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आज के अखबार : हेडलाइन मैनेजमेंट ने कई खबरों को पीट दिया, सीबीआई प्रमुख का मामला भी रह गया

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों की खबर यही है कि हेडलाइन मैनेजमेंट ने वक्फ बोर्ड वाली खबर को पीट दिया, सीबीआई प्रमुख का मामला भी दब गया और यह सब मॉक ड्रिल के आदेश से जिसका मतलब समझना टेढ़ी खीर है। यह यकीन करना मुश्किल है कि चुनावी लाभ के लिए कोई सरकार इस स्तर तक उतर जायेगी और देश ही नहीं दुनिया को भी सांसत में रख सकती है। जहां तक आतंकवाद खत्म करने का मामला है अमेरिका ने जो किया वह मिसाल है और उसमें आतंकियों को पाताल से ढूंढ़कर मारने के अलावा अपनी सुरक्षा तो ठीक करनी ही होगी। यहां अपनी सुरक्षा वयवस्था या उसमें चूक अथवा आतंकवाद को कुचल दिये जाने जैसी पूर्व घोषणाओं पर सांप सूंघ गया है। मन की बात करने वाले सरकार प्रमुख के अलावा सूचना किसी के पास होती नहीं है इसलिए अखबारों का जो हाल है सो है। कुल मिलाकर, पहलगाम हुए 14 दिन गुजर चुके हैं। मुश्किल में होने पर आतंकी को घर छोड़ आने वाली पार्टी या परिवार की सरकार ने बदला लेने में लगने वाले समय के मामले में अपना ही रिकार्ड तोड़ दिया है। हालांकि तैयारी और प्रचार के उपाय जबरदस्त हैं। ऐसे में देश की जनता के लिये यह तय करना मुश्किल है कि यह कोई राष्ट्रीय संकट है या चुनावी राजनीति का दौर। वैसे भी हम हिन्दी वाले ‘जो गरजते हैं, वो बरसते नहीं’ में यकीन करते हैं और कई साल से देख रहे हैं।

इसकी पुष्टि आज दि एशियन एज में छपी एक खबर से होती है। इसके अनुसार , पहलगाम के एसएचओ और पांच पुलिस वालों का ट्रांसफर कर दिया गया है। खबर के अनुसार ये तबादले एक महत्वपूर्ण उलट-फेर में किये गये हैं। इसका मतलब यह नहीं भी हो सकता है कि वारदात के लिए ये जिम्मेदार हैं या इतने दिनों बाद इन्हें कसूरवार पाया गया है। अमूमन ऐसे ट्रांसफर वारदात के तुरंत बाद कर दिये जाते हैं (या इस्तीफे का रिवाज है और अपेक्षा की जाती है) क्योंकि इनके पद पर बने रहने से जांच प्रभावित न हो, ये दोषियों को बचा न पाएं आदि आदि। भाजपा ने साफ कह दिया है कि उसके यहां इस्तीफे नहीं होते हैं तो जांच में भी पद से हटाने का कोई मतलब नहीं है और कई उदाहरण हैं। लेकिन इतने दिनों बाद उलट-फेर औऱ आखिराकर हटाया जाना खबर तो है पर उसमें कुछ खास निकलकर नहीं आया है और यह सरकार का हेडलाइन या मीडिया मैनजमेंट है। आज जो और खबरें हैं उनमें ज्यादातर में सिंगल कॉलम में निपटा दी गई हैं। उदाहरण के लिये 1) सीबीआई के निदेशक का चुनाव करने वाले पैनल में किसी नाम पर सहमति नहीं बनी इस कारण मौजूदा निदेशक प्रवीण सूद को ही विस्तार मिलने की उम्मीद है। इसी तरह आज एक और महत्वपूर्ण खबर सिंगल कॉलम में है, 2) जज के घर में नकद की जांच करने वाले सुप्रीम कोर्ट के पैनल ने अपनी रिपोर्ट दे दी। इसमें क्या है इसपर कोई अटकल या खबर आज प्रमुखता से नहीं छपी है। इसी तरह 3) मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह को राज्य की हिन्सा से जोड़ने वाले एक ऑडियो टेप की सत्यता से संबंधित मामले पर सेंट्रल फोरेनसिक रिपोर्ट पर कल सुप्रीम कोर्ट में चर्चा हुई। आज इससे संबंधित विस्तृत खबर हो सकती थी। नहीं है तो कारण समझना मुश्किल नहीं है। 4) वक्फ मामले पर सुप्रीम कोर्ट में कल भी सुनवाई पूरी नहीं हो पाई और अगली तारीख 15 मई है। इस बीच मुख्य न्यायाधीश रिटायर हो जायेंगे।     

राहुल गांधी की नागरिकता को चुनौती देने वाली याचिका से संबंधित एक महत्वपूर्ण खबर भी आज पहले पन्ने पर नहीं है। खबरों के अनुसार लखनऊ हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कर्नाटक के भाजपा नेता एस विग्नेश शिशिर की राहुल गांधी की नागरिकता को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। खंडपीठ ने केंद्र सरकार को यह स्पष्ट किया कि वह मामले के निपटारे के लिए कोई समय सीमा नहीं दे रही है। इसलिए इस पर विचार करने का कोई औचित्य नहीं है। इसके साथ ही याचिकाकर्ता एस विग्नेश शिशिर को अन्य वैकल्पिक कानूनों का सहारा लेने के लिये कहा। मोटे तौर पर मामला यह था कि भाजपा नेता (या कार्यकर्ता ने चुनौती दी थी) और केंद्र की भाजा सरकार ने अदालत के पूछने पर जवाब नहीं दिया। मामला समझना मुश्किल नहीं है लेकिन राजनीति में सरकारी संसाधनों के इस दुरुपयोग की इजाजत सत्तारूड़ दल के नेताओं को क्यों मिलनी चाहिये – इसपर भी आज कुछ नहीं है। मामला यह है कि 21 अप्रैल को एडिशनल सॉलिसिटर जनरल सूर्यभान पांडेय ने केंद्र की ओर से स्थिति रिपोर्ट पेश की थी। इस पर कोर्ट ने कहा था कि यह मामला राष्ट्रहित का है ऐसे मामलों में देरी नहीं चलेगी। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि राहुल गांधी भारतीय नागरिक हैं या नहीं? इसकी रिपोर्ट 10 दिन के अंदर पेश कीजिए।

पहलगाम हमले के मामले में आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री अपनी विदेश यात्रा बीच में छोड़कर वापस आ गये थे लेकिन ऑल पार्टी मीटिंग में शामिल नहीं हुए। तमाम कार्यक्रम रद्द हुए पर बिहार की रैली हुई और प्रधानमंत्री ने उसमें हिस्सा लिया। वहां से अंग्रेजी में विश्व संदेश दिया। इस तरह पाकिस्तान पर हमले की संभावना (या आशंका) भिन्न बातों से बनी लेकिन प्रधानमंत्री दूसरे कार्यक्रमों में हिस्सा लेते रहे जिसे छोड़ना शायद इसलिए संभव नहीं हुआ कि इनमें एक अदाणी का था। वहां उन्होंने देश के उस उद्यमी के साथ मंच साझा किया जो अमेरिका में वांछित है और समन तामील कराने के लिये भारत सरकार को याद दिलाया गया है। उनका पुराना मित्र और कृपापात्र है यह तो सबको पता है। ऐसे कारोबारी के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के साथ राज्य के मुख्यमंत्री और सांसद शामिल हुए तो उन्हें लगा कि विपक्ष की नीन्द हराम हो जायेगी। वैसे तो उन्हें पहलगाम के दोषियों या उसके संरक्षक अथवा सूत्रधार घोषित पाकिस्तान की नीन्द हराम करनी थी लेकिन वे विपक्ष की नीन्द हराम करके ही खुश थे जैसे नोटबंदी से आतंकवाद खत्म करके खुश हुए और उसकी घोषणा भी उनके गृहमंत्री ने कर दी।

ऐसे में जो रहा है उसे समझना तो मुश्किल है ही, क्या कहा जाये यह भी संकट है। कुछ भी न लिख देने की सरकारी चेतावनी भी है। ऐसे में मेरे आठ में से सात अखबारों की लीड लगभग एक ही है और खबर है, (पाकिस्तानी) हमले से बचाव के लिये होगी मॉक ड्रिल। यह नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है। अन्य अखबारों की चर्चा करने से पहले यह बता दूं कि जिस एक अखबार, द टेलीग्राफ में यह खबर लीड नहीं है वहां लीड क्या है। द टेलीग्राफ कोलकाता का अखबार है और इसकी लीड खबर है, भाजपा ने मुर्शिदाबाद हिंसा के पीड़ित के परिवार का अपहरण कर लिया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह आरोप लगाया है और द टेलीग्राफ का फ्लैग शीर्षक है, मुर्शिदाबाद में ‘कार्यवाहक प्रधानमंत्री’ (अमित) शाह पर सांप्रदायिक आरोप। आप जानते हैं कि वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ मुर्शिदाबाद में हिंसा के लिए मुख्यमंत्री ने भाजपा को जिम्मेदार ठहराया है और राज्यपाल से मुर्शिदाबाद का दौरा नहीं करने के आग्रह के बावजूद भाजपाई राज्यपाल ने न सिर्फ दौरा किया, वह सब भी किया जो राज्यपाल आमतौर पर नहीं करते हैं। पहले वाले राज्यपाल को इसके लिये तरक्की मिल चुकी है और आगे के लिये वह जो सब कर रहे हैं वह अभी हमारा मुद्दा नहीं है। पश्चिम बंगाल में हिंसा और गड़बड़ी का आरोप भाजपा पर लगना आम है जबकि केंद्र सरकार राज्य सरकार या तृणमूल पार्टी को दोषी ठहराती है और सीबीआई जांच करवाती है। फिर भी अभी तक तृणमूल पार्टी या राज्य सरकार के खिलाफ कुछ ठोस या गंभीर निकलकर नहीं आया है।

कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसा कुछ संभव होता तो केंद्र सरकार की योग्य, सक्षम और प्रतिष्ठित एजेंसी के लिए इसे साबित करना मुश्किल नहीं होता। सीबीआई से जांच कराने का भाजपा का मकसद यह हो सकता है उसकी भागीदारी को छिपाया जाये और अभी तक भाजपा के खिलाफ भी कुछ ठोस सामने नहीं आया है। जो सब सार्वजनिक है उसपर कार्रवाई हुई होती तो उसी को ठोस मान लिया जाता। राज्यपाल ने जो किया खुलकर किया वह निश्चित रूप से खास है। ऐसे में आज मॉक ड्रिल की खबर नहीं होती तो इस खबर को प्रमुखता मिल सकती थी। नहीं मिली तो मॉक ड्रिल की खबर हेडलाइन मैनेजमेंट का भाग हो सकती है। इसकी जरूरत और प्रभाव पर बात करने से पहले यह भी बताना जरूरी है कि वक्फ मामले पर कल भी सुनवाई पूरी नहीं हो पाई और अगली तारीख 15 मई है। आप जानते हैं कि मोदी सरकार के कई फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मामले हैं और जाते रहे हैं। ये मामले इतने ज्यादा हैं कि सुप्रीम कोर्ट में कई अन्य मामलों की समय पर सुनावाई नहीं हो पाती है। दूसरी ओर, सरकार के खिलाफ जो मामले हैं उनमें सरकार की ओर से देरी भी आम है। ऐसे में पिछले कई वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने अगर किसी मामले में स्वतसंज्ञान लिया है तो वह भाजपा के समर्थन में तृणमूल कांग्रेस की सरकार के खिलाफ था।

मेरी चिन्ता यह है कि मॉक ड्रिल से क्या फायदा होगा, उसका उद्देश्य क्या है, उसे कितनी गंभीरता से लेना है और अगर सरकार पाकिस्तान पर हमले की तैयारी कर रही है तो क्या यह जवाबी हमले से बचाव की तैयारी है? अगर सरकार हमले के बाद जवाबी हमले की उम्मीद कर रही तो क्या इस बात का ख्याल रखा गया है कि बालाकोट के समय पाकिस्तान ने भारत का एक विमान मार गिराया था और उसका लड़ाकू पायलट अभिनन्दन वर्तमान गिरफ्तार कर लिया गया था। क्या इस बारे ऐसा नहीं होना सुनिश्चित कर लिया गया है। अगर हां तो क्या इस बार का हमला बालाकोट से ज्यादा प्रभावी रहेगा और पाकिस्तान की जवाबी कार्रवाई को नहीं रोका जा सकेगा? मॉक ड्रिल के बाद क्या बत्तियां बंद करना और पूरी तरह अंधेरा करना संभव होगा? क्या इसकी जरूरत है? 1971 के बाद उपलब्ध तकनीक की बात की जाये तो अब यूपीएस हैं, सोलर लाइट हैं। यूपीएस की लाइट तो बंद की जा सकती है। बहुत सारी सोलर लाइट बंद नहीं की जा सकती है और चार्ज खत्म होने पर ही बंद होती है। लाइट बंद किये बिना मॉक ड्रिल का क्या मतलब? या इन्हें कैसे-किसलिये बंद किया जाये – नहीं बताया गया है। कुल मिलाकर जो हो रहा है उसका ना सिर है ना पैर। अगर हमला और जवाबी और युद्ध की ही बात की जाये तो हमने हाल में करगिल युद्ध देखा है। भाजपा और संघ परिवार की ही सरकार थी। पर यह सब नहीं हुआ था और युद्ध के लिये जरूरत भी नहीं है तो इसके क्यों नहीं चुनावी कोशिश माना जाये?

पुलवामा के बाद बालाकोट और उसके बाद ‘घुसकर मारूंगा’ से मिली चुनावी कामयाबी के बाद मॉक ड्रिल से संदेश पहुंचाना आसान और कामयाब तरीका हो सकता है। सरकार के फायदे की बात हो तो अखबारों का बिछ जाना मामूली है और इसका पता खबरों से भी चलता है। कल बांध से पानी बंद करने की खबर लीड थी आज जनसत्ता में टॉप खबर है, “पाकिस्तान की तरफ का पानी सूखा”। जब पानी बंद कर दिया गया तो सूखना ही था और सूख गया तो स्कूप कैसा? इस खबर को इतना महत्व किसलिये और वह भी यह बताये बिना कि सोलर लाइट (निजी, सरकारी और जनसहयोग से लगे सार्वजनिक) कैसे बंद होगी, कौन करेगा। इसके बावजूद आज अगर राज्य सरकारों को केंद्र सरकार का आदेश सभी अखबारों में लीड है तो अखबारों को यह बताना चाहिये था कि बाकी मामलों में क्या होगा या उस मामले में क्या आदेश है या कोई आदेश नहीं है। अभी जो हो रहा है उससे तो न सिर्फ पाकिस्तान के बल्कि भारत के नागरिकों को भी परेशानी में रखा जा रहा है और वे चिन्ता करने के लिए मजबूर हैं कि क्या होगा और कैसे होगा या क्या होगा तो क्या करना है। खून बहाने के बदले पानी रोकने की रणनीति का नुकसान यह है खबरों और फॉलो अप का टोटा पड़ गया है।  

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