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आज के अखबार : ईडी के दुरुपयोग, छापे की टाइमिंग और राजनीति पर कुछ नहीं; सिर्फ हेडलाइन मैनेजमेंट! 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनाव में भ्रष्ट आचरण का दोषी पाया था। उन पर सरकारी कर्मचारी, यशपाल कपूर की मदद लेने का आरोप था जिसका इस्तीफा बाद में हुआ। चुनाव अभियान में सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल भी किया गया था। इसलिए, इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया गया था। अभी ईवीएम, वोट चोरी पर जवाब नहीं है, एसआईआर चल रहा है। करोड़ों वोटर हटा दिए गए और यह नियमानुसार नहीं है। फिर आवेदन लेकर नाम लिखना परेशान करना तो है ही। ऐसे एसआईआर की जरूरत क्यों पड़ी, किसने महसूस की, किसने फैसला किया और खर्च के लिए पैसे कैसे मंजूर हुए – जैसी बुनियादी जानकारी नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का मसला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और सब चंगा सी।

संजय कुमार सिंह

इसमें कोई दो राय नहीं है कि आई-पैक के कलकत्ता कार्यालय पर ईडी की छापामारी एसआईआर और चुनाव के समय राजनीतिक विरोध से बचने या निपटने की तैयारी के बिना की गई थी। ईडी के काम के रिकार्ड से उसकी बदनीयती का भी संदेह होता है फिर भी ईडी से नहीं पूछा गया कि छापा इस समय क्यों पड़ा, उसने क्या तैयारी की थी और मामले को राजनीतिक होने से रोकने के लिए कोई सावधानी बरती थी कि नहीं। यह भी नहीं पूछा-बताया गया है कि बाकी जगहों पर क्या हुआ, क्या मिला। यह तो नहीं ही है कि 2020 के मामले में छापा अभी ही क्यों जरूरी था। तथ्य यह है कि तृणमूल कांग्रेस ने अपनी चुनावी रणनीति और प्रचार प्रबंधन के लिए इंडियन पॉलिटिकल ऐक्शन कमेटी (आई-पैक) के साथ 2021 में एक आधिकारिक अनुबंध किया था। इसे बाद में 2026 तक बढ़ा दिया गया। अनुबंध को जारी रखने की घोषणा से यह स्पष्ट है कि आई-पैक पश्चिम बंगाल में टीएमसी की चुनावी टीम के रूप में काम कर रहा है। इसका लक्ष्य अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी को सफलता दिलाना ही हो सकता है। ऐसे में पार्टी की रणनीति, योजनाएं आदि आई-पैक के कार्यालय में हो सकती हैं। यह सामान्य समझ है और घोषणा सार्वजनिक है इसलिए ईडी को पता होना चाहिए था। अगर वह छापे जैसी कार्रवाई कर रहा है तो पता किया होगा, नहीं पता होने का कोई मतलब नहीं है। आई-पैक राजनीतिक सलाह देने और चुनावी रणनीति बनाने वाली कंपनी है। यह डेटा, प्रचार रणनीति, सोशल मीडिया, वोटर-एंगेजमेंट आदि में राजनीतिक की मदद करती है। ऐसे में आई-पैक के कार्यालयों पर छापे से उस पार्टी के कार्यकर्ताओं-नेताओं में चिन्ता होना स्वभाविक है और वे अपने डेटा तथा दस्तावेजों के लिए परेशान होंगे ही। इनकी सुरक्षा उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता होगी और ममता बनर्जी ने यही किया है। यह सामान्य और स्वभाविक है।

ईडी को इसके लिए तैयार रहना चाहिए था या इससे कानून व्यवस्था की समस्या नहीं हो इसकी पूर्व व्यवस्था करनी चाहिए थी। इसका सबसे सामान्य तरीका यही हो सकता था कि छापा और पहले पड़ गया होता या कुछ समय बाद पड़ता। ईडी का काम जिस ढंग से चलता रहा है उसमें अभी ही छापा मारने की कोई जरूरत नहीं थी। आश्चर्य यह है कि सरकार और मीडिया दोनों इस मामले में चुप हैं। खबरों के अनुसार आई-पैक कार्यालयों पर हाल का छापा किसी कोयला घोटाले के सिलसिले में हुआ है। सुनने में यह अटपटा लगता है कि चुनावी रणनीति बनाने वाली कंपनी पर कोयला घोटाले का मामला है। ईडी ने जब ऐसी कंपनी पर छापा मारा तो उसे यह स्पष्ट करना चाहिए था लेकिन एक्स पर ईडी का बयान भारतीय जनता पार्टी के बाद आया और तृणमूल कांग्रेस ने इसे भी हाईलाइट किया है। दोनों के शब्द एक जैसे हैं, इसकी भाषा और शब्दावली भी सरकारी कम राजनीतिक ज्यादा है – सो अलग। ईडी कोयला घोटाला की जांच पीएमएलए के तहत कर रहा है। आरोप है कि रकम हवाला नेटवर्क के जरिए स्थानांतरित की गयी। आई-पैक से इसका संबंध यही है कि इसमें से कुछ पैसे उसे भी मिले (हो सकते) हैं। अव्वल तो विपक्षी दलों के खिलाफ ऐसी सूचनाओं का संज्ञान लेना जांच, सबूत और उसमें भी पांच साल से ज्यादा का समय अलग मुद्दा है लेकिन आई-पैक पर जांच जरूरी और जायज भी हो तो अभी ही क्यों, चुनाव के बाद क्यों नहीं और पहले क्यों नहीं। अगर यह सब सामान्य है, छापा राजनीतिक दल पर नहीं है तो क्या ईडी को यह अनुमान नहीं था कि यह राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। क्या ईडी को तृणमूल की राजनीतिक फाइलें खुद नहीं दे देनी चाहिए थी। अगर छापे का तृणमूल से संबंध ही नहीं था तो कहा जा सकता था कि तृणमूल की या चुनावी फाइलें अलग रखी हैं उन्हें देख-दिखा कर पार्टी को दे दिया जाएगा या जब्त नहीं किया जाएगा। मुख्य मंत्री अगर उठा ले आईं तो मतलब यह भी है कि उनके पहुंचने पर भी यह पेशकश विश्वसनीय तरीके से नहीं की गई। इसलिए मुझे तो छापे की यह कार्रवाई हर तरह से, तमाम कारणों से संदिग्ध लग रही है।

तृणमूल सांसद डेरेक ओ’ब्रायन के साथ पुलिस का दुर्व्यवहार पहले भी हुआ है। वे बच्चों के लिए क्विज शो चलाते रहे हैं। उनके कितने ही प्रशंसक उनके साथ इस व्यवहार से दुखी होंगे। सरकार को इसकी चिन्ता नहीं है तो वोट कौन देता है और जो वोट देते हैं उन्हें भाजपा राज में पुलिस के इस व्यवहार से न जाने क्यों दिक्कत नहीं है। अनपढ़ और गालीबाज सांसदों का सम्मान और ईनाम अलग मुद्दा है।

वैसे भी, ईडी का रिकार्ड ऐसा नहीं है कि उसपर भरोसा किया जा सके और उसकी साख होती, तृणमूल के खिलाफ सबूत होने की आशंका होती तो किसी की हिम्मत ही नहीं होती कि वह जबरन फाइल छीन कर ले जातीं। यहां तो वे पेन ड्राइव में गृहमंत्री अमित शाह पर आरोप लगा रही हैं उनके खिलाफ सबूत होने का दावा कर रही हैं। आज के अखबारों में यह सब प्रमुखता से तो नहीं ही है। आप कह सकते हैं कि खबरों में ऐसे संदर्भ होते भी नहीं हैं लेकिन इस सरकार पर जो आरोप हैं, ईडी की जो कार्यशैली है उसमें मामला पूरी तरह राजनीतिक लग रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर आरोप अनुचित हैं। उनकी मजबूरी थी और ईडी की कार्रवाई व उसका समय तो अनैतिक है ही। यह हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए भी किया गया हो सकता है। आइए देखें आज की खबरें और शीर्षक क्या हैं। आज अखबारों की खबरों में ईडी के छापे की चर्चा, बाकी जगहों पर क्या मिला और क्या हुआ – कुछ भी प्रमुखता से नहीं है। ममता बनर्जी पर आरोप गंभीरता से हैं। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि ईडी का छापा उनकी चुनाव योजनाओं से संबंधित जानकारी चुराने की कोशिश थी। ईडी ने कोर्ट में कहा है – ममता बनर्जी जबरन डिजिटल उपकरण और दस्तावेज चुराकर ले गईं। अदालत में भारी भीड़ और हंगामे के कारण सुनवाई नहीं हो सकी और इसे बुधवार तक टाल दिया गया (द टेलीग्राफ)। दि एशियन एज का शीर्षक है, ममता बनर्जी लड़ाई को सड़कों पर ले आईं, चुनावी योजना चोरी करने की ईडी की कोशिश के रूप में देख रही हैं। जांच एजेंसियों के दुरुपयोग के खिलाफ दिल्ली में गृह मंत्रालय के समक्ष प्रदर्शन कर रहे तृणमूल कांग्रेस के कई सांसदों को जबरन रोक लिया गया। दिल्ली पुलिस ने सांसदों के साथ बाकायदा दुर्व्यवहार किया जबकि सरकारी एजेंसी की मनमानी (वे दुरुपयोग कहते हैं) के खिलाफ शिकायत बुलाकर, चाय पिलाकर भी सुनी जा सकती थी और यह भी संभव था कि उसके बाद कोई कार्रवाई नहीं होती जैसे सांसदों के साथ दुर्वयहार करने के बाद भी नहीं ही होनी है। सांसदों के साथ सरकार, मंत्री या सांसद दुर्वव्यहार करें तो समझा जा सकता है। वीडियो देखकर लगता है कि सिपाहियों और सुरक्षा गार्ड से कहा गया था कि दुर्व्यवहार किया जाए। फिर भी अखबारों की खबर तृणमूल के ही खिलाफ है उन्हें ही बुरी रोशनी में दिखा रही है जैसे छापे के खिलाफ प्रदर्शन करने गए या छापे का विरोध किया। छापा उचित हैं – इसका कोई लक्षण नहीं होने के बावजूद ऐसा मान लिया गया है और तृणमूल की कार्रवाई सही / सामान्य / नैतिक लगने के बावजूद उसे गलत साबित करने की कोशिश हुई है। भाजपा से मुकाबला गर्माया तो ममता सड़कों पर आईं (हिन्दुस्तान टाइम्स), अदालत में भीड़ और शोरगुल के चलते कलकत्ता हाईकोर्ट ने ईडी के छापों पर सुनवाई स्थगित कर दी (टाइम्स ऑफ इंडिया), बंगाल का मुकाबला डाटा वापस करने की मांग पर टीएमसी अदालत गई, राज्य (सरकार) ने ईडी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की (इंडियन एक्सप्रेस) ईडी की कार्रवाई के विरोध में ममता ने निकाला मार्च, बोलीं – अब सड़क पर होगा संघर्ष (देशबन्धु), ममता ने ईडी पर दर्ज कराई दो एफआईआर (नवोदय टाइम्स) और सड़क से हाईकोर्ट तक हंगामा ….(अमर उजाला)। 

भाजपा की राजनीति में विपक्षी सांसदों, महिलाओं और मुख्यमंत्रियों के साथ जो व्यवहार हो रहा है उसमें अनपढ़ों और गालीबाजों को मिलने वाले ईनाम का मुद्दा अलग है। कार्रवाई तो एक्स पर प्रधानमंत्री को फॉलो करने वालों के खिलाफ नहीं होती है। भ्रष्टाचार की जांच का दावा प्रचारित किया जा रहा है विरोधियों को बदनाम किया जा रहा है।

पूरी संभावना है कि देश की राजनीति में जो सब हो रहा है वह हेडलाइन मैनेजटमेंट के लिए हो। बंगाल में चुनाव हो तो उसे बदनाम किया जा रहा है ऐसा दिखाया जा रहा है जैसे ममता बनर्जी ने ईडी के छापे का विरोध किया जबकि उनका मकसद पार्टी के दस्तावेजों को संभालना था जिसमें पार्टी की चुनाव संबंधी रणनीतिक और जानकारी हो सकती है। इसे जब्त करके सरकार के पास पहुंचाना ईडी का काम नहीं हो सकता है लेकिन ममता बनर्जी के ऐसे आरोप के बावजूद ईडी या सरकार से ऐसा कोई सवाल नहीं है। उल्टे अमर उजाला की लीड है, गिरोह की तरह काम कर रहा था लालू परिवार, जमीन घोटाले  में आरोप तय। आज एक और खबर प्रमुखता से छपी है, भारत ने अमेरिका के इस दावे को खारिज किया कि व्यापार सौदा प्रधानमंत्री के कारण नहीं हुआ या रोक दिया गया। खबर के अनुसार लालू यादव का मामला 2004-2009 का है जब लालू यादव रेल मंत्री थे। चार्ज शीट में कहा गया है कि 4.39 करोड़ की जमीन 26 लाख रुपए में खरीदी। यह कीमत सर्किल रेट के अनुसार है। जाहिर है मामला बनता है लेकिन ऐसा हुआ कैसे और क्या यह दूसरों की मिलीभगत के बिना संभव होगा। जवाब यही हैं, यह उपहार के रूप में दर्ज है। मैं नहीं कहता कि यह भ्रष्टाचार नहीं है लेकिन है तो नियमों के अनुसार या नियमों का पालन नहीं हुआ तो उसके लिए भी कार्रवाई होनी चाहिए। नहीं हुई मतलब लालू निशाना थे। या सिस्टम ही गड़बड़ है। नरेन्द्र मोदी इसी सब को ठीक करने का दावा करके सत्ता में आए थे लेकिन अब चुनिन्दा कार्रवाई करते दिखते हैं। वाशिंग मशीन के मामले भरे हुए हैं। प्रधानमंत्री के भाई को नौकरी में तरक्की और अवैध कमाई कराने की भी शिकायत है और आंध्र प्रदेश कौशल विकास निगम से जुड़े धन के दुरुपयोग में मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू का नाम था। हाल में सीएजी की रिपोर्ट में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में घोटाले का आरोप है। पर जांच सिर्फ विरोधियों की होती है जबकि टू जी घोटाला और कांग्रेस के समय के कोयला घोटाले में भारी हंगामे और बदनामी के बावजूद किसी को सजा नहीं हुई।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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