
पंकज प्रसून-
दिल्ली जिमखाना क्लब बंद हो रहा है…मुलायम सिंह यादव इसके बारे बहुत खराब बोलते थे। वे कहते थे कि इसमें अमीरों के कुत्ते, अमीरों के साथ घुसते हैं और अमीर लोग हम ग्रामीण भारत के लोगों के खिलाफ रणनीति बनाते है।
मुलायम के बेटे अखिलेश दिल्ली जिमखाना क्लब बंद होने से दुःखी हैं। लुटियन के खानदानी रईसों में हाहाकार है…दिल्ली या देश के नए रईस इसमें घुस भी नहीं सकते… वेटिंग लिस्ट 37 साल है… वेटिंग की फीस 7.5 लाख रु है।
कोई सोच नहीं सकता था कि सरकार इसे हाथ लगाएगी… 27 एकड़ में फैला है… ये रक्षा के लिए संवेदनशील इलाके में था। पहले की सरकारों को हिम्मत नहीं थी कि इसके ख़िलाफ़ एक शब्द भी बोल दे… संजय गांधी और रुखसाना सुल्ताना की मुलाकात यहीं हुई थी।
राहुल गांधी 2006 में खुद इसके मेंबर बन गए तो मनमोहन सरकार इसे क्या ही बंद करती…
मनोज अभिज्ञान-
दिल्ली में इस बार चोट उस दुनिया पर पड़ी है जहाँ बुलडोजर चलाने की किसी की हिम्मत नहीं थी। दिल्ली जिमखाना क्लब को खाली करने का आदेश उस पुरानी दिल्ली को छूने की कोशिश है जिसे लोग स्थायी सत्ता कहते हैं। सरकारें बदलती रहती हैं लेकिन कुछ क्लब, कुछ बंगले, कुछ नेटवर्क और कुछ चेहरे हमेशा बने रहते हैं। वही लोग हर शासन में सहज रहते हैं। अंग्रेज गए, वायसराय हाउस राष्ट्रपति भवन बन गया, ICS IAS हो गया, लेकिन सत्ता की सामाजिक बनावट बहुत ज्यादा नहीं बदली।
दिल्ली जिमखाना क्लब अंग्रेजों ने 1913 में बनाया था। तब इसका नाम इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब था। यह क्लब साम्राज्य का सामाजिक मुख्यालय था। यहां तय होता था कौन सभ्य है, कौन प्रभावशाली है और किसकी पहुंच सत्ता तक है। आजादी के बाद बोर्ड बदल गए, चेहरे बदल गए, लेकिन ढांचा बचा रहा। पहले गोरे साहब आते थे, बाद में भूरे साहब आने लगे।
दिल्ली की सबसे महंगी जमीनों में से एक पर फैला यह क्लब दशकों से उस वर्ग का ठिकाना रहा है जिसे कभी चुनाव लड़ने की जरूरत नहीं पड़ती। यहां की सदस्यता मिलना आईएएस बनने से ज्यादा कठिन है। यह क्लब सामाजिक हैसियत प्रमाणपत्र जैसा है। अगर कोई यहां है तो समझिए वह सत्ता के सबसे एलीट सर्किल के अंदर है।
लेकिन कहानी सिर्फ जिमखाना तक सीमित नहीं है। दिल्ली गोल्फ क्लब को देखिए। विशाल सरकारी जमीन पर फैला यह सिर्फ खेल का मैदान नहीं, बल्कि सत्ता और पूंजी का मिलन स्थल है। यहां डीलें होती हैं, रिश्ते बनते हैं, भविष्य तय होते हैं।
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर बाहर से सांस्कृतिक संस्थान दिखता है लेकिन भीतर यह सेवानिवृत्त सत्ता का पुनर्जन्म केंद्र है। यहां वे लोग मिलते हैं जो कभी सचिव थे, कभी राजदूत थे, कभी आयोगों के प्रमुख थे। पद चला जाता है लेकिन नेटवर्क जीवित रहता है।
इंडिया हैबिटेट सेंटर में एनजीओ, कॉर्पोरेट, मीडिया और नीति जगत का ऐसा मिश्रण मिलता है जहां देश की लिबरल बातचीत जन्म लेती है। यहां गरीबों पर सेमिनार होते हैं, वातानुकूलित हॉल में असमानता पर चर्चा होती है और कॉफी टेबल पर सामाजिक न्याय निपटाया जाता है।
चेल्म्सफोर्ड क्लब हो या दूसरे औपनिवेशिक दौर के क्लब, सबकी कहानी लगभग एक जैसी है। असल सवाल जमीन का नहीं है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र सिर्फ वोट डालने तक सीमित रहेगा या सत्ता के इन सामाजिक अड्डों तक भी पहुंचेगा?
दिल्ली की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां गरीब आदमी हमेशा अस्थायी होता है और अमीर आदमी हमेशा स्थायी। रिक्शावाले से पूछा जाता है कि कब हटोगे? लेकिन कई क्लब ऐसे हैं जो एक-दो रुपये सालाना किराये पर हजारों करोड़ की जमीन घेरकर बैठे हैं और कोई उनसे नहीं पूछता कि भाई साहब, आपका एग्रीमेंट कब खत्म हो रहा है?
अब पहली बार यह सवाल पूछा जा रहा है। और अगर यह सवाल सचमुच आगे बढ़ा, तो चर्चा उस अदृश्य व्यवस्था की होगी जिसमें कुछ लोग हमेशा राष्ट्र के मालिक की माफिक रहते हैं और बाकी लोग सिर्फ किरायेदार की तरह।
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