Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

आज के अखबार : ‘….हम जल्दबाजी करना नहीं चाहते हैं’, में छिपा है जिसकी लाठी उसकी भैंस का ‘आदर्श’

संजय कुमार सिंह

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को किसी तरह हराकर सत्ता हथियाने पर आमादा भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव जीतने की हर संभव कोशिश की है। भले उसके पास अपना या पूरे संघ परिवार से ममता बनर्जी के खिलाफ योग्य उम्मीदवार नहीं है। मुख्य मंत्री को टक्कर दे रहे सुवेन्दु अधिकारी दो जगह से चुनाव लड़ रहे हैं। तृणमूल से ही भाजपा में आयातित हैं और बाबुल सुप्रियो भाजपा में जा चुके हैं। खुद ममता बनर्जी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में दो बार मंत्री रह चुकी हैं। ऐसे में राजनीति सेवा के लिए होती होगी यहां तो अमित शाह ने एलान कर रखा है कि ममता बनर्जी को हराने के लिए 15 दिन बंगाल में रहेंगे। भले भाजपा का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं है और भाजपा तथा उसके समर्थकों को रेखाओं से कोई दिक्कत नहीं होती है। ऐसे में पश्चिम बंगाल के लाखो वोटर इस बार वोट नहीं दे पाएंगे। दे भी दें तो उनमें से कोई चुनाव लड़ना चाहता हो तो उसकी क्या दशा होगी – समझा जा सकता है। हालांकि, हर वोटर समान नहीं है और द टेलीग्राफ की कल की एक खबर का शीर्षक था, सक्षम उम्मीदवार एसआईआर से पार पाया। लाखों लोगों के लिए यह मांग अविश्वसनीय है। बेहरामपुर डेटलाइन से आलमगिर हुसैन की खबर के अनुसार, रविवार को एसआईआर ट्रिब्यूनल ने दस्तावेजों की जांच के बाद कांग्रेस उम्मीदवार मेहताब शेख का नाम मुर्शिदाबाद के फरक्का स्थित उनके निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में बहाल करने का आदेश दिया। मेहताब बंगाल के पहले ऐसे मतदाता हैं जिनका नाम ट्रिब्यूनल द्वारा रद्द किया गया है। अब तक 19 ट्रिब्यूनलों में से किसी ने भी उनके मामले के अलावा किसी और मामले की सुनवाई नहीं की है। स्पष्ट रूप से इसका कारण “बुनियादी ढांचागत समस्याएं” हैं।

कांग्रेस उम्मीदवार और धनी ठेकेदार होने के कारण मेहताब ने दो अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। ट्रिब्यूनल को उनके मामले का शीघ्र निपटारा करने का आदेश जारी हुआ। चुनाव आयोग को पूर्ण सहयोग देने का निर्देश भी था। यह खबर सोमवार को छपी थी। इसके अनुसार, हटाए गए मतदाताओं की अनुमानित संख्या: 25 लाख थी जबकि ट्रिब्यूनलों द्वारा सुने गए मामलों की संख्या सिर्फ एक थी। शेष मामलों के निर्णय लेने के लिए चार दिन बाकी थे। द टेलीग्राफ की आज की खबर इसका फॉलो अप है। शीर्षक है, लाखो नाम हटाये गए, दो की सुनवाई हुई, अपील का अंतिम समय करीब है। वोट बनाए रखने की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, …. हम इसे जल्दबाजी में नहीं करना चाहते हैं। नई दिल्ली डेटलाइन से ब्यूरो की खबर इस प्रकार है, सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें 19 अपीलीय न्यायाधिकरणों को अंतरिम आदेश पारित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। मकसद था बाहर किए गए कुछ श्रेणी के मतदाताओं को मतदान करने की अनुमति दिलाना। कोर्ट ने कहा, “हम इसे जल्दबाजी में नहीं करना चाहते हैं।” राज्य सरकार ने अंतरिम राहत की मांग की थी, विशेष रूप से उन मतदाताओं के लिए जिन्हें मतदाता सूची से हटा दिया गया था लेकिन जो “मैप्ड” थे। (ये वो वोटर हैं जिनका पता चल गया है कि कहां से कहां आए हैं या इनका पिछला इतिहास मालूम है मतलब ये घुसपैठिये नहीं हैं) सरकार ने कथित तौर पर 20 लाख से अधिक मतदाताओं को बाहर किए जाने और न्यायाधिकरणों के पास सभी अपीलों के निपटारे के लिए समय की कमी का हवाला दिया था।

इस तरह मतदाता सूची और चुनाव का तो जो होना है सो होगा लेकिन सरकार का काम भी कम दिलचस्प नहीं है। आजतक डॉट इन की खबर के अनुसार, शनिवार को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि अगर भारत ने ‘नाटकीय साजिश के तहत कोई ऑपरेशन’ किया तो पाकिस्तान सीधे कोलकाता तक जाएगा। ख्वाजा आसिफ का दावा है कि उनके पास खबरें हैं कि भारत ऐसी कोई साजिश रच रहा है। इस पर ममता बनर्जी ने कहा है और आज यह दि एशियन एज में पहले पन्ने पर पांच कॉलम में छपा है। शीर्षक है, पाकिस्तान की धमकी पर प्रधानमंत्री की चुप्पी को लेकर ममता ने सवाल उठाए। इस खबर को भी आज प्रमुखता नहीं मिली है। मेरे तीनों हिन्दी अखबारों के साथ दि एशियन एज में प्रधानमंत्री का चुनाव प्रचार प्रमुखता से छपा है। पेश है उदाहरण – 1. अमर उजाला – समान नागरिक संहिता व एक राष्ट्र-एक चुनाव भाजपा का अगला मिशन :  मोदी। 2. देशबन्धु – कांग्रेस ने असम के साथ सौतेला व्यववहार किया 3. नवोदय टाइम्स – पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाती है कांग्रेस और 4. दि एशियन एज – असम को आत्मनिर्भर बनाइए, कांग्रेस को ‘ना’ कहिए : मतदाताओं से मोदी की अपील। जाहिर है, प्रधानमंत्री चुनाव में व्यस्त हैं। सुप्रीम कोर्ट को जल्दी नहीं है कि सभी वोटर इसी बार वोट दें। ऐसे में आज हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड है, पश्चिम बंगाल में तर्कसंगत विसंगतियों वाले 45 प्रतिशत नाम कट सकते हैं। मामला लाखों का है तो 45 प्रतिशत भी कुछ लाख में होगा ही। यानी खबर है कि पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में कुछ लाख वोटर वोट नहीं दे पाएंगे। जाहिर है, यह सामान्य नहीं है और पूरी संभावना है कि ऐसा जान-बूझकर किया गया है। जो काम घुसपैठियों को हटाने की आड़ में शुरू किया गया था उसमें लाखों वोटर लॉजिकल डिसक्रिपेंसी यानी तर्कसंगत विसंगतियों के नाम पर (सफलतापूर्वक) हटा दिए गए। घुसपैठियों की कोई चिन्ता नहीं है। घुसपैठियों का मामला होना भी नहीं था और हो भी तो पुराना है।

इस बार पश्चिम बंगाल में तर्कसंगत विसंगतियों के नाम पर हटाए गए – यह बड़ी खबर है फिर भी आज अखबारों में प्रमुखता से नहीं है। यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से जुड़ा है। पहले तो सरकार ने अपने चहेते अधिकारी की नियुक्ति की, फिर उनकी नियुक्ति के नियम से संबंधित मामले पर महीनों सुनवाई नहीं हुई। फेट अकम्पली हो गया तब मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वे इस मामले से खुद को अलग रखेंगे क्योंकि नियुक्ति करने वाले पैनल में मुख्य न्यायाधीश के भी होने की बात है। मुख्य चुनाव आयुक्त से शिकायत हो तो देश जो कर सकता है किया गया था और उनके खिलाफ महाभियोग का नोटिस दिया गया था। महाभियोग के नोटिस के बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त चुनाव करवा रहे थे। यही नहीं, अरविन्द केजरीवाल ने हाईकोर्ट में पेश होकर मांग की कि उनके खिलाफ मामला दूसरी बेंच को सौंपा जाए तो सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अदालत थिएटर करने की जगह नहीं है। मुझे याद आता है कि सोनम वांगचुक के मामले में जो आरोप लगाया गया, जिसके आधार पर सरकार और सरकारी वकीलों ने उनकी गिरफ्तारी और उनके जेल में रहने को जायज या जरूरी बताया वह आधार ही एक दिन धाराशायी हो गया। तब उन्होंने सरकार से ऐसा कुछ कहा हो, मैंने नहीं सुना या पढ़ा।

जहां तक मोदी सरकार, कानून व्यवस्था, डबल इंजन वाली सरकार और जनता की दशा-दिशा की बात है, राहुल गांधी आरोप लगाते रहे हैं कि केरल में भाजपा-माकपा एक हो गई है। कारण सोने की तस्करी का एक मामला है। इसमें मुख्यमंत्री कार्यालय के लोगों के शामिल होने और उसकी जांच केंद्रीय एजेंसी से चलने का भी उदाहरण है। ऐसे में मुख्यमंत्री भाजपा से कंप्रोमाइज्ड हों तो कहा नहीं जा सकता है। तथ्य या खबर यह भी थी कि तस्करी की आरोपी, मुख्य मंत्री कार्यालय की महिला अधिकारी अब आरएसएस के एनजीओ में काम करती है। भले इससे कुछ साबित न होता हो तथ्य यह भी है कि जिस विदेशी अधिकारी के नाम से डिप्लोमैटिक बैग के जरिए तस्करी होती थी वे देश छोड़कर निकल चुके हैं। इसलिए मामला मिलीभगत का भी हो सकता है। क्या है पता नहीं है और भाजपा-माकपा गठजोड़ की खबर को महत्व नहीं मिलता है। आज इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, मुख्यमंत्री पिनयारी विजयन ने प्रचार के अंतिम दौर में अपने ही चुनाव क्षेत्र में प्रचार किया। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के अनुसार, देहरादून में एक महिला ने 18 महीने में अपने बेटे की मौत के सबूत जुटाए और पुलिस को मजबूर किया कि वह बेटे की मौत के मामले की जांच फिर से शुरू करे और पता लगाए कि सड़क दुर्घटना का मामला कहकर बंद कर दी गई फाइल, हत्या की तो नहीं है। पुलिस के काम न करने, सहयोग नहीं करने और परेशान करने के ढेरों मामले हैं। इसीलिए यह माना जाता है और महसूस होता है कि लोग शिकायत नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें पुलिस से कोई उम्मीद नहीं होती है।

द हिन्दू में फोटो के साथ तीन कॉलम में छपी एक खबर है, तमिलनाडु में हिरासत में मौत के मामले में नौ पुलिसवालों को मौत की सजा। यह कोविड लॉकडाउन के समय हुआ था। जून 2020 में लॉक डाउन के समय मोबाइल फोन की बिक्री और सर्विस शो रूम को खुला रखने के आरोप में पुलिस ने पिता पुत्र को गिरफ्तार किया था। बाद में इनकी मौत हो गई थी और हिरासत में मौत के इस मामले में नौ पुलिस वाले दोषी पाए गए थे जिन्हें अब सजा हुई है। तमिलनाडु में डबल इंजन की सरकार नहीं है, पीड़ितों को सरकारी मदद मिली या नहीं मिली मुझे पता नहीं है लेकिन सीबीआई की जांच में पुलिस वालों को सजा हो गई जबकि संदेशखली हो या केरल का सोने की तस्करी का मामला अभी नहीं निपटा है। इस खबर को भी दिल्ली के अखबारों में वैसी प्रमुखता नहीं मिली है जैसी मिलनी चाहिए थी। आपको याद होगा,  फरवरी 2026 में, एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक, “एक्सप्लोरिंग सोसाइटी : इंडिया एंड बेयांड” में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ नामक अध्याय पर गंभीर विवाद हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने इसे न्यायपालिका की छवि खराब करने वाला मानते हुए इसके प्रकाशन और वितरण पर रोक लगा दी और किताब को वापस लेना पड़ा। आज एक खबर है, सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू के परिवार के सदस्यों की कंपनियों को दिए गए सरकारी ठेकों की सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं। खबर है कि 10 वर्षों में सीएम खांडू के परिवार से जुड़ी चार कंपनियों को करीब 1270 करोड़ रुपए के सरकारी ठेके और कार्यादेश दिए गए हैं। मुझे लगता है कि यह पहले ही महीने या पहले ही आदेश के बाद रुक जाना चाहिए था और नहीं रुखा तो सुप्रीम कोर्ट का आदेश दूसरे ही महीने हो जाना चाहिए था। संवतः संज्ञान लेने का प्रावधान है ही। लेकिन तब यह नहीं कहा जाता था कि इस बार वोट नहीं दे पाए तो कोई बात नहीं, अगली बार दे पाओगे या मतदाता सूची में नाम नहीं है तो नागरिक अधिकारों में कमी नहीं आएगी। अगर वोट देने का अधिकार टाला जा सकता है तो भ्रष्टाचार की जांच का मामला भी टलता रहेगा। यह व्यवस्था है और मामला सिस्टम का है जो एक व्यक्ति के कारण ऐसा हो गया है। पर वह अलग मुद्दा है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन