Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

हिंदुस्तान और दैनिक भास्कर में छपी इन खबरों की आपस में शक्ल क्यों मिल रही है?

बड़ौत- हिंदुस्तान और दैनिक भास्कर की लोकल कवरेज में आज तो कमाल ही हो गया। बड़ौत के एक खेल कार्यक्रम की रिपोर्ट दोनों अख़बारों में हूबहू एक जैसी… बस शीर्षक बदल दिया, फोटो बदल दी और बाकी कॉपी-पेस्ट जैसा।

यहाँ तक कि कार्यक्रम पर की गई ‘एक्सक्लूसिव’ निगेटिव टिप्पणी भी ज्यों की त्यों! लगता है या तो दोनों का रिपोर्टर एक ही है या फिर एक का लोकल डेस्क दूसरे का होमवर्क देखकर चलता है।

हम पाठक लोग बेचारे समझें किसे असली रिपोर्टिंग और किसे ‘शेयरिंग सर्विस’? लगता है बेचारा हिंदुस्तान स्टाफ का ही कोई रिपोर्टर अपने लिए दैनिक भास्कर में जुगाड़ लगा रहा है और यह उसी श्रद्धा निष्ठा का परिणाम है।

भड़ास को एक जागरुक पाठक द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
3 Comments

3 Comments

  1. Prawin kumar

    November 22, 2025 at 2:23 pm

    ऐसे बहुतेरे रिपोर्टर हैं जो दो जगह के लिए काम करते हैं। अगर तकनीकी बाधा भी आती है तो अपनी पत्नी के नाम से करते हैं या फिर भाई के नाम से। मीडिया संस्थानों को ज्यादा मतलब नहीं है, बस उनको ऐड मिलना चाहिए 15 अगस्त, 26 जनवरी और स्पेशल स्थापना दिवस पर।

  2. Amit

    November 23, 2025 at 11:53 am

    इन दिनों तो बड़े संस्थानों जैसे दैनिक जागरण और अमर उजाला के पत्रकार भी पब्लिक एप जैसे थर्ड पार्टी प्लेटफॉर्म के लिए खबरें बनाने लगे हैं। जहां कवरेज के लिए संस्थान के कैमरे और सैलरी से डलाया गया पेट्रोल इस्तेमाल होता है, वहीं मोबाइल से पब्लिक एप के लिए भी कंटेंट खूब तैयार किया जाता है। लगता है मीडिया एथिक्स अब पूरी तरह से ओल्ड फैशन हो गया है।

  3. Vikas N1

    November 23, 2025 at 1:56 pm

    यह घटना सिर्फ कॉपी-पेस्ट नहीं.. पत्रकारिता के मुँह पर करारा तमाचा है। खबरें मैदान में दौड़कर नहीं बल्कि अब एयर-कंडीशंड ऑफिस की मिलीभगत और फील्ड के दोहरे खेल से तैयार हो रही हों तो समझ लीजिएकि प्रिन्ट मीडिया अब ‘कंटेंट का दलाली बाजार’ बन चुका है। चार-चार पैराग्राफ हूबहू उठाकर छाप देना दिखाता है कि कुछ संस्थानों के लिए न तो पेशेवर साख मायने रखती है और न पाठकों का भरोसा। शर्म की बात यह है कि संपादक केबिन में एथिक्स पर भाषण देंगे और नीचे रिपोर्टर बोनस के लिए दो नावों पर पैर रखता मिलेगा। यह सिर्फ कॉपीराइट का उल्लंघन नहीं बल्कि यह अख़बारों के भीतर सड़ चुकी व्यवस्था का आईना है। अगर इस पर भी कार्रवाई न हुई तो फिर मीडिया हाउसों को ‘न्यूज़रूम’ नहीं बल्कि ‘री-प्रिंटिंग सेंटर’ लिख लेना चाहिए। इन सभी की डिग्री की भी जांच होनी चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन