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साहित्य

सुप्रीम कोर्ट और सरकार का चरित्र समझने के लिए 2018 में छपी ये किताब पढ़नी जरूरी है!

जितेंद्र कुमार-

कल सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपंकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ काफी भयावह टिप्पणी की है. राहुल गांधी ने 2022 में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान नरेन्द्र मोदी पर आरोप लगाया था कि चीन ने भारत के 2000 वर्ग किलोमीटर पर कब्जा कर लिया है. इसपर सुप्रीम कोर्ट के दोनों जजों ने पूछा कि आपकी कितनी विश्वसनीयता है? कोई भी सच्चा भारतीय ऐसा नहीं कहेगा! मतलब सुप्रीम कोर्ट यह तय कर लेना चाहता है कि कौन भारतीय क्या कहकर सच्चा साबित हो सकता है!

सुप्रीम कोर्ट और सरकार के चरित्र को समझने के लिए 2018 में छपी “हाउ डेमोक्रेसीज़ डाई” हार्वर्ड विश्वविद्यालय के राजनीति वैज्ञानिक स्टीवन लेवित्सकी और डैनियल जिब्लाट द्वारा लिखी गई तुलनात्मक राजनीति की किताब है, को पढ़ने की जरूरत है. यह किताब लोकतांत्रिक मूल्यों के धीरे-धीरे क्षरण होने और लोकतात्रिक प्रक्रिया से चुने हुए नेता कैसे अपनी ताकत बढ़ाने और सत्ता को नियंत्रित करने के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमज़ोर करते हैं, इसके बारे में है. इसमें वेनेजुएला, रूस, तुर्की, थाईलैंड, हंगरी और पोलैंड जैसे देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं का विश्लेषण है. साथ ही, डोनाल्ड ट्रम्प के पहले कार्यकाल के बारे में भी कई कड़ी चेतावनी शामिल है जिसमें लेखकद्वय की राय है कि यह अमेरिकी लोकतंत्र के लिए ख़तरा है.

“हाउ डेमोक्रेसीज़ डाई” विभिन्न देशों के ऐसे उदाहरणों का हवाला देती है जहां “आपसी सहिष्णुता” का पतन हुआ, साथ ही विपक्ष की “राजनीतिक वैधता” के प्रति “सम्मान” भी कम होता गया. सहिष्णुता को लेखक कुछ इस तरह परिभाषित करते हैं कि जब विपक्ष जीतता है तो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के परिणामों को स्वीकार करने की बजाय चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने को बेबुनियाद और आत्मरोदन करार देता है और उपहास उड़ाते हुए यहां तक कहता है कि विपक्षी दल चुनावी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की बात करते थे लेकिन जीत गए तो चुप्पी लगा गए हैं. लेखकद्वय ने लिखा है कि सत्ता पक्ष विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा किसी भी सवाल को उसकी देशभक्ति से जोड़ देता है और इसे देश पर हमला करार देते हुए बताता है कि यदि वे लोग सत्ता में आएगें तो देश को बर्बाद कर देंगे!

भारत के मशहूर वकील प्रशांत भूषण पर जस्टिस अरुण मिश्रा ने जब ‘कंपेप्ट ऑफ कोर्ट’ का मामला चलाया तो प्रशांत भूषण ने अपनी दलील में इस किताब के कई अंशों को शामिल किया था. अंततः प्रशांत भूषण को आंशिक रुप से राहत मिली (हालांकि एक रुपया का जुर्माना लगा ही दिया गया). लेकिन इस बात को हमें नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें यह राहत इसलिए मिली क्योंकि वह प्रशांत भूषण थे, हम-आप होते तो लटका दिए गए होते या जाते!

देर से ही सही, इस किताब का अनुवाद “लोकतंत्र की चौकीदारी” के नाम से बाजार में आ गयी है जिसका अनुवाद प्रिय मित्र अभिषेक श्रीवास्तव ने किया है जिसे राजकमल प्रकाशन ने छापा है.

इस किताब को पढ़ने से आपको पता चलेगा कि जो काम वेनेजुएला, रूस, तुर्की, थाईलैंड, हंगरी, पोलैंड और अमेरिका में सरकार कर रही है, वह काम तो अपने भारत में बहुत तेजी से लंबे समय से हो रहा है और इसमें नरेन्द्र मोदी ने सत्ता पर काबिज होने के बाद रफ्तार दे दी है.

यह किताब अनिवार्य रुप हर समझदार व्यक्ति को पढ़ने की जरूरत है जिससे कि समझ में आए कि कैसे भारत में भी उसी पैटर्न पर सबकुछ कैसे नियंत्रित किया जा रहा है और जनता को कैसे हाशिए से भी बाहर निकाला जा रहा है.


मैं राहुल गांधी का फैन नहीं हूँ…उन्हें पप्पू टाइप ही मानता रहा हूँ. राहुल का कोई भाषण मैंने दो तीन मिनट से ज़्यादा शायद ही सुना हो.

इरिटेशन होने लगती है.

लेकिन जिस तरह से उन्हें चारों तरफ़ से घेरा जा रहा है उसे देखकर लगता है सत्ता राहुल से घबराई हुई है.

लोकसभा में समूचे विपक्ष के सर्वमान्य नेता को हड़काते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया वो वास्तव में आश्चर्यजनक है.

मुझे लगता है राहुल अपने समय की सबसे कड़ी और ख़तरनाक लड़ाई लड़ रहे हैं. मेरा समर्थन भले ही हो या ना हो, सहानुभूति राहुल के साथ है. इतनी घेराबंदी तो इंदिरा गांधी की भी नहीं हुई थी.

-प्रभात डबराल

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1 Comment

1 Comment

  1. RAJ SHEKHAR

    August 5, 2025 at 5:13 pm

    ये बातें पश्चिम औऱ शिक्षित देशों के लिए सही है। लेकिन भारत जैसे देशों के लिए यह महज हवाहवाई है।कश्मीर की बहुमत जनता यों कहें 90 फीसद से भी ज्यादा जनता (मुस्लिम) हिंदुओं को वहां से भगानेे के पक्ष में थी और अभी भी है। क्या इस जनता की राय को मान लेनी चाहिए या इलाज की जरूरत है। कुछ मूर्ख लोकतंत्र प्रेमी कह सकते हैं अगर 90 फीसदी जनता हिंदुओं को वहां रहने के खिलाफ है तो वहां से हिंदुओं को भगा देना चाहिए। बहुमत का तो यही मत है।
    इसी तरह कोई आतंकवादी मारा जाता है उसके जनाजे में लाखों लोग शामिल होते हैं। इस जनता की राय के बारे में क्या कहेंगे।जनता की राय, लोकतंत्र की एक सीमा होती है। जरा भी छूट मिलते ही यह कश्मीर जैसी राय बनाने लगती है। 

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