पूरे पन्ने के विज्ञापन में सबसे जरूरी सवाल का जवाब नहीं

भारत में ईवीएम का उपयोग पहली बार 2009 के चुनाव में किया गया था। असल में, ईवीएम से चुनाव के बाद जब शिकायतें आईं तो इसकी जांच की जरूरत समझी गई पर मशीन उपलब्ध नहीं थी। इसलिए उपलब्ध सूचना के आधार पर लोगों ने पहले मशीन बनाई गई और फिर उससे छेड़छाड़ कर दिखाया गया। तकनीक समझाया गया। इससे एक तरफ तो आम लोगों के मन में ईवीएम के प्रति शंका बैठ गई दूसरी ओऱ, चुनाव आयोग कहता रहा कि उसकी मशीन से छेड़छाड़ संभव नहीं है। साथ ही, वह मशीन देने से मना करता रहा। आखिरकार, नेटइंडिया कंपनी समूह के उस समय के प्रबंध निदेशक हरि के प्रसाद ने दिखा दिया कि ईवीएम आसानी से हैक किए जा सकते हैं। हरि प्रसाद ने इसके लिए मांगी हुई मशीन का उपयोग किया था। मशीन चुनाव आयोग की थी पर उसने दी नहीं थी। इसलिए पहले चोरी की एफआईआर कराई गई और फिर हरि के प्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया। उनपर मशीन का स्रोत बताने के लिए दबाव डाला गया। परेशान किया गया, यातनाएं दी गईं जबकि छेड़छाड़ साबित होने के बाद इसका कोई मतलब नहीं था। हालांकि, इस समय गिरफ्तारी अलग मुद्दा है।


उस समय ईवीएम से दो तरह की छेड़खानी दिखाई गई थी। एक में मशीन का छोटा पुर्जा बदलना होता है जो देखने में उसी के जैसा है। ईवीएम में लगाने के बाद इस पुर्जे को मोबाइल फोन से चुपचाप निर्देश दिया जा सकता है कि वह किसी निश्चित उम्मीदवार के पक्ष में वोट की चोरी करे। दूसरा मामला जेब में रखने योग्य उपकरण के उपयोग का है। यह मतदान के बाद और गिनती से पहले ईवीएम की मेमरी में रखे वोट में गड़बड़ी करने का है। अतिरिक्त विवरण के लिए https://indiaevm.org देखें। ध्यान रखें यह 2010 की बात है। तब मोबाइल फोन कैसे होते थे और अब कितने स्मार्ट हो गए हैं। दिलचस्प यह है कि ईवीएम से छेड़छाड़ का पता लगाना बहुत आसान नहीं है। नियमित अंतराल पर मशीन का टेक्निकल ऑडिट जरूरी है पर इसका मुख्य चिप निर्माता द्वारा भी नहीं पढ़ा जा सकता है। यह समस्या की जड़ है। एक इंटरव्यू में हरि प्रसाद से पूछा गया कि जब आप ईवीएम को अच्छी तरह जान ही गए हैं तो क्या आप इस समस्या का समाधान बता सकते हैं? उन्होंने ऑडिटेबल (ऑडिट या जांच योग्य) पेपर ट्रेल की सिफारिश की थी जो बाद में वीवीपीएटी यानी मतदाता द्वारा जांचे जाने योग्य पेपर ऑडिट ट्रायल के रूप में सामने आया है।


यह सब 2009-10 की बात है। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और बहुत विस्तार में गए बिना मैं 9 अक्तूबर 2013 के आदेश पर आता हूं। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में चरणों में पेपर ट्रेल लगाए जाएं। स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनावों के लिए यह ऐसी आवश्यकता है जिससे बचा नहीं जा सकता है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि चुनाव आयोग को ईवीएम में वीवीपैट सिस्टम लगाने के लिए वित्तीय सहायता मुहैया कराई जाए। सर्वोच्च अदालत के आदेश वाली खबर में ही आगे लिखा है कि वीवीपैट से मतदाता के वोट देने के बाद उसकी पसंद की पुष्टि हो सकेगी और विवाद की स्थिति में ये वोट गिने जा सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा कि यह काम चरणों में हो या 2014 के आम चुनाव में भौगोलिक क्षेत्र के हिसाब से। उसी पर काम हुआ और अब चुनाव आयोग का कहना है कि उसके पास पर्याप्त वीवीपैट वाली ईवीएम हैं। यहां तक तो कोई दिक्कत नहीं है। सब कुछ सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुआ है लेकिन ईवीएम की जो कमजोरी है वह तो अपनी जगह बनी हुई है।

वैसे तो आज के विज्ञापन में चार मिथकों के तथ्य बनाए गए हैं पर अभी मैं उनमें से एक की ही चर्चा करूंगा। बाकी वैसे भी बेमतलब है। उनके बारे में मैंने नहीं सुना। तीसरा मिथक है, वीवीपैट मतदाता के फोटो खींच लेता है अतः ऐसे में मत की गोपनीयता भंग होती है। वैसे तो यह भी बेकार का मिथक और जवाब है फिर भी यह मामला चर्चा करने लायक है। आज के समय में जब रिहायशी परिसरों में, सड़कों पर, सार्वजनिक स्थलों पर और स्कूलों में कैमरे लगे हुए हैं तो वीपैट फोटो खींच ले क्या फर्क पड़ता है। आप घर से निकलेंगे तब से लेकर मतदान केंद्र तक कैमरे लगे हैं मतदान केंद्र में घुसने से लेकर निकलने तक और कई स्कूलों के कक्षाओं में कैमरे हैं तो मतदान केंद्र में भी हो सकता है। मतदान के दौरान होने वाली हिंसा, विवाद, बेईमानी के मद्देनजर कोई भी उन्हें बंद करने के लिए नहीं कहेगा और चल रहे हैं तो सब कुछ रिकार्ड हो ही रहा है। महत्वपूर्ण यह नहीं है।

महत्वपूर्ण आज के विज्ञापन में ही दी गई यह जानकारी है कि वोट देने के बाद वीवीपैट की पर्ची सात सेकेंड तक (ही) दिखती है। मुद्दा यह है कि क्या सात सेकेंड पर्याप्त है?और सात सेकेंड ही क्यों? अगर कोई न देख पाए तो? कितने मतदाता शोर मचाएंगे और कितनों की सुनी जाएगी? अगर सुनी जाएगी और बाद में यह देखा जा सकता है कि मैंने जो वोट दिया वह सही पड़ा कि नहीं तो मेरे निकलने के बाद यह भी देखा जा सकता है कि मैंने किसे वोट दिया? तो वोट की गोपनीयता कहां रही। मुझे नहीं पता वीवीपैट का प्रिंट कटता जाएगा या कागज के रॉल के रूप में ही रहेगा। उसमें समय प्रिंट होगा कि नहीं। कोई नंबर या क्रम होगा कि नहीं। मेरे हिसाब से प्रिंट कटते जाना चाहिए। तभी पता नहीं चलेगा कि किसने किसे वोट दिया। लेकिन कट जाने के बाद अगर किसी ने कहा कि वह देख नहीं पाया या उसका वोट गलत गया है तो पुष्टि कैसे होगी? पूरे पन्ने के विज्ञापन में सबसे जरूरी इस सवाल का जवाब नहीं है।

(इंटरनेट पर सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर।)

 

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट। संपर्क : anuvaad@hotmail.com

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