आम लोगों के लिए कमाई के अवसर घटते जा रहे हैं। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि नौकरीपेशा लोगों की जेब में भी बचत की जगह कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर निवेश लगातार घट रहा है, और सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ कमज़ोर की जा रही हैं…
जयराम रमेश-
एक के बाद एक रिपोर्ट भारत में धन के व्यापक केंद्रीकरण के बारे में आगाह कर रही है। एक तरफ करोड़ों भारतीय रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सिर्फ़ 1687 लोगों के पास देश की आधी दौलत है।
मोदी सरकार-प्रेरित आर्थिक नीतियों के कारण धन का इतना बड़ा केंद्रीकरण हमारे देश में विकराल आर्थिक असमानता पैदा कर रहा है। यही असमानता व्यापक सामाजिक असुरक्षा और असंतोष को जन्म दे रही है।
अन्य देशों में हाल की तारीखें गवाह हैं कि यही घनघोर आर्थिक असमानता और पंगु लोकतांत्रिक संस्थाएँ राजनीतिक अराजकता पैदा करने में कैटलिस्ट बनी हैं।
इस सरकार द्वारा भारत को भी उसी रास्ते पर धकेला जा रहा है।
सत्ता के गठजोड़ से चंद उद्योगपति अमीर और अमीर होते जा रहे हैं। प्रधानमंत्री की नीतियाँ उनके चंद उद्योगपति मित्रों के फायदे के लिए ही केंद्रित हैं।
भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़, MSME क्षेत्र, अभूतपूर्व दबाव में है। यह दबाव केवल घरेलू नीतियों का ही नहीं, बल्कि विदेश नीति की असफलताओं का भी नतीजा है।
आम लोगों के लिए कमाई के अवसर घटते जा रहे हैं। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि नौकरीपेशा लोगों की जेब में भी बचत की जगह कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर निवेश लगातार घट रहा है, और सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ कमज़ोर की जा रही हैं।
मनरेगा जैसी सफल योजनाएँ, जिन्होंने करोड़ों लोगों को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का जाल मुहैया कराया था, आज वेतन संकट से जूझ रही हैं। श्रमिकों को समय पर भुगतान तक नहीं हो रहा।
धन का इतना घोर केंद्रीकरण केवल अर्थव्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा हमला है। जब आर्थिक शक्ति मुट्ठीभर हाथों में सिमट जाती है, तो राजनीतिक निर्णय भी उन्हीं के हित में होने लगते हैं।
इसके चलते सामाजिक और आर्थिक असमानता का दायरा लगातार बढ़ रहा है। नतीजा यह हो रहा है कि देश के करोड़ों नागरिक धीरे-धीरे लोकतंत्र और विकास की प्रक्रिया से बाहर किए जा रहे हैं।
लेखक वरिष्ठ कांग्रेस नेता हैं।
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