
संजय कुमार सिंह
आज की खबर तो हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट ही है। और सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस ने इसे लीड बनाया है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सिंगल कॉलम की है और विस्तार अंदर होना बताया गया है। यहां लीड प्रधानमंत्री का वायनाड दौरा और सहायता का आश्वासन है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने घाटी में दो सैनिकों के मारे जाने की खबर को सेकेंड लीड बनाया है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह पहले पन्ने पर दो कॉलम की खबर है। हालांकि, शीर्षक में बताया गया है कि मई से जम्मू और कश्मीर में शहीद होने वाले सैनिकों की संख्या 16 हो गई है। तथ्य यह है कि कश्मीर में आतंकी हिंसा में वृद्धि नरेन्द्र मोदी के तीसरी बार शपथ लेने के बाद से बढ़ गई है। पहला हमला तीर्थयात्रियों की बस पर शपथग्रहण के दौरान ही हुआ था। 4 मई को वायुसेना का एक कर्मी शहीद हुआ था उसके बाद वारदातें 11/12 जून से शुरू होती हैं। ऐसे में शीर्षक यह भी हो सकता था कि नरेन्द्र मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद से 16 जवान शहीद हुए। 11/12 जून से 15 जुलाई तक एक महीने 11 जवान शहीद हुए थे। उसके बाद खबर आई थी कि कश्मीर में सैनिकों की संख्या कम है इसलिए वे कमजोर पड़ रहे हैं। फिर उनकी संख्या बढ़ाने की भी खबर आई लेकिन वारदातें जारी हैं। मोटे तौर पर 11 जून से 10 अगस्त तक दो महीने में 15 जवान शहीद हुए हैं पर मई से 16 बताया गया है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने इस खबर को संभवतः इसी लिये महत्व दिया है।
आप जानते हैं कि राज्य में अनुच्छेद 370 खत्म किये जाने के बाद से विधानसभा ही नहीं नगर निगम के चुनाव भी लंबित हैं। इन दिनों विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित किये जाने के लक्षण हैं और ऐसे में इस खबर का अपना महत्व है। जहां तक हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट का सवाल है इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक भी सबसे दुरुस्त है। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, (सेबी प्रमुख) माधवी पुरी बुच निगरानी में; स्टेक का मूल्य 8.7 लाख डॉलर। मुख्य शीर्षक है, हिन्डनबर्ग के अनुसार अडानी की ऑफशोर इकाइयों में सेबी प्रमुख का हिस्सा था, इसलिए कार्रवाई नहीं की। हिन्दुस्तान टाइम्स में इस खबर का शीर्षक हिन्डबर्ग के हवाले से है, ऑफशोर फंड में सेबी प्रमुख का हिस्सा था। अंग्रेजी में ओन्ड लिखा है और इसका मतलब है कि एक समय था और इसका यह मतलब नहीं है कि अभी है। रिपोर्ट के अनुसार, पैसे पति-पत्नी दोनों के नाम से थे। निवेश 1 जून 2015 को किया गया था। अप्रैल 2017 में माधवी पुरी सेबी की पूर्ण कालिक निदेशक बनीं। इससे कुछ ही पहले दंपत्ति ने तय किया कि खाते धवल ही (अकेले) ऑपरेट करेंगे। फरवरी 2018 में धवल को 8,72,000 डॉलर का भुगतान मिला है। जाहिर है, शीर्षक तथ्यात्मक और तकनीकी रूप से सही है पर पूरा मामला नहीं बताता है।
इस मामले में उपरोक्त विवरण द टेलीग्राफ ने अपनी खबर में दिये हैं और लिखा है कि माधवी पुरी या उनके पति अथवा सेबी का पक्ष नहीं आया है। द टेलीग्राफ ने सेबी के ट्वीटर (एक्स) हैंडल का स्क्रीन शॉट भी छापा है और बताया है कि वह लॉक्ड है। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी खबर के शीर्षक के ठीक नीचे लाल स्याही से दो कॉलम का शीर्षक लगाया है, “निराधार, सख्ती से इनकार : बुच, पति”। मुख्य शीर्षक है, अब हिन्डनबर्ग ने सेबी प्रमुख और पति के डीलिंग पर सवाल उठाये। कहने की जरूरत नहीं है कि यह मामले की गंभीरता के अनुसार हल्का लगता है और लाल स्याही से इनकार के बाद बहुत कमजोर। लेकिन अखबार ने इसे टॉप पर छापा है और संभव है इसका मकसद मुकदमेबाजी से बचना हो। इस प्रस्तुति पर मुकदमा तो नहीं हो सकता है। अखबार ने रिपोर्ट के आधार पर तीन आरोप (नीचे) छापे हैं। अंतिम आरोप के अनुसार, सेबी के सदस्य के रूप में माधवी पुरी के कार्यकाल के दौरान उनके पति को ब्लैकस्टोन का सीनियर एडवाइजर नियुक्त किया गया। इससे पहले उन्होंने किसी फंड के लिए काम नहीं किया था। उनके लिंक्डइन प्रोफाइल के आधार पर कहा गया है कि उन्होंने रीयल इस्टेट या पूंजी बाजार में किसी फंड के लिए काम नहीं किया था फिर भी उन्हें ब्लैकस्टोन का सीनियर एडवाइजर बना दिया गया।

द हिन्दू में भी यह खबर सेकेंड लीड है। शीर्षक के अनुसार अदाणी रिपोर्ट से जुड़े फंड में सेबी प्रमुख का हिस्सा था। हिन्डनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पिछली रिपोर्ट के बाद उसे सेबी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया था। हिन्दू ने सेबी के लोगो के साथ इस सूचना को भी प्रमुखता से छापा है। द टेलीग्राफ में यह सेकेंड लीड है और दो कॉलम की इसकी खबर का शीर्षक है, “हिन्डनबर्ग का खुलासा : अदाणी ट्रेल सेबी प्रमुख तक जाता है”। आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी की सरकार ने बेनामी निवेश रोकने के लिए शेल कंपनियों को बंद करने का बड़ा शोर मचाया था, बहुत सख्ती की। इससे जो नुकसान हुआ वह तो अपनी जगह है ही, फायदे का पता नहीं है और यह भी इस सरकार के नोटबंदी जैसे कई मामलों में से एक है। बाद में पता चला कि अदाणी की कंपनियों में 20,000 करोड़ रुपये का अस्पष्ट निवेश है। राहुल गांधी और सांसद महुआ मोइत्रा ने इसे मुद्दा बनाया तो किसी और कारण से दोनों की संसद सदस्यता खत्म कर दी गई। अब दोनों और मजबूत होकर संसद में आये हैं।
सरकार अब संसद की कार्यवाही को संभाल नहीं पा रही है। शुक्रवार को अचानक संसद का सत्र समय से पहले ही खत्म करने की घोषणा कर दी गई। उसके बाद हिन्डनबर्ग का यह खुलासा सामने आया है। कल्पना कीजिये कि संसद का सत्र चल रहा होता तो कितना हंगामा मचता और सरकार क्या जवाब देती। जो भी हो, अदाणी की कंपनियों में अस्पष्ट निवेश का पता सेबी को लगाना था। हिन्डनबर्ग की पिछली रिपोर्ट के बाद पता चला था कि सेबी के उस समय के निदेशक रिटायर होने के बाद अदाणी की एनडीटीवी में नौकरी कर रहे थे। जांच नहीं हो पाने के संबंध में उन्होंने अपनी तरफ से कोई जानकारी तो नहीं ही दी, किसी ने पूछा भी नहीं और कोई खुलासा नहीं हुआ। सरकार ने जांच नहीं करवाई और सरकार को किसी भी तरह से जांच के लिए मजबूर नहीं किया जा सका। उल्टे हिन्डबर्ग को ही कारण बताओ नोटिस भेज दिया गया और अब यह खुलासा है। ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ तथ्यों के आधार पर निकाला गया निष्कर्ष है। असल में रिपोर्ट में संबंधित दस्तावेज भी हैं। पिछली रिपोर्ट में भी ऐसा ही था पर सरकार ने जांच नहीं करवाई कह दिया गया कि एक डेड एंड के बाद आगे नहीं बढ़ा जा सकता है।
ऐसे में यह खुलासा निश्चित रूप से बेहद गंभीर है और न सिर्फ सरकार बल्कि सरकारी एजेंसियों के लिए भी शर्मनाक है। पूर्व में ये आरोप लगे हैं कि अदाणी के यहां ये निवेश प्रधानमंत्री के हैं। जिस हिसाब से तथ्यों को छिपाया गया है, जांच रोकी गई है और अब जो खुलासा हुआ है वह यह कि सेबी प्रमुख का निवेश भी है और इसलिए वे निष्पक्ष काम नहीं कर सकते ही। इससे जांच नहीं कराने से संबंधित संदेह और पुख्ता होता है। इतना पैसा नौकरी पेशा दंपत्ति के पास हो और सरकार को सूचना न हो या कार्रवाई नहीं हो – और सेबी प्रमुख जैसे पद पर नियुक्ति तथा नियुक्ति के दौरान पति को लाभ यह सब सामान्य मामला हो, इस पर यकीन करना मुश्किल है। अमर उजाला में इस खबर का शीर्षक है, हिन्डनबर्ग का आरोप सेबी प्रमुख का अदाणी की कंपनियों में निवेश। दावा किया गया है कि पति के साथ ऑफशोर कंपनियों में पैसा लगाया गया है। ऐसा ही शीर्षक नवोदय टाइम्स का है। इसके अनुसार हिन्डनबर्ग ने अब सेबी प्रमुख पर लगाये गंभीर आरोप। इसके साथ एक खबर का शीर्षक है, चौकीदार की चौकीदारी कौन करेगा।


