चंदन पांडेय-
आनंद स्वरूप वर्मा और सेतु प्रकाशन के बीच जो सरेआम विवाद है वह ऊपर से देखने में पैसे रुपयों से संबंधित है लेकिन वास्तव में वह प्रकाशन संसार में उपस्थित शक्ति संरचना से जुड़ा है। पॉवर स्ट्रक्चर।
आनंद स्वरूप वर्मा ने पहली पोस्ट में लिखा है कि संवादहीनता की सी स्थिति है। यह संवादहीनता वास्तव में प्रकाशन व्यवसाय की पहचान हो गई है। जैसे ‘झूठी-विनम्रता’ वास्तव में टेली-कॉलिंग की पहचान है। जैसे मुस्तैद रहना फौजियों की पहचान हो सकती है।
फोन नहीं उठाना, संदेशों का जवाब नहीं देना, महीनों वर्षों तक मेल देखना ही नहीं, मेल का जवाब न देना, एक दो साल तक पांडुलिपि मेलबॉक्स में रखने के बाद किसी मुहूर्त पर लेखक को इंकार कर देना, यह सब प्रकाशन संस्थाओं और उससे जुड़े लोगों का जैसे मूलभूत अधिकार हो गया हो। ऐसा ही एक हृदयविदारक वर्णन मनोज रूपड़ा करते हैं। उनके किसी ऐसे मित्र से जुड़ी बात है जो मरणासन्न थे और उनकी पुस्तक विलंबित ढंग से प्रकाशनाधीन थी।
सब चंगा जा रहा होता है, किताब की योजना बन रही होती है, प्रकाशन की तारीख तय हो रही होती है और अंततः एक दिन उधर से संपर्क टूट जाता है। फोन अनुत्तरित रह जाते हैं। व्हाट्सऐप के संदेश अनदेखे रख जाते हैं। चिट्ठियाँ अपठित। लेखक ख़ुद की आग में जलता हुआ रह जाता है। हमलोग जो थोड़े मोटी चमड़ी के हैं वे एकाध बार पूछगीछ कर लेते हैं बाकी जो कोमल हृदय और मानवीय गरिमा से लैस रचनाकार हैं वे शायद ही किसी प्रकाशक या संपादक से पूछ पाते होंगे कि भाई मेरी रचना का क्या किया? जिस संसार में सब कुछ टंकित होता है वहाँ ऐसी-ऐसी किताबें भी हैं जिनके पांडुलिपि से प्रकाशन में सात आठ वर्षों का समय लग जाता है।
जाहिर सी बात है प्रकाशन संसार कुबेर या लक्ष्मी या कारू का खजाना नहीं है इसलिए पैसों की लेन देन एक समस्या रहती है लेकिन यह जो सत्ताशीर्ष पर विराजने का दंभ है वह इस स्थिति की रचना करता है जिसमें प्रकाशन संवाद को किसी नैतिक जिम्मेदारी से जुड़ी बात नहीं मानता। वे लोग इतने ऊँचे सिंहासन पर है कि आप कुछ कहेंगे तो उनके साथ-साथ बाकी लोग आप पर ही हँसेंगे। आप ही रुसवा होंगे।
पुराने प्रकाशनों पर लिखते हुए कई नये प्रकाशन संपर्क में आये, पाया कि संवाद की स्थिति वहाँ भी बादशाह और दुग्गी सरीखी ही है।
कुछ लोग कहते हैं कि काम का बोझ! काम का बोझ किसे नहीं है! जो अकर्मण्य हैं उनके अलावा सब किसी हरीस और जुआठ में जुते हुए हैं। बाकी सारा काम तो उसी में होता ही रहता है। केवल लेखकों का उत्तर देना नहीं हो पाता।
ऐसे छोटे मोटे कारणों से उपजी अपमान की स्थिति से बचने के लिए मैं देखता हूँ कि अनेक लेखक बड़े प्रकाशकों को अपनी रचनाएँ नहीं भेजते हैं।
यह बात कहीं न कहीं हिंदी के उस प्रचलन से जुड़ी है जिसमें लेखक की कला का स्वीकार नहीं है। जिसमें कथ्य ही जो है सो है इसलिए लेखक का योगदान महज कलमघसीट की तरह है। इनके लिए या हिंदी साहित्य की किसी भी ’शक्ति-मठ’ के लिए लेखक के भीतर के कलाकार, उसकी कला-साधना इत्यादि की कोई अहमियत नहीं।
मेरी बातों को अन्यथा न लें। किसी को भला बुरा कहने की आवश्यकता नहीं है। यह मुद्दा विचारणीय है। थोड़ी विनम्रता, नैतिकता (एंपैथी के संदर्भ में) और थोड़ा प्रोफेशनलिज्म इस स्थिति को सुधार सकता है। एक शब्द का उत्तर या एक वाक्य का दिलासा लेखक को अनेक किस्म के नकारात्मक एहसास से बचा सकता है।
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सेतु प्रकाशन ने पैसे देने के मामले में वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा को जवाब दिया!
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