
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों की खबरों की चर्चा करने से पहले यह याद करना महत्वपूर्ण है कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने के बहुप्रचारित और महान कार्य के पांच साल पूरे हो चुके हैं। इससे संबंधित आदेश में टाइपिंग और हिज्जे की इतनी गलतियां थीं कि उन्हें सुधारने के लिए अलग से आदेश निकाला गया था। पर पांच साल बाद भी सरकार कश्मीर में चुनाव नहीं करवा पाई है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए जो अंतिम सीमा तय की थी वह भी करीब है। तब आज के अखबारों में इस पर पहले पन्ने की खबर सिर्फ हिन्दुस्तान टाइम्स में है। इंडियन एक्सप्रेस ने इसपर खास खबर की है और लगभग 70 प्रतिशत पन्ने पर विज्ञापन होने के बावजूद पांच कॉलम में अपनी रिपोर्ट का पहला हिस्सा छापा है। शीर्षक में जो हाल है वह बताया गया है और साथ में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का इंटरव्यू भी है। इसका शीर्षक है, प्रगति हुई है, राज भवन केंद्र शासित प्रदेश की निर्वाचित सरकार के साथ अच्छे संतुलन के पक्ष में है। आपको याद होगा, इंडियन एक्सप्रेस में ही हाल में देश भर के राज्यपालों के सम्मेलन से संबंधित खबरें छपी थीं।
नवोदय टाइम्स में आज छपी एक खबर के अनुसार, सम्मेलन में भाग लेने दिल्ली आये पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने कहा है कि ‘निष्क्रिय’ राज्यपाल की अवधारणा खत्म हो गई है। निर्वाचित मुख्यमंत्री को सरकार का अग्रणी चेहरा होना चाहिये जबकि मनोनीत राज्यपाल को निर्वाचित प्रतनिधियों के मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक के रूप में पृष्ठभूमि में रहना चाहिये। यह सोच तब है जब राज्यपाल के खिलाफ राजभवन की महिला कर्मचारी ने यौन उत्पीड़न की शिकायत की है पर कार्रवाई नहीं हो रही है क्योंकि राज्यपाल को संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है और इसपर सुप्रीम कोर्ट में विचार होना है। पर यह सब अलग मुद्दा है।
मुख्य बात है कि भाजपा सरकार के इतने महत्वपूर्ण निर्णयों और विचारों किसी एक अखबार में थोड़ी सी जगह मिल रही है। मुख्यमंत्रियों की बात की जाये तो एक जेल में हैं, एक जेल हो आये हैं, विपक्षी नेताओं, मंत्रियों की तो गिनती ही नहीं है। वाशिंग मशीन पार्टी के बुलडोजर मुख्यमंत्री अपनी चला रहे हैं और आज असम के मुख्यमंत्री अखबारों में छाये हुए हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इनकी बातों को सबसे प्रमुखता से छापा है। उन्होंने एलान किया है, लव जिहाद के लिए उम्र कैद का कानून और भूमि जिहाद को रोकने के लिए एक और कानून लायेंगे। यही नहीं, सिर्फ असम में जन्मे लोगों को राज्य में सरकारी नौकरी मिलेगी। एक तरफ सरकार ऑल वेदर चार धाम रोड बनवा रही है दूसरी ओर जो पहले से बने हुए हैं अक्सर कट जाते हैं।

आप जानते हैं कि कश्मीर को दो हिस्सों में बांट कर केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया था और इसका इतना विरोध हुआ कि भाजपा को लोकसभा चुनाव लड़ने की जरूरत ही नहीं महसूस हुई। दूसरी ओर इससे चीन भी नाराज हुआ था और इसका कारण 2017 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से ठीक पहले चारधाम राजमार्ग विकास योजना की शुरुआत भी था। इसे ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट भी कहा जाता है। इसका उद्देश्य उत्तराखंड स्थित चार धामों – केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम की यात्रा को सुगम और सुरक्षित बनाना तो है ही इसका संबंध देश की सुरक्षा से भी जुड़ा बताया गया है। इन सब और दूसरे कारणों से गलवान में चीनी सैनिकों से झड़प में भारतीय सेना के 20 जवान मारे गये थे। इनमें 16 बिहार के थे और उसके कुछ ही बाद बिहार में चुनाव थे।
इसी झड़प के बाद, “ना कोई हमारी सीमा में घुस आया है, ना ही कोई घुसा हुआ है” का मशहूर बयान आया था और ऑल वेदर रोड का फायदा चाहे जो हो, नुकसान समझ में आने लगा था और यह प्रकृति से छेड़छाड़ का मामला था। इसकी जरूरत और व्यावहारिकता पर किसी खास चर्चा के बिना इसकी शुरुआत हुई। और तमाम घटनाओं में सबसे मशहूर हुआ टनल में मजदूरों का फंस जाना। उन्हें 17 दिनों बाद निकाला जा सका। बाद में टनल बनाने वाली कंपनी के इलेक्टोरल बांड के रिश्ते भी चर्चा में आये पर अब जब देश के कई राज्यों में कुदरत का कहर बरपा है, केदानाथ में 400 यात्री फंसे हैं और हिमाचल प्रदेश में 13 मौतों की पुष्टि के बाद चौथे दिन पांच शव मिलने की खबर है। वायनाड का मामला आप जानते हैं। इस बीच आज हिन्दुस्तान टाइम्स में खबर है कि हाइड्रो परियोजनाओं के लिए प्राथमिक ड्रिलिंग को अब वन विभाग के क्लीयरेंस से मुक्त कर दिया गया है।
एफसीआरए और पर्यावरण
इस तरह की मुक्ति लाल फीताशाही खत्म करने के नाम पर दी जाती है हालांकि मुझे लगता है कि इसकी कोई जरूरत नहीं है। हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए ड्रिलिंग कोई ऐरा-गरा करेगा नहीं, जो करेगा तो उसका आधार होहा और यह सपना आने जैसा नहीं होगा तो क्लियरेंस लेने का नियम बने रहने देने में कोई बुराई नहीं थी। लेने वाला कौन है उसका असर होगा ही और उस हिसाब में इसमें तेजी या जल्दी हो सकती थी और वह वाजिब है। ऐसे में इसमें तो छूट दी गई है लेकिन सरकार चाहती है कि सोशल मीडिया पर लिखने वालों और यू ट्यूब पर वीडियो बनाने वाले लाइसेंस लें अनुमति मांगें और तब काम करें। कहने की जरूरत नहीं है कि इसका मकसद सरकार के खिलाफ हो सकने वाली खबरों को रोकना ही है। मीडिया का जो हाल है उसमें यह व्यवस्था सरकार अपनी सुरक्षा के लिए करना चाहती है और यह एफसीआरए नियमों को सख्त बनाने के बाद का प्रयास है। इसके बार में कल ही लिख चुका हूं। इसका नुकसान यह है कि सरकार महात्मा गांधी पर अनुसंधान के लिए विदेशी सहायता लेने की इच्छुक तो नहीं है, पैसे की कमी के कारण रेल यात्रा को सुरक्षित बनाने के लिए ‘कवच’ की व्यवस्था नहीं हो रही है पर सरकार अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक हर उपाय कर रही है जो घोषित इमरजेंसी से बुरी है पर आलोचना 50 साल पुरानी इमरजेंसी की कर रही है और उसके समर्थक चाहते हैं कि 2016 की नोटबंदी की चर्चा नहीं हो।
ऑल वेदर रोड और जो पहले से हैं
देश के कई राज्यों में कुदरत का कहर जारी है। उत्तराखंड की केदारघाटी में अब भी बड़ी संख्या में यात्री फंसे हैं। सेना राहत एवं बचाव कार्य में जुटी है। जम्मू-कश्मीर में भूस्खलन की वजह से श्रीनगर-लेह राजमार्ग बंद हो गया है। हिमाचल प्रदेश में भी प्रकृति का रौद्र रूप देखने को मिल रहा है। यहां बाढ़ में मरने वालों की संख्या 14 हो गई है। केरल ने हाल के वायनाड हादसे को राष्ट्रीय आपदा का दर्जा देने की मांग की है (द हिन्दू)। मध्य प्रदेश मे दीवार गिरने से नौ बच्चों की मौत हो गई है। यह हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड है। अमर उजाला के अनुसार, कश्मीर के गांदरबल में फटा बादल, श्रीनगर-लेह राजमार्ग घंटों ठप रहा। उत्तराखंड से अब तक 17,000 लोगों को निकाला गया है। हिमाचल प्रदेश में 45 लापता लोगों की तलाश जारी है और पांच राज्यों में भारी बारिश का रेड अलर्ट जारी किया गया है। इन सबके साथ अमर उजाला संवाद की खबर भी है।
इसके अनुसार मुख्यमंत्री, पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि पर्यावरण संतुलन के साथ विकास प्राथमिकता है। लेकिन विकास के लिए अध्ययन की आवश्यकता है इसपर संवाद भी नहीं हो सकता है। मांग करना, जरूरत बताना सरकार के निर्बाध काम में रोड़ा अटकाना है। और ताली-थाली बजाने वाली जनता से इसकी उम्मीद बेमानी है। इसीलिए और शायद इसलिए भी कि ईवीएम ‘जिन्दा’ है, केंद्रीय गृहमंत्री ने कहा है, 2029 में फिर बनेगी राजग सरकार। नवोदय टाइम्स ने इसे पांच कॉलम में बॉटम बनाया है। दिलचस्प यह भी है कि यह दावा उन्होंने चंडीगढ़ में किया है। मनीमाजरा में चौबीस घंटे जलापूर्ति सुनिश्चित करने वाली परियोजना का उद्घाटन करने के बाद वे एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे।
मांस, मछली, मुजरे के बाद मनीमाजरा
इसमें उन्होंने कहा कि 10 साल का कार्यकाल स्वर्णाक्षरों में अंकित होगा। इसमें उन्होंने सर्जिकल स्टाइक (300 आतंकवादी मारे जाने का दावा था पर आतंकवाद आज भी जारी है), एयर स्ट्राइक (अभिनंदन पाकिस्तान के कब्जे में रह गये थे, यह अपने आप में बड़ी चूक है पर पाकिस्तान ने छोड़ दिया इसे उपलब्धि बताना है), अनुच्छेद 370 (चर्चा ऊपर है), अयोध्या में राम मंदिर (निश्चित रूप से उपलब्धि है लेकिन तथ्य यह भी है कि अयोध्या हार गये और मुख्य न्यायाशीध को राज्यसभा में मनोनीत किया गया), रोड नेटवर्क (जरूर उपलब्धि है लेकिन दरार और धंसने के मामलों का क्या करें) और ब्रिटिश कालीन रेलवे स्टेशनों के स्वरूप परिवर्तन की चर्चा की। रेलवे के मामले में आप जानते हैं कि आम आदमी की सुविधायें खतम करके वंद भारत जैसी ट्रेन चलाई जा रही है जो बेहद महंगी है और इसके लिए सुरक्षा को किनारे रख दिया गया है। कवच जैसी सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद उपयोग नहीं की जा रही है। आज खबर है, विशाखापत्तनम में गोधरा की तरह ट्रेन में आग लग गई।
पहले ऐसा नहीं होता था और इस कल्पना पर मशहूर फिल्म, द बर्निंग ट्रेन गोधरा से भी पहले बनी थी। मेट्रो के डिब्बे में आग बुझाने वाला सिलेडर होता है पर रेलगाड़ी के सभी कोच में हो यह जरूरी नहीं है। सभी मॉल में अग्निशमन के उपाय होना जरूरी है पर प्लैटफॉर्म पर कुछ नहीं होता। फिर भी दावा है और खबर पांच कॉलम में छप रही है। ऐसी दिखावटी और हवाई उपलब्धियों से चुनाव जीतने और आगे भी जीतने का दावा करने पर ईवीएम की याद आती है। आप जानते हैं कि लोकसभा चुनाव में जितने वोट पड़े बताये गये उससे ज्यादा और कम वोट गिने जाने के मामले सामने आये हैं। इससे संबंधित सवालों के जवाब नहीं मिल रहे थे। आज खबर है कि चुनाव आयोग ने इस विश्लेषण को खारिज कर दिया है और कहा है कि चुनावों की प्रतिष्ठा को गिराने के लिए यह झूठा अभियान चलाया जा रहा है। हालांकि इसे मानने का कोई कारण नहीं है और सबको पता है कि चुनाव आयुक्तों का चुनाव (और इस्तीफा भी) कैसे हुआ था तथा ईवीएम को छोड़ बी दिया जाये तो प्रधानमंत्री के चुनावी भाषण कैसे थे और उनकी शिकायतों पर कार्रवाई के मामले में चुनाव आयोग कितना चुस्त और मुस्तैद था। निष्पक्ष तो वह नहीं ही नजर आया। फिर भी दावा कि चुनावों की प्रतिष्ठा गिर रही है।

पाठ्यपुस्तकों से संविधान की प्रस्तावना गायब
द टेलीग्राफ में नई दिल्ली डेटलाइन से बसंत कुमार मोहंती की बाइलाइन वाली खबर के अनुसार इस साल राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने कक्षा तीन और छह की कई पाठ्यपुस्तकों से संविधान की प्रस्तावना हटा दी है। कुछ पाठ्यपुस्तकों से उन चीज़ों को हटा दिया गया है जिन्हें “मुख्य शैक्षणिक विषय” माना जाता है। एनसीईआरटी ने 2005-06 और 2007-08 के बीच सभी कक्षाओं के लिए पाठ्यपुस्तकें प्रकाशित कीं थी। 2020 में एनडीए सरकार द्वारा नवीनतम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) की शुरूआत के बाद अब वह इन्हें संशोधित कर रही है। नई पुस्तकों में से संविधान की प्रस्तावना गायब है और खबर में इनका विवरण है। उदाहरण के लिए, एनसीईआरटी ने पर्यावरण अध्ययन पर तीन की जगह सिर्फ एक किताब प्रकाशित की है। एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड नामक इस पुस्तक में प्रस्तावना नहीं है, लेकिन मौलिक अधिकारों और मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख है। गणित की नई पुस्तक अभी उपलब्ध नहीं है। नई अंग्रेजी पाठ्यपुस्तक, पूर्वी में राष्ट्रगान है, जबकि संस्कृत पाठ, दीपकम में राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत दोनों हैं, लेकिन प्रस्तावना नहीं है। पहले की संस्कृत पुस्तक रुचिरा में भी प्रस्तावना नहीं थी। अखबार ने इस खबर के साथ प्रधानमंत्री की 7 जून की तस्वीर छापी है जो राजग की बैठक में संविधान को माथे लगाते हुए दिखाई गई थी। इसी बैठक में उन्होंने बताया था, …. मैंने पूछा कि ईवीएम जिन्दा है कि मर गया। आज उसपर भी खबर है।
आईआरसीटीसी और बीमा पोर्टल की लापरवाही द हिन्दू में आज छपी एक खबर के अनुसार आईआरसीटीसी ने बीमा पोर्टल पर डेटा उल्लंघन की महत्वपूर्ण आशंका को रोक दिया है। नोएडा के साइबर सुरक्षा शोधकर्ता नीलाभ राजपूत ने इस गड़बड़ी को पकड़ा। इससे यात्रियों के यात्रा विवरण उसकी जानकारी के बिना प्राप्त किया जा सकता था। यही नहीं, बीमा का धन प्राप्त करने के लिए नामांकित व्यक्ति को बदला भी जा सकता था। आईआरसीटीसी वेबसाइट पर ट्रेन टिकट बुक करने और यात्रा बीमा का विकल्प चुनने के बाद नीलाभ को बग का पता चला। उनने इसकी शिकायत 23 जुलाई 2024 को कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम – इंडिया (सीईआरटी-इन) से की और राहत की बात है कि 30 जुलाई 2024 को संबंधित संस्थान ने पुष्टि की कि इसे ठीक कर दिया गया है। निश्चित रूप से यह बड़ी लापरवाही थी और नहीं होनी चाहिये थी पर पकड़ी गई और सात दिन में ठीक हो गई यह भी कम नहीं है वरना ईवीएम का हाल आप देख ही रहे हैं।


