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सिर्फ़ 10 साल में 12 लाख करोड़ का कर्ज़ बट्टे खाते में: सरकार ने संसद में दी जानकारी

नई दिल्ली, 23 जुलाई – सरकार ने संसद में जानकारी दी है कि पिछले दस वर्षों में देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने कुल 12.09 लाख करोड़ रुपये का कर्ज़ “बट्टे खाते” में डाल दिया है। इसका सीधा मतलब है कि यह रकम अब बैंक अपनी बैलेंस शीट से हटा चुके हैं और उसकी वसूली की संभावना बेहद कम है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सिर्फ पिछले पांच वर्षों में ही 5.82 लाख करोड़ रुपये की रकम बट्टे खाते में डाली गई। सबसे ज़्यादा कर्ज़ माफ करने वालों में सबसे ऊपर है भारतीय स्टेट बैंक (SBI), जिसने पिछले पांच सालों में 1.14 लाख करोड़ रुपये का लोन राइट ऑफ किया। इसके बाद यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (85,540 करोड़ रुपये) और पंजाब नेशनल बैंक (81,243 करोड़ रुपये) का स्थान है।

वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में कहा कि लोन राइट ऑफ का मतलब यह नहीं कि कर्जदारों की देनदारी खत्म हो गई है। बैंक कानूनी माध्यमों से वसूली की प्रक्रिया जारी रखते हैं। इनमें दीवानी मुकदमे, ऋण वसूली न्यायाधिकरण, इन्सॉल्वेंसी प्रक्रिया आदि शामिल हैं।

इस बीच, एक और चिंताजनक तथ्य यह सामने आया कि 1,629 उधारकर्ताओं को जानबूझकर कर्ज़ न लौटाने वाला (wilful defaulter) घोषित किया गया है। इन पर 1.63 लाख करोड़ रुपये का बकाया है। सरकार ने बताया कि ऐसे उधारकर्ताओं और उनकी कंपनियों को आगे बैंक ऋण, पूंजी बाजार से फंडिंग और अन्य वित्तीय सुविधाएं देने पर रोक लगा दी गई है।

विशेषज्ञों और विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सवाल खड़े किए हैं कि आम जनता की गाढ़ी कमाई से बैंकों को दी गई राहत, बड़े उद्योगपतियों के लिए एक सुरक्षित निकास बन चुकी है। वहीं आम आदमी यदि छोटा कर्ज़ न चुका पाए, तो उसे कठोर परिणाम भुगतने पड़ते हैं।

इस खबर ने एक बार फिर देश की बैंकिंग प्रणाली, कर्ज़ वसूली व्यवस्था और पूंजीवादी संरक्षणवाद पर गंभीर बहस को जन्म दे दिया है।

(इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट पर आधारित)

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