दयाशंकर मिश्रा-
इंडियन एक्सप्रेस, आज तानाशाही के ख़िलाफ़ घुटनों के बल क्यों बैठा हुआ है! 50 साल पहले जो अख़बार, इमरजेंसी के ख़िलाफ़ खड़ा हुआ था, अब उसकी चुप्पी पाठकों को परेशान करती है। अख़बार में ख़बर और संपादकीय की धार गुम है। कभी-कभी जो ख़बरें आप को भरमाने के लिए छापी जाती हैं, उसका कारण जानने के लिए आपको नॉम चोम्स्की के पास जाना होगा!
बीते 11 वर्षों में अख़बार एक बार सरकार के सामने खड़े होने की हिम्मत जुटाते नहीं दिखा। हाँ, हमने जज लोया की मौत पर एक्सप्रेस की वह रिपोर्ट ज़रूर पढ़ी, जिसने भावी प्रधानमंत्री को संदेह से परे करने का काम किया।
सरकार के दावों को अपनी सुर्खियों के रंग में रंगने का काम किया। इसलिए, पाठक का सवाल है, आज ‘साहस’ की स्याही सूख क्यों गई! अख़बार संघ और सांप्रदायिकता के सामने समर्पित नज़र आया, क्यों! इस रहस्य के लिए 2004 से 2014 की अख़बार की कतरने पलटने की ज़रूरत है।
अख़बार के कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की सतत मौजूदगी बताती है; नाराज़गी का कोई सबब नहीं है। 50 साल पहले जो पेज ख़ाली छोड़ा गया था, अब वही पेज सरकार, संघ की सांप्रदायिकता को समर्पित कर दिया गया हैं। ‘अमृत’काल आते ही इंडियन एक्सप्रेस ने अपने संपादकीय – विचार पेज को BJP और संघ के नेताओं को लेखक बनाने में समर्पित कर दिया है।
‘द वायर’, ‘न्यूज़ लॉन्ड्री’ और ‘न्यूज़ क्लिक’ से लेकर दैनिक भास्कर, गुजरात समाचार और भारत समाचार तक पर ED-CBI-INCOME TAX के छापे पड़े। नौबत यहाँ तक आई; ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ को भी नोटिस मिल गया, लेकिन ‘साहस’ की पत्रकारिता वाला ‘इंडियन एक्सप्रेस’ बचा रहा।
यूट्यूब तक पर बोलने वालों के पीछे क़ानून और समाचार एजेंसी के कॉपीराइट ‘टूल’ को दौड़ा दिया गया है। बस, इंडियन एक्सप्रेस सबसे परे है। उसके दफ़्तर की सीढ़ियों पर चढ़ने की हिम्मत किसी क़ानून की नहीं होती, यह कैसा रहस्य है! लोकतंत्र रहस्य में ज़िंदा नहीं रहते। रहस्य में तानाशाही फलती-फूलती है!
वेब सीरीज़ ‘सेक्रेड गेम्स’ का एक लोकप्रिय डायलॉग था; ‘बस, त्रिवेदी बचेगा!’ क्या, इंडियन एक्सप्रेस वही त्रिवेदी है! इंडियन एक्सप्रेस के इस प्राचीन पाठक की टिप्पणी से आप सहमत हैं तो इसे दूसरे पाठकों तक पहुँचाने में मदद करें। हमारी पहुँच सीमित है।


