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घर के अंदर किन किन जगहों पर कितने चप्पल रखें!

विवेक उमराव-

हाइजीन की चोचलेबाजी : लगभग दो महीने पहले अनेक वर्षों बाद जब भारत आया, एक हफ्ता से अधिक ग्रेटर-नोएडा में मित्र छोटे भाई के यहां रहा, दिल्ली में टाइम्स ग्रुप के संपादक महोदय के घर में कई घंटे रहा, एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के राष्ट्रीय स्तर के अधिकारी के यहां डिनर करने गया। इनमें से किसी के भी यहां मैंने घर के अंदर व बाथरूम के लिए अलग चप्पल होने का व्यवस्था नहीं देखी। लिविंग एरिया के बाहर जूते उतारिए और फिर पूरे घर में नंगे पैर जहां मर्जी वहां घूमिए, टायलेट का प्रयोग कीजिए। बार-बार चप्पल बदलने उतारने इत्यादि का झंझट नहीं।

लेकिन जब से उत्तरप्रदेश में आया हूं, तब से लखनऊ हो या गोरखपुर या वाराणसी (प्रोफेसर ओम शंकर भाई की हवेली को छोड़) जहां भी गया हूं, मैंने एक अजीब फ्रीकनेस देखी है। वह है अनेक प्रकार के चप्पलों को पहनने की फ्रीकनेस। यह फ्रीकनेस किसी एक घर में देखी हो ऐसा नहीं है, जहां भी गया हूं, लगभग सभी जगह देखी है। कुछ घरों में तो मनोविकार की स्थिति तक यह फ्रीकनेस देखी है।

घर के बाहर प्रयोग किए जाने वाले जूते चप्पल तो बाहर ही उतार दिए जाते हैं। फिर घर के अंदर वाले चप्पल अलग होते हैं, आंगन में प्रयोग किए जाने वाले चप्पल अलग होते हैं, बाथरूम में प्रयोग किए जाने वाले चप्पल अलग होते हैं।

कुछ घरों में इस संदर्भ में नियम बहुत सख्त होते हैं, ऐसे घरों में रहने वाले लोगों में कई लोग ऐसे भी होते हैं जो एक तरह से दहशत में जीते हैं। मान लीजिए आप भूल से घर के अंदर पहने जाने वाले चप्पल पहनकर दरवाजे के बाहर आ गए (भले ही घर के कैंपस के अंदर ही हों) तो आपके अंदर एक बड़ी गलती कर चुकने की दहशत भर जाती है। आप अपने कमरे के अंदर हैं, लेकिन भूलवश बाथरूम में कमरे वाले चप्पल पहने ही घुस गए जब याद आता है तो आप गलती कर चुकने के दहशत से भर जाते हैं।

दिन में अनेक बार आपको कमरे से बाथरूम, कमरे से घर के आंगन, कमरे से दरवाजे के बाहर तक आना जाना पड़ता है, जाहिर है कि यदि आप रोबोटिक मानसिकता के नहीं हैं तो आपसे बार बार चप्पलों को उतारने व दूसरे चप्पलों को पहनने में भूल हो सकती है। हर बार आप दहशत से भर उठते हैं। आपके शरीर में तनाव के कारण कइ प्रकार के रसायनों व हारमोनों का स्राव होता है जो आपके स्वास्थ्य को हानि पहुंचाते हैं।

यह सब चोचलेबाजी होती है हाइजीन के नाम पर। जबकि यदि गंभीरता से देखा जाए तो यदि इन लोगों को वास्तव में हाइजीन के प्रति समझ हो तो इन लोगों को स्वयं अहसास होगा कि इस तरह के हाइजीन से इनकी इम्युनिटी घटती है, गलती करने के तनाव के कारण रसायनों/हारमोनों के स्राव से होने वाली हानियों इत्यादि से लाभ की बजाय नुकसान ही अधिक है।

मैंने इन घरों में बिना अपवाद यही देखा कि हाइजीन के नाम पर की जाने वाली इस तरह की चोचलेबाजियों के बावजूद इन घरों में रहने वाले लोग स्वस्थ नहीं हैं, शरीर की फिटनेस नहीं है, शरीर की इम्युनिटी कमजोर है।

लोग घर के अंदर अनेक प्रकार के चप्पल रखते हैं, कमरे का अलग, लाबी का अलग, आंगन का अलग, बाथरूम का अलग। मुझे इस मानसिकता के पीछे का कारण हाइजीन कम, मन में गहरे दबी हुई छुआछूत वाली कंडीशनिंग अधिक लगती है। शौच को छुआछूत के तहत रखा गया है, शौच के संदर्भ में अनेक कर्मकांड बनाए गए, बहुत लोग जितनी बार शौच जाएंगे उतनी बार नहाएंगे, बहुत लोग शौचालय निवास से दूर बनाएंगे, बहुत लोग शौच में प्रयोग किए जाने वाले मग को गंदा व टूटाफूटा रखते हैं (जबकि यह मजबूत व साफसुथरा होना चाहिए)। ऐसा ही बहुत कुछ।

यहां तक कि जिन लोगों के घरों में पाश्चात्य शैली के कमोड हैं, उनके घरों में भी यही चोचलेबाजी की जाती है। जबकि पाश्चात्य शैली वाले कमोड में तो शौच की छिट्टी इत्यादि वगैरह का भी कमोड से बाहर आने की गुंजाइश नहीं होती है।

पैर के तलुवे जो बहुत अधिक मोटी खाल होती है, प्राकृतिक रूप से डिजाइन्ड होती है कि उसे जमीन पर ही चलना है, कीचड़ इत्यादि में चलना है। जो सुरक्षित है उसके संदर्भ में हम अपनी फ्रीकनेस के तहत हाइजीन का चोला ओढ़कर चोचलेबाजी करते हैं। लेकिन हम अपने पर्यावरण को शुद्ध करने का कोई भी गंभीर प्रयास नहीं करते हैं, हम इस संदर्भ में विचार ही नहीं करना चाहते हैं कि हमारे शरीर की त्वचा कितना प्रदूषण सोखती है (भले ही हम कपड़े पहने रहें), हम जो सांस लेते हैं वह कितना प्रदूषण सोखती है। जो सब्जी फल हम खाते हैं वे कितना प्रदूषित हैं। हममे से बहुत लोग तो ग्राउंडवाटर को शुद्ध मानने के मिथक में इस कदर लिप्त होते हैं कि इस संदर्भ में कुछ भी तर्क ठेलठाल कर, सही बात को समझना सुनना तक नहीं चाहते हैं।

हम धूल को इनहाइजीन मानते हैं, हम पेड़ों की पत्तियों को इनहाइजीन मानते हैं, हम मिट्टी को इनहाइजीन मानते हैं, जबकि जिन चीजों को इनहाइजीन मानना चाहिए उनके संदर्भ में हम इंग्नोरेंट रहने को प्राथमिकता देते हैं।

दरअसल इस प्रकार की चोचलेबाजियों से हम अपनी व अपने परिवार के सदस्यों व बच्चों की इम्युनिटी कमजोर कर रहे होते हैं। और हममें एरोगेंस इतना अधिक होता है कि हम यह मानने को तैयार नहीं होते हैं। अजानकारी का एरोगेंस, कंडीशनिंग का एरोगेंस, डिस्क्रिमिनेटिव मानसिकता का एरोगेंस, ईर्ष्या का एरोगेंस, बहुत हानिकारक व खतरनाक एरोगेंस होते हैं।

घर के कैंपस के बाहर प्रयोग किए जाने वाले जूते लिविंग एरिया से बाहर उतारने तक ठीक है। शेष हो सके तो घर के पूरे कैंपस में नंगे पांव रहिए, आंगन में नंगे पांव चलिए, घर के कमरों में नंगे पांव रहिए, बाथरूम नंगेपांव जाइए, यदि टायलेट पाश्चात्य शैली का कमोड हो तो नंगे पांव रहिए।

शरीर की इम्युनिटी संवर्धित कीजिए, कमजोर नहीं कीजिए। यह चप्पल नहीं पहना, वह चप्पल नहीं पहना, इस तरह की गलती करने के बाद दहशत में रहना, तनाव में रहना, शरीर के स्वास्थ्य के लिए बहुत ही अधिक हानिकारक होता है।

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