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आज के अखबार : घुस कर मारूंगा से लेकर पुलवामा पर सन्नाटा, अब सिंधु संधि स्थगित करने से होगा क्या?

संजय कुमार सिंह

पहलगाम के बाद कल के अखबारों के बारे में मैंने यहां लिखा था कि हिन्दी वालों ने नाम पूछकर मारा को बहुत प्रमुखता दी है और व्हाट्सऐप्प पर अंग्रेजी में भी बताया जा रहा था कि धर्म देखकर मारा। आज के अखबारों में पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई की खबर है, मुसलमानों के खिलाफ नहीं। आप जानते हैं कि वारदात के वक्त प्रधानमंत्री मुस्लिम देश में थे और जाते रहते हैं। ऐसे में मुसलमानों की कार्रवाई के लिये पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई का कोई मतलब नहीं है लेकिन आज सभी अखबारों की लीड यही है। किसने क्या लिखा कैसे छापा उसपर आने से पहले यह बताना जरूरी है कि पाकिस्तान की आतंकवादी कार्रवाई के लिये उसे सबक सिखाना जरूरी है लेकिन कार्रवाई पाकिस्तान की ही थी इसकी तो पुष्टि होनी चाहिये। अगर समस्या मुसलमानों से है तो मुसलिम देशों से संबंध के बारे में भी सोचा जाना चाहिये। नवोदय टाइम्स की खबर के अनुसार हमले के बाद 90 फीसदी बुकिंग रद्द हुई है, 15 हजार एयर टिकट कैंसिल हुए हैं। दि एशियन एज ने चार कॉलम की खबर से बताया है कि यह मामला खुफिया जानकारी इकट्ठा करने वालों की पूर्ण नाकामी है और इससे यह खुलासा हो चुका है। इसके साथ यह भी खबर है, हमले के बाद पाकिस्तान में सैनिक गतिविधि देखी गई। इन खबरों के बीच एक खबर यह भी है कि बिहार में आज प्रधानमंत्री की रैली है और कानपुर वाली टाल दी गई है। आप जानते हैं कि बिहार में चुनाव होने हैं।     

पहलगाम हमला पाकिस्तान ने कराया तो ‘घुसकर मारूंगा’ के बाद क्या हुआ? पुलवामा की जांच में पाकिस्तान के शामिल होने के सबूत मिले? अगर मिले तो आगे क्या कार्रवाई हुई और नहीं मिले तो इस बार फिर पाकिस्तान को ही कैसे दोषी ठहराया जा सकता है। खबरों में (यह भी) बताया गया है कि स्थानीय लोगों की मिलीभगत थी। इसके अलावा, पाकिस्तान में (दरअसल कश्मीर में पाकिस्तानी) आतंकवाद खत्म होने का दावा कई बार किया जा चुका है फिर भी पाकिस्तान के खिलाफ अपनी ही घोषणा गलत होने पर आज कोई खबर नहीं है। मैं नियमित रिपोर्टिंग करने वाला पत्रकार नहीं हूं और अखबारों में सारी सूचनाएं नहीं होती हैं। इसलिए मैं नहीं जानता कि वास्तविकता क्या है लेकिन जो अखबार आज बता रहे हैं कि पाकिस्तान के खिलाफ यह कार्रवाई की गई है उन्हें यह तो याद रखना ही चाहिये कि पुलवामा के मामले में क्या हुआ और उसके बाद से अभी तक भारत सरकार ने क्या कार्रवाई की है। अगर उस मामले में कार्रवाई नहीं की गई तो इस बार क्या कुछ होगा और जो हुआ उसका क्या प्रभाव हो सकता है। यह भी देखा जाना चाहिये और खबरों में यह सब भी बताया जाना चाहिये पर मुझे मेरे अखबारों में ऐसा कुछ नहीं दिखा।

अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बता दूं कि अमर उजाला की लीड के अनुसार, पहलगाम आतंकी हमले के बाद फूटा भारत (सरकार) का गुस्सा – सिंधु संधि स्थगित, पाकिस्तानियों के वीजा रद्द, 48 घंटे में छोड़ें देश। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सीसीएस बैठक में बनी जवाबी कार्रवाई की रणनीति। अभी तक तो मैं यही समझता था कि प्रधानमंत्री अकेले ही सारे निर्णय लेते हैं और बैठक वगैरह होती भी है तो अनौपचारिक और उसमें प्रधानमंत्री का फैसला ही मानने का निर्णय होता रहा है। लेकिन आज फोटो के साथ बताया गया है कि जवाबी कार्रवाई (जो हमलावरों के खिलाफ नहीं) पाकिस्तान के खिलाफ है की रणनीति सीसीएस की बैठक में बनी है। इसके तहत पहली कार्रवाई सिंधु संधि स्थगित करने की है तो कोई भी समझ सकता है कि यह नदी के पानी से संबंधित किसी संधि को स्थगित करने की कार्रवाई है।

अजीत साही ने लिखा है, सुनने में ये सख़्त और कड़ा कदम लगता है। लेकिन सच्चाई ये है कि ये फ़ैसला क़ानूनी तौर पर कमज़ोर है और ज़मीनी हक़ीक़त में इसका कोई असर नहीं पड़ने वाला है। पहली बात ये कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत भारत इस समझौते से यूं ही बाहर नहीं निकल सकता है। ये एक पक्का समझौता है जो 1960 में हुआ था और वर्ल्ड बैंक की निगरानी में साइन किया गया था। इस से निकलने का कोई सीधा (इतना आसान कहना चाहिये) रास्ता है ही नहीं। अगर भारत इसे एक तरफा तरीक़े से ख़त्म करता है तो ये अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन होगा। ….. दूसरी और ज़्यादा बड़ी बात ये है कि अगर भारत ट्रीटी को ख़त्म भी कर दे तो भी वो पाकिस्तान जाने वाले पानी को रोक नहीं सकता है। भारत के पास ऐसे बड़े बांध, रिज़र्वॉयर या सुरंगें हैं ही नहीं जिससे सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी विशाल नदियों को रोका या मोड़ा जा सके। पकल डुल बांध और बर्सर बांध जैसे प्रोजेक्ट्स जिनको भारत इस समझौते के तहत बना सकता है वो सालों से अधूरे पड़े हैं। हालत तो ये है कि इस संधि के तहत भारत अपने हिस्से के पानी का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है, ख़ासकर पूर्वी नदियों में, जिनका काफ़ी पानी वैसे ही पाकिस्तान चला जाता है। तो फिर पाकिस्तान के रोके गए पानी को कहाँ ले जाया जाएगा?

एक बात और। इनमें से कुछ नदियों का बहाव ऐसा है कि पाकिस्तान पहुँचने से पहले इनका पानी नहरों और छोटी नदियों वग़ैरह के रास्ते जम्मू-कश्मीर और पंजाब जैसे भारतीय राज्यों तक जाता है। अगर भारत सरकार इन नदियों के पानी को किसी तरह रोक भी पाती है तो इसका असर पाकिस्तान से पहले भारतीय किसानों पर पड़ेगा जो इन्हीं नदियों के पानी से खेती करते हैं। हर हाल में भारत की फ़सलें प्रभावित होंगी। किसानों में ग़ुस्सा पैदा होगा और वो भी उन इलाकों में जो पहले ही संवेदनशील हैं। अगर बिना तैयारी के पानी को रोकने की कोशिश की गई तो बिना स्टोरेज के पानी इकट्ठा होकर बाढ़ जैसी हालत भी बना सकता है। ख़ासकर बरसात या ग्लेशियर पिघलने के मौसम में। यही वजह है कि 1965, 1971 और 1999 के बड़े युद्धों के दौरान भी और सीमा पार आतंकवाद और भारत-पाकिस्तान के बीच चल रही दुश्मनी के बावजूद आज तक सिंधु पानी समझौता जारी है।

इसके बावजूद अब इसे स्थगित किया जाना आज मेरे सभी अखबारों में लीड है। यह अलग बात है कि इंडियन एक्सप्रेस ने शीर्षक में यह बात नहीं कही है। शीर्षक है, पहला कदम। वैसे तो यह बहुत गंभीर बात लगती है लेकिन यह कदम बहुत पहले उठाया जाना चाहिये था। पुलवामा के बाद की कार्रवाई वैसी क्यों नहीं हुई जैसी अमेरिका ने 11 सितंबर 2001 के बाद की थी। भारत के पास तो इसके लिए आधार भी मौजूद था और भाजपा की सरकार में ही विमान अपहरण के बाद उसे दुर्दांत आतंकियों को छोड़ना पड़ा था और उसके बाद की आतंकी कार्रवाई हुई थी। पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए अब जो सख्ती की या दिखाई जा रही है वह पुलवामा के बाद भी या कई अन्य मौके पर पहले भी की जा सकती थी। पहले नहीं की गई और इस बार की जायेगी (उसका असर होगा) यह यकीन मुझे नहीं हो रहा है।

द हिन्दू ने पांच कॉलम की लीड का शीर्षक लगाया है, पाकिस्तान के साथ सिंधु समझौता स्थगित। तीन और कार्रवाई उपशीर्षक है। इनमें पहला है, भारत ने पहलगाम हमले के पाकिस्तान संबंध को रेखांकित किया, पांच जवाबी कार्रवाई का खुलासा। दूसरा बिन्दु है, अटारी चेकपोस्ट बंद; पाकिस्तानी नागरिकों से एक मई तक वापस जाने के लिए कहा गया। तीसरा बिन्दु है, विशेष वीजा रद्द मान लिये गये, राजनयिक कर्मचारी वापस बुलाये जायेंगे। मुझे लगता है कि पुलवामा के बाद ही यह सब किया जाना चाहिये था और तब नहीं किये गये तो अब किये जाने का एक मतलब यह भी होगा कि यह कार्रवाई पहले की गई होती तो पहलगाम हादसा नहीं होता। अगर यह सही नहीं है और आगे फिर ऐसा कुछ होने की गारंटी नहीं है तो जाहिर है कि मामला वह नहीं है जो बताया और दिखाया जा रहा है। बताया यह गया है कि मुसलमानों ने हिन्दुओं को मारा और तथ्य यह है कि प्रधानमंत्री एक मुस्लिम देश में थे और पाकिस्तान के खिलाफ जो कार्रवाई की गई है उसका जमीन पर कोई असर नहीं होना है और अगर यह कार्रवाई इतनी ही दमदार थी तो पहले क्यों नहीं की गई। अगर नदी का पानी रोकना इतना ही आसान होता तो बिहार में हर साल बाढ़ क्यों आती है और उसे क्यों नहीं रोका जा सका है। 

आज अखबारों की खबरों में इन सवालों का जवाब नहीं है और कई अखबारों ने तो शीर्षक भी ऐसा लगाया है जिससे इस कार्रवाई के बेमतलब होने का संदेश न जाये। उदाहरण के लिए, दि एशियन एज का शीर्षक है – प्रधानमंत्री ने सीसीएस की अध्यक्षता की और पाकिस्तान के खिलाफ राजनयिक हमला। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर चार कॉलम की लीड है। शीर्षक है, भारत ने पाकिस्तान के साथ संबंध सीमित किये, सिंधु जल संधि को स्थगित किया। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर बैनर है। शीर्षक है, सिन्धु संधि स्थगित, पाकिस्तानियों के लिए नो एंट्री। सुनने में यह भी अच्छा लगता है लेकिन आज ही खबर है कि वीजा दिये गये थे (जाते थे) और उनसे कहा गया है कि 48 घंटे में भारत छोड़ें। ऐसे में वारदात उनलोगों ने तो नहीं की होगी जो वीजा लेकर आते थे और अवैध रूप से आने वालों ने वारदात की तो वीजा लेकर आने वालों को क्यों वापस भेजना और पड़ोसी देशों के हिन्दुओं के मामले में भारत सरकार का जो रुख रहा है तो वह पाकिस्तानी हिन्दुओं के मामले में क्या होगा, इस शीर्षक से समझ में नहीं आता है। हालांकि, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि इस शीर्षक से यह सवाल दिमाग में आता है जिसका जवाब आज नहीं है और सवाल यह है कि विधिवत आने पर रोक पहले क्यों नहीं थी और अब लगने से क्या फर्क पड़ने वाला है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सवाल इस प्रचारनुमा शीर्षक से उठ रहा है।

द टेलीग्राफ का शीर्षक है, काउंटिंग: द प्राइस ऑफ पहलगाम। मोटे तौर पर इसका मतलब हुआ, पहलगाम की कीमत का हिसाब लगाइये। द टेलीग्राफ ने अपनी इस खबर के साथ बताया है कि पहलगाम के बाद कश्मीर में पर्यटन का बुरा हाल है और यह भी कि इसके खिलाफ घाटी में दुर्लभ बंद का आयोजन किया गया और विरोध प्रदर्शन हुए। सोशल मीडिया पर खबरें और सूचनाएं भरी पड़ी हैं कि स्थानीय लोगों ने पर्यटकों की मदद की और वे आतंकियों के साथ नहीं हैं। एक स्थानीय मुस्लिम के मारे जाने की भी खबर है। सरकार समर्थक अखबारों में ये खबरें नहीं हैं। दूसरी ओर, इंडियन एक्सप्रेस में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बयान है, आतंकियों ने निर्दोष लोगों और धर्म को निशाना बनाया, इसकी मजबूत प्रतिक्रिया होगी। जाहिर है, रक्षा मंत्री आतंकियों को दोषी मान रहे हैं और कार्रवाई पाकिस्तान के खिलाफ हो रही है। अगर पाकिस्तान पहले से आतंकवादी हरकतें करवाता रहा है तो उसके साथ अभी तक संबंध क्यों थे? इसका जवाब कहीं नहीं है। हालांकि, आज इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक खबर का शीर्षक है, पाकिस्तान ने किसी भूमिका से इनकार किया, भारत ने सीमा पार से हमले के संबंध बताये। इंडियन एक्सप्रेस की एक और खबर के अनुसार, पहलगाम वारदात की जांच से पता चला है कि इसमें पांच आतंकी शामिल थे। इनमें तीन पाकिस्तान के हैं। यहां आपको याद दिला दूं कि मोदी सरकार ने बालाकोट हमले में तीन सौ आतंकियों को मार गिराने का दावा किया था और हाल में पाकिस्तान चुनाव के समय केंद्रीय गृहमंत्री ने कश्मीर के आतंकवाद से मुक्त होने और आतंकवाद को कुचल देने का दावा किया था। कहने की जरूरत नहीं है कि कश्मीर घूमने जाने वालों पर इस आश्वासन का भी प्रभाव रहा होगा और अब हिन्दी मीडिया इसे हिन्दुओं के खिलाफ मुसलमानों की कार्रवाई बता रहा है तो सरकार इसे भारतीयों के खिलाफ पाकिस्तान का हमला मान रही है। नवोदय टाइम्स की खबर भी ऐसी ही है। बैनर खबर का शीर्षक है, सिंधु जल संधि रोकी, अटारी बॉर्डर बंद। जो खबर अखबारों में नहीं है, जिसपर तमाम लोग उंगली उठा रहे हैं उसपर किन्हीं गौरव जोशी ने लिखा है, ….इस पर मोदी सरकार 2016 से ही काम शुरू कर चुकी थी… मुझे याद है तब भी पाकिस्तान ने एक कायराना आतंकी हमला किया था और मोदीजी ने कहा था “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकता”… पाकिस्तान जाने वाले पानी को रोकने के लिए और उसको मोड़ने के लिए पिछले साल शाहपुर कंडी बांध परियोजना पूरी हुई है… और चिनाब नदी के पानी को सफलतापूर्वक रतले हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के लिए मोड़ा गया था… पानी को रोकने के लिए और भी कई बड़े प्रोजेक्ट हैं, जो लगभग तैयार है…।

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