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सुख-दुख

मूर्ख और अनपढ़ निंदकों के लिए अनिवार्य गांधी पाठ!

सुशोभित-

क्या सच में ही महात्मा गांधी ने हिन्दुओं से ये कहा था कि अगर मुसलमान उन्हें मार भी डालें तो भी उन्हें अपने दिल में मुसलमानों के लिए नफ़रत नहीं रखनी है और बहादुरी से मर जाना है?

पिछले कई वर्षों से हिन्दुत्ववादी विचारधारा के द्वारा यह दुष्प्रचार किया जा रहा है कि गांधी ने ऐसा कहा। आनंद रंगनाथन नामक एक व्यक्ति तो हर गांधी जयंती पर गांधी के इस कथन को ट्विटर पर पोस्ट करता है और इसे पढ़कर उसके फ़ॉलोअर्स के द्वारा गांधी को गालियाँ दी जाती हैं। यह रंगनाथन किस नेता का समर्थक है और किस विचारधारा से वास्ता रखता है, यह छुपी हुई बात नहीं है। प्रसंगवश, अगर कोई व्य​क्ति गांधी के प्रति विषवमन करता है तो आप शर्तिया यह जान लें कि उसका सरोकार एक विशेष पार्टी, नेता, विचारधारा के समर्थकों से ही होगा। यह दो और दो चार की तरह खुली बात है।

अब हम अपने मूल प्रश्न पर लौटें कि क्या सच में ही गांधी ने वैसा कहा था। हाँ, गांधी ने वैसा कहा था, लेकिन उन्होंने अकेले हिन्दुओं से वैसा नहीं कहा था। उन्होंने मुसलमानों से भी ठीक यही बात कही थी कि अगर हिन्दू तुम्हें मारने आएँ तो मर जाना, लेकिन मारना मत। जब दोनों ही पक्षों से कहा जा रहा हो कि मर जाना, लेकिन मारना मत- तो भला कौन-किसको मारेगा? गांधी किसी एक पक्ष से तो ऐसा नहीं कह रहे थे। लेकिन दूसरे पक्ष को दी गई हिदायत को हिन्दुत्ववादी धूर्त चतुराईपूर्वक छुपा जाते हैं।

मैं स्वयं गांधी को उद्धृत कर रहा हूँ। यह उद्धरण राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित गांधी जी की पुस्तक ‘प्रार्थना प्रवचन’, खण्ड 1 के 311वें पृष्ठ से है, ताकि सुधी पाठक अपने स्तर पर भी इसे देखकर सत्यापित कर सकें। गांधी कहते हैं :

“मुझको तो यह पसंद होगा कि कोई अपनी जगह से हटे नहीं, वहीं मर जावे। यही मैं मुसलमानों से कहता हूँ और यही हिन्दुओं से भी कहता हूँ। पाँच मुसलमान हों, पाँच सौ हिन्दू और सिख, उनका मुक़ाबला क्या? भले ही हिन्दू, सिख उन्हें काट डालें। जो पाँच ऐसे कट जायेंगे, बिना हथियार, ईश्वर का नाम लेते चले जायेंगे, वे बड़े बहादुर हैं। वे कहते हैं, आप हमारे भाई हैं, मारना है तो मार डालें।”

ध्यान रहे कि यहां गांधी मुसलमानों को हिदायत दे रहे हैं ​कि हिन्दू और सिख भाई मारने आएँ तो ईश्वर का नाम लेते हुए मर जाना, लेकिन मारना मत। और गोडसेवादी लोग देशवासियों को यह झूठी पट्टी पढ़ाते रहते हैं कि गांधी ने ऐसा केवल हिन्दुओं से कहा था।

आप यहाँ गांधी से यह प्रतिप्रश्न कर सकते हैं कि पाँच सौ के सामने अगर पाँच हों तो भी लड़ते-लड़ते क्यों ना शहीद हो जाएँ, आत्मसमर्पण क्यों करें? यह बात अपने तईं दुरुस्त है। लेकिन आप परिप्रेक्ष्य को समझें। यह जो बयान मैंने ऊपर दिया, यह 19​ सितम्बर, 1947 का है। देश में आग लगी हुई थी, दंगे हो रहे थे। ऐसे में गांधी भूलकर भी मारो-काटो का उपदेश नहीं दे सकते थे। अगर देते तो देश में ख़ून की नदियाँ बह जातीं। तब उनको यही उ​चित लगा कि दोनों पक्षों को अहिंसा और निरस्त्रीकरण का उपदेश देवें। लेकिन यह कहना कि गांधी केवल और केवल हिन्दुओं से ही वैसा कहते थे, सरासर झूठ है! सफ़ेद झूठ है!

यों झूठ का दक्षिणपंथ और फ़ासीवाद से गहरा सम्बंध है। यह रीति गोयबल्स के ज़माने से ही चली आ रही है। सोशल मीडिया ने तो झूठे दुष्प्रचार की वृत्ति को जंगल की आग की तरह फैला दिया है। लेकिन झूठ के कुहासे से सत्य के सूर्य को कभी ढाँका नहीं जा सकता। कभी ना कभी जनता भी इस बात को समझेगी कि जिस आदमी को बुरा साबित करने में इन लोगों ने ऐड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया, उसमें आखिर ऐसी क्या बात थी।

एक बार फिर यह प्रश्न उठता है कि भाजपा-संघ के समर्थक तो गांधी को अपना वैचारिक शत्रु मानकर गोडसे की पूजा करते हैं, फिर उसके शीर्ष नेता राजघाट पर पुष्पांजलि अर्पित करने और गांधी को प्रात:स्मरणीय मानने का ढोंग क्यों करते हैं? इतिहास में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि अपने वैचारिक शत्रु को सत्ताधीशों ने नमन किया हो। फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने तो सम्राट और सम्राज्ञी को नमन नहीं किया था, रूसी क्रांतिकारियों ने तो ज़ार को नमन नहीं किया था, मित्र-राष्ट्रों ने तो हिटलर को नमन नहीं किया था- ये भाजपा-संघ वाले ही अपने सबसे बड़े वैचारिक शत्रु गांधी को प्रकट में नमन क्यों करते हैं और पीठ पीछे गांधी की चरित्र-हत्या के प्रयासों को क्यों बढ़ावा देते हैं?

इसका कारण यह है कि ये हीनभावना से ग्रस्त हैं, इनमें आत्मविश्वास नहीं है। ये कायर हैं। ये जानते हैं कि सौ साल में इनकी बौनी विचारधारा ने एक भी ऐसा चिंतक पैदा नहीं किया, जिसको दुनिया मान-सम्मान दे। दुनिया आज भी भारत को बुद्ध और गांधी का देश ही मानती है। पश्चिम में गांधी पर विस्तृत अध्ययन हुआ है, पुस्तकें लिखी गई हैं और अनेक अहिंसक आंदोलनों की प्रेरणा गांधी रहे हैं। यूरोप में-​ विशेषकर जर्मनी और इटली में तो गांधी का बहुत सम्मान है। क्योंकि इन दो देशों ने फ़ासीवाद का नंगा चेहरा देखा है। वो गांधी के अंतर्मन को समझते हैं।

भारत-देश के वासी भी गांधी के अंतर्मन को समझें और संघी दुष्प्रचारकों को ललकारते हुए सत्य का साक्षात् स्वयं गांधी-वांग्मय में झाँककर करें, इसी प्रार्थना के साथ।

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2 Comments

2 Comments

  1. Vivek Kumar Rameshchandra Mishra

    October 4, 2025 at 4:31 pm

    Gandhi ki baat suna kun aur sabse jyada kata kun aur kata kun

  2. Satyendra Kumar

    October 4, 2025 at 4:52 pm

    लेखक का कहना है कि ‘दुनिया आज भी भारत को बुद्धू और गांधी का देश मानती है’
    इसका मतलब तो यही हुआ कि गांधी बुद्धुओ के मसीहा हैं। या कहना चाहिए गांधी जी बड़े वाले बुद्धू थे?
    मेरा मानना है कि किसी एक विचारधारा का विरोध तो ठीक है किन्तु विरोध में इतना अंधा होना कहां तक उचित है कि सब अंधेरा ही दिखने लगे।
    हर विचारधारा में अच्छाइयां भी होती हैं और बुराइयां भी। केवल अच्छाइयां या बुराइयां देखना बिल्कुल उचित नहीं है।
    गांधी जी निःसंदेह महापुरुष थे किन्तु उनमें कोई भी बुराई नहीं थी सब अच्छाई ही थीं ये भी हास्यास्पद ही है।

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