
संजय कुमार सिंह-
संभव है, इसका कारण यह हो कि पहले भाजपा के विरोध को आम आदमी पार्टी, कांग्रेस या तृणमूल कांग्रेस का समर्थन बताया गया और अब इनके विरोध करके भाजपा का परोक्ष समर्थन किया- कराया जा रहा है। भाजपा निम्न स्तर के प्रचार और विरोध की जो राजनीति कर रही है वैसा दूसरी पार्टियां नहीं कर रही हैं। वैसे भी, खुद को बेहतर बताना सामान्य है पर दूसरों को बुरा बताना एंटायर पॉलिटिकल साइंस और उनके समर्थकों की विशेष योग्यता!
आज के ज्यादातर अखबारों में चुनाव की घोषणा लीड है। इसमें कई बातें महत्वपूर्ण हैं जैसे कश्मीर में तीन चरणों में चुनाव होना, हरियाणा के चुनाव अलग चरण में होना, कश्मीर में 10 साल बाद चुनाव होना और प्रधानमंत्री के यह कहने तथा इस दिशा में काम शुरू होने के बावजूद एक देश, एक चुनाव की जगह कश्मीर और हरियाणा जैसे देश के छोटे से हिस्से में एक दिन में चुनाव नहीं हो रहे हैं। यही नहीं, तीनों चरण में विधानसभा सीटों की संख्या समान नहीं है यानी इससे भी अंतर पड़ता है और प्रधानमंत्री दूसरी लाइन पर काम कर रहे हैं। झारखंड और महाराष्ट्र में भी चुनाव होने हैं और उसकी घोषणा अभी नहीं करना तथा उसके जो कारण बताये गये हैं वो सब भाजपा शासन की कार्यकुशलता कहे जा सकते हैं। कश्मीर में यह स्थिति तब है जब बहुप्रचारित अनुच्छेद 370 को हटाये पांच साल से ज्यादा हो चुके हैं और अभी के चुनाव सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर, पूर्व घोषित तारीख से पहले कराने की मजबूरी में घोषित किये गये हो सकते हैं। आज खबरों के शीर्षक में यह सब मुद्दा नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने तो शीर्षक में इनमें से कुछ नहीं ही बताया है। बहुत ही सरल व सामान्य शीर्षक है, “जम्मू व कश्मीर तथा हरियाणा में चुनाव के लिए तैयारिया पूरी; नतीजे 4 अक्तूबर को।”
आज की दूसरी प्रमुख खबर, युनूस ने मोदी को दिया हिन्दुओं की सुरक्षा का भरोसा है। अमर उजाला ने इसे टॉप पर छापा है और जाहिर है यह नरेन्द्र मोदी के हिन्दुत्व समर्थक (और प्रतिनिधि भी) होने का प्रचार है। इस खबर और इससे संबंधित समस्या तब होगी जब कोई देश भारत में मुसलमानों की दिक्कतों पर बोलेगा। भारत उसे आंतरिक मामलों में दखल मानता है और अखबार वैसी खबरों को कहीं कोने में निपटा देते हैं। लेकिन आज यह खबर लगभग सभी अखबारों में पहले पन्ने पर है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर है जबकि नवोदय टाइम्स में यह पहले पन्ने पर नहीं है। युनूस ने यह भरोसा नरेन्द्र मोदी की मांग के जवाब में दिया होगा. वैसे यह उनका बड़प्पन और उनकी धर्मनिरपेक्षता भी है लेकिन भारत न तो हिन्दू राष्ट्र है ना मोदी हिन्दुओं के स्वीकार्य प्रतिनिधि हैं। ऐसे में यह खबर इतना प्रचार डिजर्व नहीं करती है लेकिन समर्थकों और प्रचारकों की बात अलग है और यही लोग तृणमूल कांग्रेस की सरकार और उसकी नेता ममता बनर्जी को बदनाम करने में लगे हैं।
कोलकाता में डॉक्टर की हत्या शुक्रवार 9 अगस्त 2024 को हुई थी। 12 घंटे के अंदर मुख्य अपराधी को पकड़ लिया गया था। मुख्यमंत्री ने पुलिस को अगले इतवार यानी 18 अगस्त तक जांच पूरी करने का आदेश दिया था और कहा था कि ऐसा नहीं हुआ तो जांच सीबीआई को सौंप दी जायेगी। हाल के समय में पश्चिम बंगाल के मामले में हर जांच सीबीआई से कराने का केंद्र सरकार का अलग उतावलापन दिखता रहा है। हालांकि, मुझे सीबीआई पर बहुत भरोसा नहीं है और नोएडा के आरुषि हत्याकांड में मामला तो नहीं ही सुलझा, चुनिन्दा ‘लीक’ से किसी की अनावश्यक बदनामी न हो इसका भी ख्याल नहीं रखा गया। अब तो सीबीआई का उपयोग इसी काम के लिए किया जा रहा है पर वह अलग मुद्दा है। हालांकि, इसके बावजूद हाईकोर्ट के आदेश पर जांच सीबीआई को सौंपी जा चुकी है। तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मांग की है कि सीबीआई अपनी जांच इतवार तक पूरी करे ताकि तुरंत न्याय हो सके। उन्होंने कहा है कि दोषी को रविवार को ही फांसी दे दी जाये, (द टेलीग्राफ)। जाहिर है, इसका मतलब यह भी है कि वे किसी दोषी को बचाना नहीं चाहती हैं और चाहती भी हों, तो चुप नहीं हैं। खुल कर कह रही हैं कि इतवार को (कल) ही फांसी दे दी जाये। फिर भी उनकी आलोचना हो रही है तो यह राजनीति है, घटिया पत्रकारिता है – आइये समझें कैसे?
इससे पहले, बता दूं कि मेरी राय में यह भाजपा की राजनीति का परिणाम है और इसका मकसद जनहित से ज्यादा भाजपा के चुनावी लाभ के साथ दूसरे मुद्दों को दबाकर रखना है। यहां मेरा मकसद इसे साबित करना नहीं है पर जो स्थितियां हैं उसमें यह आरोप भर नहीं है। पर मुद्दा वह नहीं है। बेशक, यह एक आपराधिक घटना है और नहीं होनी चाहिये थी। लेकिन इस अपराध में किसी को बचाया जा रहा है, ऐसा भी नहीं है और सही जांच के लिए जरूरी नहीं है कि मेडिकल कॉलेज अस्पताल के प्रिंसिपल या पुलिस प्रमुख के खिलाफ कार्रवाई की जाये। इसकी बजाय जो जांच कर रहा है उसे समय, सहायता और सहयोग मिलना चाहिये। पर हो वैसा नहीं रहा है और यह मेरी चिन्ता का विषय नहीं है। पर मुद्दा यह है कि आईएमए लगातार सक्रिय है, आज फिर हड़ताल है। इससे पहले 15 अगस्त की रात भारी भीड़ ने अस्पताल पर हमला बोल दिया। इसके लिए भी पुलिस को जिम्मेदार और लापरवाह बताया जा रहा है (टाइम्स ऑफ इंडिया)। लेकिन मुद्दा यह है कि भाजपाई राज्यों में ऐसा होता है तो मीडिया (और समाज) की प्रतिक्रिया कैसी होती है या ऐसी क्यों नहीं होती है? आज की खबरों के अनुसार हाईकोर्ट ने कहा है अपराध की जगह को सुरक्षित रखा गया है उसके सबूत दिये जायें।
यहां मुझे डबल इंजन वाले उत्तराखंड का चर्चित अंकिता भंडारी हत्याकंड याद आ रहा है। इस मामले ने यौन उत्पीड़न, राजनीतिक रूप से प्रभावशाली किसी ‘वीआईपी’ की संलिप्तता आदि मामले थे। पर हुआ क्या? सितंबर 2022 का मामला सुलझा या नहीं, यह भी पता नहीं है। क्या होटलों में काम करने वाली रिसेप्शनिस्ट की सुरक्षा जरूरी नहीं है? उनका एसोसिएशन आईएमए जैसा नहीं है तो यह काम मीडिया औऱ समाज को नहीं करना चाहिये? पर हिन्दी समाज इसे भूलकर कोलकाता में लगा है। दूसरी ओर, वनतंत्र नाम के जिस होटल में अंकिता रहती थी और जहां अपराध हुआ उसे सील किये जाने के बावजूद उसमें आग लग गई थी बाद में गिरा भी दिया गया। पुलिस उसकी सुरक्षा में नाकाम रही थी। पर उसकी आलोचना नहीं हुई। तब हाईकोर्ट में ऐसी कोई चिन्ता नहीं जताई गई। आज तक डॉट इन की एक खबर के अनुसार, मुख्य गवाह विवेक आर्य ने कोर्ट को बताया था कि अंकिता ने उसे फोन कर बताया था कि 106 नंबर कमरे में मैनेजर सौरभ भास्कर ने उसके साथ कई बार दुष्कर्म करने का प्रयास किया। वनंतरा रिजॉर्ट का मालिक पुलकित आर्य भी उसका शारीरिक शोषण करता था। स्पष्ट है कि यह अकेले में पाकर या गुस्से अथवा यौन अतिरेक में किया गया अपराध नहीं है। पीड़िता को राहत नहीं मिली क्योंकि व्यवस्था (और समाज भी) ऐसा नहीं है।
अपराध की जगह को सुरक्षित रखना बुनियादी जरूरत है और यह पुलिस का काम है, इसकी जरूरत वही तय करती है। इसमें पीड़ित या अदालत की भूमिका क्यों होनी चाहिये? अगर है भी तो भाजपा शासित राज्यों में क्या होता है या कभी ऐसा हुआ है? हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार कोलकाता हाईकोर्ट ने कहा है कि अस्पताल बंद कर दिया जायेगा। ठीक है कि डॉक्टर की सुरक्षा होनी चाहिये, पुलिस को इसके लिए मजबूर किया जाना चाहिये, पुलिस इसी काम के लिए है। लेकिन सरकारी अस्पताल इन कारणों से बंद होने लगे तो वो सरकारें ही ठीक हैं जहां अस्पताल किसी काम के नहीं हैं और आम आदमी बेइलाज मरने को मजबूर है। कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल सरकार पर दबाव इसलिए भी है कि सरकारी अस्पताल काम कर रहे हैं (या चिकित्सों को काम करना पड़ रहा है)। हादसे के बाद से आईएमए का विरोध प्रदर्शन पहले भी हुआ है। आईएमए का दबाव इस कारण तो नहीं है? कैसे तय होगा? खासकर तब जब लोकप्रिय सरकार अस्पताल बनाने और चलाने की बजाय बीमा और आयुष्मान योजना चला रही है। यही नहीं, खबरों के अनुसार, पश्चिम बंगाल भाजपा का कहना है कि राज्य की स्थिति पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे नाकाम लोकतंत्र से बुरी है। जहां तक पुलिस के काम और उसपर आईएएम की प्रतिक्रिया तथा संबंधित खबर का सवाल है, आज एक खबर यह भी है कि गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर का फोन उनके पीआरओ ने उठाया और ऐसे में डॉक्टर ने कहा कि सुरक्षा की उम्मीद किससे करें। भले ही यह पहले पन्ने की खबर नहीं है पर मैंने कल सोशल मीडिया पर इसका वीडियो देखा था। आज भास्कर डॉट कॉम पर यह खबर है और इसमें कहा गया है कि मुख्यमंत्री का स्पष्ट निर्देश है कि अधिकारी सीयूजी (क्लोज्ड यूजर ग्रुप) नंबर खुद उठायें। इसका मतलब यह हुआ कि यह आम नंबर की बात नहीं हो रही है। कल रात मैंने जो वीडियो देखा उसके अनुसार आईएमए के डॉक्टर बीपी त्यागी पांच दिन से कमिश्नर को फोन कर रहे हैं और पीआरओ उन्हें टाल रहा है और बात नहीं हो पाई है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह साधारण (सार्वजनिक) नंबर पर भी नहीं होना चाहिये और हो रहा है तो बड़ी खबर है लेकिन आप ढूंढ़िये, कहीं है? यह खबर छपी भी हो तो मुद्दा नहीं है जबकि बंगाल प्रशासन के खिलाफ राज्यपाल भी टिप्पणी कर रहे हैं जबकि आधी रात के प्रदर्शन और तोड़फोड़ के लिए द हिन्दू डॉट कॉम की खबर के अनुसार 12 लोगों को रोका गया था।
पुलिस ने अन्य संदिग्ध की तस्वीरें सीसीटीवी के फुटेज से जारी कर दी थीं। यह सब तब है जब वहां की सरकार भाजपाई सरकारों की तरह आंदोलन विरोधी नहीं हैं और पुलिस को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अमानवीय व्यवहार करने की छूट नहीं है। आंदोलन-प्रदर्शन को जनता का अधिकार समझा जाता है और भाजपा वाले इस अधिकार का पूरा उपयोग करते हैं जबकि भाजपा के खिलाफ ऐसा होने लगे तो उसकी ट्रोल सेना की भूमिका आप अब जान गये होंगे। ऐसा नहीं है कि ममता बनर्जी यह सब बोल नहीं रही हैं, पत्रकारों को पता नहीं है या किसी को बताया नहीं गया है। असल में गोदी मीडिया वही कर रहा है जो वह करता रहा है कल नवोदय टाइम्स में प्रकाशित एक खबर का शीर्षक था, कुछ दल समस्याएं खड़ी करने का प्रयास कर रहे हैं : ममता। यह राज्यपाल के हवाले से छपी खबर के साथ है। इसका शीर्षक है, अब और नहीं चलने देंगे खून-खराबा। कुल मिलाकर, हिन्दी पट्टी के लोग अपनी भलाई और बेहतरी भूलकर भाजपा का समर्थन और भाजपा विरोधियों का विरोध करने में लगे हैं।


