राष्ट्रीय सहारा के गुणानंद को मजीठिया मामले में मिली लेबर कोर्ट में जीत

लेबर कोर्ट देहरादून ने दिया सहारा को बड़ा झटका… ठेका कर्मी को नियमित कर्मचारी मानते हुए मजीठिया देने का आदेश…

राष्ट्रीय सहारा को लेबर कोर्ट देहरादून ने करारा झटका दिया है। श्रम न्यायालय ने सहारा प्रबंधन के तमाम तिकडम और दबाव के बावजूद कर्मचारियों के हक में फैसला दिया है। श्रम न्यायालय के माननीय जज एस के त्यागी ने राष्ट्रीय सहारा देहरादून में मुख्य उप संपादक के रूप में कांट्रेक्ट पर तैनात गुणानंद जखमोला को नियमित कर्मचारी माना।

अदालत में प्रबंधन ने तर्क दिया कि गुणानंद को कांट्रेक्ट पर तैनात किया गया था और उसकी अवधि पूरी हो जाने पर स्वत: ही कांट्रेक्ट समाप्त हो जाता है। प्रबंधन द्वारा यह भी तर्क दिया गया कि गुणानंद का फुल एडं फाइनल भुगतान हो चुका है लेकिन अदालत में यह बात प्रबंधन साबित नहीं कर सका। प्रबंधन ने यह तर्क भी दिया था कि गुणानंद को प्रबंधकीय अधिकार थे जबकि वादी ने इससे स्पष्ट इनकार किया।

प्रबंधन गुणानंद को कर्मकार की श्रेणी में नहीं मान रहा था जबकि वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के अनुसार और यूपी श्रमिक विवाद अधिनियम 1955 के अनुसार उपसंपादक कर्मचारी की श्रेणी में है। वादी ने तर्क दिया कि वह एक अक्टूबर 2009 से 31 मार्च 2016 तक बिना किसी ब्रेक के कंपनी में कार्यरत रहा और हर साल उसने 240 दिनों से भी अधिक काम किया। इस आधार पर वह न सिर्फ वेतन, एरियर, ग्रेच्युटी और मुआवजा लेने का अधिकारी है बल्कि मजीठिया लेने का भी अधिकारी है। अदालत ने तथ्यों व पेश किये सबूतों के आधार पर माना कि गुणानंद के साथ प्रबंधन ने अन्याय किया।

अदालत ने यूपी श्रम विवाद अधिनियम के तहत गुणानंद को छंटनी का शिकार माना और उसे छह माह का वेतन, लीव इनकैसमेंट, बोनस व ग्रेच्युटी देने का आदेश दिया। अदालत ने प्रबंधन को कहा कि मजीठिया की सिफारिश के अनुसार गुणानंद को 11-11-2011 से मजीठिया का लाभ भी दिया जाए। लेबर कोर्ट द्वारा मजीठिया के अनुसार वेतनमान देने का ये देशभर में पहला फैसला है।

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Comments on “राष्ट्रीय सहारा के गुणानंद को मजीठिया मामले में मिली लेबर कोर्ट में जीत

  • पहले तो गुणानन्द जी को बधाई और शुभकामनाएं भी। ईश्वर उनको आगे की लड़ाई लड़ने का साहस प्रदान करे। साहस इसलिए कि हर प्रबंधन स्वभाव से बनिया होता है और अब सहारा भी हो गया है। हालांकि श्रम कानून की जानकारी नहीं है न्यायमूर्ति को मानिसक तनाव/उत्पीड़न और हर्जा खर्चा भी दिलाना चाहिए। हालांकि हर्जा खर्चा कोई देता नहीं क्योंकि यह प्रमाणित नहीं हो पाता।
    बहरहाल, गुणानंद जी के साथ चार अन्य (मेरे को छोड़कर मैं निकाले जाने के हाईकोर्ट गया और मजीठिया वेतन बोर्ड के लिए लेबल कोर्ट) लोगों का क्या हुआ नहीं मालूम। जखमोला जी को उनके बारे में भी कुछ लिखना चाहिए और हाँ जो साथी अभी इस लड़ाई में शामिल नहीं है वे भी आगे आयें। गुणानंद जी की जीत से सबक लें।

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