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आज के अखबार : हेडलाइन मैनेजमेंट में केजरीवाल ने मोदी को टक्कर दी है, उन्हीं की चाल में फंसाया है!

“48 घंटे का समय क्यों चाहिये : सुधांशु  त्रिवेदी“। राजनाथ सिंह कह चुके हैं, भाजपा में इस्तीफे नहीं होते, वे केवल मांगते हैं और वह भी माधवी पुरी बुच से नहीं। उसमें इस सवाल का जवाब केजरीवाल आराम से दे सकते हैं, मेरी मर्जी या विकल्प नहीं है या विधायक दल की बैठक में निर्णय होगा। उसके लिए इतना समय चाहिये। पर आदत का कुछ नहीं कर सकते और अखबारों की खुद ओढ़ी मजबूरी है कि वे ऐसे सवाल के बिना कुछ छापते ही नहीं हैं। वरना पहले नहीं बताते और 17 सितंबर को इस्तीफा होता तो क्या प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर ‘सरप्राइज’ नहीं हो जाता या ‘उपहार’ होगा?

संजय कुमार सिंह

आज का दिन अरविन्द केजरीवाल का है। दो दिन बाद इस्तीफे की घोषणा करके उनने हेडलाइन मैनेजमेंट किया है और जोरदार राजनीतिक चाल चली है। इस्तीफा वे कल भी दे सकते थे और पूर्व घोषणा की कोई जरूरत नहीं थी। अभी उनके पास विकल्प है कि इस्तीफा नहीं दें। कानूनन ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। लेकिन घोषणा पर जो प्रतिक्रियाएं आई हैं और अखबारों ने उन्हें जैसे प्रस्तुत किया है उसमें मुझे भाजपा की ‘सेवा’ नजर आ रही है। आज मैं उसी की चर्चा करूंगा। उससे पहले स्पष्ट कर दूं कि मैं केजरीवाल को भ्रष्ट नहीं मानता, उनके खिलाफ आरोप दो कौड़ी का है और सबूत नहीं है तथा अभी ट्रायल भी शुरू नहीं हुआ है। मामले में कोई दम नहीं है। पीएमएलए का कानून ही जज साब को ईनाम देकर और सरकार की दूसरी कोशिशों से टिका हुआ है। जमानत नहीं मिलने को हाईकोर्ट के मनोबल से जोड़ा जा चुका है जबकि अर्नब गोस्वामी को हफ्ते भर में इसी व्यवस्था में जमानत मिल चुकी है। अरविन्द केजरीवाल की बात आई तो सब बराबर हैं और स्पेशल ट्रीटमेंट की बात होने लगी।

यही नहीं, भारत में अब तक यह व्यवस्था रही है कि बहुमत के आधार पर निर्वाचित दल अपने हिसाब से काम करते हैं, शराबबंदी से लेकर स्वास्थ्य के लिए खतरनाक लिखे तंबाकू उत्पाद बेचते हैं उससे संबंधित नियम बनाते हैं और डिब्बी पर कितनी बड़ी तस्वीर होगी – तक तय करते रहे हैं। जो गैर सरकारी संस्था, वालंट्री हेल्थ एसोसिएशन (वीएचएआई) इसमें सहयोग करती रही है उसे विदेशी चंदे लेने के नियमों के तहत काम करने से रोक दिया गया है। 4 अप्रैल 2024 की इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, एफसीआरए के उल्लंघन के लिए पांच एनजीओ के पंजीकरण रद्द कर दिये गये हैं। यह वैसे ही है कि पांच लाख शेल कंपनियां (अब इन्हें शेल कंपनी नहीं कहा जाता है) बंद कराने के बावजूद अदाणी की कंपनी में 20,000 करोड़ रुपये के निवेश का पता नहीं चला, बताने पर भी जांच नहीं हुई। हिन्डनबर्ग ने इसका कारण अदाणी से सेबी प्रमुख के संबंध बताये तो उससे इनकार किया गया पर कार्रवाई नहीं होना मुद्दा नहीं बना। अब तो सेबी प्रमुख पर ही कई आरोप हैं पर वे इनकार करती जा रही हैं और सब मान लिया जा रहा है। पर शेल कंपनियों और विदेशी धन से जनसेवा के काम करने वाले एफसीआरए के मामले में ऐसी गुंजाइश नहीं है। बेशक इसमें मीडिया की अपनी भूमिका है पर वह सब अलग मुद्दा है।      

मूल बात यह है कि निर्वाचित मुख्यमंत्री को बिना सबूत जेल में रखने का अधिकार केंद्र सरकार या उसकी एजेंसियों- ईडी या सीबीआई को कैसे है और है तो सुप्रीम कोर्ट ने अब जमानत कैसे दी। यह सवाल वैसे ही है जैसे केजरीवाल से पूछा जा रहा है कि उनने पहले इस्तीफा क्यों नहीं दिया। मुझे लगता है कि केजरीवाल ने व्यवस्था की पोल खोलने का काम किया है। ऐसा वे कह भी चुके हैं। भाजपा की चाल और राजनीति तो सब दिखा ही रही है। अगर दिल्ली की शराब नीति से केजरीवाल, उनकी सरकार या आम आदमी पार्टी ने भ्रष्टाचार किया तो गोवा में नियम बदलकर लैंड यूज बदलने और सांसद को मंजूरी मिलने के मामले में भ्रष्टाचार कैसे नहीं है? संभव है वहां पैसे का लेन-देन नहीं हुआ हो पर अपनी पार्टी के (या कुछ) लोगों को फायदा पहुंचाने का मामला तो है ही। यही आरोप केजरीवाल पर है और पैसे नहीं मिले तो केजरीवाल पर पीएमएलए का केस बना वहां मामला ही नहीं बना क्योंकि लाभार्थी भाजपा के नेता हैं। केजरीवाल मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देकर राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह के मामले सामने लाना चाहें और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति करना चाहें तो कुछ गलत नहीं है और गुजरात मॉडल से बेहतर है।

वैसे भी, भ्रष्टाचार किसी के कहने से नहीं काम से साबित होगा या अदालत में साबित होगा। केजरीवाल के मामले में दोनों नहीं है और भाजपा की परेशानी सार्वजनिक है। इसमें केजरीवाल अगर भाजपा के खिलाफ काम कर रहे हैं या अपनी ईमानदारी साबित करने के लिए जनता की अदालत में जाना चाह रहे हैं तो कुछ गलत नहीं है। यह अलग बात है कि जिस जनादेश या बहुमत के दम पर भाजपा या नरेन्द्र मोदी मनमानी कर रहे हैं वही जनादेश या बहुमत एक छोटे क्षेत्र में केजरीवाल को भी मिला हुआ है और इस व्यवस्था में उनकी निगरानी करने का अधिकार किसी निष्पक्ष संस्था को हो, पर सरकार या प्रधानमंत्री को तो नहीं है। यह व्यवस्था भविष्य के लिए भी ठीक की जानी चाहिये वरना दिख रहा है कि कोशिश एक देश, एक चुनाव के नाम पर एक बार किसी तरह चुनाव जीत जाने के बाद सत्ता पर स्थायी कब्जा कर लेने की हो सकती है और इसमें विरोधियों को कुचलने के लिए अदालतों के मनोबल की चिन्ता सरकार से वेतन पाने वाले लोग करते हैं। कुल मिलाकर, नरेन्द्र मोदी तय कर रहे हैं कि किसके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर कार्रवाई होगी और किसके खिलाफ नहीं। इसमें अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ क्यों हो रही है और माधवीपुरी बुच के खिलाफ क्यों नहीं, समझना रॉकेट साइंस नहीं है। वह भी तब जब झोला उठाकर चल देना था और मार्ग दर्शक मंडल में लोग हैं।  

मैं बता चुका हूं कि ऐसी हालत में, राहुल गांधी कुछ कहें तो वह भाजपा के जवाब या प्रतिक्रिया के साथ छपता है। नरेन्द्र मोदी के मामले में ऐसी कोई जरूरत नहीं होती और केजरीवाल के मामले में जो है उसे आज देखिये और समझिये कि अखबारों ने इस खबर को ऐसे क्यों प्रस्तुत किया है। इंडियन एक्सप्रेस में ऊपर से नीचे चार कॉलम का विज्ञापन है बाकी चार कॉलम में एक लाइन के लाल फ्लैग शीर्षक और दो लाइन के मुख्य शीर्षक के साथ मूल खबर छपी है। दिलचस्प है, एक्सप्रेस एक्सप्लेन्ड – मल्लिका जोशी और जतिन आनंद ने जो लिखा है उसका शीर्षक है, “रिश्वत के आरोपों से नुकसान की चिन्ता के बीच नैतिक रूप से मजबूत दिखने की कोशिश”। फ्लैग शीर्षक है, भाजपा ने इसे ‘नाटक’ कहा, पूछा दो दिन बाद क्यों? मुख्य शीर्षक है, “दो दिन बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दूंगा, अग्निपरीक्षा कराउंगा : केजरीवाल”। इंट्रो है, “शीघ्र चुनाव कराने की मांग की, कहा जनता के फैसले के बाद ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठूंगा प्रत्येक वोट मेरी ईमानदारी का सर्टिफिकेट होगा।”

हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पांच कॉलम में है। दो लाइन का शीर्षक बगैर किसी फ्लैग शीर्षक या इंट्रो के है। मुख्य शीर्षक है, “एक चौंकाने वाले कदम के तहत केजरीवाल ने कहा मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दूंगा”। इसके साथ तीन कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, “आप प्रमुख ने अगले कदम को एक राज रखा, पद के संभावित उम्मीदवारों में अतिशी”। सिंगल कॉलम की दो खबरें हैं। पहली का शीर्षक है, दिल्ली कांग्रेस, भाजपा ने इस कदम को पबलिसिटी स्टंट कहा। दूसरी खबर का शीर्षक है, केजरीवाल ने दो महीने में चुनाव कराने की मांग की, जानकारों ने इसे मुश्किल काम कहा।    

टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर पांच कॉलम में दो लाइन के शीर्षक के साथ है। मुख्य शीर्षक है, “केजरीवाल ने कहा कि वे दो दिन में मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देंगे, आम आदमी से ‘ईमानदारी का सर्टिफिकेट’ चाहते हैं”। अग्नि परीक्षा से गुजरने के लिए शीघ्र चुनाव कराने की मांग की। अतिशी इस पद के लिए सर्वोच्च दावेदार, सिसोदिया दौड़ में नहीं। एक खबर में यह भी कहा गया है कि चुनाव आयोग नवंबर में ही चुनाव करायेगा इसकी संभावना कम है। मुख्य खबर के साथ खास बातों के बॉक्स में सबसे पहले आप सांसद संदीप पाठक की टिप्पणी है, सरकार बनाने के बाद से ही उनके पास कोई अधिकार नहीं है। हरेक कदम पर उन्हें अपनी जिम्मेदारी निभाने से रोका गया है। लोगों ने उनमें अपना विश्वास जताया था … इसलिए अब जनता ही (उनका भविष्य) तय करेगी। भाजपा के शहजाद पूनावाला ने कहा है, यह उनकी पत्नी सुनीता (केजरीवाल) को मुख्यमंत्री बनाने की योजना का भाग है … आवश्यकता को सदाचार बनाने पर उन्होंने पीएचडी कर रखी है। दिल्ली कांग्रेस के प्रमुख देवेन्दर यादव ने कहा है, उन्हें जेल से आते ही इस्तीफा दे देना चाहिये था (गिरफ्तार होते ही नहीं?) … दो दिन का इंतजार क्यों कर रहे हैं?

द हिन्दू में पांच कॉलम की लीड है, एक लाइन का शीर्षक है, केजरीवाल इस्तीफा देंगे, शीघ्र चुनाव कराने की मांग की। उपशीर्षक है, आम आदमी पार्टी के प्रमुख ने कहा कि वे दो दिन में मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे देंगे तथा पार्टी चुनाव के दौरान काम करने के लिए अपने नए नेता का चुनाव करेगी। वे चाहते हैं यह चुनाव महाराष्ट्र के साथ नवंबर में कराये जायें; उनकी योजना आम आदमी पार्टी को तोड़ने की भाजपा की कोशिशों को रोकना है। इसके साथ सिंगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, कांग्रेस ने इसे ड्रामा कहा, भाजपा ने इसे स्वीकारोक्ति कहा। राजनाथ सिंह ने बहुत पहले कहा था, भाजपा में इस्तीफे नहीं होते। उसके बाद से भाजपा के नेता गण इस्तीफा मांगते ही हैं, देते नहीं है।

द टेलीग्राफ में यह खबर दो कॉलम में है। यहां पांच कॉलम की लीड डॉक्टर्स की हड़ताल पर है। शीर्षक है, डॉक्टर्स अभी भी वार्ता के लिए तैयार लेकिन निमंत्रण की जिम्मेदारी सरकार पर डाली। पहले पन्ने पर डॉक्टर की हड़ताल पर दो और खबरें हैं लेकिन केजरीवाल की खबर दो कॉलम में है। इसमें यह तीन लाइन का शीर्षक है, केजरीवाल दो दिन में मुख्यमंत्री का पद छोड़ेंगे, अग्निपरीक्षा देंगे। नवोदय टाइम्स में यह पांच कॉलम की लीड है, केजरीवाल इस्तीफा देंगे, लेकिन दो दिन बाद! साफ किया कि जनादेश मिलने तक सिसोदिया डिप्टी सीएम नहीं बनेंगे। इसके साथ एक खबर बॉक्स में है, इस्तीफे का दांव और इसके नीचे भाजपा प्रवक्ता का सवाल, “48 घंटे का समय क्यों चाहिये : सुधांशु  त्रिवेदी”। जैसा मैंने पहले कहा है, भाजपा में इस्तीफे नहीं होते, वे केवल मांगते हैं और वह भी माधवी पुरी बुच से नहीं। उसमें इस सवाल का जवाब केजरीवाल आराम से दे सकते हैं, मेरी मर्जी या विकल्प नहीं है या विधायक दल की बैठक में निर्णय होगा। उसके लिए इतना समय चाहिये। पर आदत का कुछ नहीं कर सकते और अखबारों की खुद ओढ़ी मजबूरी है कि वे ऐसे सवाल के बिना कुछ छापते ही नहीं हैं। वरना 17 सितंबर को इस्तीफा हुआ तो क्या प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर सरप्राइज नहीं हो जाता या ‘उपहार’ होगा?

नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर यह अटकल भी है कि कौन लेगा केजरीवाल की जगह। हालांकि मुझे लगता है कि केजरीवाल अपने लिए बड़ी जगह बना रहे हैं और भाजपा ने उन्हें भ्रष्ट साबित करने की कोशिश की तो अब वे उसी को मुद्दा बना रहे हैं और अगर सवाल यह बन गया कि प्रधानमंत्री किसी मुख्यमंत्री की ईमानदारी तय करने वाले कौन होते हैं और बिना ठोस सबूत सीबीआई, ईडी अगर किसी निर्वाचित मुख्यमंत्री के खिलाफ मामला बनाये, सरकारी वकील हाईकोर्ट के मनोबल जैसे तर्क दें, सुप्रीम कोर्ट पर स्पेशल ट्रीटमेंट जैसा आरोप लगाया जाये और अर्नब गोस्वामी को हफ्ते भर में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल जाने पर चुपी छाई रहे तो लगता है कि पूरी व्यवस्था पिंजड़े का तोता है और इसे ठीक करने की गंभीर जरूरत है। यह काम कोई राजनीतिक दल नहीं कर सकता है। समाज को ऐसी मांग करनी होगी, मीडिया को साथ देना (या देने के लिए मजबूर करना) होगा। फिलहाल देखा जाये, ऊंट किस करवट बैठता है।   

कहने की जरूरत नहीं है कि केजरीवाल की इस चाल से आज प्रधानमंत्री की खबर पिट गई है। कल झारखंड के जमशेदपुर और रांची के दौरे पर जमशेदपुर में बारिश के कारण उनका निर्धारित रोड शो कैंसल हो गया। झारखंड चुनाव की घोषणा से पहले का यह कार्यक्रम कोलकाता के टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स में यह सेकेंड लीड है जिसका शीर्षक है, “घुसपैठ झारखंड के लिए बड़ा खतरा : मोदी”। पर मुद्दा यह है कि बांग्लादेश सीमा से अगर घुसपैठ होती है तो उसे रोकने का उपाय केंद्र सरकार को करना है और केंद्रीय बलों को रोकना है। सीमा पर व्यवस्था ठीक नहीं होने से अगर वे सीमा पार कर अवैध रूप से आयेंगे तो देश में कहां हैं, क्या कर रहे हैं यह वाकई खतरा है पर देखना केंद्र सरकार को ही है। केंद्र सरकार ने कुछ किया हो या नहीं, हर चुनाव से पहले नरेन्द्र मोदी इस मुद्दे को उठाते हैं। 2014 में तो इसके लिए पहले की सरकारें जिम्मेदार थीं पर अब तो नरेन्द्र मोदी की ही सरकार है और दस साल कम नहीं होते हैं। ऐसा भी नहीं है कि किसी से अनुमति लेनी थी। फिर भी काम नहीं हुआ और रोना जारी है। दूसरी ओर, पाकिस्तान सीमा के बारे में झूठे आश्वासन को दावा बना देने की खबर आप पढ़ चुके हैं।

घुसपैठ वाली खबर द हिन्दू में पहले पेज पर सूचना भर है कि विवरण अंदर के पेज पर है। इसके साथ सिंगल कॉलम की फोटो भी है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह फोल्ड के ऊपर दो कॉलम में है। शीर्षक है, “बांग्लादेशी घुसपैठ एक चिन्ता : प्रधानमंत्री झारखंड में”। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह दो कॉलम में है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा – मोदी ने कहा, झामुमो, कांग्रेस, राजद बांग्लादेशी, रोहिंग्या प्रवासियों के साथ हैं। अमर उजाला में प्रधानमंत्री के झारखंड दौरे की खबर दूसरे पहले पन्ने पर लीड है। शीर्षक है, “कांग्रेस, राजद व झामुमो सत्ता के भूखे वोट बैंक की राजनीति में लिप्त : मोदी”। उपशीर्षक है, पीएम ने कहा, कांग्रेस देश की सबसे बेईमान और महाभ्रष्ट पार्टी। एक खबर का शीर्षक है, कांग्रेस ने राज्य के लिए कुछ नहीं किया दूसरी का शीर्षक है, सत्ता में आये तो अभ्यर्थियों की मौत मामले की जांच करायेंगे (अदाणी और सेबी मामले की नहीं?)। एक और प्रचार है, (जो चुनाव की घोषणा के पहले की और भुनाई जाती रही हैं) देश को मिली छह और वंदे भारत ट्रेनें। कहने की जरूरत नहीं है कि इनमें किसी भी दावे या खबर पर विपक्ष की प्रतिक्रिया या टिप्पणी नहीं है जैसी राहुल गांधी के मामले में होती है और अरविन्द केजरीवाल के मामले में आज है।

सरकार और सरकार के काम के प्रचार की खबरों से भरे अखबारों में आज द हिन्दू की सेकेंड लीड मणिपुर की है। शीर्षक के अनुसार, मणिपुर के मंत्री के घर में बम फटा, कोई घायल नहीं। यह खबर जिन अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है उनमें बताया गया है कि एक देश एक चुनाव इसी कार्यकाल में लागू होगा। अमर उजाला में पहले पन्ने की यह खबर ब्यूरो की है और अनाम सरकारी सूत्र के हवाले से है। इंडियन एक्सप्रेस में लिज मैथ्यू की बाईलाइन है और यह खबर सरकार के अधिकारी (फंक्सनरी) के हवाले से है। द हिन्दू में भी यह ब्यूरो की खबर है और सूत्रों के हवाले से तीन कॉलम में तीन लाइन के शीर्षक से छपी है। इसमें जनगणना का काम जल्दी शुरू होने की भी ‘खबर’ है। टाइम्स ऑफ इंडिया में शीर्षक जनगणना पर है। खबर पर अखिलेश सिंह की बाईलाइन है और सरकारी फंक्शनरी के हवाले से छपी है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगी, “जनगणना की प्रक्रिया शुरू, जातिवार जनगणना पर खुली : सरकार”। मुझे लगता है कि सरकार का यह काम है और उसे बाकायदा इसकी घोषणा करनी चाहिये। जो भी करता उसका नाम और पदनाम बताया जाना चाहिये था। सूत्रों की खबर तो गलत भी हो सकती है। और संपादक चाहे जो कार्रवाई करे, पाठक को तो पता भी नहीं चलना है। वैसे भी, सरकारी प्रचार अगर अधिकृत नहीं है तो पहले पन्ने पर छापना क्यों जरूरी है? दूसरी तरफ प्रधानमंत्री चुनावी आरोप लगा रहे हैं और अखबार उसे भी हवा दे रहे हैं।

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