
यशवंत सिंह-
संस्कार नाम की कोई चीज ही नहीं बची, नैतिकता नष्ट भ्रष्ट हो चुकी है… कहाँ सोए हैं संघी लट्ठबाज़ उर्फ करैक्टर रेगुलेटर।
ऐसी-ऐसी फ़िल्में आ रही हैं कि पूछिए मत… क्वाँरी लड़की को शादीशुदा मर्द के साथ इसलिए सोना है क्योंकि उसे ख़ुद की लाइफ स्टोरी में ट्विस्ट चाहिए।
बियाह के लिए दूल्हा लड़का अपनी माँ को लेकर दुल्हन लड़की के घर आ जाता है जहाँ लड़की के पापा लड़के की माँ को बांह में भर लेते हैं और तब माताजी कहती हैं- अब तो घर का मामला हो गया ये सब!
उल्लेखनीय है कि लड़की के पिता की पत्नी मर चुकी हैं और लड़के की माँ के पति मर चुके हैं इसलिए अब दोनों मुँह मारने के लिए स्वतंत्र हैं।
लड़की की सगी बहन टिंडर से लड़के पटाती है, कुछ दिन लेती देती है फिर छोड़ देती है और इसी क्रम में कमाऊ मिले चौथे लड़के के साथ लाइफ सेट करने हेतु बियाह का फैसला करती है।
दोनों खानदान इकट्ठे व्हिस्की पीता है, उल्टी करता है अंडबंड बोलता है… क्या बच्चे क्या बूढ़े…
भारतीय चरित्र नैतिकता गंभीरता संस्कार मर्यादा सबकी माकानाका करने वाली फ़िल्म मोदी राज में धड़ल्ले से चल रही है।
ये संघिये भी सब किसी काम लायक नहीं रह गए हैं… अरे कुछ तो भारतीय संस्कृति की रक्षा की जिम्मेदारी का निर्वाह करते!
लट्ठ लेकर पतन रोकने हेतु सिनेमाघर में तांडव करने की बड़ी जिम्मेदारी संघ और उनके खानदान के सुशिक्षित सुसंस्कारी लौंडों की ज़्यादा है जिसे पहले ये कांग्रेस सपा बसपा आदि राज में खूब करते रहे हैं लेकिन अपने राज में चुप होकर भारतीय संस्कृति की माकासाकानाका खूब होने दे रहे हैं। ये ग़लत बात है। संघियों जागो! कैसे बनाओगे भारत को विश्व गुरु!
जब मोदी जी के सेंसर बोर्ड ने फ़िल्म देख कर घटिया फ़िल्म को पास कर दिया तो दर्शक तमाशा देखने जाएँगे ही। सिस्टम को ठीक कराइये। दर्शकों को न कोसिए।
ठेका संघ एंड कंपनी ने ही लिया हुआ है
पहले तो ऐसी फ़िल्मों के आने पर दंगे कर्फ्यू हो जाया करते थे
अब सब अपने राज में काहें सोए पड़े हैं ?



