राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा है हिन्दी का सवाल

भाषा का सवाल राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय अस्मिता के प्रबल पक्षधर थे। राष्ट्रभाषा के संदर्भ में अपनी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ में 1909 में ही अपना नजरिया स्पष्ट कर दिया था-‘सारे भारत के लिये जो भाषा चाहिए, वह तो हिन्दी ही होगी। भारत की भाषा अंग्रेजी नहीं है, हिन्दी है। वह आपको सीखनी पड़ेगी। इसके बाद 15 अक्टूबर 1917 को भागलपुर के कटहलबाड़ी क्षेत्र में बिहारी छात्रों का एक सम्मेलन आयोजित किया गया था। देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के निर्देष पर बिहारी छात्रों के संगठन का काम लालूचक के श्री कृष्ण मिश्र को सौंपा गया था। बिहारी छात्रों के सम्मेलन की अध्यक्षता महात्मा गांधी ने की थी। अपने संबोधन में महात्मा गांधी ने कहा था-‘ मुझे अध्यक्ष का पद देकर और हिन्दी में व्याख्यान देन और सम्मेलन का काम हिन्दी में चलाने की अनुमति देकर आप विद्यार्थियों ने मेरे प्रति अपने प्रेम का परिचय दिया है। इस सम्मेलन का काम इस प्र्रांत की भाषा में ही और वही राष्ट्रभाषा भी है- करने का निष्चय दूरन्वेषी से किया है।’ इस सम्मेलन में सरोजनी नायडू का भाषण अंग्रेजी से हिन्दी अनुदित होकर छपा था। यह सम्मेलन आगे चलकर भारत की राजनीति, विषेषकर स्वतंत्रता संग्राम में राजनीति का कॅानवास बना, जिससे घर-घर में  स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद करना मुमकिन हो सका। वही प्रसिद्ध गांधीवादी काका कालेलकर ने इस सम्मेलन  के भाषण  कोे  राष्ट्रीय महत्व प्रदान कर राष्ट्रभाषा हिन्दी की बुनियाद डाली थी। बाद में इसी कटहलबाड़ी परिसर में मारबाड़ी पाठशाला की स्थापना हुई।

कहते हैं कि कभी-कभी अतीत की घटनाओं की पुनरावृति होती है। भागलपुर में बिहारी छात्रों के सम्मेलन के 97 वर्ष बाद 15-16 सितम्बर को तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रायोजित ‘राष्ट्रीय अम्मिता और हिन्दी’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी कई मायने में महत्वपूर्ण रहा। संवाद, रचना और संघर्ष पूरी संगोष्ठी का आधार बना। एक ओर जहां विज्ञान, वाणिज्य और अन्य विषयों के लिये मानक तकनिकी शब्दावली तैयार करने का फैसला लिया गया तो दूसरी ओर हिन्दी के देशभर में स्वीकार्यता के सवाल को लेकर उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर करने की बात की गयी। सी-सैट के मामले पर भी चर्चा हुई। दो दिनो की राष्ट्रीय संगोष्ठी में यह मुद्दा भी छाया रहा कि शहर के कतिपय निजी स्कूलों में हिन्दी बोलने पर दंड दिया जाता है। सवालिया लहजे में कई वक्ताओं ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विदेशों में हिन्दी में भाषण देते हैं और उनके देश में संचालित निजी स्कूलों में बच्चे क्यों दंडित होते हैं?

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमाशंकर दूबे ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। उद्घाटन संबोधन में उन्होंने बनारस हिन्दू विष्वविद्यालय के संस्थापक मदन मोहन मालवीय को उधृत करते हुए कहा कि वे चाहते थे कि न्यायालय के आदेश हिन्दी में लिखे जायें। यदि अपने ज्ञान- विज्ञान को जन-जन तक पहुंचाना है, देश की प्रगति को गति प्रदान करनी है तो हमें हिन्दी को अपनाना होगा। विज्ञान को हिन्दी के माध्यम से प्रस्तुत करने की शुरूआत करनी होगी, जिससे कल को आगे आनेवाली पीढ़ी मुक्त होकर अपने विचारों को अभिव्यक्ति दे सकें। ज्ञान, विज्ञान और कौषल को भाषाई बंधन में नहीं बांधा जा सकता है। हिन्दी को ग्राह्य और सरल बनाना षिक्षकों का दायित्व है। वहीं प्रतिकुलपति डॉ. अवध किशोर राय ने यह सवाल उठाया कि यदि अंग्रेजी में पढ़ना लिखना और बोलना अच्छी शिक्षा मानी जाती है तो माध्यम हिन्दी क्यों नहीं? वाणिज्य वनस्पति विज्ञान, जंतु विज्ञान, भौतिकी, रसायन आदि विषयों की  किताबें अंग्रेजी में होती है। दरअसल में विज्ञान की बारीकियों को या तकनिकी शास्त्र की जटिलता को हिन्दी में उतारने का प्रयास नहीं किया गया। यह काम कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं।

बीज वक्तव्य देते हुए हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध समालोचक और तिलकामांझी भागलपुर के प्रो. डॉ. श्रीभगवान सिंह ने कहा कि यह सोच और चिंता का विषय है कि आजादी के 67 वर्षो के बाद राष्ट्रीय अम्मिता के संदर्भ में हिन्दी की स्थिति मजबूत होने की बजाय छीजती जा रही है, जबकि राष्टनायकों ने अंग्रेजी के वर्चस्व से मुक्त कराने के लिये एक राष्ट्रीय सपंर्क भाषा के रूप में बढ़ावा दिया। उन्होंने यह कहकर चैंका दिया कि दूर की बात छोड़ दें, भागलपुर के कई निजी स्कूलों में छात्रों को हिन्दी में बोलने पर सजा दी जाती है। यह भी सत्य है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की शुरूआत बंगाल से की गयी। दिसम्बर 1872 में स्वामी दयानंद सरस्वती को केशवचंद सेन से सुझाव दिया कि यदि वे संस्कृत की वजाय हिन्दी में अपने विचार प्रस्तुत करें, तो सारा देश लाभान्वित होगा। यह सुझाव उन्हें पसंद आया और काषी आकर हिन्दी सीखी, तब सत्यार्थ प्रकाश की रचना हिन्दी में की और इसके बाद 1875 में आर्य समाज की स्थापना की। दयानंद सरस्वती और उनके अनुयायियों ने पूरे देश में हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता तिलकामांझी भागलपुर विष्वविद्यालय की स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग की अध्यक्षा डॉ. विद्या रानी ने की। आयोजन सचिव सह पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. नृपेन्द्र प्रसाद वर्मा ने कहा कि राष्ट्रीय अस्मिता के लिये यह जरूरी है कि राष्ट्र के समस्त निवासी एक भाषा में विचार विनिमय कर सकें। यह दुखद पहलू है कि आजादी के 67 वर्ष बाद संपर्क सूत्र के लिये एक भाषा स्वीकार नहीं कर सके तो निःसंदेह भाषिक दासता हम पर हावी  है। इस सत्र में महात्मा गांधी विद्यापीठ, वाराणसी के हिन्दी विभाग के पूर्व आचार्य और अध्यक्ष प्रो. सुरेन्द्र प्रताप सिंह, रजनीश ने भी अपने विचार रखे। उद्घाटन सत्र का आरंभ छात्र-छात्राओं द्वारा प्रस्तुत स्वागत गान और कुलगीत गायन से हुआ और इस सत्र का समापन डॉ. बहादुर मिश्र के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ।

दूसरे सत्र की अध्यक्षता डॉ. नृपेन्द्र प्रसाद वर्मा ने की। इस सत्र में भारत सरकार के टी बोर्ड कोंलकाता के निदेशक डॉ. ऋषिकेष राय ने ‘स्वातंत्रय पूर्व राष्ट्रीय अस्मिता और हिन्दी’ पर अपना व्याख्यान दिया। इसी सत्र में महात्मा गांधी विद्यापीठ, वाराणसी के हिन्दी विभाग के पूर्व आचार्य और अध्यक्ष प्रो. सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने ‘स्वातंत्रय पश्चात  राष्ट्रीय अस्मिता और हिन्दी’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार में महात्मा गांधी के बाद सबसे ज्यादा काम राममनोहर लोहिया ने किया। वे सगुण समाजवाद के पक्षधर थे। उन्होंने लोकसभा में कहा था -‘अंग्रेजी को खत्म कर दिया जाए।’ चैखंभा योजना की सफलता में स्वभाषा का विकास जरूरी मानते थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा- ‘मैं चाहता हूं कि अंग्रेजी का सार्वजनिक प्रयोग बंद हो, लोकभाषा के बिना लोकराज्य असंभव है, कुछ भी  हो अंग्रेजी हटनी ही चाहिये, उसकी जगह कौन सी भाषाएं आती है, यह प्रश्न नहीं है। इस वक्त खाली यह सवाल है, अंग्रजी खत्म हो और उसकी जगह देश की दूसरी भाषाएं आएं। हिन्दी और किसी भाषा के साथ आपके मन में जो आए सो करें, लेकिन अंग्रेजी तो हटना ही चाहिये और वह भी जल्दी। अंग्रेज गये तो अंग्रेजी चली जानी चाहिये।’ उनके अंग्रेजी हटाओं आंदोलन के फलस्वरूप वनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अंग्रेजी की आनिवार्यता हटी। वर्तमान परिदृष्य की चर्चा करते हुए कहा कि वैश्विक दुनिया में हिन्दी छायी हुई है। पूंजीवाद के बाजार में हिन्दी है। दुनिया की दूसरी बड़ी भाषा है हिन्दी।

दूसरे दिन के प्रथम स़त्र की अध्यक्षता डॉ. बहादुर मिश्र ने की। इस सत्र का विषय था- ‘राष्ट्रीय अस्मिता के संदर्भ में हिन्दी मीडिया की भूमिका।’ इस विषय पर विश्वभारती, शातिनिकेतन के हिन्दी विभाग के आचार्य और पूर्व अध्यक्ष डॉ. हरिष्चंद्र मिश्र ने कहा कि साहित्य हमारा मानसिक चिंतन है और जितने भी विषय हैं भाषिक चिंतन हैं। हमें यह निरंतर प्रयास करना होगा कि अंग्रेजी से मुक्ति मिले। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व  अध्यक्ष डॉ. तपेश्वर नाथ ने ‘बिहार के हिन्दी सेवियों का योगदान’ पर अपने व्याख्यान को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के अवदान पर केन्द्रित  किया। उनके प्रयासों के फलस्वरूप हिन्दी वहुभाषी देश की राजभाषा एवं संपर्क भाषा के रूप में प्रतिष्ठापित हुई। 1959 में जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की कि हिन्दी को अहिन्दी भाषी राज्यों पर थोपी  नहीं जाएगा और अंग्रेजी को सह भाषा के रूप में तब तक बने रहने की बात उठायी जब तक हिन्दी का पूर्ण विकास नहीं हो जाता है। उन्होंने कहा कि संविधान के मूल अनुच्छेद से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता है। इस सवाल पर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की आवाज बुलंद की। इस सत्र में पूर्व परीक्षा नियंत्रक डॉ. मधुसूदन झा ने भी अपने विचार रखे।

अंतिम सत्र की अध्यक्षता महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी के पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष प्रो. सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने की। इस सत्र में ‘राष्ट्रीय अस्मिता और हिन्दी’ विषय पर डॉ. नीतू कुमारी, कुमारी कंचन, डॉ. ब्रजभूषण तिवारी, डॉ. परषुराम राय, डॉ. शषि भारती, नीलम कुमारी, श्वेता कुमारी, माधवी और आनंद ने अपने विचार व्यक्त किये। मथुरा प्रसाद दूबे ने अपनी कविता का पाठ कर भाव बोध को अभिव्यक्ति प्रदान की। कुलपति रमाशंकर दूबे ने प्रतिभागियों के बीच प्रमाण पत्र वितरित किये। दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन विदाई गीत से गीत से हुआ।

भागलपुर हिन्दी प्रदेश की पूर्वी अंतिम सीमा है। इसका उल्लेख आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘हिन्दी साहित्य के इतिहास में’ इसकी चर्चा की है। इस धरती पर  आयोजित यह संगोष्ठी दिशा देने का काम करेगा।

 

कुमार कृष्णन, स्वतंत्र पत्रकार।



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