विजय मनोहर तिवारी-
इंडिया टुडे के 50 वर्ष… आप घटनाओं में क्या देखते हैं? या केवल घटनाएँ ही देखते हैं?
भारी-भरकम विज्ञापनों के वजनदार रंगबिरंगे पहाड़ी पृष्ठों से लबालब “इंडिया टुडे’ का 346 पृष्ठों का विशेषांक 50 साल के प्रसंग पर है। इसमें कोई दो मत नहीं कि 1975 में इमरजेंसी के समय छपना शुरू हुई इस पाक्षिक पत्रिका ने भारतीय पत्रकारिता में एक आकर्षक मकाम बनाया। पहले अंग्रेजी और फिर हिंदी में साप्ताहिक अंतराल से छपी “इंडिया टुडे’ पेशेवर कामयाबी की भी एक मिसाल है।
“इंडिया टुडे’ ने इस अंक में अपनी 50 साल की यात्रा को एक-एक दशक में बदलते भारत की तस्वीर के साथ पिरोया-पेश किया है। इसलिए नेहरू के अवसान के बाद उनकी बेटी इंदिरा गाँधी के हाथ में आई सत्ता के निरंकुश होने से यह कहानी शुरू होती है, जो राजीव गाँधी की शपथ से होकर पीवी नरसिंहराव और मनमोहन सिंह जैसे “परिवार के लिए सुविधाजनक’ प्रधानमंत्रियों को आगे करते हुए नरेंद्र मोदी के भारत तक आती है।
15 दिसंबर 1975 के पहले अंक से ही “इंडिया टुडे’ के लिए चुने गए दिलीप बॉब ने 2010 में मैनेजिंग एडिटर के रूप में इसे छोड़ा और इन 35 वर्षों को अपने पत्रकारीय करिअर के सबसे बेहतरीन साल माना है। वे कहते हैं कि तत्कालीन संपादक मधु त्रेहान सारी स्टोरी की प्रतियाँ लेकर सेंसर कार्यालय पहुंची, जहाँ ब्यूरोक्रेट आपत्तिजनक सामग्री की पड़ताल के लिए नीली पेंसिल लेकर एक-एक शब्द बारीकी से पढ़ते। पत्रिका को विदेश में बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसलिए पहले अंक की सारी प्रतियाँ भारतीय बाजार में उतार दी गईं।
संजय गाँधी के लिए उनके शब्द हैं-“बिना किसी आधिकारिक पद के 17 महीनों तक देश पर अपना शासन चलाया, मंत्रियों को कठपुतली बना दिया और भारत की संवैधानिक नींव को लगभग हिलाकर रख दिया।’
जनता पार्टी से हारने के बाद एक दिन इंडिया टुडे की टीम इंदिरा गाँधी के घर गई। संजय गाँधी की पत्नी मेनका बरामदे में खड़ी थीं। उन्होंने खासे रूखे लहजे में पूछा कि हम किस मीडिया संस्थान से हैं। जैसे ही उन्हें बताया गया कि हम कहाँ से हैं तो मेनका गार्ड पर चिल्लाईं, इन इंडिया टुडे वालों को बाहर निकालो। इमरजेंसी के संदर्भ में अपने समय के दूसरे तानाशाहों पोलपोल और पिनाशे की तुलना में इंदिरा गाँधी को नरम तानाशाह कहा गया है।
शेखर गुप्ता तब रहे जब राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने। यह 1985 से शुरू होने वाला दशक था। राजीव के समय सेक्युलर राजनीति का पर्दाफाश करने वाला शाहबानो केस सामने आता है। वे लिखते हैं-सुप्रीम कोर्ट ने 67 वर्षीय शाहबानों के पक्ष में फैसला सुनाया। इंदौर की वह बुजुर्ग मुस्लिम महिला की काजल लगी आँखें राष्ट्रीय अखबारों में छा गईं। शाहबानो ने अपने समुदाय के मौलानाओं को चुनौती देने का असाधारण साहस दिखाया लेकिन दून स्कूल से शिक्षित अभिजात पृष्ठभूमि के नेता पूरी तरह झुक गए। संसद में कानून लाकर अदालत के फैसले को निष्प्रभावी कर दिया। आज भी वह फैसला “मुस्लिम तुष्टीकरण’ की मिसाल बना हुआ है। हालात हाथ से ऐसे निकले कि चार दशक बाद भी उनकी पार्टी का संभलना अभी बाकी है।
राजीव गाँधी की हत्या के बाद नरसिंहराव के चयन पर लिखा है- इंदिरा और राजीव के केबिनेट में रहते हुए जिसने कभी अपनी आवाज नहीं उठाई थी। वह पुराना खादी पहनने वाला कांग्रेसी सुरक्षित विकल्प लगा। भरोसा था कि वे कुछ नहीं करेंगे। आरोपों की बौछार के साथ जब उन्हें हटाया गया, तब भी लोग यह नहीं समझ पाए थे कि उन्होंने पहले ही उनकी दुनिया बदल दी थी।
दिसंबर 1992 में बाबरी ढाँचे के ढहने पर इंडिया टुडे की कवर स्टोरी है-“कलंकित हुआ सारा देश।’ रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होने पर इंडिया टुडे की कवर स्टोरी का शीर्षक है-“आई हिंदु पुनरुत्थान की बेला।’ अयोध्या की कहानी के दो सिरों पर ये दो सुर्खियाँ मीडिया की भी एक कहानी कहती हैं। “आप घटनाओं में क्या देखते हैं? या केवल घटनाएँ ही देखते हैं?’
अगले दशक में प्रभु चावला आते हैं, जब खिचड़ी सरकारों का समझौतावादी समय आया। 1998 में अजित नैनन का एक कार्टून है, जिसमें पसीना-पसीना अटल बिहारी वाजपेयी लंबे पटाखों की कुर्सी पर बैठे हैं। बत्तियाँ लगे हुए सभी पटाखों में उनके सहयोगी दल के नेताओं ममता, चंद्रबाबू, जयललिता के चेहरे हैं। कोई कभी भी फट सकता है। अटलजी के माथे से पसीना टपक रहा है।
1997 में इंद्रकुमार गुजराल को नैनन ने गाँधीजी की तरह धोती लपेटकर मार्च करते हुए दिखाया है। एक तख्ती हाथ में लिए, जिस पर लिखा है- Corruption HALT MARCH। सबसे पीछे सीताराम केसरी के हाथ में वह घिर्री है, जिससे निकली रस्सी आगे जाते गुजराल की कमर से बंधी है और दोनों के बीच पीएमओ, आईबी, सीबीआई, ईडी और सीवीसी नजर आ रही हैं। यह चारा घोटाले के खुलासों का समय था। यह वही समय था जब 24 घंटे का सैटेलाइट चैनल आज तक आया 31 दिसंबर सन 2000 को।
मनमोहन सिंह के समय में राहुल गाँधी पर तीन कवर स्टोरी के शीर्षक उनके ऊपर आने और फिर चुनावी सीढ़ियों पर पार्टी को लगातार नीचे उतरता हुआ दिखाते हैं- 2005 में ताजपोशी की तैयारी, 2012 में आक्रामक अगुआ और 2014 में पार्टी पर भारी।
रविशंकर के दो कार्टून मनमोहन सिंह पर हैं। दोनों में उन्हें सोनिया गाँधी के हाथ की कठपुतली बनाकर चित्रित किया गया है। इस दौरान नक्सली और आतंकी हमलों से भारत के रक्तरंजित होने और आर्थिक घोटालों की कई कवर स्टोरियाँ बताती हैं कि यूपीए के समय भारत कहाँ और कैसे लड़खड़ाया हुआ था? सत्ता के शिखर पर एक कमजोर का चुनाव, राजनीतिक चालबाजी के गुणागणित से पार्टी या परिवार के लिए भले ही अनुकूल रहा हो मगर अपने स्वार्थ के लिए वह देश को दुर्बल बनाने वाली आत्मघाती चाल थी।
यह दशक बीतते-बीतते नरेंद्र मोदी फलक पर आ जाते हैं और इंडिया टुडे के अनुसार यह दशक “एक मुखर भारत’ का दशक है, जिसे 2024 में इंडिया टुडे की सुर्खी मिलती है- हिंदुत्व की नई प्राण प्रतिष्ठा। यहाँ से नजर आती हैं- नक्सलवाद का खेल खत्म होने की सुर्खियाँ, सौगातों का दौर, आत्मनिर्भर बनने का सफर, विश्व के मित्र, इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए बेमिसाल भारत और इंडिया गठबंधन के रूप में कमाल का झमेला।


