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क्या भारत में एक नया डिजिटल नज़रबंदी तंत्र खड़ा किया जा रहा है?

केंद्र सरकार स्मार्टफोन्स में हमेशा चालू रहने वाले लोकेशन ट्रैकिंग को अनिवार्य करने पर विचार कर रही है, जिससे डिवाइस की सटीक लोकेशन हर समय सरकारी एजेंसियों को उपलब्ध हो सकेगी। इस प्रस्ताव ने प्राइवेसी को लेकर नई बहस छेड़ दी है, क्योंकि Apple, Google और Samsung जैसी वैश्विक कंपनियां इसे अभूतपूर्व और निगरानी बढ़ाने वाला कदम बता रही हैं। नीचे पढ़ें…


कम्युनिकेशन क्षेत्र के जानकार कार्तिक ने ट्वीट कर लिखा है-

अचानक हर भारतीय के फोन में डिवाइस-लेवल सैटेलाइट लोकेशन ट्रैकिंग अनिवार्य करने की भाजपा सरकार की इतनी बेचैनी क्यों? दुनिया में कहीं इसका कोई उदाहरण नहीं है। क्या यह फिर से ‘साहेब’ वाले दौर की वापसी का संकेत है?


खुरपेंच सटायर नामक हैंडल का ट्वीट-

क्या भारत में एक नया डिजिटल नज़रबंदी तंत्र खड़ा किया जा रहा है?

आज WhatsApp–Telegram–Signal सब पर SIM-binding थोप दी गई। एक नंबर, एक अकाउंट वरना बंद। डेस्कटॉप हर 6 घंटे में ऑटो-लॉगआउट। अब सीधा सवाल – हर मैसेज का चेहरे-नाम से पता लगाने की तैयारी हो रही है क्या?

उधर सरकार हर मोबाइल के लिए सैटेलाइट-लेवल की ऑलवेज-ऑन ट्रैकिंग दबा रही है। “हर सेकंड” रीयल-टाइम लोकेशन। Apple और Google तक असहमति जता चुके है।

तो पूछना पड़ेगा : ये सुरक्षा है या पूर्ण निगरानी?

और याद है वो चाल? हर नए फोन में सरकारी ट्रैकिंग ऐप जबरन डालने का प्लान सिर्फ जनता के भयंकर विरोध के बाद रुका।

तो सीधा सवाल – ये सब मिलाकर एक विशाल डिजिटल चौकीदारी तंत्र खड़ा नहीं किया जा रहा?

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