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सुख-दुख

भांग पियें तो अपने जोखिम पर, जरा सी चूक से घर-परिवार संकट में पड़ सकता है!

दिनेश पाठक-

सच्ची कहानी है 1993 की। राष्ट्रीय सहारा से करियर शुरू हुआ था। होली के एक दिन पहले काम निपटाकर रात में ही लखनऊ से अयोध्या चला गया। अगली सुबह देर से सोकर उठा। अपने हाते में ठण्डाई के नाम पर भाँग तैयार थी।

भैया ने सभी बच्चों को एकत्र कर एक-एक कप ठण्डाई पिला दी। थोड़ी देर में भाँग ने काम शुरू कर दिया। मैं रंग खेलने कहीं निकल नहीं पाया। जीवन में पहली और अंतिम बार भाँग पीने का अवसर मिला था। मैं केवल एक काम कर रहा था।

हर दो मिनट बाद रसोई में घुसना और कुछ खा लेना। हँसना-खाना चलता रहा। दो घण्टे में शरीर पस्त हो गया। मैं हाते में ही पड़ गया। कुछ देर बाद मुझे होश आया तो मैं ट्यूबवेल के नीचे था। मेरे ऊपर पानी की धार गिर रही थी।

ठण्ड से काँपने लगा तो मुझे फिर वहाँ से उठाकर कंबल के नीचे डाल दिया गया। नींबू आदि इस गरज से पिलाया गया कि नशा उतरे। पर, कुछ खास फर्क नहीं पड़ा। रात सोकर गुजरी। अगली सुबह 11 बजे मुझे लखनऊ दफ्तर में रिपोर्ट करना था और तब मैं सोकर ही उठा।

जैसे-तैसे भागा और बस में बैठकर कैसरबाग पहुँचा। उस जमाने में मेरे ऊपर अपराध कवर करने की जिम्मेदारी थी। बस अड्डे से सटे मैं एसपी सिटी दफ्तर पहुँचा। वहाँ से अपने दफ्तर। मैं जो कुछ कर रहा था, यह खुद से हो रहा था।

दफ्तर में सबसे पहले तो सुबह न पहुँचने के लिए एक राउण्ड फटकार पड़ी। मैं बिना किसी प्रतिक्रिया के निर्विकार भाव से सब सुनता रहा। धीमा नशा अभी भी मुझे था। नये नवेले पत्रकार साथियों के लिए जानना जरूरी है कि उस जमाने में लखनऊ में होली में छूरेबाजी में 10-15 आदमी निपट जाते थे।

उस साल भी कोई 12 लोग जान गंवा बैठे थे और इसकी खबर मैंने एक पेज में बनाकर डेस्क पर दे दिया। कॉपी सीधे संपादक श्री सुनील दुबे जी के सामने पहुँची। मैं फिर तलब हुआ। वे मुझ पर फायर किये जा रहे थे और मैं चुपचाप केवल सुन रहा था। उनकी फटकार का असर मुझ पर नहीं हो रहा था।

हालाँकि, दुबे जी जब फटकारते थे तो अच्छे-अच्छे बेहोश हो जाते थे। पर मैं तो नशे में था। बीस मिनट में वे थक गये तो मुझे लगा कि कुछ गड़बड़ी हो गयी है। मेरे भाँग के नशे को वे भी महसूस कर चुके थे। मेरी छवि ठीक थी तो नौकरी पर संकट नहीं आया लेकिन पूरे दफ्तर में मैं हंसी का पात्र बना।
दुबे सर की फटकार के बाद न जाने कैसे एक पेज की पुरानी कॉपी डेस्क की मंशा के अनुरूप बन गयी और मेरी जान बची। अगली सुबह मैं दफ्तर पहुँचा तो खुसुर-फुसुर करते हुए सारी बातें मेरी जानकारी में आईं। संपादक जी ने भी बुलाकर पूछ लिया-नशा उतर गया या मैं उतारूँ?

मैं शर्मिंदा था। माफी मांगी। उस जमाने में फोन सहज उपलब्ध नहीं थे। रात में डीटीपी के साथियों की मदद से घर फोन किया तो वहाँ की सारी जानकारी जुटाई और अपनी मूर्खता का एहसास हुआ। वह दिन है और आज। 30 वर्ष हो गए। फिर कभी भाँग या कोई नशा नहीं किया।

बताते हैं कि अगर भाँग सिल-बट्टे पर ठीक से पिसी हो और उसे ठण्डाई में मिलाकर पी लिया जाए तो लगभग 36 घण्टे तक उसका असर रह सकता है। मेरे साथ तो रहा ही है। इसलिए होली संभल कर खेलें। भाँग पियें तो अपने जोखिम पर। जरा सी चूक से घर-परिवार संकट में पड़ सकता है।

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