक चाहते हैं कि बच्चों का भविष्य फ्यूचर प्रूफ हो। मुझे लगता है कि इसके लिए पहली जरूरत बच्चों को हिन्दी, संस्कृत और संभवतः उर्दू जैसी भाषाओं से दूर रखना है और दक्षिण में हिन्दी थोपने और इसके विरोध का कारण यह भी हो सकता है। जो भी हो, प्रधानमंत्री और उनकी सरकार जब आस्था और संस्कृति का महिमामंडन कर रही है, शहरी पढ़े-लिखे लोगों को अर्बन नक्सल कह रही है तब लोग अपने बच्चों का भविष्य सुनिश्चित करने के लिए उन्हें न सिर्फ अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ा रहे हैं भारत बल्कि विदेशी स्कूलों का दूसरा सबसे बड़ा मेजबान हो गया है. सरकार समर्थक समझें या नहीं, उनका भला हुआ हो या नहीं, बच्चों के मामले में जो ज्यादा खर्च कर सकते हैं वे समझ रहे हैं और जो नहीं समझ रहे हैं उनकी पीढ़ियां भुगतेंगी क्योंकि आरएसएस अपने विचार लोगों तक अंग्रेजी में तो पहुंचाने से रहा। ईवीएम पर भाजपा नेता की किताब जरूर अंग्रेजी में आई थी लेकिन उसपर  पार्टी को यू टर्न लेना पड़ा। दिलचस्प यह है कि हिन्दी के अखबारों जैसे हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स में आरएसएस के प्रचार की खबर लीड नहीं है लेकिन अंग्रेजी के इंडियन एक्सप्रेस के साथ दि एशियन एज में भी यही खबर लीड है।

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