नई दिल्ली। भारत में पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक मामलों का सबसे बड़ा कारण सार्वजनिक अधिकारियों, धार्मिक मुद्दों और विरोध-प्रदर्शनों पर रिपोर्टिंग को माना गया है। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एनएलयू), दिल्ली की साझेदारी में तैयार एक अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक 2012 से 2022 के बीच 427 पत्रकारों के खिलाफ 423 आपराधिक मामले दर्ज किए गए, जिनमें कुल 624 बार पत्रकारों पर “क्रिमिनलाइजेशन ऑफ जर्नलिज्म” की कार्रवाई हुई। इन मामलों में कम से कम 40 प्रतिशत पत्रकारों को गिरफ्तार भी किया गया।
रिपोर्ट “प्रेसिंग चार्जेज : ए स्टडी ऑफ क्रिमिनल केसिस अगेंस्ट जर्नलिस्ट्स अक्रॉस स्टेट्स इन इंडिया” बताती है कि सार्वजनिक अधिकारियों पर रिपोर्टिंग करना पत्रकारों के लिए सबसे बड़ा खतरा बना, क्योंकि ऐसे 147 मामले दर्ज हुए। धार्मिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग को लेकर 99 घटनाएं सामने आईं, जबकि विरोध-प्रदर्शनों की कवरेज करने पर 79 मामलों में पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई हुई।
रिपोर्ट के अनुसार छोटे शहरों और कस्बों में काम करने वाले पत्रकार ज्यादा प्रभावित हुए। महानगरों में जहां 24 फीसदी घटनाओं में पत्रकार गिरफ्तार हुए, वहीं छोटे शहरों में यह आंकड़ा 58 फीसदी तक पहुंच गया। बड़े शहरों में 65 फीसदी मामलों में पत्रकारों को गिरफ्तारी से संरक्षण मिला, लेकिन छोटे शहरों में यह संख्या महज 3 फीसदी रही।
रिपोर्ट क्लूनी फाउंडेशन फॉर जस्टिस की पहल ट्रायलवॉच और कोलंबिया लॉ स्कूल के ह्यूमन राइट्स इंस्टीट्यूट के सहयोग से तैयार की गई है। एनएलयू दिल्ली के कुलपति जी.एस. बाजपेयी ने कहा, “पत्रकारों पर आपराधिक कानूनों का बढ़ता बोझ लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस का स्वतंत्र रहना लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।”
विशेषज्ञों का मानना है कि इस रिपोर्ट के निष्कर्ष मीडिया की स्वतंत्रता और जवाबदेही पर गहरा सवाल खड़ा करते हैं और सरकार को इस दिशा में जरूरी सुधार करने की आवश्यकता है।


