वर्तमान में हिन्दू समाज को निश्छल दिखाने के लिए तमाम ढ़कोसले हो रहे हैं। इनमें धर्म के नाम पर हो रहे राजनीतिक मंचनों में बड़े-बड़े पदों पर बैठे हुए लोग प्रतीकात्मक तौर पर किसी अनुष्ठान में दलित समाज के विद्वान को अग्रणी बना देते हैं तो कभी स्वच्छकार समाज के पैर धोने लग जाने का प्रहसन अंजाम दिया जाना शामिल है…

के पी सिंह-
इटावा जिले के ब्राह्यण बाहुल्य दादरपुर गांव में श्रीमद भागवत की कथा बांचने गये तीन लोगों की जाति पता चल जाने पर गांव वाले उग्र हो गये। उन्होंने शूद्र होते हुए भी व्यास गद्दी पर बैठने की हिमाकत करने के कारण तीनों लोगों की जमकर खबर ली। इनमें एक अनुसूचित जाति का व्यक्ति दोनों नेत्रों से दिव्यांग था इसलिए उसे तो उन्होंने सस्ते में छोड़ दिया लेकिन मुख्य कथा वाचक मुकुटमणि यादव और उनके शिष्य संतसिंह यादव के साथ अमानवीय व्यवहार की पराकाष्ठा कर डाली। इन दोनों को मारा पीटा गया, जमीन में इनकी नाक रगड़वायी गई, सिर मूड़ा गया, चोटी काटी गई और कहा तो यहां तक गया कि उन पर मानव मूत्र शुद्धिकरण के नाम पर फेंका गया।
हालांकि, मौजूदा निजाम भी मानता है कि शूद्र चाहे वे संपन्न पिछड़ी जाति के हों, चाहे अति पिछड़ी जाति के हों अथवा अनुसूचित जाति के हों जन्मना अपवित्र हैं इस मामले में बस उनके बीच डिग्री का फर्क हो सकता है इसलिए शूद्रों को धार्मिक कार्यक्रमों में बाहर तक ही सीमित रहना चाहिए। उन्हें यह जुर्रत कभी नहीं करनी चाहिए कि वे प्रवचन करें अथवा किसी अनुष्ठान को संपादित करायें। ऐसी गुस्ताखी करने पर संबंधित शूद्र को कड़ी सजा दी जानी चाहिए। इस नाते होना तो यह चाहिए था कि पुलिस को अपमानित हुए शूद्र कथा वाचकों के प्रति हमदर्दी न दिखाकर गांव वालों के करने में जो कसर रह गई थी वह उनके साथ पूरा करती लेकिन घटना इतनी विचलित कर देने वाली थी कि इटावा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक पर अंतरात्मा की आवाज हावी हो गई और उन्होंने व्यवहारिक स्थिति को भुलाकर कथा वाचकों की ओर से ग्रामीणों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया और चार लोग आनन-फानन में गिरफ्तार भी कर लिये गये।
बाद में इस नादानी के लिए संभवता उन्हें ऊपर से फटकार मिली और अब उन्हें मामला पलटना पड़ रहा है। यह समझना मुश्किल है कि जाति छुपाना धोखाधड़ी का अपराध कैसे हो सकता है लेकिन दोनों कथा वाचकों के खिलाफ इसी आधार पर धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज हो गया है हालांकि अभी यह आलेख लिखे जाने तक दोनों जेल के भीतर नहीं हो पाये हैं लेकिन उन पर यह बीतनी तय है।
इससे साफ जाहिर हो गया है कि दुनिया भले बदल गई हो लेकिन भारत के सनातनी समाज के आदिम इतिहास के उसूल अभी भी ज्यों के त्यों हैं। दुनिया में हर जगह यह हुआ कि मानव के समाजीकरण की शुरूआत कबीलों से हुई। फिर कबीले आपस में लड़े भिड़े जिसके बाद जिस कबीले का वर्चस्व स्थापित हुआ उसने विजित कबीलों को दबाकर रखने के नियम बना डाले। इसके बाद राज गठित हुए फिर उनके बीच प्रतिस्पर्धा हुई। जो जीता उसने विजित राज के निवासियों के लिए उत्पीड़नात्मक व्यवस्थायें बनायीं ताकि उन्हें कभी सिर उठाने का अवसर न मिले।
एक दौर आया जब कारोबार के नये क्षितिज की तलाश के क्रम में शातिर कौमों ने खनिज व अन्य प्राकृतिक संपदा से भरपूर नये द्वीपों की खोज की और उन पर काबिज होने के लिए उनके मूल निवासियों के निर्मम सफाये का अभियान चलाया। करोड़ों लोग मुनाफे की इस हविश में बलि चढ़ा दिये गये। उपनिवेशवाद का दौर आया जिसमें पराजित देश के खुशहाल निवासियों को दोयम दर्जे के नागरिक की स्थिति में धकेलकर उनके जीवन को नारकीय बना दिया गया। सम्यताओं की इस उठा पटक में दास प्रथा, बेरोजगारी प्रथा और ऐसी न जाने कितने हृदयहीन रिवाज कायम हुए। इन प्रथाओं की कड़ी में भारत की जाति व्यवस्था और उसमें निहित ऊंच-नीच, शोषण, पाशविक दमन के सामाजिक प्रावधान भी सम्मिलित रहे लेकिन सभ्यता जब ऊंचे सोपान पर पहुंची तो हर समाज में ये प्रथायें कलंकपूर्ण मानी गई और उनका उन्मूलन किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ का मानवाधिकार चार्टर जारी हुआ जिसमें आदर्श व्यवस्था के ये मानक स्थापित किये गये जिनके पैमानों पर कोई देश किस सोपान पर है इसका आंकलन होता है।
अमेरिका और इग्लैंड जैसे विकसित देश में रंगभेदी सोच को लगभग विराम लगाया जा चुका है। दास प्रथा के अभिशाप का लगभग हर देश में उन्मूलन कर दिया गया है। समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित व्यवस्था आज हर देश का अभीष्ट है लेकिन भारत के सनातनी समाज को अभी भी ऐसे सकारात्मक परिवर्तन मंजूर नहीं हैं। दिखावे के लिए तो सनातनी समाज ने भी समता के मूल्य को अंगीकार कर रखा है। लेकिन जैसा कि बाबा साहब डा. अम्बेडकर ने ध्यान दिलाया था कि जब तक समाज के एक बड़े वर्ग को नीच घोषित करने और लगभग सारे मानवाधिकारों से वंचित रखने के निर्देश सनातन धर्म की किताबों से नहीं हटाये जायेंगे तब तक आप कितना भी प्रगतिशील संविधान बना लें त्याज्य घोषित की जा चुकी परंपरायें सनातन समाज में मिट नहीं सकतीं।
आज के कर्णधार इस बात की बहुत हुंकार भर रहे हैं कि हिन्दू समाज को एक रहना चाहिए। अगर वह बटेगा तो उसे अतीत की तरह बराबर कटते रहना पड़ेगा। लेकिन हिन्दू समाज की एकता के नाम पर आप चाहते हैं कि लोग अपमान और अन्याय झेलकर एकता के लिए बलि चढ़ें तो वर्तमान की जागरूकता में यह कैसे संभव है। डा. अम्बेडकर ने जब धर्म परिवर्तन नहीं किया था तब हिन्दू समाज को मजबूत करने के लिए सुझाव मांगे जाने पर उन्होंने धर्म के नाम पर शास्त्रों में बहुतायत आबादी के लिए किये गये विष वमन कारक लेखों को हटाने पर जोर दिया था जो पूरी तरह से औचित्यपूर्ण था लेकिन बाबा साहब की बात नहीं मानी गई।
वर्तमान में जब स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि रामचरित मानस में शूद्र को कितना भी गुणी, ज्ञानी और कुशल होने के बावजूद भी सम्मान का अधिकारी न बनाये जाने की जो समझायश दर्ज है उसे हटा देना चाहिए ताकि मानस सर्वमान्य हो सके। इसमें रामचरित मानस के प्रति किसी तरह की अ़श्रृद्धा प्रदर्शित नहीं हुई थी फिर भी मौर्य की निन्दा की जाने लगी, उनके लिए गालियां बकी जाने लगी और उन्हें धर्म द्रोही कहा जाने लगा। लेकिन किसी ने उनकी विवेकपूर्ण सलाह पर सहमति देने का नैतिक साहस नहीं दिखाया। ऐसा रवैया हिन्दू समाज के लिए शुभ चिंतन का कहा जाये या यह कहा जाये कि सनातन समाज के तथाकथित ठेकेदार अपने समाज को हाराकीरी के लिए धकेलने पर उद्यत हैं।
वर्तमान में हिन्दू समाज को निश्छल दिखाने के लिए तमाम ढ़कोसले हो रहे हैं। इनमें धर्म के नाम पर हो रहे राजनीतिक मंचनों में बड़े-बड़े पदों पर बैठे हुए लोग प्रतीकात्मक तौर पर किसी अनुष्ठान में दलित समाज के विद्वान को अग्रणी बना देते हैं तो कभी स्वच्छकार समाज के पैर धोने लग जाने का प्रहसन अंजाम दिया जाना शामिल है। लेकिन इसका व्यापक प्रभाव कैसे हो सकता है जब ऐसे कार्यक्रमों के सूत्रधार ही अपने को संकीर्णता से परे नहीं कर पाये हैं। जाति नहीं व्यक्ति श्रेष्ठ, सक्षम या हीन होता है यह एक सच्चाई है लेकिन जब आप यह जताना चाहते हैं कि राम इसलिए भगवान के रूप में मान्य हुए कि उन्होंने मेरी जाति में जन्म लिया था।
बात उल्टी है राम तो किसी भी जाति में जन्म लेते समाज और राजनीति में नैतिकता के जो मील के पत्थर उन्होंने गाड़े उनके नाते समाज उन्हें भगवान के रूप में स्थापित होना था ही। इसलिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री सामाजिक सोच के मामले में एक क्रांतिकारी पीठ के अधीश्वर होते हुए भी रूढ़िवादी मानसिकता के बंधक नजर आते हैं। इसीलिए उन्होंने यादव समाज के कथा वाचकों द्वारा श्रीमद भागवत बांचने को महा पाप के रूप में संज्ञान लिया और उनके खिलाफ जबावी रिपोर्ट दर्ज करा दी। इसका संदेश लोगों में अच्छा नहीं गया है। मुख्यमंत्री के इस कदम से हिन्दू समाज में एकता मजबूत नहीं हुई बल्कि दरार पैदा हुई है।
आज हर कौम में अधिकार चेतना है इसलिए कोई कौम भले ही धर्म के नाम पर प्रयास किया जाये पर अपनी नीच स्थिति को स्वीकार नहीं कर सकती। इसलिए हर कौम का व्यक्ति धार्मिक ग्रन्थों के पठन पाठन की इच्छा रख सकता है। उसके द्वारा ऐसा करना कोई पाप नहीं है, पाप तो उसे प्रभु भक्ति से रोकना और अनर्गल बातों से मानवीय गरिमा का हनन करना है।
कथावाचक पर दर्ज हुई FIR की प्रति देखें…




