थक गया है बनारस का ‘गांडीव’!

गांडीव अखबार की मालकिन और संपादक की तस्वीरें

वाराणसी। एक समय था, जब ‘गांडीव’ को शाम का दैनिक जागरण माना जाता था। लेकिन अब सब कुछ बदल चुका है। गांडीव थक चुका है। कोरोना काल अखबार के अस्तित्व को धीरे-धीरे समाप्त कर रहा है। एक समय था, जब ऑफिस में लोगों को बैठने के लिए जगह नहीं मिलती थी, लेकिन वर्तमान समय में ऑफिस तो रोज खुलता है, लेकिन वहां कोई बैठने वाला नहीं है।

सरकार सभी छोटे-मझोले अखबारों को हर माह लाखों का विज्ञापन देती है, ताकि इस कोरोना काल में विज्ञापन के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा सके, लेकिन यह सभी छोटे-मझोले अखबार वाले (जिसमें ‘गांडीव’ भी शामिल है) केवल फाइल कॉपी छापकर मोटी कमाई का जरिया बनाकर सरकार को हर माह लाखों का चूना लगा रहे हैं।

‘गांडीव’ अखबार की मालकिन रचना अरोड़ा हैं। प्रधान सम्पादक राजकुमार वाजपेयी हैं। ये हिटलरशाही रवैये को लेकर कुख्यात हैं। कई पुराने कर्मचारियों ने बकाया वेतन और बोनस को लेकर श्रम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। कुछ को हाल में ही जीत भी मिली है। श्रम न्यायालय द्वारा कर्मचारियों के हित में फैसले आने के बावजूद भी कर्मचारियों को आज तक उनका पारिश्रमिक नहीं दिया गया और ना ही बकाया बोनस।

इन अखबार मालिकों को न तो सरकार का भय है और ना ही कानून का। वर्तमान में कार्यरत कर्मचारियों में पारसनाथ विश्वकर्मा, आशुतोष नारायण, अनुग्रह नारायण पाण्डेय , विजय कुमार यादव तथा राजू विश्वकर्मा ने मेहनत और लगन के बल पर संस्थान को उच्च शिखर पर पहुंचाया। इसके बावजूद भी इन सभी कर्मचारियों का लगभग लाखों रुपया बकाया है।

संस्थान से अपना बकाया वेतन व बोनस मांगने पर मालिकानों द्वारा झूठा आश्वासन दिया जाता है। हिटलरशाही रवैया अपनाकर काम कराया जाता है। काम नहीं करने पर पैसा भूल जाने की बात कही जाती है। इससे इन कर्मचारियों के परिवारों के सामने भुखमरी की समस्या आ गयी है।

अत: समय रहते अगर सरकार और प्रशासन ने इन कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान नहीं कराया तो कभी भी इन परिवारों के साथ अप्रिय घटनाएं हो सकती है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार व प्रशासन की होगी।

बनारस से एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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