साथियों की परेशानी देख एकत्र हुए लिखने-दिखने वाले पत्रकार, समिति बनाने का फैसला

अनिल सिंह-

  • पत्रकार संगठनों की बदहाली एवं धंधेबाज पत्रकारों की बढ़ती तादात से बढ़ी मुश्किल
  • बेरोजगार एवं गरीबी से जूझ रहे पत्रका‍रों के आर्थिक मदद पहुंचाने का लक्ष्‍य

-पहली बार हुआ इतना बड़ा जुटान

लखनऊ : राजधानी लखनऊ में अधिकारियों-मंत्रियों की खूबी तलाशकर उन्‍हें सम्‍मानित करती पत्रकारों की टोली या फिर अधिकारियों का जन्‍मदिन तलाशकर जबरिया केक-गुलदस्‍ताबाजी करती पत्रकारों की भीड़ आये दिन कहीं ना कहीं जुटती ही रहती है, क्‍योंकि इनमें से ज्‍यादातर का मूल पेशा पत्रकारिता नहीं बल्कि पत्रकारिता की दुकानदारी होती है। लिखने-पढ़ने में भी इनकी दिचलस्‍पी भी नहीं होती है। पढ़ने-लिखने, दिखने-बोलने वाले पत्रकारों के पास इतना टाइम नहीं होता है कि वह केक लेकर शिकार तलाशें या शिकार तलाशकर उसकी खूबी ढूंढे!

काम में व्‍यस्‍त पत्रकारों की अनदेखी के चलते ही जगह-जगह सम्‍मान बांटने और केक काटने वाले पत्रकारिता पर लगातार हावी होते जाते हैं। सिस्‍टम भी इनको ही असली पत्रकार मानता है, क्‍योंकि यह किसी भी अधिकारी-नेता के कार्यालय में चार घंटे बैठकर उसकी इतनी खूबी बता देते हैं, जिसकी जानकारी खुद उस अधिकारी-नेता को नहीं होती है। गदगद अधिकारी-नेता इन्‍हें ही पत्रकार मान लेता है। व्‍यस्‍त पत्रकार के पास इतना टाइम नहीं होता, जो नेता-अधिकारी की खूबी खोजे। कहने को जो पत्रकार संगठन और पत्रकार नेता हैं, उन्‍हें पत्रकारों की बजाय अपनी दुकानों की चिंता ज्‍यादा रहती है, लिहाजा वो भी उसी में बिजी रहते हैं।

इन व्‍यस्‍तताओं के बीच असली पत्रकारों की परेशानियां ज्‍यों की त्‍यों रह जाती हैं। इन्‍हें सुनने वाला कोई नहीं होता है। इन्‍हीं चिंताओं समेत पेशेगत तमाम परेशानियों को लेकर रविवार को राजधानी के भारतेंदु नाट्य अकादमी में लिखने-पढ़ने एवं दिखने-बोलने वाले पत्रकारों का जुटान हुआ। ज्ञानेंद्र शुक्‍ला, अखंड शाही, नवलकांत सिन्‍हा, उत्‍कर्ष मिश्रा जैसे पत्रकारों की पहल पर सैकड़ों जेन्‍युइन पत्रकार लंबे अर्से बाद एक जगह इकट्ठे हुए। इसमें रिपोर्टिंग से लेकर डेस्‍क के पत्रकार भी शामिल थे। कोरोना काल के दौरान बेरोजगार हुए तमाम पत्रकारों के हालत को लेकर भी चिंता जताई गई।

दरअसल, कोरोना काल के दौरान राजधानी के तमाम पत्रकार बेरोजगार हो गये। इनमें से कई पत्रकारों के पास लॉकडाउन के दौरान खाने तक को कुछ नहीं बचा था। ज्ञानेंद्र शुक्‍ला, राजीव श्रीवास्‍तव और उनके कुछ युवा सहयोगी पत्रकार साथियों ने आपस में मिलकर हैसियत के अनुसार बेरोजगारी और गरीबी झेल रहे कुछ साथियों की मदद की। बिना कोई फोटो खिंचे या हो हल्‍ला किये। कोरोनाकाल में साथियों की स्थिति देखकर ही आज की बैठक में तय किया गया कि कुछ ऐसा काम किया जाये ताकि केवल पत्रकारिता की नौकरी तक सिमटे साथियों के किसी परेशानी में आ जाने पर उनकी मदद हो सके।

पत्रकारिता के गिरते स्‍तर एवं बदतर होती स्थिति को लेकर भी चर्चा की गई। कवरेज के दौरान नौकरीपेशा पत्रकारों के समक्ष आने वाली परेशानियों को लेकर भी चिंता जताई गई। आरोप लगा कि तमाम अधिकारी दिन भर अपने आसपास मंडराने और फोटो खिंचाने वाले को ही पत्रकार मानकर काम करते हैं, जिससे किसी कार्यक्रम के कवरेज के दौरान असली पत्रकार पास वगैरह से वंचित रह जाते हैं, जबकि दुकानदारी करने वाले पत्रकार बनकर कॉलर टाइट किये रहते हैं। गौरतलब है कि राजधानी में तमाम ऐसे तथाकथित मान्‍यता प्राप्‍त पत्रकार हैं, जिन्‍हें एक पैरा भी ठीक ढंग से लिखने नहीं आता है, लेकिन वो सिस्‍टम की नजर में क्रांतिकारी होते हैं।

इस बैठक में तय किया गया कि राजधानी में चल रहे तमाम संगठनों के इतर एक ऐसा संगठन बनाया जायेगा, जिसमें कोई नेतागिरी, पद या लीडरशिप नहीं होगी। पत्रकारों की कुछ समितियां बनेंगी, जो उनसे जुड़ी तमाम प्रकार की समस्‍याओं को लेकर काम करेगी। आवश्‍यक हुआ तो सरकार से भी सामंजस्‍य बनाने का प्रयास करेंगी। ये समितियां साल-दो साल के लिये नहीं बल्कि तीन से छह महीने के लिये बनती और बदलती रहेंगी ताकि समिति से जुड़े पत्रकारों को नौकरी करने में कोई दिक्‍कत ना हो साथ ही कोई नेतागिरी या किसी की मोनोपोली ना चल सके। किसी प्रकार का विवाद भी उत्‍पन्‍न ना हो।

बैठक में यह भी तय किया गया कि इस संगठन से जुड़ने वाला प्रत्‍येक पत्रकार हर महीने एक न्‍यूनतम धनराशि देगा, जिससे फंड तैयार कराया जायेगा। इस फंड से मुश्किल में आने वाले पत्रकार साथी की आर्थिक मदद की जायेगी। कुछ साथियों को सम्‍मानित भी किया गया। बैठक में अनिल भारद्वाज, कुमार अभिषेक, धर्मेंद्र सिंह, विजय उपाध्‍याय, नवलकांत सिन्‍हा, अजीत खरे, जीतेश अवस्‍थी, अजीत सिंह, प्रदीप विश्‍वकर्मा, विवेक तिवारी ने अपने विचार रखे। इस दौरान आशीष सिंह, धर्मेंद्र ठाकुर, राजीव ओझा, पंकज चतुर्वेदी, अंकित श्रीवास्‍तव, प्रेमशंकर मिश्रा, परवेज अहमद, राघवेंद्र सिंह समेत कई दर्जन पत्रकार मौजूद रहे।

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One comment on “साथियों की परेशानी देख एकत्र हुए लिखने-दिखने वाले पत्रकार, समिति बनाने का फैसला”

  • Sanjog Walter says:

    अच्छा है अब कोई रज्जन कोई मनोज बगैर इलाज़ के नहीं रहेगा।

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