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सुख-दुख

पत्रकारिता के हर अपराध को जनता के बीच लाना चाहिए!

रवीश कुमार-

विपक्ष को अपनी रैलियों में हिंदी अख़बार ले जाना चाहिए। जनता के बीच अख़बार खोल कर दिखाना चाहिए कि ख़बरें कैसे छपती हैं। क्या क्या नहीं छपता है। कैसे टीवी में डिबेट होता है। प्रधानमंत्री के इंटरव्यू के बारे में बताना चाहिए। हर नेता को इस पर दस से बीस मिनट बोलना चाहिए। अब तो वक्त निकल गया मगर शुरुआत की जा सकती है। पत्रकारिता के हर अपराध को जनता के बीच लाना चाहिए।

अवनीश सिन्हा-
पहले मीडिया अगर सरकार के पक्ष में नही लिखती थी तो विज्ञापन नही दिया जाता था। आज भी है ये। बॉस ज्यादातर इंडस्ट्रियलिस्ट होते थे, आज भी हैं। You tube आया तो रिमोट के साथ जनता को ताकत आई। अब जिनकी जो चॉइस। पत्रकार को अपने व्यूअरशिप को पहचानना पड़ता है। अंतर इतना आया है सिर्फ की पहले डायरेक्ट खुल्ले में सब कुछ नही था। चद्दर ओढ़ कर घी पीने का चलन था।

अनीता मीणा-
बिल्कुल जनता के सामने हकीकत को लाना चाहिए! ये लोग झुठ बोलकर जनता से वोट ले लेते हैं! बल्कि इसकी हकीकत किसी को भी पता नहीं रहती हैं!

राहुल सिंह सूरवार-
बिल्कुल विपक्ष के सभी नेताओं को जमीनी स्तर के हर तपके से मिलना चाहिए, उन्हे देश में जो हालात हैं उसपर जनता को सामने से सबूत के साथ दिखाना चाहिए। जनता अनभिज्ञ है, इन चोरों और तड़िपारों से।

हाशिम-
अभी भी तो सर ऐसा ही हो रहा है, बीजेपी सरकार विपक्ष पर ही ED और CBI के छापे लगवा रही है। चुनाव आयोग बीजेपी की कटपुतली बन चुका है बीजेपी के इशारो पर मुजरा करता है, ED और CBI के दम पर ये विधायक और संसदों को ख़रीद रहे है, और ये गोदी मीडिया बस हर टाइम साहब को ही दिखाती है।

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