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सुख-दुख

नहीं रहे वरिष्ठ संपादक और पद्म भूषण एच के दुआ

नई दिल्ली: देश के वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व राज्यसभा सदस्य एचके दुआ का बुधवार को 88 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। परिवार के एक सदस्य के अनुसार उन्होंने दोपहर में दिल्ली के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। वह पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थे और करीब तीन सप्ताह पहले उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

एचके दुआ का अंतिम संस्कार गुरुवार को दिल्ली के लोधी रोड श्मशान घाट पर किया जाएगा। उनके परिवार में पत्नी अदिति और बेटा प्रशांत हैं। दुआ को पत्रकारिता में संपादकीय स्वतंत्रता के प्रति उनकी मजबूत प्रतिबद्धता के लिए जाना जाता था।

दुआ वर्ष 2009 से 2015 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे। इस दौरान उन्होंने विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर संसद में सक्रिय भूमिका निभाई।

कई बड़े मीडिया संस्थानों में निभाई जिम्मेदारी

अपने लंबे पत्रकारिता करियर में एचके दुआ ने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अहम पदों पर काम किया। वह ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के संपादक (1987-94), ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के प्रधान संपादक (1994-96) और ‘द ट्रिब्यून’ के प्रधान संपादक (2003-09) रहे। इसके अलावा ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में भी उन्होंने संपादकीय सलाहकार के रूप में कार्य किया।

सरकार और कूटनीति में भी निभाई भूमिका

एक जुलाई 1937 को जन्मे एचके दुआ दो प्रधानमंत्रियों—अटल बिहारी वाजपेयी और एचडी देवगौड़ा—के मीडिया सलाहकार भी रहे। इसके अलावा 2001 से 2003 के बीच उन्होंने डेनमार्क में भारत के राजदूत के रूप में भी सेवाएं दीं। वह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य रहे और संसद की कई महत्वपूर्ण समितियों से भी जुड़े रहे।

पद्म भूषण से सम्मानित

एचके दुआ को पत्रकारिता और सार्वजनिक जीवन में योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। पंजाब विश्वविद्यालय और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय ने भी उन्हें मानद डी.लिट की उपाधि दी थी।

नेताओं और मीडिया जगत ने जताया शोक

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि दुआ की ईमानदारी, संपादकीय स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता हमेशा याद की जाएगी।

वहीं शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि एचके दुआ ने पत्रकारिता में सत्यनिष्ठा और लोकतांत्रिक मूल्यों को हमेशा प्राथमिकता दी। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी उन्हें पत्रकारिता जगत का एक बड़ा स्तंभ बताते हुए श्रद्धांजलि दी।


वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी जी का एफबी पोस्ट-

हरिकृष्ण दुआ नहीं रहे। पेशे में एचके दुआ नाम से जाने जाते थे। हम दुआ साहब कहते। 89 का स्पंदित जीवन उन्होंने जिया। वे बहुमुखी प्रतिभा वाले संपादक थे। चार बड़े दैनिकों के संपादक रहे। हिंदुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और ट्रिब्यून। दो प्रधानमंत्रियों के मीडिया सलाहकार हुए — अटलबिहारी वाजपेयी के भी, एचडी देवेगौड़ा के भी।

अटलजी ने बाद में राजदूत बना कर डेनमार्क भेजा। वहाँ मन नहीं लगा, तो लौट आए। ट्रिब्यून के संपादक हो गए। पद्मभूषण मिला। मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने, उन्होंने राज्यसभा में लिया। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सदस्य भी रहे।

वे विनम्र स्वभाव के थे। पर सख़्त रुख़ भी अख़्तियार करते थे। जब टाइम्स ऑफ़ इंडिया में थे, अख़बार के मालिक अशोक जैन फेरा (विदेशी मुद्रा उल्लंघन) के मामलों में गिरफ़्तार हुए। छुड़ाने के लिए लॉबिंग हुई। दुआ साहब ने उसमें मदद शामिल होने से इनकार कर दिया। उन्हें अख़बार से निकाल दिया गया। इस कार्रवाई के विरुद्ध उन्होंने “दंतविहीन” प्रैस काउंसिल में शिकायत की, अपना केस ख़ुद लड़ा।

मुझसे उन्हें स्नेह था। प्रभाष जोशी जी के तो अभिन्न मित्र थे। प्रभाषजी के बड़े बेटे संदीप के विवाह में एसी-रहित डिब्बे में हमारे साथ जोधपुर गए थे। वहाँ मैंने उन्हें घंटाघर की सैर करवाई। मिर्चबड़ा उन्हें सदा याद रहा, कि तोड़ते ही कैसे भीतर “मिसाइल की तरह तन गया था”। उनमें अहंकार नहीं था। विनोदी भी बहुत थे। सदा मुस्कुराते रहते। आख़िरी दिनों में आइआइसी में वीलचेयर पर आते थे।

नब्बे के दशक में जब मैं जनसत्ता-चंडीगढ़ का संपादक था, वे इंडियन एक्सप्रेस के प्रधान संपादक के नाते वहाँ आए। दिल्ली लौटने से पहले बोले कि कल पिताजी का जन्मदिन है, एक स्वैटर लेना है। मेरी ऑमनी वैन में हो लिए। रास्ते में बोले कि अगली बार आपके यहाँ दाल-बाटी खाने आऊँगा। बाद में मिलने पर भी ऐसा कहते। उनका शिष्टाचार था।

मैं जब 1999 में पदोन्नति पाकर दिल्ली आया, तब जो मोटर (कंटेसा) मिली वह पहले दुआ साहब के पास थी। ऐसा पीछे सीट के ख़रीते में छूटी उनके बेटे की तसवीरों से पता चला। मैं लौटाने गया। कहने लगे — प्रेमलताजी के हाथ की दाल-बाटी खानी है। मैंने कह डाला कि यह तो आपका तकियाकलाम हो चला। आप समय निकालिए, अभी तय कीजिए।

उनके जाने से जीवट वाले हँसमुख एक बड़े संपादक की जगह ख़ाली हो गई। उनकी स्मृति को नमन।

(फ़ोटो: जोधपुर, 1994 – हरिकृष्ण दुआ, बालकृष्ण चम, स्वदेश तलवार, वेदप्रताप वैदिक, ओम थानवी)

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