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EVM मुकद्दमें में सुप्रीम कोर्ट के जजों की नसीहत का तोड़ क्यों नहीं विरोधी खेमे के पास?

के पी सिंह-

वीएम को लेकर एडीआर व अन्य संस्थाओ द्वारा उच्चतम न्यायालय में दायर याचिकाओं की सुनवाई दो सदस्यीय खंडपीठ कर रही है जिसमें जस्टिस संजीव खन्ना व जस्टिस दीपांकर दत्ता शामिल हैं। भारत में हाल में कुछ उच्च न्यायालयों द्वारा प्रदर्शित विचित्रताओं को छोड़ दें तो कुल मिलाकर देश की न्याय पालिका का रिकार्ड पूर्वाग्रहों से परे होकर कानून, नियम, प्रक्रियाओं व न्याय के मूल भूत सिद्धातों के आधार पर निष्कर्ष प्रतिपादित करने का रहा है फिर भी न्यायपालिका के रूख के निर्णायक रूप में सामने आने के पहले ही पक्षकारों द्वारा अपनी-अपनी सोच के मुताबिक उसके विनिश्चय को चित्रित करने की चेष्टायें शुरू कर दी जाती हैं।

EVM पर चल रही सुनवाई के संदर्भ में भी मोदी सरकार की विरोधी बौद्धिक लाबी ने ऐसा ही बचकाना उत्साह दिखाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी लेकिन मंगलवार को सुनवाई कर रहे जजों की याचिकाकर्ता संगठनों के वकीलों की दलीलों पर टिप्पणी ने प्याले के इस तूफान पर ठंडा पानी डाल दिया है। सुनवाई कर रहे जजों ने स्पष्ट कर दिया है कि ईवीएम से जुड़े सभी मुद्दों पर ठंडे दिमाग से मनन करने की पूरी क्षमता न्यायपालिका में है और उसका संतुलित रूख इस बात की गवाही नहीं दे रहा कि सरकार के खिलाफ न्यायपालिका बेवजह कोई क्रांतिकारी रूख अख्तियार कर ले।

दरअसल इस संबंध में दायर याचिकाओं में जिन मांगों को शामिल किया गया है वे इकतरफा हैं। जजों ने याचिकाकर्ता के वकीलों से कहा कि आखिर उन्हें एक सिस्टम में काम करना पड़ेगा भले ही हर सिस्टम में गड़बड़ी की जाने की आशंका है। प्रशांत भूषण द्वारा जर्मनी के उदाहरण को दिये जाने पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि वे मशीन की जगह बैलेट पेपर से काम करा सकते हैं क्योंकि जर्मनी में केवल छह करोड़ के करीब आबादी है जो उनके गृह राज्य पश्चिम बंगाल से भी कम है। लेकिन भारत में 97 करोड़ पंजीकृत मतदाता हैं। सोचिये उनके लिए मत पत्रों से चुनाव कराने में कितना ज्यादा तामझाम करना पड़ेगा जो बहुत खर्चीला भी होगा। इसके अलावा मत पत्रों से चुनाव जब होते थे तो धांधलियों की पराकाष्ठा थी।

जजों ने प्रशांत भूषण से कहा कि आपको तो इस बारे में अच्छी तरह मालूम है। जजों की बात सही है। 1967 में जब उत्तर प्रदेश में विपक्ष के विधायक बड़ी तादात में चुन गये थे तो कहा जाता है कि मैडम यानी इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री निवास से कई जिलों के कलेक्टरों को फोन कराया। उस समय जागरूकता की कमी थी। कई विधायक निर्वाचन का प्रमाण पत्र लिये बिना जुलूस लेकर निकल गये। कलेक्टर ने उनके क्षेत्र के कांग्रेस प्रत्याशी का पुनर्मतगणना का प्रार्थना पत्र लिया और रिकाउंटिंग कराकर उसे विजयी घोषित कर दिया। बिहार मत पत्रों से चुनाव कैसे होते थे यह तो बुजुर्गी की ओर आगे दर आगे बढ़ती जा रही पीढ़ी अच्छी तरह जानती है।

उत्तर प्रदेश में भी जसवंत नगर में 1991 में मुलायम सिंह ने पूरे बूथ लुटवा लिये थे। कहने का तात्पर्य यह है कि सत्ताधारी दल को मत पत्रों से चुनाव में भी पूरी गड़बड़ी कराने की पूरी गुंजाइश रहती है और ईवीएम में भी। इसलिए ईवीएम को हटाकर पुनः मत पत्रों से चुनाव की ओर लौटने की मांग का कोई औचित्य नहीं है।

लोगों में लोकतंत्र के प्रति आस्था मजबूत करनी होगी जो आजादी के बाद से अभी तक नहीं किया जा सका। यह हमारे राष्ट्र निर्माताओं की बहुत बड़ी विफलता है। एक समय था जब माना जाता था कि वर्ण व्यवस्था में मिले प्रभुत्व का फायदा जो जातियां उठाती हैं उनके नेता इसे कायम रखने के लिए लोकतंत्र की सुचारू व्यवस्था नहीं बनने देते। सामाजिक न्याय के सिद्धांत ने जोर पकड़ा तो लगा कि वंचित जातियां सत्ता के सिंहद्वार में पहुंचकर लोकतंत्र को धांधलियों से बचायेंगी। पर वंचित जातियों के नेता ज्यादा बड़े फासिस्ट साबित हुए। उन्होंने समाज के परिशोधन की मशीनरी को फेल कर दिया। इस तरह लोकतंत्र के एक परिवर्तनकारी चक्र का दुखांत हो गया। फिर उम्मीद जगी कि धर्म की दुहाई देने वाले लोगों को अवसर दिया जायेगा तो समाज में चारित्रिक उत्थान के प्रयास मजबूत होंगे जिससे स्वच्छ लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाने में मदद मिलेगी। भाजपा की ही बात करें तो अटल युग में इसके प्रतिमान स्थापित हुए जिससे सकारात्मक वातावरण को मजबूती मिली लेकिन परिवर्तन का यह चक्र भी मोदी युग आते-आते ढ़हने को अभिशप्त हो गया।

मोदी युग में लोग दोराहे पर खड़े हैं। वर्तमान सरकार ने एक ओर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को एक बड़ी ताकत के रूप में स्थापित किया है, विकास के मोर्चे पर इन्फ्रास्ट्रक्चर के मामले में देश की प्रगति को नये पंख लगा दिये हैं, भारतीयों के आत्मविश्वास को उस बुलंदी पर पहुंचा दिया है जिसकी कल्पना हाल के वर्षों में वे नहीं कर पा रहे थे। दूसरी ओर यह निजाम सारी मर्यादाओं और शील को तिलांजलि देने में लगा हुआ है जिसमें इसने मध्य युगीन बर्बर आक्रांताओं की शहजोरी को भी पीछे छोड़ने का प्रण ले लिया है। साथ ही साथ देश के बहुसंख्यक गरीब बेरोजगारों के लिए इसका क्रोनी कैप्टलिज्म विनाशकारी साबित हो रहा है। इसके परिणाम आने वाले कुछ वर्षो में और ज्यादा स्पष्ट रूप से सामने आयेंगे तो कैसी विभीषिका उपस्थित होगी इसका अनुमान सिहरन पैदा कर देता है। बहुसंख्यक आबादी गुलामी से ज्यादा बदतर जिंदगी के अंधेरे में धकेली जा सकती है।

आश्चर्य यह है कि इसके बावजूद आम जनता पर मोदी सरकार का सम्मोहन इस कदर तारी है कि उसकी निरंकुशता पर किसी तरह की लगाम के लिए वह तैयार नहीं हो रहा है। एबीवीपी सी वोटर का ताजा सर्वे सामने आया है जिसके मुताबिक भारतीय जनता पार्टी अकेले 373 सीटें जीतने की स्थिति में है जबकि विपक्ष केवल 155 सीटों पर सिमट जाने को मजबूर है। मोदी विरोध में अंधे लोग इस सर्वे को नकार सकते हैं। वे अभी तक भाजपा को स्पष्ट बहुमत न मिल पाने के स्वप्न लोक में विचरण कर रहे हैं। एबीवीपी सी वोटर जैसी एजेंसियों के सर्वे को ये लोग यह कहकर ठुकरा देते हैं कि भारतीय जनता पार्टी से इन एजेंसियों को फंडिंग होती है जिसके लालच में मतदाता का मनोबल गिराने के लिए ऐसे निष्कर्ष इन लोगों को जारी कर दिये जाते हैं। ऐसे लोग ये नहीं मानते कि इन एजेंसियों को अपने साख की चिंता करनी पड़ती है जिसकी वजह से किसी पार्टी के कहने से इनके द्वारा काम करना संभव नहीं है। फिर अतीत का इनका रिकार्ड भी बताता है कि इस एजेंसी के सर्वे काफी हद तक सही साबित होते हैं।

विचारणीय यह नहीं है कि इस इस सर्वे को नकारा जाये। मुद्दा यह है कि लोकतंत्र को इन चुनौतियों के बीच पटरी पर रखने का पराक्रम विपक्ष कैसे दिखाये। ईवीएम से गड़बड़ी की एक सीमा है। अगर सत्तारूढ़ पार्टी की तानाशाही के खिलाफ विपक्ष इतनी वितृष्णा लोगों में भर सके कि भाजपा के उम्मीदवार एक लाख से अधिक वोटों से पिछड़ सकें तो ईवीएम कुछ नहीं कर सकती। क्या विपक्ष का मारक कौशल इतना है कि यह लक्ष्य वह पूरा कर सके। इस पर वह विचार करेगा तो स्पष्ट हो जायेगा कि उसका मारक कौशल कमजोर है। उसमें मतदाताओं की ऐसी कमजोर नस को छूने का माद्दा नहीं है जिससे वे बगावत पर आमादा हो जायें। क्या उज्जवल लोकतंत्र के लिए बेहतर प्रतिज्ञायें विरोधी खेमे के पास हैं या वह जातिवाद, परिवारवाद और वीर भोग्या वसुंधरा की कारा से बाहर निकलने को तत्पर नहीं हैं। आर्थिक नीतियों को लेकर क्या उसके पास कारपोरेट से लड़कर मानवीय खाके पर आधारित नया माडल प्रतिपादित करने की क्षमता है।

मोदी और उनकी टीम राहुल गाधी को व्यक्तिगत तौर पर कितनी ही निकंम्मा और भौंदा युवराज साबित करने की कोशिश करें लेकिन देश का बहुसंख्यक उनकी ईमानदारी के सोच का कायल है और मोदी के विकल्प में उन्हीं को निहारता है। पर क्या राहुल देश को एक खुदमुख्तार विकल्प देने में सक्षम हैं। वे बदलाव के लिए उन क्षेत्रीय शक्तियों पर निर्भर हैं जिनका एजेंडा खुद और अपने परिवार के लिए सत्ता हासिल करने पर है। ऐसे में अगर मोदी अपनी तमाम मनमानियों के बावजूद सत्ता में फिर से वापिसी के लिए अग्रसर हैं तो इसमें आश्चर्य क्या है।

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