झूठ की फैक्ट्री से बापू के बारे में विष-वमन!

राष्ट्रपिता, महात्मा गांधी, बापू आदि अत्यंत सम्मान सूचक नामों से याद किये जाने वाले मोहनदास कर्मचंद गांधी अहिंसक तरीकों से नागरिक अवज्ञा आंदोलन के लिए प्रसिद्ध हुए। सत्याग्रह उनका लोकप्रिय हथियार था। कानून के ज्ञान का उपयोग जनहित और देशहित में करते हुए उन्होंने सारी उम्र अंग्रेजों से लोहा लिया। उनकी पारदर्शिता, ईमानदारी, सच्चाई और सादगी ने सबका मन मोहा। उनके चरित्र की मजबूती इससे झलकती है कि उन्होंने भारत-पाक विभाजन के समय भी पाकिस्तानी नेताओं को उनका हक दिलवाने में अग्रणी भूमिका निभायी। धोती उनकी वेशभूषा थी तो चरखा उनका कर्म। वे सन् 1930 की डांडी यात्रा और नमक आंदोलन के लिए तो सुर्खियों में रहे ही, लेकिन सन् 1942 के उनके अंग्रेजो भारत छोड़ो अभियान की परिणित भारतवर्ष की स्वतंत्रता के रूप में हुई। Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अपनी नाकामी छिपाने के लिए गांधी-जगजीवन की निंदा करते हैं दलित!

-इं राजेन्द्र प्रसाद-

आज गाँधी की निंदा और उनके विरुद्ध अपशब्दों का प्रयोग करने वाले दलित नेताओं और उनके युवा अनुयायियों की संख्या बढ़ रही है। वे अपनी सभी समस्याओं के निदान में बाधक पूना-पैक्ट को मानते हैं। कुछ लोग जोर-शोर से ऐसा ही दुष्प्रचारित भी करते हैं। ऐसे लोगों में से अधिकतर पूना-पैक्ट की धाराओं को न तो जानते हैं और न जानने-समझने की चेष्टा करते हैं। उनका एकमात्र काम दलितों के बीच गाँधी की निन्दा करना होता है। आज गाँधी की निन्दा की बजाय गाँधी के समग्र कार्यों की समीक्षा की जानी चाहिए। साथ ही दलित अपने कथनी-करनी का भी आकलन करें। तभी हम गाँधी का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन कर सकते हैं। अन्यथा यह एकतरफा गैर-जिम्मेदाराना वक्तब्यों के अलावा और कुछ नहीं है।

गाँधी की आलोचना सकारात्मक होनी चाहिए, केवल विरोध के लिए नहीं, बल्कि कुछ करने के लिए। योजनाएं बनाकर कार्य करने और समाज में उपलब्धि प्राप्त करने के लिए। सिर्फ अपनी अकर्मण्यता को छुपाने के लिए, अपनी दायित्वहीन प्रवृत्ति को ढंकने के लिए गाँधी की आलोचना करना दलित समाज को नीचे ले जाएगा। यह उसी प्रकार की बात होगी, जिस प्रकार बड़ी जाति वाले अपने सभी दोषों को छोटी जाति वालों के मत्थे मढने का कार्य करते हैं। हमें इसका आत्म अवलोकन करना चाहिए।
    
यह सत्य है कि दलितों के राजनीतिक प्रतिनिधि पाँच वर्ष के लिए सवर्णों की इच्छा पर ही चुने जाते हैं। इसलिए सवर्णों का दबाव उनपर रहता है। माना कि वोट के लालच या भय से ये गुलामीगिरी करते हैं। अधिकतर बेशर्मीपूर्वक दलित हित के विरुद्ध कार्य करते हैं। लेकिन दलितों के प्रशासनिक प्रतिनिधियों पर ऐसा कोई दबाव नहीं होता है। वे एक बार नियुक्त होने के बाद सेवानिवृत्ति तक कार्यरत रहते हैं। वे सामान्यतः 30-40 वर्ष तक कार्यरत रहते हैं। फिर क्यों वे अपने समाज के हितों के प्रतिकूल कार्य करते हैं? कुछ अपवाद जरूर है, पर अधिकतर ऐसे ही हैं। सवर्णों के काम उनके भय अथवा प्रलोभन में ये कर देते हैं। उनके गलत कार्यों को भी करने में नहीं हिचकिचाते हैं। लेकिन ये दलितों के सही कामों को करने में भी कई कई बार आगा पीछा सोचते हैं। प्रशासनिक प्रतिनिधियों पर पूना पैक्ट का कोई दखल नहीं है। इसमें कम्यूनल अवार्ड को जस का तस स्वीकार किया गया था। फिर भी दलित अधिकारी दलितों को न्याय नहीं दे पाते हैं। कारण क्या है?

यह एक ज्वलंत प्रश्न है जिस पर विचार करने की आवश्यकता है। कहीं तो कोई बुनियादी खराबी है। ये 30-40 साल तक सेवारत सरकारी सेवक क्यों नहीं अपने कलम की धार तेज कर पाते हैं? ये बाबा साहब के ‘पे बैक टू सोसाईटी’ के वसूलों पर अमल क्यों नहीं करते हैं? क्या दलितों का भला करने की जिम्मेदारी सिर्फ विधायिका की बनती है और कार्यपालिका केवल अपने परिवार की मौज मस्ती के लिए है? जब आरक्षित वर्ग की कार्यपालिका जिसमें प्रोन्नति में भी आरक्षण दिया गया है, लोभ या भयवश कार्य करती है, तब यह कैसे कहा जा सकता है कि पृथक निर्वाचन से चुने गए प्रतिनिधि भी लोभ, भय या दबाव में नहीं रहेंगे? अथवा वे अपने उपजाति के लिए अन्य अनुसूचित उपजातियों के हितों की अवहेलना नहीं करेंगे। आज क्यों अनुसूचित जातियों और जनजातियों के केवल चार-पाँच उपजातियों का ही प्रतिनिधित्व हो पाया है? शेष उपजातियां उपेक्षित ही हैं। समाज इस पर मुखर क्यों नहीं हो रहा है?
     
सरकारी सेवाओं में आरक्षण के कारण एक निश्चित संख्या में हिस्सा भी दलितों को मिला। उनके सरकारी सेवा में रहने, पद-प्रतिष्ठा पाने का उन्हें लाभ अवश्य मिला पर उनके पद-प्रतिष्ठा का कोई ज्यादा असर समाज के निचले हिस्से की बेहतरी पर नहीं दिखता है। जो थोड़ा बहुत बदलाव नजर आता है वह वयस्क मताधिकार के ‘एक व्यक्ति: एक मत: एक मूल्य’ की वजह से है जो बाबासाहब और गाँधीजी का दिलवाया हुआ अमूल्य हथियार है। यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा हथियार है, उसे दिलवाने में अम्बेडकर और गाँधी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। क्योंकि उस समय सवर्णों के कई लोग षिक्षित और जमीन-जायदात वालों को ही वोट के अधिकार देने की वकालत की थी, साइमन कमीशन के आने पर सबके लिए वयस्क मताधिकार का विरोध किया था। पर गाँधी ने उन्हें समर्थन नहीं दिया।

डॉ0 अम्बेडकर ने इसी वोट के अधिकार के बल पर दलितों-पिछड़ों को राजसत्ता प्राप्त करने और जातिविहीन समाज के निर्माण का आह्वान किया था और कहा था कि स्वतंत्र भारत में हम शासक होंगे। लेकिन क्या उनके अनुयायी ऐसा कर रहे हैं? यह इसी वोट के अधिकार का प्रतिफल है कि आज अम्बेडकर के धुरविरोधी भी जोर शोर से उनका यशोगान कर रहे हैं। सियासी दल एक दूसरे से बढ़ चढ़ कर अम्बेडकर के प्रति अपनी निष्ठा और भक्ति प्रदर्शित कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि पहले अधिकतर दलितों को वोट नहीं देने दिया जाता था। उनके नाम पर जबरन दूसरे वोट दे देते थे। लेकिन निर्वाचन आयोग की सख्ती, पहचान पत्र की अनिवार्यता एवं तकनीकी विकास  और जागरुकता की वजह से दलित अब अधिकतर जगह अपने मताधिकार का प्रयोग करने लगे हैं। जिससे अब दलित का वोट सबके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। सवर्ण राजनीतिज्ञ और विभिन्न राजनीतिक दल दलित वोट की उपेक्षा नहीं कर सकते हैं। दलितों को यह षक्ति वोट के अधिकार से मिली है। इस वयस्क मताधिकार की शक्ति ने सारे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों को प्रभावित किया है। इसने दलितों -पिछड़ों की शक्ति को उत्तरोत्तर आगे बढाया है। इसी शक्ति के चलते दलित वर्ग से महामहिम राष्ट्रपति,उप राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीष बनाए गए।

जिस प्रकार दलित प्रतिनिधि सवर्णों से भय खाते हैं, उसी प्रकार संगठित दलितों से सवर्णों के प्रतिनिधि भी भयभीत रहते हैं। दलितों के वोट के कारण संगठित दलितों के काम करने को सवर्ण प्रतिनिधि उसी तरह तत्पर रहते हैं, जिस तरह दलित प्रतिनिधि सवर्णों के काम करने के लिए तत्पर रहते हैं। इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि दलित समुदाय की सभी उपजातियाँ संगठित हों और अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठावें, अपने दायित्व के प्रति मुखर हों।

गाँधी की निंदा करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि दलितों के प्रतिनिधि दलित सरोकारों के मामले में तू-तू, मैं-मैं को छोड़कर उसे हल कराने में इमानदारीपूर्वक पहल करें। आज के दलितों के लिए यह आवष्यक है कि वे केवल गाँधी की निंदा करने, उन्हें भला-बुरा कहने की बजाय अपने बौद्धिक, सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिनिधियों के कार्यकलापों की विवेचना करें। सरकार के कार्यों की समीक्षा करें। अपने कमियों को सुधारने के लिए रणनीति बनावें, दबाव समूह का कार्य करें। उस पर अमल करें। डॉ0 अम्बेडकर के मूल मंत्र ‘‘शिक्षित बनो, संगठित होओ, संघर्ष करो’’ और ‘पे बैक टू सोसाइटी’ पर चलें तो समाज का ज्यादा भला होगा।

दलितों का प्रबुद्ध वर्ग सबसे ज्यादा असंगठित है। वह अम्बेडकर के वसूलों के विरुद्ध आचरण करता है। वह चाहता है कि बाबासाहब के समानता और संघर्ष के मंत्र को दूसरे समझें और आचरण करें। जबकि यह काम उन्हें सबसे पहले स्वयं करना है। जिस दिन यह बौद्धिक वर्ग अपने सुख की परवाह किए बगैर संगठित होकर संघर्ष की ओर बढेगाा, सवर्ण अपने फायदे और पूर्वाग्रह को छोड़ने पर मजबूर हो जाएगा। सामाजिक परिवर्तन की गति तीव्र होगी। आज दलित समुदाय के सेवानिवृत्त कर्मियों की संख्या बहुत बढी है जो सामाजिक कार्यों की बजाय अधिकतर घरों में ही रहते हैं। उन्हें दायित्व के प्रति सक्रिय होना होगा।

उन्हें यह समझना चाहिए कि सतत् परिश्रम और मितव्ययिता के व्यवहार से मनुष्य को जीवन में सफलता मिलती है। बहता हुआ पानी और गुजरता हुआ समय लौटकर नहीं आता है इसलिए उन दोनों का समय पर सदुपयोग हमेशा किया जाना चाहिए। संविधान ने हमें अपने अधिकारों के साथ ही उसे प्राप्त करने तथा अत्याचारों के प्रतिकार के कई उपाय मुहैय्या कराए हैं। यही संवैधानिक तरीके हमें सामाजिक-आर्थिक न्याय,  खाद्य, आजीविका, षिक्षा आदि के अधिकार प्राप्त करने के माध्यम हैं, उसका लाभ लेने के लिए हमें लोगों को जागरुक बनाने और  सामूहिक रूप से संघर्ष करने की जरूरत है।

हमें केवल 1932 के गाँधी को कोसने और उनकी निंदा में व्यर्थ समय गवाने से कोई लाभ होने वाला नहीं है। बल्कि इससे अन्य लोगों कि यह टिप्पणी सुननी पड़ती है कि दलित बैठे बिठाए सब कुछ खाने के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। ये बयानवीर हैं, कर्मवीर नहीं। ये आजीवन विकलांग ही बने रह कर खैराती बनना चाहते हैं। अब दलितों को कोई मदद न करे।  मान्यवर कांशी राम का यह कथन भी प्रासंगिक और विचारणीय है कि हमें पृथक निर्वाचन की माँग की बात पर एक मिनट का भी समय बर्बाद नहीं करना चाहिए क्योंकि जब ब्रिटिश राज में बाबासाहब जैसे व्यक्ति इसे नहीं प्राप्त कर पाए तो इस हुकुमत में इस पर सोचना भी व्यर्थ है। हमें संघर्ष कर इस लायक बनना है कि हम हुक्मरान बने। हम दाता बनें, याचक नहीं बनें।

सन् 1932 के कम्युनल अवार्ड में पृथक निर्वाचन की आरक्षण व्यवस्था 10 वर्ष के लिए थी। यह सच है कि 1932 में गाँधी के पूना आमरण अनशन ने दलितों के लिए संयुक्त निर्वाचन पद्धति को निश्चित किया। किन्तु इसने अम्बेडकर के कद को बहुत ही ऊँचा किया। अम्बेडकर के मंच को विश्वव्यापी प्रसिद्धि मिली। अम्बेडकर देश-विदेश में अछूतों और वंचित तबकों के निर्विवाद नेता बने, सामाजिक क्रान्ति के योद्धा कहे गए। साथ ही वे राष्ट्रीय नेताओं की अग्रिम पक्ति में एक महत्वपूर्ण स्थान बनाए। गाँधी ने सवर्ण हिन्दुओं की अन्तरात्मा को झकझोरा और अछूतों के प्रति उनके द्वारा किए जा रहे पापों को प्रायश्चित करने के लिए प्रेरित किया। सवर्णों में आत्म शुद्धि आंदोलन चलाया। गाँधी के आह्वान पर उस समय अछूतों के उद्धार के लिए कुछ हिन्दुओं ने अपना जीवन समर्पित किया। उनका कहना था कि हिन्दू समाज को हमने गंदा किया है, हम उसे साफ करेंगे। जिससे अछूतों के प्रति देशभर में एक सकारात्मक वातावरण बना। स्थिति में बहुत जगह परिवर्तन आया। 

आज इतने सुरक्षात्मक कानूनों और जागरूकता के बावजूद दलित बहुत जगह असहाय स्थिति में हैं। तब 90 वर्ष पूर्व, जब उनके सुरक्षा के कानून नहीं थे तब दलित कितने  दयनीय हालत में रहे होंगे? यह कल्पना की जा सकती है। समय के साथ तथा अपने अनुभवों के आधार पर गाँधी बहुत बड़े संषोधनवादी थे। अपनी पुरानी मान्यताओं को बदलने में देर नहीं करते थे। इसलिए गाँधी के पूर्व और बाद के विचारों और कार्यों में विरोधाभाष दिखाई पड़ता है। गाँधीजी द्वारा सन् 1932 के पहले जातिप्रथा और वर्णव्यवस्था को मानना और फिर कुछ वर्ष के बाद 1942 के आस पास अर्न्तजातीय विवाहों जिसमें एक पक्ष हरिजन हो, का जबरदस्त समर्थक बनना, उनमें से एक था। इस समय उन्होंने किसी भी ऐसे वर-वधु को आशीर्वाद नहीं दिया, जिसने सजातीय शादी किया। अपने परिवर्तित विचारों को गाँधी सत्य का प्रयोग कहते थे। गाँधी से प्रेरित होकर उस समय सवर्णों के अधिकतर प्रबुद्ध लोगों ने अपने से छोटी जातियों के पुरुष-महिला से अन्तर्जातीय विवाह किया था। उतना अन्तर्जातीय विवाह तो दलितों की विभिन्न उपजातियों ने भी आपस में नहीं किया। जबकि बाबासाहब ने जाति तोड़ो और एक अनुसूचित जाति बनों का आह्वान किया था।

गाँधी की हत्या सनातनियों ने क्यों की? पहला अनुसूचित जातियों का पक्ष लेने से वे अन्दर अन्दर गाँधी से चिढ़े हुए थे। उनके अन्दर आक्रोश था, पर दबा हुआ था। दूसरा कारण जब गाँधी ने मुसलमानों के हितों का पक्ष लेना शुरू किया तो वह आक्रोश एक आकार लिया और सुनियोजित तरीके से उनकी हत्या कर दी। आज गाँधी की स्थिति गाँव के पंचायती करने वाले और शादी ब्याह के उस अगुआ की तरह है जो दोनों पक्षों का काम बनवा देता है लेकिन बाद में दोनो पक्षों का अप्रिय बन जाता है। उस व्यक्ति से दोनों पक्ष रुष्ट रहता है, उससे गाली सुनता है। आजादी के बाद गाँधी की भूमिका को उनकी हत्या के बाद उनके अनुयायियों ने न केवल सीमित कर दिया बल्कि उसे धीरे-धीरे दफनाने का भी कार्य किया। गाँधी के नाम पर गाँधीवादी कुछ दिन मलाई खाते रहे, पर कब तक खाते। अत्याचारों के खिलाफ दलितों का गुस्सा गाँधीवादियों के साथ सवर्णों पर होना चाहिए, न कि गाँधी पर। दलित उत्पीड़न के विरुद्ध जाने माने गाँधीवादी या गाँधीभक्त संघर्ष के लिए आगे नहीं आ रहे हैं, जिसका कारण गाँधीवादी आज गाँधी के सद्धान्तों को अपने से अलग कर दिए हैं। वे छद्म- गाँधीवादी बन कर गाँधी का पाठ कभी-कभी अपने निजी फायदे के लिए करते हैं ।

अम्बेडकर ने वंचित लोगों में आत्म सम्मान और मानव अधिकार के लिए संघर्ष करने की ज्योति जलाई। उसके बाद सामाजिक-आर्थिक न्याय का युग शुरू होता है, जिसके प्रतीक अम्बेडकर हैं। यह अभी चल रहा है। पर लगता है उनके अनुयायी कहीं उनका हश्र गाँधी जैसा न कर दें। अम्बेडकर को जितना खतरा अम्बेडकरवादियों से है उतना अन्यों से नहीं है। जिस प्रकार गाँधी को गाँधीवादी समाप्त करते जा रहे हैं, उसी प्रकार अम्बेडकर को अम्बेडकरवादी समाप्त  करने में लगे हैं। वे जितनी जोर से अम्बेडकर के नाम और सिद्धान्त  की माला का जाप करते हैं,उतना ही ज्यादा उनके सिद्धान्तों को तिलांजलि भी देते जा रहे हैं।  उनके कथनी और करनी की खाईं चौड़ी से चौड़ी होती जा रही है। अम्बेडकर की महानता और उनके नाम का इस्तेमाल हमें उनके मिषन को आगे बढाने में किया जाना चाहिए, अपनी अकर्मण्यता को ढकने और नए महंथ या नए पंडा बनने के लिए नहीं ।

गांधी के कार्यों के दूसरे पहलू का अध्ययन किया जाना भी जरूरी है। उल्लेखनीय है कि 1 मई 1946 को डॉ0 अम्बेडकर ने वायसराय की कार्यकारी परिशद (मंत्रिमंडल) से त्याग पत्र दे दिया। वायसराय लार्ड वेवल ने 13 अगस्त 1946 को काँग्रेस के नेतृत्व में अंतरिम कार्यकारी परिशद का पुर्नगठन किया। 2 सितम्बर 1946 को जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में नई अंतरिम कार्यकारी परिशद ने पदभार ग्रहण किया। जिसमें डॉ0 अम्बेडकर का स्थान जगजीवन राम ने लिया। काँग्रेस सरकार का दृष्टिकोण 1946 में संकुचित और उदार दोनों हुआ। संकुचित इस अर्थ में कि वे लोग संघर्ष, सिविल नाफरमानी और आंदोलन के खिलाफ हो गए, जबकि इसी के बल पर काँग्रेस लोकप्रिय हुई थी। उदार इस मामले में कि वे अपनी पूर्व की धारणा को बदल कर राष्ट्र निर्माण में सभी विरोधी पक्षों का सहयोग लेने को तैयार हुए।

देश 1947 में आजाद हुआ, पर यह दो टुकड़ों – भारत और पाकिस्तान में बंटा। डॉ0 अम्बेडकर 1946 में पूर्वी बंगाल से केन्द्रीय विधान सभा के सदस्य चुने गए थे। 1947 में देश के बंटवारे के बाद उनकी सदस्यता समाप्त होने वाली थी। क्योंकि डॉ0 अम्बेडकर पूर्वी बंगाल के जिस स्थान से चुनकर आए थे, वह भाग पाकिस्तान में चला गया, उनकी सदस्यता पाकिस्तान के संविधान सभा के साथ जुड़ गई। डॉ0 अम्बेडकर भारत के केन्द्रीय विधान सभा (संविधान सभा) की सदस्यता समाप्त होने वाली थी। इसी बीच बम्बई से काँग्रेस के चुने गए सदस्य डॉ0 एम0 आर0 जयकर ने सन् 1947 में केन्द्रीय विधान सभा से त्याग पत्र दे दिया।

उन्हें नए बनने वाले पूना विश्वविद्यालय (वर्तमान सावित्री बाई फूले पूना विश्वविद्यालय) के कुलपति के पद पर नियुक्त किया गया था। बम्बई के उस रिक्त स्थान से सन् 1947 में डॉ0 अम्बेडकर केन्द्रीय विधान सभा (भारतीय संविधान सभा) में निर्विरोध चुन कर आए। काँग्रेस ने डॉ0 अम्बेडकर के विरुद्ध कोई प्रत्यासी नहीं खड़ा किया, काँग्रेस ने अपने प्रत्यासी से नाम वापस करवा लिया।  इसके बाद काँग्रेस ने डॉ0 अम्बेडकर को पहले संविधान ड्राफ्टिंग कमिटी का सदस्य और फिर संविधान ड्राफ्टिंग कमिटी का अध्यक्ष और कानून मंत्री बनाया, जिसे डॉ0 अम्बेडकर ने स्वीकार किया। डॉ0 अम्बेडकर ने संविधान सभा में स्वयं यह स्वीकार करते हुए कहा था कि ‘मैं काँग्रेस का घोर विरोधी रहा हूँ इसलिए जब संविधान सभा ने मुझे प्रारूप समिति के सदस्य के लिए चुना तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था। मुझे तब और भी आश्चर्य हुआ जब मुझे उस समिति का अध्यक्ष चुना गया।’

डॉ0 अम्बेडकर को यह सब गाँधीजी के कहने पर मिला। यदि गाँधीजी नहीं चाहते तो डॉ0 अम्बेडकर को यह तीनों पद नहीं मिल सकता था। यहाँ हम कह सकते हैं कि आजादी के बाद डॉ0 अम्बेडकर दलित समाज के हित में संविधान में जो कुछ भी किए वह गाँधी और काँग्रेस के योगदान के बिना पूर्ण नहीं हो सकता था। वे जो कुछ किए वह गाँधी और काँग्रेस के सहयोग से ही कर पाए, क्योंकि वे अपने दल के एकमात्र सदस्य थे। ब्रिटिश सरकार के चले जाने के बाद अम्बेडकर दबाव बनाने की स्थिति में नहीं थे। आजादी के बाद जो कुछ दलितों को मिला, उसमें गाँधी का योगदान विशेष महत्व का है। यह गाँधी के आत्मशुद्धि आन्दोलन और अम्बेडकर के आत्मसम्मान तथा मानवाधिकार आन्दोलन के कारण सम्भव हुआ। इसमें गाँधी और अम्बेडकर के कार्य एक दूसरे के पूरक की तरह हैं, विरोधी की तरह नहीं। इसे समझा जाना चाहिए। 

जिस तरह आजादी के पूर्व लम्बे समय तक गाँधी-अम्बेडकर के बीच तीखे वाद-विवाद, कटु आरोप-प्रत्यारोप हुए, उसके बावजूद यह गाँधी का बड़प्पन था कि उन्होंने अम्बेडकर को तीनों पद दिलवा कर उदारतापूर्वक व्यवहार किया। राष्ट्र  निर्माण में  अम्बेडकर के योगदान में चार चाँद लगाया। यह गाँधी के दलित उत्थान और डॉ0 अम्बेडकर के प्रति उनके सोच को दर्षाता है। आजादी के बाद डॉ0 अम्बेडकर की जो स्थिति बनी थी ,उसमें यदि आज के नेता लोग रहते तो उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल कर रख देते। ये उन्हें पाकिस्तान में षरण लेने का उपदेश देने से भी नहीं चूकते।

बंगाल के सर जोगेन्द्र नाथ मंडल पाकिस्तान के संविधान सभा के ही सदस्य बने रहे। उनका दर्जा पाकिस्तान के प्रधान मंत्री के बाद का था। वे पाकिस्तान संविधान सभा के कार्यकारी अध्यक्ष बनाए गए थे। बाद में वे पाकिस्तान के कानून और श्रम मंत्री बनाए गए।  लेकिन जिन्ना की मृत्यु के बाद सन् 1950 में जब प्रधान मंत्री लियाकत अली खाँ ने संविधान के विरुद्ध पास्तिान को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की घोशणा की तो उन्होंने खिन्न होकर सरकार से त्याग पत्र दे दिया। 10 पृष्ठों का यह त्याग पत्र पढ़ा जाना चाहिए। बाबासाहब डॉ0 अम्बेडकर के सम्पर्क में 25 वर्ष के लेखक सोहन लाल शास्त्री के शब्दों में अछूतों के लिए डॉ0 अम्बेडकर ने माता की भूमिका अदा किया और गाँधी ने एक उच्च कोटि के कुशल डॉक्टर और नर्स का काम किया।

कहा जाता है कि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू देश के संविधान को बनाने हेतु विदेश के विषेशज्ञों को नियुक्त करने के लिए गाँधीजी से मषविरा करने गए थे। गाँधीजी ने कहा कि देश में ही ऐसे  व्यक्ति हैं, उसे यह काम क्यों नहीं सौंपते हो ? चर्चा के क्रम में जब गाँधीजी ने डॉ0 अम्बेडकर का जिक्र किया, तो नेहरू ने प्रतिवाद किया कि वह काँग्रेस का धुर विरोधी है, आपकी भी कटु आलोचना करता है। गाँधीजी ने प्रत्युत्तर में कहा कि इस देश को आजाद कराने में सबका योगदान है, केवल काँग्रेस का नहीं। प्रत्येक के कार्यों की आलोचनाएं होती रहती है लेकिन आलोचना ही लोकतंत्र को गतिषील बनाती है। 

हमें मिलजुल कर सबके साथ देश का निर्माण करना है। यह देश हम सबका है। शासन में सबका हिस्सा होना चाहिए। नेहरू ने गाँधीजी के आदेश का अनुपालन किया। नेहरू और पटेल ने डॉ0 अम्बेडकर से मंत्रिमंडल में षामिल होने का अनुरोध किया। वार्ताक्रम में कुछ बिन्दुओं पर गतिरोध पैदा हुआ। मतभेद वाले बिन्दू पर वार्ता हुई। आखिरकार नेहरूजी ने स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर को डॉ0 अम्बेडकर के निवास स्थान पर भेजकर उन्हें आमंत्रित किया। डॉ0 अम्बेडकर को मंत्री पद की षपथ दिलाई गई। यह सब गाँधीजी का डॉ0 अम्बेडकर के प्रति अनुराग और सदासयता का ही परिणाम था। गाँधीजी की मृत्यु के बाद काँग्रेस ने डॉ0 अम्बेडकर के साथ क्या सलूक किया? अम्बेडकर न केवल दो लोकसभा (सन् 1952 के बम्बई का आमचुनाव और 1954 के भंडारा का उपचुनाव) का चुनाव हार गए बल्कि बुद्ध की 2500वीं वर्षगांठ सन् 1956  के अवसर पर लिखी गई उनकी पुस्तक ‘बुद्ध और उनका धर्म’ को छपवाने में आर्थिक सहायता करने के उनके अनुरोध को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने अस्वीकार कर दिया था।

आउटलुक पत्रिका, दिल्ली, अगस्त-सितम्बर 2012, स्वधीनता विषेशांक के एक सर्वेक्षण ‘गाँधी के बाद महानतम भारतीय की तलाष में संविधान निर्माता अव्वल’, (आजादी के बाद जय भीम,लेकिन कब आजाद होगा आम दलित)  को पढा जाना चाहिए। स्पष्टतः आधुनिक भारत में जहाँ से गाँधी की भूमिका खत्म होती है, वहीं से अम्बेडकर-जगजीवन राम की भूमिका शुरू होती है। यानी राजनीतिक आजादी के बाद सामाजिक-आर्थिक आजादी की लड़ाई आरम्भ हुई ।

बकौल मधु लिमये ‘‘अम्बेडकर और गाँधीजी के लेखों,वक्तब्यों, कार्यों और चिंतन का अध्ययन करने वालों को कभी-कभी यह बात उलझन में डालती है कि उनके विचार लगाातार बदलते रहे। जब गाँधीजी को पहले व्यक्त किए गए विचारों की याद दिलाई जाती थी तो वे प्रष्नकर्ताओं से कहते थे कि इन असंगतियों को न देखें, उनके वर्तमान मत को ही प्रमाणिक माने। यह उनके सत्य का प्रयोग है। डॉ0 अम्बेडकर के विचार भी सभी प्रष्नों पर अपरिवर्तनीय नहीं थे। जाति-संस्था के उन्मूलन और राष्ट्र की मजबूती के लिए समतामूलक समाज की स्थापना के प्रष्न को छोड़ कर अन्य प्रष्नों पर उनके विचार काफी लचीले थे।

विचारों के सातत्य,संगति तथा स्थिरता के प्रति डॉ0 अम्बेडकर का रवैया वही था जो गाँधीजी का था। एकबार डॉ0 अम्बेडकर ने इमर्सन का हवाला देकर कहा कि विचारों की स्थिरता गधे का गुण है और मुझे अपने आपको गधा बनाना अभीश्ट नहीं है। केवल सातत्य के लिए किसी भी विचारषील प्रणाली को एक ही मत से नहीं बंधे रहना चाहिए। अमूर्त सातत्य की अपेक्षा मूर्त परिस्थिति ज्यादा महत्वपूर्ण है और मनुश्य को सीखी हुई बात को भूलना भी जरूरी है। एक जिम्मेदार आदमी में पुनर्विचार करने और अपने विचारों को बदलने का साहस होना चाहिए। जरूरी बात यह है कि विचारों की अन्तिमता को बदलने के लिए अच्छे और प्रर्याप्त कारण होने चाहिए। ‘‘

डॉ0 अम्बेडकर ने आरक्षण की माँग वंचित तबके के सषक्तिकरण के लिए तात्कालिक रूप से किया था। यह सदा के लिए नहीं था। आरक्षण अम्बेडकर का लक्ष्य नहीं था। डॉ0 अम्बेडकर का लक्ष्य था ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद का अंत कर जातिविहीन समाज और समाजवाद की स्थापना करना। लेकिन उनके दलित अनुयायी उनके सिद्धान्तों की बलि चढाकर केवल आरक्षण रूपी मलाई खाने में व्यस्त हैं। यही नहीं वे आपस में उपजाति का भेदभाव और जहर फैलाने से भी नहीं चूकते हैं।

ऐसे लोग मलाई खाने के बाद अपने से नीचे के व्यक्तियों से बहुत दूरी बना कर ही रहते हैं। यहाँ तक कि वे अपने पैतृक गाँव-घर से भी रिस्ता नहीं निभाते हैं। दलितों में यह जो नया मध्यम वर्ग पैदा हुआ है,वह ब्राह्मणों जैसा बौद्धिक रूप से बेइमान बन गया है। वह अधिकार बोध के तहत सिर्फ माँग करता है। संघर्ष नहीं करता है। वह कर्त्तब्य और संघर्ष की अपेक्षा दूसरों से करता है। उसे दायित्व नहीं अधिकार चाहिए। दायित्व के बिना अधिकार व्यक्ति को कर्महीन, उच्छृंखल और स्वेच्छाचारी बनाता है। यह क्रम यदि चलता रहा तो ऐसे दलितों की हालत उन ब्राह्मणवादियों से भिन्न नहीं होने जा रही है जिसकी आज सर्वत्र निन्दा होती है ।

आज दलितों का धुर गाँधी-विरोधी और उग्र-अम्बेडकर समर्थक तबका इन तथ्यों को या तो जानते ही नहीं हैं अथवा जानने पर भी अनजान बनने का प्रदर्षन करते हैं।  वे आँख मूद कर अपनी हर समस्या के लिए केवल गाँधी के 1932 के आमरण अनषन की दुदुम्भी बजाते रहते हैं। गाँधी के प्रति विद्वेशपूर्ण बातें कहने और प्रचारित करने में मसगूल रहते हैं। ऐसे लोग दलितों का कितना भला करेंगे ?

जिस तरह दलितों के बीच  गाँधी की निंदा की जाती है उसी तरह जगजीवन राम की भी दलित समाज बिना सोचे समझे निंदा में लिप्त रहता है। दलित उत्थान में  जगजीवन राम के योगदान का मूल्यांकन करने और समझने की बजाय एकतरफा उन्हें अम्बेडकर विरोधी से लेकर न जाने कितने अनुचित विषेशणों से नवाजा जाता है। जगजीवन राम के राजनीतिक विरोधियों ने उनके बारे में जो सगूफा उस वक्त छेड़ा था, उसी डफली को आज भी दलित बजा रहे हैं।

जिस प्रकार नब्बे के दसक के पूर्व घोर सवर्णवादी लोग अम्बेडकर को हिन्दू विरोधी, देशद्रोही, अंग्रेजों का पक्षधर और अन्य अपमानजनक टिप्पणियां करते थे, उसी प्रकार, कुछ अपने को प्रखर बुद्धिवादी और कट्टर दलित नेता कहलाने वाले भी जगजीवन राम के विरुद्ध अपमानजनक टिप्पणी करने से नहीं चूकते हैं। वे जगजीवन राम को ब्राह्मणवाद के खुषामदी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जगजीवन राम के काँग्रेसी होने को वे ऐसे प्रचारित करते हैं, जैसे उन्होंने एक बहुत बड़ा अपराध किया हो। जगजीवन राम के विरुद्ध बोलना उनलोगों ने एक फैशन बना लिया है। उन्हें जगजीवन राम के कार्यों को दाएं-बाएं, आगे-पीछे देखने की फुर्सत आज तक नहीं मिली।

ऐसे प्रखर दलित मायावती के ब्राह्मण प्रेम या गठजोड़ पर जय-जयकार करते हैं, जबकि वे पानी पी-पीकर जगजीवन राम को इसके लिए कोसते रहते हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या आज गांधी-जगजीवन की निंदा की जानी चाहिए? उत्तर होगा कदापि नहीं। तब उन दोनों की निंदा करने का मायने क्या है ? स्पष्टतः उनकी निंदा अपनी अकर्मण्यता और नाकामी को छिपाने के लिए की गई असफल कोशिश है।

लेखक इं राजेन्द्र प्रसाद बिहार अभियंत्रण सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी और सामाजिक चिंतक हैं. उनसे संपर्क 09472575206 या r.prasadee5@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

गांधी और नेहरू को सोशल मीडिया पर बदनाम करने की गहरी साजिश का भंडाफोड़

Rajesh Singh Shrinet : फेसबुक पर किस तरह अपने देश और देश के पुराने नेताओं के बदनाम करने की साजिश रची जा रही है, वह इन दो फोटोग्राफ से जाहिर हो जाता है। मेरी अपील है कि इस तरह की साजिश का हिस्सा न बनें। या तो इसका सही जवाब दें या फिर ऐसे गलत फेसबुकिया दोस्तों को अनफ्रेंड कर दें।

 

पत्रकार राजेश सिंह श्रीनेत के फेसबुक वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए कई कमेंट में से एक Abhay Paprikar की टिप्पणी : These “Rashtra bhakt” do not have a history. So, the best they can do is to distort/fabricate history! They are “masters” of this art. But these “pious” people forget what Abraham Lincoln said ” you can fool some people for some time but you cannot fool all the people all the time “! These people are a disgrace!!!

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

उपेक्षा का शिकार हो रहा है गांधी का सत्याग्रह आश्रम

गुजरात के पाटनगर गांधीनगर के महात्मा मंदिर में महात्मा गांधी के हिंद आगमन की शताब्दी प्रवासी भारतीय सम्मेलन के रुप में मनाई जा रही है, लेकिन देश में सत्तारुढ़ पार्टी हो या विपक्षी दल गांधी के नाम पर पिछले कई सालों से राजनीति करने वालों को शायद यह भी नहीं मालूम कि जब महात्मा गांधी अफ्रीका से गुजरात आए थे और 20 मई 1915 को अहमदाबाद में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना कर देश की आजादी का शंखनाद किया था, वह सत्याग्रह आश्रम उपेक्षा का शिकार हो रहा है. देश में साबरमती आश्रम के बारे में तो सबको मालूम है लेकिन सत्याग्रह की शुरुआत करने वाले गांधीजी के आश्रम को ना केवल कांग्रेस बल्कि देश की सत्तारुढ़ भाजपा सरकार ने भी भुला दिया है यही कारण है कि महात्मा गांधी के हिंद आगमन शताब्दी के आरंभ में और ना ही इन 100 सालों में इस सत्याग्रह आश्रम में अब तक कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं हुआ.

कितनी अजीब त्रासदी है कि देश के राजनेताओं ने गांधी का स्वरुप ही बदल दिया है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब गांधीनगर के 40,000 पेड़ कटवाकर और 14,000 श्रमिकों की झोपड़ियों को उजाड़कर अपना गुणगान और अपनी मार्केटिंग करने के लिए महात्मा मंदिर बना दिया, लेकिन जिस महात्मा मंदिर में जिस प्रवासी की याद में प्रवासी भारतीय सम्मेलन आयोजित किया गया है और जिसने सत्याग्रह आश्रम की स्थापना कर नया राजनैतिक अध्याय आरंभ किया उसकी स्थली को आखिर क्यों भुला दिया गया यह एक बहुत बड़ा सवाल है.

अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ 1908 में मोहनदास करमचंद गांधी ने आजादी की लड़ाई का शंखनाद किया और अफ्रीका ही में बने अश्वेत लोगों को संगठित किया, और 1908 में अफ्रीकन इंडियन कांग्रेस की स्थापना कर मास मुवमेंट शुरु किया. गांधी के इस जन आंदोलन में सभी लोग संगठित रहे और 6 साल तक यह आंदोलन चला, जिसके परिणामस्वरुप ब्रिटिश सरकार को रंगभेद के खिलाफ कानून में बदलाव लाना पड़ा. गांधीजी का ध्येय अफ्रीका में तो पूरा हुआ लेकिन 1893 में पीटरमेरिस बर्ग रेलवे के कम्पार्टमेंट में गांधीजी को जब उतार दिया तो रंगभेद नीति को लेकर उन्हें और झटका लगा जिसने विश्व का इतिहास ही बदल कर रख दिया. और गांधीजी अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ हमेशा के लिए भारत लौट आए. गांधीजी की इच्छा गोखले की संस्था भारत सेवक समाज से जुड़ने की थी लेकिन गोखले ने कहा कि 25 सालों से देश में काफी बदलाव आए हैं, पहले उसे समझो फिर भविष्य़ तय करो..

गांधीजी ने अफ्रीका में टॉलस्टाय आश्रम स्थापित किया था, इसी तर्ज पर उन्हें भारत में भी एक आश्रम स्थापित करने की जरुरत महसूस हुई, हांलाकि गांधीजी को कोलकत्ता, राजकोट, और अन्य जगह से आश्रम स्थापित करने का न्यौता मिला था लेकिन उन्होंने अहमदाबाद को प्राथमिकता दी,  सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 1915 में अहमदाबाद को भारत का ‘मैनचेस्टर’ कहा जाता था, यहां कपड़े की अनेक मिलें थी, इसीलिए गांधीजी का ऐसा मानना था कि खादी का काम यहां अच्छे से विकसित हो सकेगा. यहां के व्यापारी वर्ग, धनिकों ने भी उन्हें आश्वासन दिया था कि आश्रम का खर्च उठाएंगे, इसीलिए गांधीजी ने अहमदाबाद में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की थी, 20 मई 1915 को आश्रम की स्थापना हुई.

गांधीजी अहिंसा और सत्य के पुजारी थे इसीलिए इस आश्रम का नाम सत्याग्रह आश्रम रखा गया था, इस आश्रम से ही राजनैतिक परिवर्तन का एक नया अध्याय शुरु हुआ,  साथ ही सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक बदलाव का नया युग भी आरंभ हुआ. कस्तूरबा और अन्य लोगों के विरोध के बावजूद भी गांधीजी ने एक दलित परिवार को इस आश्रम में जगह दी. जिसके कारण इस आश्रम को आर्थिक सहायता मिलनी भी बंद कर दी गई थी लेकिन गांधीजी डटे रहे. स्वाधीनता संग्राम में महिलाओं को एक नई दिशा भी इसी आश्रम से गांधीजी ने दी थी, ‘मेंकिग ऑफ महात्मा’ का उदय भी इसी आश्रम से हुआ था. लेकिन इस सबके बावजूद भी सत्याग्रह के नींव का पत्थर रखने वाले इस आश्रम को आज भुला दिया है. गुजरात के साबरमती आश्रम में नेताओं और लोगों का हूजूम उमड़ता है और चला जाता है लेकिन जहां से गांधीजी ने सत्याग्रह की शुरुआत की वह सत्याग्रह आश्रम कब खुलता है कब बंद होता है इस बारे में ना ही गुजरात पर्यटन विभाग और ना ही देश के पर्यटन विभाग को इस बात की कोई खबर है. ताज्जुब की बात यह है कि इस आश्रम के रख-रखाव को लेकर राज्य सरकार एक साल में केवल सवा लाख की ग्रांट देती है.

हालांकि गांधीजी के मूल्यों, विचारों और सिद्धातों से संबंधित विचारधारा को समझने के लिए वडोदरा के निजी टूर आपरेटर  ‘मरुन माइग्रेट’ से 2013 में अहमदाबाद की गुजरात विद्य़ापीठ के साथ गांधीजी के सत्याग्रह आश्रम को प्रमोट करने के लिए समझौता किया था और 2 अक्टूबर 2013 को ‘लिव गांधी फॉर ए वाइल; (गांधी को थोड़ा जीकर देखो) के नाम से 1000 रु. एक दिन के पैकेज की घोषणा की थी जिसमें पर्यटकों को एक दिन के लिए इस सत्याग्रह आश्रम में रहना था बल्कि खादी के कपड़े पहनने से लेकर गांधीजी के विचारों को समझना भी इस टूर पैकेज में शामिल था लेकिन लगता है कि यह योजना राज्य सरकार या केन्द्र सरकार के गले नहीं उतरी और पर्यटन क्षेत्र में सत्याग्रह आश्रम का पैकेज टूर पूरी तरह से विफल रहा. 

अहमदाबाद से उषा चांदना की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

गांधी जी की अपने बेटे को चिट्ठी : ”मनु ने बताया कि तुमने उससे आठ साल पहले दुष्कर्म किया था”

लंदन। महात्मा गांधी बड़े बेटे हरिलाल के चाल-चलन को लेकर खासे आहत थे। उन्होंने हरि को तीन विस्फोटक पत्र लिखे। जिनकी नीलामी अगले सप्ताह इंग्लैंड में की जाएगी। इन पत्रों में गांधी ने बेटे के व्यवहार पर गहरी चिंता जताई थी। नीलामीकर्ता ‘मुलोक’ को इन तीन पत्रों की नीलामी से 50 हजार पौंड (करीब 49 लाख रुपये) से 60 हजार पौंड (करीब 59 लाख रुपये) प्राप्त होने की उम्मीद है। ये पत्र राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जून, 1935 में लिखे थे।

हरिलाल के अनुचित व्यवहार पर गांधी जी ने पत्र में लिखा, ‘तुम्हें यह जानना चाहिए कि मेरे लिए तुम्हारी समस्या हमारी राष्ट्रीय स्वतंत्रता से अधिक कठिन हो गई है।’ पत्र में उन्होंने कहा, ‘मनु ने मुझे तुम्हारे बारे में बहुत सी खतरनाक बातें बताई हैं। उसका कहना है कि तुमने आठ वर्ष पहले उसके साथ दुष्कर्म किया था। जख्म इतना ज्यादा था कि उसे इलाज कराना पड़ा।’ गौरतलब है कि मनु गांधी जी पोती और हरिलाल की बेटी थीं।

मुलोक द्वारा जारी बयान में कहा गया है, ‘ये पत्र गुजराती में लिखे गए और अच्छी हालत में हैं। जहां तक हमारी जानकारी है इन्हें सार्वजनिक रूप ने पहले कभी नहीं देखा गया। इनसे गांधी जी के बेटे के संबंध में परेशानी की नई जानकारी मिलती है।’

हरिलाल पिता की तरह बैरिस्टर बनने के लिए इंग्लैंड जाकर पढ़ाई करना चाहते थे। गांधी जी ने इससे मना कर दिया। उनका मानना था कि पश्चिमी शिक्षा ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष में मददगार साबित नहीं होगी। इसके बाद हरिलाल ने 1911 में परिवार से संबंध तोड़ लिया। फिर जीवनभर पिता से उनके संबंध खराब ही बने रहे। एक अन्य पत्र में गांधी जी ने कहा, ‘मुझे बताओ कि क्या तुम अब भी अल्कोहल और विलासिता में रुचि रखते हो। मेरे विचार से अल्कोहल का सहारा लेने से ज्यादा अच्छा तो तुम्हारे लिए मर जाना है।’

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

स्वाधीनता संघर्ष के दौरान गांधी ने पत्रकारिता का उपयोग एक हथियार के रूप में किया था

जौनपुर। वीर बहादुर सिंह पूविवि के जनंसचार विभाग में महात्मा गांधी की जयंती की पूर्व संध्या पर ‘गांधी, पत्रकारिता एवं समाज’ विषयक गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर छात्रों को महात्मा गांधी द्वारा लिखित ‘दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास’ पुस्तक भेंट की गयी। गोष्ठी में विभाग के प्राध्यापक डॉ. मनोज मिश्र ने कहा कि पत्रकारिता, समाज सेवा एवं राजनीति करने वालों के लिए गांधी आदर्श है। पत्रकारिता के क्षेत्र में सच को उजागर करना पहली जिम्मेदारी है। इसकी शुरूआत स्वयं महात्मा गांधी ने की थी।

jaunpur

गोष्ठी को सम्बोधित करते डाॅ. मनोज मिश्र

आज गांधी के विचारों को पूरा विश्व नमन कर रहा है। भारत को विश्व गुरू बनने के लिए गांधी दर्शन अपनाना होगा। इसी क्रम में डॉ. अवध बिहारी सिंह ने कहा कि महात्मा गांधी ने भारत को स्वाधीन कराने में पत्रकारिता को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। गांधी जी सदैव यह चाहते थे कि समाचार पत्र आत्मनिर्भर बनें।

डॉ. सुनील कुमार ने कहा कि गांधी ने देश के लोगों की नब्ज़ को पहचाना। समाज के उन लोगों को जोड़ा जो सबसे निचले पायदान पर खड़े थे। वह सदैव यह चाहते थे कि गांव आत्मनिर्भर बने अपनी जरूरतों के लिए शहरों की ओर न दौड़ें। आज चीनी वस्तुओं से मार्केट भरा पड़ा है। कुटीर उद्योग दम तोड़ रहे है ऐसे में आज फिर से सोचने की जरूरत है।

विभाग के प्राध्यापक डॉ. दिग्विजय सिंह राठौर ने महात्मा गांधी द्वारा निकाले गये समाचार पत्र इंडियन ओपिनियन, यंग इंडिया, नवजीवन एवं हरिजन पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर विभाग के विद्यार्थी मौजूद रहे।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मैं अपनी भावनाएं-विचार व्यक्त करता रहूंगा, भले ही यश मिले या अपयश, मित्र मिलें या शत्रु, मान मिले या अपमान : अमिताभ ठाकुर

Amitabh Thakur: अमिताभ माफ़ी मांगो वर्ना! ….. मुझे डरना अच्छा लगता है क्योंकि टीवी वाले कहते हैं “डर के आगे जीत है”. मैंने “गाँधी और उनके सेक्स-प्रयोग” शीर्षक से जो नोट लिखा था वह मुझे जीवन के कई नए आयाम दिखा रहा है. मैंने अपने लेख में मूल रूप से गाँधी के दूसरी विवाहित/अविवाहित महिलाओं के साथ नंगे अथवा अन्यथा सार्वजनिक रूप से सोने के प्रयोग पर कड़ी टिप्पणी करते हुए उसे पूर्णतया गलत बताया और कहा कि यदि हर आदमी ऐसा करने लगे तो समाज की संरचना वहीँ समाप्त हो जाएगी. मैंने कहा कि गाँधी ऐसा मात्र अपने मजबूत सामाजिक और राजनैतिक रसूख के कारण कर पाए, यद्यपि उनके आश्रम में ये सभी नियम मात्र उनके लिए लागू होते थे, अन्य लोगों को इस प्रकार दूसरी महिलाओं के साथ सोने की छूट नहीं थी बल्कि उन्हें उलटे ब्रह्मचर्य और अलग-अलग सोने के आदेश थे जो उनके दोहरे व्यक्तित्व को प्रदर्शित करता है. मैंने कहा कि मैं उक्त कारणों से निजी स्तर पर गाँधी को अपना राष्ट्रपिता मानने से इनकार करता हूँ.

उसके बाद लखनऊ निवासी श्री प्रताप चन्द्र का एक व्यक्तिगत आक्षेपयुक्त नोट मुझे मिला जिसमे उन्होने अन्य बातों के आलावा लिखा- “अमिताभ जी सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए ऐसे अपने “गैर औरतों के साथ सोने के निजी तजुर्बों” को बापू के बहाने मत पोस्ट किया करें…..अमिताभ जी एक मुफ्त की राय है कि अपने पिता की और अपना DNA जरूर टेस्ट करा लीजिये जिससे मालूम हो सके की वो ही आपके पिता है, वरना कैसे मालूम और क्या प्रमाण है कि वही आपके पिता हैं….”
 
मैंने इसे प्रताप जी की महात्मा गाँधी के प्रति निष्ठा और श्रद्धा मानते हुए उसे नज़रअंदाज़ करना उचित समझा क्योंकि जब भावनाओं पर ठेस लगती है तो मनुष्य निश्चित रूप से तर्क का पथ छोड़ देता है और उसे बहुत गलत नहीं माना जा सकता. कमोबेश ऐसी ही बातें कुछ अन्य लोगों ने भी कही और गाँधी जैसे ऊँचे कद के व्यक्ति के लिए इस प्रकार कुछ लोगों का भावुक होना स्वाभाविक है.

इसके बाद मुझे स्पष्ट धमकी भरे आदेश मिलने लगे. श्री प्रताप ने कहा- “श्री अमिताभ ठाकुर और उनका समर्थन करने वाले लोग जो सरकार की नौकरी कर रहे हैं एक लोक सेवक हैं और गाँधी जी राष्ट्रीय प्रतीक हैं किसी भी लोक सेवक द्वारा राष्ट्रीय प्रतीकों के विरुद्ध सार्वजनिक बयान देना राज्य के प्रति विद्रोह का प्रदर्शन है। इसके लिए IG श्री अमिताभ ठाकुर को अपने इस असंवैधानिक और राष्ट्रद्रोही विचार के लिए माफ़ी मांगनी चाहिये” और “अब राष्ट्रीय राष्ट्रवादी पार्टी ने सर्वसम्मति से तय किया है की इन पर कानूनी कार्यवाही तत्काल की जायेगी और गृह सचिव के संज्ञान में मामला लाने के बाद हाई कोर्ट में अवमानना की कार्यवाही प्रारम्भ कर दी जायेगी … इन लोगों को बर्खास्त कर देना चाहिए लेकिन देखते हैं क्या होता है।“
 
उसके बाद श्री विजय कुमार पाण्डेय (Vijay Kumar Pandey) जो लखनऊ हाई कोर्ट में अधिवक्ता हैं, ने और भी कड़े अंदाज़ में मुझे आदेशित किया-“गांधी को राज्य ने राष्ट्रपिता का दर्जा दिया है जिसे आप लोग नहीं मानते। दूसरी तरफ यह मामला अवमानना के तहत आता है जिसके लिए माननीय उच्च न्यायालय ने गृह सचिव भारत सरकार को 1971 के एक्ट का हर हालत में पालन कराने का आदेश दिया है जिसकी कापी आपको भी गयी होगी। अमिताभ जी ने लोगों को राज्य के विरुद्ध उकसाने जैसा संगीन अपराध किया है। इससे इनका सरकारी सेवा में रहना किसी भी दृष्टि उचित प्रतीत नहीं होता। अमिताभ और उनके समर्थकों के विरुद्ध जो कदम उठाये जायेंगे बताना जरुरी है—–1 कल दर्ज होगी FIR, 2 गृह सचिव के संज्ञान में मामला लाने के बाद अवमानना की कार्यवाही प्रारम्भ की जायेगी। अदालत तय करे की कानून का पालन कैसे हो। अगर आप लोग अपनी पोस्ट को हटा लेते हैं और माफ़ी मांग लेते हैं तो यह माना जा सकता है की अनजाने में ऐसा हुआ है। नहीं तो यह मान लिया जाएगा की जानबूझकर होशो हवास में ऐसा किया गया है।“

निवेदन करूँगा कि जहां तक किसी भी व्यक्ति की भावना आहत करने का प्रश्न है यह ना तो मेरा उद्देश्य था और ना है. पुनः कहूँगा कि चूँकि मेरी बातों से श्री प्रताप, श्री विजय पाण्डेय या अन्य लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं, अतः उस हद तक मैं निशर्त माफ़ी मांगता हूँ क्योंकि यह लिखते समय मेरा उद्देश्य अपने मत को व्यक्त करना था, आप लोगों की भावनाओं को आहत करना नहीं. अतः मेरी बातों से भावना आहत होने के लिए पुनश्चः निशर्त माफ़ी.

लेकिन इसके साथ ही यह भी कहूँगा कि यह माफ़ी इसलिए नहीं है ताकि आप एफआईआर नहीं कराएं अथवा मेरे खिलाफ शिकायत नहीं करें अथवा अवमानना नहीं करें. यदि आप चाहते हैं और आपको लगता है कि मैं गलत पर हूँ तो बेशक ऐसा करें क्योंकि यही आपका धर्म होगा लेकिन साथ ही कृपया निम्न बातों पर भी एक बार ध्यान दे दें-
 
1. एक सरकारी सेवक को भी उसके आचरण नियमावली में अपने शासनेतर अकादमिक मुद्दों पर अपने निजी मत व्यक्त करने का कानूनी अधिकार है. मेरा यह लेख एक पूर्णतया अकादमिक और ऐतिहासिक विषय पर है, जो मैंने अपनी निजी हैसियत में लिखा है जिस हेतु मुझे भी इस देश के नागरिक के रूप में उतने ही अधिकार प्रदत्त किये गए हैं, जितने आप को, थोड़े भी कम नहीं

2. गाँधी जी एक अति सम्मानित व्यक्ति हैं और आम तौर पर राष्ट्रपिता कहे जाते हैं पर जन सूचना अधिकार से प्राप्त विभिन्न उत्तरों से यह स्पष्टतया स्थापित हो गया है कि भारत सरकार द्वारा उन्हें कभी भी आधिकारिक रूप से यह उपाधि नहीं दी गयी जैसा विशेषकर युवा आरटीआई कार्यकर्त्ता ऐश्वर्या पराशर को गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रेषित पत्र दिनांक 15/10/2012 में अंकित है कि गांधीजी को राष्ट्रपिता घोषित करने के सम्बन्ध में कोई कार्यवाही नहीं की गयी क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 18(1) में इस प्रकार की उपाधियाँ निषिद्ध हैं. पुनः इसी प्रकार की बात ऐश्वर्या पराशर बनाम संस्कृति मंत्रालय में केन्द्रीय सूचना आयोग के आदेश दिनांक 07/08/2013 में भी कही गयी. हरियाणा के युवा आरटीआई कार्यकर्ता श्री अभिषेक कादियान को भारत सरकार द्वारा प्रेषित पत्र दिनांक 18/06/2012 में भी यह बात कही गयी कि यद्यपि गांधीजी आम तौर पर राष्ट्रपिता कहे जाते हैं पर भारत सरकार ने उन्हें ऐसी कोई उपाधि कभी नहीं दी.

अतः निवेदन करूँगा कि चूँकि गांधीजी आधिकारिक अथवा न्यायिक रूप से इस देश के राष्ट्रपिता घोषित ही नहीं हैं, ऐसे में मेरे द्वारा एक व्यक्ति के विषय में व्यक्त विचार के किसी भी प्रकार से किसी राष्ट्रीय प्रतीक अथवा राष्ट्र के प्रति विरोध होने का प्राथमिक स्तर पर भी प्रश्न नहीं उठता है.

3. संभवतः आप राष्ट्रद्रोह की भारतीय दंड संहिता की धारा 124क में दी परिभाषा से बहुत परिचित नहीं है क्योंकि यहाँ परिभाषित राजद्रोह विधि द्वारा स्थापित सराकर के विरुद्ध कार्य करने से सम्बंधित है, ना ही किसी व्यक्ति के विषय में अपना मत व्यक्त करने से सम्बंधित.

4. जहां तक 1971 के प्रिवेंशन ऑफ़ इन्सल्ट टू नेशनल ऑनर एक्ट और इससे जुड़े न्यायालय के अवमानना का प्रश्न है, पुनः सादर निवेदन है कि यह एक्ट राष्ट्रीय ध्वज, देश के संविधान और राष्ट्रीय एम्ब्लम के अपमान से जुड़ा है, इसमें गाँधी जी सहित किसी व्यक्ति विशेष के प्रति अपने निजी विचार व्यक्त करने को किसी भी प्रकार से अपराध नहीं माना गया है.

मैंने अपनी जानकारी के अनुसार इस प्रश्न से जुड़े विधिक पहलुओं को प्रस्तुत किया है. मैं पुनः कहता हूँ कि मेरा मत या उद्देश्य किसी की भी भावनाओं को आहत करना नहीं था पर इसके साथ ही एक नागरिक के रूप में मुझे विभिन्न सामाजिक और अकादमिक प्रश्नों पर अपने निजी विचार रखने और उन्हें व्यक्त करने के संवैधानिक अधिकार हैं, अतः मैं भविष्य में भी व्यक्त करता रहूँगा, चाहे इससे मुझे यश मिले या अपयश, मित्र मिलें या शत्रु, मान मिले या अपमान.

निष्कर्षतया एक सामाजिक और संवेदनशील व्यक्ति के रूप में गांधीजी के समर्पित अनुयायियों की भावनाएं आहता होने के सम्बन्ध में निशर्त क्षमायाचना, विधिक रूप से दी गयी धमकीनुमा चेतावनी से पूर्ण असहमति और प्रस्तुत विषय पर वर्तमान में कोई अग्रिम मंतव्य नहीं क्योंकि ऐसा करने के पहले कुछ और विस्तृत अध्ययन करना चाहूँगा.

वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के फेसबुक वॉल से साभार।

संबंधित खबरें….

महात्मा गांधी पर विवादित फेसबुक पोस्ट के कारण अमिताभ ठाकुर पर एफआईआर

XXX

गांधी द्वारा महिलाओं के साथ किये गए सेक्स प्रयोग घृणास्पद और निंदनीय : अमिताभ ठाकुर

XXX

क्या महात्मा गांधी को सचमुच सेक्स की बुरी लत थी?

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

क्या महात्मा गांधी को सचमुच सेक्स की बुरी लत थी?

राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी की कथित सेक्स लाइफ़ पर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है. लंदन के प्रतिष्ठित अख़बार “द टाइम्स” के मुताबिक गांधी को कभी भगवान की तरह पूजने वाली 82 वर्षीया गांधीवादी इतिहासकार कुसुम वदगामा ने कहा है कि गांधी को सेक्स की बुरी लत थी, वह आश्रम की कई महिलाओं के साथ निर्वस्त्र सोते थे, वह इतने ज़्यादा कामुक थे कि ब्रम्हचर्य के प्रयोग और संयम परखने के बहाने चाचा अमृतलाल तुलसीदास गांधी की पोती और जयसुखलाल की बेटी मनुबेन गांधी के साथ सोने लगे थे. ये आरोप बेहद सनसनीख़ेज़ हैं क्योंकि किशोरावस्था में कुसुम भी गांधी की अनुयायी रही हैं. कुसुम, दरअसल, लंदन में पार्लियामेंट स्क्वॉयर पर गांधी की प्रतिमा लगाने का विरोध कर रही हैं. बहरहाल, दुनिया भर में कुसुम के इंटरव्यू छप रहे हैं.

वैसे तो महात्मा गांधी की सेक्स लाइफ़ पर अब तक अनेक किताबें लिखी जा चुकी हैं. जो ख़ासी चर्चित भी हुई हैं. मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार जेड ऐडम्स ने पंद्रह साल के गहन अध्ययन और शोध के बाद 2010 में “गांधी नैकेड ऐंबिशन” लिखकर सनसनी फैला दी थी. किताब में गांधी को असामान्य सेक्स बीहैवियर वाला अर्द्ध-दमित सेक्स-मैनियॉक कहा गया है. किताब राष्ट्रपिता के जीवन में आई लड़कियों के साथ उनके आत्मीय और मधुर रिश्तों पर ख़ास प्रकाश डालती है. मसलन, गांधी नग्न होकर लड़कियों और महिलाओं के साथ सोते थे और नग्न स्नान भी करते थे.

देश के सबसे प्रतिष्ठित लाइब्रेरियन गिरिजा कुमार ने गहन अध्ययन और गांधी से जुड़े दस्तावेज़ों के रिसर्च के बाद 2006 में “ब्रम्हचर्य गांधी ऐंड हिज़ वीमेन असोसिएट्स” में डेढ़ दर्जन महिलाओं का ब्यौरा दिया है जो ब्रम्हचर्य में सहयोगी थीं और गांधी के साथ निर्वस्त्र सोती-नहाती और उन्हें मसाज़ करती थीं. इनमें मनु, आभा गांधी, आभा की बहन बीना पटेल, सुशीला नायर, प्रभावती (जयप्रकाश नारायण की पत्नी), राजकुमारी अमृतकौर, बीवी अमुतुसलाम, लीलावती आसर, प्रेमाबहन कंटक, मिली ग्राहम पोलक, कंचन शाह, रेहाना तैयबजी शामिल हैं. प्रभावती ने तो आश्रम में रहने के लिए पति जेपी को ही छोड़ दिया था. इससे जेपी का गांधी से ख़ासा विवाद हो गया था.

तक़रीबन दो दशक तक महात्मा गांधी के व्यक्तिगत सहयोगी रहे निर्मल कुमार बोस ने अपनी बेहद चर्चित किताब “माई डेज़ विद गांधी” में राष्ट्रपिता का अपना संयम परखने के लिए आश्रम की महिलाओं के साथ निर्वस्त्र होकर सोने और मसाज़ करवाने का ज़िक्र किया है. निर्मल बोस ने नोआखली की एक ख़ास घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है, “एक दिन सुबह-सुबह जब मैं गांधी के शयन कक्ष में पहुंचा तो देख रहा हूं, सुशीला नायर रो रही हैं और महात्मा दीवार में अपना सिर पटक रहे हैं.” उसके बाद बोस गांधी के ब्रम्हचर्य के प्रयोग का खुला विरोध करने लगे. जब गांधी ने उनकी बात नहीं मानी तो बोस ने अपने आप को उनसे अलग कर लिया.

ऐडम्स का दावा है कि लंदन में क़ानून पढ़े गांधी की इमैज ऐसा नेता की थी जो सहजता से महिला अनुयायियों को वशीभूत कर लेता था. आमतौर पर लोगों के लिए ऐसा आचरण असहज हो सकता है पर गांधी के लिए सामान्य था. आश्रमों में इतना कठोर अनुशासन था कि गांधी की इमैज 20 वीं सदी के धर्मवादी नेता जैम्स वॉरेन जोन्स और डेविड कोरेश जैसी बन गई जो अपनी सम्मोहक सेक्स-अपील से अनुयायियों को वश में कर लेते थे. ब्रिटिश हिस्टोरियन के मुताबिक गांधी सेक्स के बारे लिखना या बातें करना बेहद पसंद करते थे. इतिहास के तमाम अन्य उच्चाकाक्षी पुरुषों की तरह गांधी कामुक भी थे और अपनी इच्छा दमित करने के लिए ही कठोर परिश्रम का अनोखा तरीक़ा अपनाया. ऐडम्स के मुताबिक जब बंगाल के नोआखली में दंगे हो रहे थे तक गांधी ने मनु को बुलाया और कहा “अगर तुम मेरे साथ नहीं होती तो मुस्लिम चरमपंथी हमारा क़त्ल कर देते. आओ आज से हम दोनों निर्वस्त्र होकर एक दूसरे के साथ सोएं और अपने शुद्ध होने और ब्रह्मचर्य का परीक्षण करें.”

किताब में महाराष्ट्र के पंचगनी में ब्रह्मचर्य के प्रयोग का भी वर्णन है, जहां गांधी के साथ सुशीला नायर नहाती और सोती थीं. ऐडम्स के मुताबिक गांधी ने ख़ुद लिखा है, “नहाते समय जब सुशीला मेरे सामने निर्वस्त्र होती है तो मेरी आंखें कसकर बंद हो जाती हैं. मुझे कुछ भी नज़र नहीं आता. मुझे बस केवल साबुन लगाने की आहट सुनाई देती है. मुझे कतई पता नहीं चलता कि कब वह पूरी तरह से नग्न हो गई है और कब वह सिर्फ़ अंतःवस्त्र पहनी होती है.” दरअसल, जब पंचगनी में गांधी के महिलाओं के साथ नंगे सोने की बात फैलने लगी तो नथुराम गोड्से के नेतृत्व में वहां विरोध प्रदर्शन होने लगा. इससे गांधी को प्रयोग बंद कर वहां से बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा. बाद में गांधी हत्याकांड की सुनवाई के दौरान गोड्से के विरोध प्रदर्शन को गांधी की हत्या की कई कोशिशों में से एक माना गया.

ऐडम्स का दावा है कि गांधी के साथ सोने वाली सुशीला, मनु, आभा और अन्य महिलाएं गांधी के साथ शारीरिक संबंधों के बारे हमेशा गोल-मटोल और अस्पष्ट बाते करती रहीं. उनसे जब भी पूछा गया तब केवल यही कहा कि वह सब ब्रम्हचर्य के प्रयोग के सिद्धांतों का अभिन्न अंग था. गांधी की हत्या के बाद लंबे समय तक सेक्स को लेकर उनके प्रयोगों पर भी लीपापोती की जाती रही. उन्हें महिमामंडित करने और राष्ट्रपिता बनाने के लिए उन दस्तावेजों, तथ्यों और सबूतों को नष्ट कर दिया गया, जिनसे साबित किया जा सकता था कि संत गांधी, दरअसल, सेक्स-मैनियॉक थे. कांग्रेस भी स्वार्थों के लिए अब तक गांधी के सेक्स-एक्सपेरिमेंट से जुड़े सच छुपाती रही है. गांधी की हत्या के बाद मनु को मुंह बंद रखने की सख़्त हिदायत दी गई. उसे गुजरात में एक बेहद रिमोट इलाक़े में भेज दिया गया. सुशीला भी इस मसले पर हमेशा चुप्पी साधे रही. सबसे दुखद बात यह है कि गांधी के ब्रम्हचर्य के प्रयोग में शामिल क़रीब-क़रीब सभी महिलाओं का वैवाहिक जीवन नष्ट हो गया.

ब्रिटिश इतिहासकार के मुताबिक गांधी के ब्रह्मचर्य के चलते जवाहरलाल नेहरू उनको अप्राकृतिक और असामान्य आदत वाला इंसान मानते थे. सरदार पटेल और जेबी कृपलानी ने उनके व्यवहार के चलते ही उनसे दूरी बना ली थी. गिरिजा कुमार के मुताबिक पटेल गांधी के ब्रम्हचर्य को अधर्म कहने लगे थे. यहां तक कि पुत्र देवदास गांधी समेत परिवार के सदस्य और अन्य राजनीतिक साथी भी ख़फ़ा थे. बीआर अंबेडकर, विनोबा भावे, डीबी केलकर, छगनलाल जोशी, किशोरीलाल मश्रुवाला, मथुरादास त्रिकुमजी, वेद मेहता, आरपी परशुराम, जयप्रकाश नारायण भी गांधी के ब्रम्हचर्य के प्रयोग का खुला विरोध कर रहे थे.

गांधी की सेक्स लाइफ़ पर लिखने वालों के मुताबिक सेक्स के जरिए गांधी अपने को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध और परिष्कृत करने की कोशिशों में लगे रहे. नवविवाहित जोड़ों को अलग-अलग सोकर ब्रह्मचर्य का उपदेश देते थे. रवींद्रनाथ टैगोर की भतीजी विद्वान और ख़ूबसूरत सरलादेवी चौधरी से गांधी का संबंध तो जगज़ाहिर है. हालांकि, गांधी यही कहते रहे कि सरला उनकी महज “आध्यात्मिक पत्नी” हैं. गांधी डेनमार्क मिशनरी की महिला इस्टर फाइरिंग को भी भावुक प्रेमपत्र लिखते थे. इस्टर जब आश्रम में आती तो वहां की बाकी महिलाओं को जलन होती क्योंकि गांधी उनसे एकांत में बातचीत करते थे. किताब में ब्रिटिश एडमिरल की बेटी मैडलीन स्लैड से गांधी के मधुर रिश्ते का जिक्र किया गया है जो हिंदुस्तान में आकर रहने लगीं और गांधी ने उन्हें मीराबेन का नाम दिया.

दरअसल, ब्रिटिश चांसलर जॉर्ज ओसबॉर्न और पूर्व विदेश सचिव विलियम हेग ने पिछले महीने गांधी की प्रतिमा को लगाने की घोषणा की थी. मगर भारतीय महिला के ही विरोध के कारण मामला विवादित और चर्चित हो गया है. अपने इंटरव्यू में कभी महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर चलाने वाली कुसुम ने उनकी निजी ज़िंदगी पर विवादास्पद बयान देकर हंगामा खड़ा कर दिया है. कुसुम ने कहा, “बड़े लोग पद और प्रतिष्ठा का हमेशा फायदा उठाते रहे हैं. गांधी भी इसी श्रेणी में आते हैं. देश-दुनिया में उनकी प्रतिष्ठा की वजह ने उनकी सारी कमजोरियों को छिपा दिया. वह सेक्स के भूखे थे जो खुद तो हमेशा सेक्स के बारे में सोचा करते थे लेकिन दूसरों को उससे दूर रहने की सलाह दिया करते थे. यह घोर आश्चर्य की बात है कि धी जैसा महापुरूष यह सब करता था. शायद ऐसा वे अपनी सेक्स इच्छा पर नियंत्रण को जांचने के लिए किया करते हों लेकिन आश्रम की मासूम नाबालिग बच्चियों को उनके इस अपराध में इस्तेमाल होना पड़ता था. उन्होंने नाबालिग लड़कियों को अपनी यौन इच्छाओं के लिए इस्तेमाल किया जो सचमुच विश्वास और माफी के काबिल बिलकुल नहीं है.” कुसुम का कहना है कि अब दुनिया बदल चुकी है. महिलाओं के लिए देश की आजादी और प्रमुख नेताओं से ज्यादा जरूरी स्वंय की आजादी है. गांधी पूरे विश्व में एक जाना पहचाना नाम है इसलिए उन पर जारी हुआ यह सच भी पूरे विश्व में सुना जाएगा.

दरअसल, महात्मा गांधी हत्या के 67 साल गुज़र जाने के बाद भी हमारे मानस-पटल पर किसी संत की तरह उभरते हैं. अब तक बापू की छवि गोल फ्रेम का चश्मा पहने लंगोटधारी बुजुर्ग की रही है जो दो युवा-स्त्रियों को लाठी के रूप में सहारे के लिए इस्तेमाल करता हुआ चलता-फिरता है. आख़िरी क्षण तक गांधी ऐसे ही राजसी माहौल में रहे. मगर किसी ने उन पर उंगली नहीं उठाई. कुसुम के मुताबिक दुनिया के लिए गांधी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के आध्यात्मिक नेता हैं. अहिंसा के प्रणेता और भारत के राष्ट्रपिता भी हैं जो दुनिया को सविनय अवज्ञा और अहिंसा की राह पर चलने की प्रेरणा देता है. कहना न भी ग़लत नहीं होगा कि दुबली काया वाले उस पुतले ने दुनिया के कोने-कोने में मानव अधिकार आंदोलनों को ऊर्जा दी, उन्हें प्रेरित किया.

लेखक हरिगोविंद विश्वकर्मा कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.


हरगोविंद विश्वकर्मा ने ‘गांधीजी की सेक्स लाइफ’ शीर्षक से एक आर्टकिल 26 अप्रैल 2010 को लिखा था, जो नीचे दिया जा रहा है….

गांधीजी की सेक्स लाइफ

-हरिगोविंद विश्वकर्मा-

क्या राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी असामान्य सेक्स बीहैवियर वाले अर्द्ध-दमित सेक्स मैनियॉक थे? जी हां, महात्मा गांधी के सेक्स-जीवन को केंद्र बनाकर लिखी गई किताब “गांधीः नैक्ड ऐंबिशन” में एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री के हवाले से ऐसा ही कहा गया है। महात्मा गांधी पर लिखी किताब आते ही विवाद के केंद्र में आ गई है जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उसकी मांग बढ़ गई है। मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार जैड ऐडम्स ने पंद्रह साल के अध्ययन और शोध के बाद “गांधीः नैक्ड ऐंबिशन” को किताब का रूप दिया है।

किताब में वैसे तो नया कुछ नहीं है। राष्ट्रपिता के जीवन में आने वाली महिलाओं और लड़कियों के साथ गांधी के आत्मीय और मधुर रिश्तों पर ख़ास प्रकाश डाला गया है। रिश्ते को सनसनीख़ेज़ बनाने की कोशिश की गई है। मसलन, जैड ऐडम्स ने लिखा है कि गांधी नग्न होकर लड़कियों और महिलाओं के साथ सोते ही नहीं थे बल्कि उनके साथ बाथरूम में “नग्न स्नान” भी करते थे।

महात्मा गांधी हत्या के साठ साल गुज़र जाने के बाद भी हमारे मानस-पटल पर किसी संत की तरह उभरते हैं। अब तक बापू की छवि गोल फ्रेम का चश्मा पहने लंगोटधारी बुजुर्ग की रही है जो दो युवा-स्त्रियों को लाठी के रूप में सहारे के लिए इस्तेमाल करता हुआ चलता-फिरता है। आख़िरी क्षण तक गांधी ऐसे ही राजसी माहौल में रहे। मगर किसी ने उन पर उंगली नहीं उठाई। ऐसे में इस किताब में लिखी बाते लोगों ख़ासकर, गांधीभक्तों को शायद ही हजम हों। दुनिया के लिए गांधी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के आध्यात्मिक नेता हैं। वह अहिंसा के प्रणेता और भारत के राष्ट्रपिता भी हैं। जो दुनिया को सविनय अवज्ञा और अहिंसा की राह पर चलने की प्रेरणा देता है।  कहना न होगा कि दुबली काया वाले उस पुतले ने दुनिया के कोने-कोने में मानव अधिकार आंदोलनों को ऊर्जा दी, उन्हें प्रेरित किया।

नई किताब यह खुलासा करती है कि गांधी उन युवा महिलाओं के साथ ख़ुद को संतप्त किया जो उनकी पूजा करती थीं और अकसर उनके साथ बिस्तर शेयर करती थीं। बहरहाल, ऐडम्स का दावा है कि लंदन से क़ानून की पढ़ाई करने के बाद वकील से गुरु बने गांधी की इमैज कठोर नेता की बनी जो अपने अनोखी सेक्सुअल डिमांड से अनुयायियों को वशीभूत कर लेता है। आमतौर पर लोग के लिए यह आचरण असहज हो सकता है पर गांधी के लिए सामान्य था। ऐडम्स ने किताब में लिखा है कि गांधी ने अपने आश्रमों में इतना कठोर अनुशासन बनाया था कि उनकी छवि 20वीं सदी के धर्मवादी नेताओं जैम्स वॉरेन जोन्स और डेविड कोरेश की तरह बन गई जो अपनी सम्मोहक सेक्स अपील से अनुयायियों को क़रीब-क़रीब ज्यों का त्यों वश में कर लेते थे। ब्रिटिश हिस्टोरियन के मुताबिक महात्मा गांधी सेक्स के बारे लिखना या बातें करना बेहद पसंद करते थे। किताब के मुताबिक हालांकि अन्य उच्चाकाक्षी पुरुषों की तरह गांधी कामुक भी थे और सेक्स से जुड़े तत्थों के बारे में आमतौर पर खुल कर लिखते थे। अपनी इच्छा को दमित करने के लिए ही उन्होंने कठोर परिश्रम का अनोखा स्वाभाव अपनाया जो कई लोगों को स्वीकार नहीं हो सकता।

किताब की शुरुआत ही गांधी की उस स्वीकारोक्ति से हुई है जिसमें गांधी ख़ुद लिखा या कहा करते थे कि उनके अंदर सेक्स-ऑब्सेशन का बीजारोपण किशोरावस्था में हुआ और वह बहुत कामुक हो गए थे। 13 साल की उम्र में 12 साल की कस्तूरबा से विवाह होने के बाद गांधी अकसर बेडरूम में होते थे। यहां तक कि उनके पिता कर्मचंद उर्फ कबा गांधी जब मृत्यु-शैया पर पड़े मौत से जूझ रहे थे उस समय किशोर मोहनदास पत्नी कस्तूरबा के साथ अपने बेडरूम में सेक्स का आनंद ले रहे थे।

किताब में कहा गया है कि विभाजन के दौरान नेहरू गांधी को अप्राकृतिक और असामान्य आदत वाला इंसान मानने लगे थे। सीनियर लीडर जेबी कृपलानी और वल्लभभाई पटेल ने गांधी के कामुक व्यवहार के चलते ही उनसे दूरी बना ली। यहां तक कि उनके परिवार के सदस्य और अन्य राजनीतिक साथी भी इससे ख़फ़ा थे। कई लोगों ने गांधी के प्रयोगों के चलते आश्रम छोड़ दिया। ऐडम ने गांधी और उनके क़रीबी लोगों के कथनों का हवाला देकर बापू को अत्यधिक कामुक साबित करने का पूरा प्रयास किया है। किताब में पंचगनी में ब्रह्मचर्य का प्रयोग का भी वर्णन किया है, जहां गांधी की सहयोगी सुशीला नायर गांधी के साथ निर्वस्त्र होकर सोती थीं और उनके साथ निर्वस्त्र होकर नहाती भी थीं। किताब में गांधी के ही वक्तव्य को उद्धरित किया गया है। मसलन इस बारे में गांधी ने ख़ुद लिखा है, “नहाते समय जब सुशीला निर्वस्त्र मेरे सामने होती है तो मेरी आंखें कसकर बंद हो जाती हैं। मुझे कुछ भी नज़र नहीं आता। मुझे बस केवल साबुन लगाने की आहट सुनाई देती है। मुझे कतई पता नहीं चलता कि कब वह पूरी तरह से नग्न हो गई है और कब वह सिर्फ अंतःवस्त्र पहनी होती है।”

किताब के ही मुताबिक जब बंगाल में दंगे हो रहे थे गांधी ने 18 साल की मनु को बुलाया और कहा “अगर तुम साथ नहीं होती तो मुस्लिम चरमपंथी हमारा क़त्ल कर देते। आओ आज से हम दोनों निर्वस्त्र होकर एक दूसरे के साथ सोएं और अपने शुद्ध होने और ब्रह्मचर्य का परीक्षण करें।” ऐडम का दावा है कि गांधी के साथ सोने वाली सुशीला, मनु और आभा ने गांधी के साथ शारीरिक संबंधों के बारे हमेशा अस्पष्ट बात कही। जब भी पूछा गया तब केवल यही कहा कि वह ब्रह्मचर्य के प्रयोग के सिद्धांतों का अभिन्न अंग है।

ऐडम्स के मुताबिक गांधी अपने लिए महात्मा संबोधन पसंद नहीं करते थे और वह अपने आध्यात्मिक कार्य में मशगूल रहे। गांधी की मृत्यु के बाद लंबे समय तक सेक्स को लेकर उनके प्रयोगों पर लीपापोती की जाती रही। हत्या के बाद गांधी को महिमामंडित करने और राष्ट्रपिता बनाने के लिए उन दस्तावेजों, तथ्यों और सबूतों को नष्ट कर दिया, जिनसे साबित किया जा सकता था कि संत गांधी दरअसल सेक्स मैनियैक थे। कांग्रेस भी स्वार्थों के लिए अब तक गांधी और उनके सेक्स-एक्सपेरिमेंट से जुड़े सच को छुपाती रही है। गांधीजी की हत्या के बाद मनु को मुंह बंद रखने की सलाह दी गई। सुशीला भी इस मसले पर हमेशा चुप ही रहीं।

किताब में ऐडम्स दावा करते हैं कि सेक्स के जरिए गांधी अपने को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध और परिष्कृत करने की कोशिशों में लगे रहे। नवविवाहित जोड़ों को अलग-अलग सोकर ब्रह्मचर्य का उपदेश देते थे। ऐडम्स के अनुसार सुशीला नायर, मनु और आभा के अलावा बड़ी तादाद में महिलाएं गांधी के क़रीब आईं। कुछ उनकी बेहद ख़ास बन गईं। बंगाली परिवार की विद्वान और ख़ूबसूरत महिला सरलादेवी चौधरी से गांधी का संबंध जगज़ाहिर है। हालांकि गांधी केवल यही कहते रहे कि सरलादेवी उनकी “आध्यात्मिक पत्नी” हैं। गांधी जी डेनमार्क मिशनरी की महिला इस्टर फाइरिंग को प्रेमपत्र लिखते थे। इस्टर जब आश्रम में आती तो बाकी लोगों को जलन होती क्योंकि गांधी उनसे एकांत में बातचीत करते थे। किताब में ब्रिटिश एडमिरल की बेटी मैडलीन स्लैड से गांधी के मधुर रिश्ते का जिक्र किया गया है जो हिंदुस्तान में आकर रहने लगीं और गांधी ने उन्हें मीराबेन का नाम दिया।

ऐडम्स ने कहा है कि नब्बे के दशक में उसे अपनी किताब “द डाइनैस्टी” लिखते समय गांधी और नेहरू के रिश्ते के बारे में काफी कुछ जानने को मिला। इसके बाद लेखक की तमन्ना थी कि वह गांधी के जीवन को अन्य लोगों के नजरिए से किताब के जरिए उकेरे। यह किताब उसी कोशिश का नतीजा है। जैड दावा करते हैं कि उन्होंने ख़ुद गांधी और उन्हें बेहद क़रीब से जानने वालों की महात्मा के बारे में लिखे गए किताबों और अन्य दस्तावेजों का गहन अध्ययन और शोध किया है। उनके विचारों का जानने के लिए कई साल तक शोध किया। उसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे।

इस बारे में ऐडम्स ने स्वीकार किया है कि यह किताब विवाद से घिरेगी। उन्होंने कहा, “मैं जानता हूं इस एक किताब को पढ़कर भारत के लोग मुझसे नाराज़ हो सकते हैं लेकिन जब मेरी किताब का लंदन विश्वविद्यालय में विमोचन हुआ तो तमाम भारतीय छात्रों ने मेरे प्रयास की सराहना की, मुझे बधाई दी।” 288 पेज की करीब आठ सौ रुपए मूल्य की यह किताब जल्द ही भारतीय बाज़ार में उपलब्ध होगी। ‘गांधीः नैक्ड ऐंबिशन’ का लंदन यूनिवर्सिटी में विमोचन हो चुका है। किताब में गांधी की जीवन की तक़रीबन हर अहम घटना को समाहित करने की कोशिश की गई है। जैड ऐडम्स ने गांधी के महाव्यक्तित्व को महिमामंडित करने की पूरी कोशिश की है। हालांकि उनके सेक्स-जीवन की इस तरह व्याख्या की है कि गांधीवादियों और कांग्रेसियों को इस पर सख़्त ऐतराज़ हो सकता है।

लेखक हरिगोविंद विश्वकर्मा के उपरोक्त आलेख का स्रोत ब्रिटिश अख़बारों में ‘गांधीः नैक्ड ऐंबिशन’ के छपे रिव्यू और रिपोर्ताज हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: