
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में खबर होनी नहीं थी, नहीं है। मतदान के बाद अखबारों के लिए आराम का दिन होता है। आज एक्जिट पोल छपना था वही छपा है लेकिन जब उसका कोई मतलब ही नहीं रहा, उससे शेयर बाजार का खेल करने का आरोप है तो क्यों छापना-पढ़ना? दरअसल प्रमुखता देना। आज मेरे आठ में से तीन अखबारों की लीड एक्जिट पोल के नतीजे हैं और हिन्दुस्तान टाइम्स, दि एशियन एज ने दोनों राज्यों में राजग को आगे बताया है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने शीर्षक में ही कहा है एक्जिट पोल राजग को आगे बता रहे हैं पर क्या ऐसा होगा। द हिन्दू में यह सेकेंड लीड है। इसका शीर्षक है, दोनों राज्यों में भाजपा नेतृत्व वाले गठजोड़ को आगे बता रहे हैं। पिछले नतीजों से हम जानते हैं कि भाजपा पीछे भी हो तो विधायक खरीदकर या दूसरे तरीके से सरकार बना लेती है। ऐसे में इन सर्वेक्षणों में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। दूसरी खास बात यह है कि द हिन्दू की लीड बताती है कि महाराष्ट्र में 65 प्रतिशत मतदान हुआ है और यह 2019 से बेहतर है। आम समझ यह है कि मतदाता को जब कुछ खास करना होता है तो वह वोट देने निकलता है वरना यही सोचकर छुट्टी मनाता है कि कोई जीते-कोई हारे, साणू की।
ऐसे में ज्यादा वोट का मतलब है कुछ बदलाव। ऐसा तो नहीं है कि लोगों को सरकार के बचाव के लिए कूदने की जरूरत होगी और अगर ऐसा हो भी तो लोग जानते हैं कि भाजपा सक्षम है। इसलिए ज्यादा मतदान का मतलब साफ है। लेकिन वोट मतदान खत्म होने के बाद बढ़ते हैं और कल देर रात भी बढ़ने की चर्चा है। इसलिए अखबारों में मतदान का प्रतिशत अलग है। बाद में वोट बढ़ना ईवीएम का खेल माना जाता है। मुझे एक्जिट पोल इसलिये भी बेमतलब लगता है। इंडियन एक्सप्रेस ने एक्जिट पोल की चर्चा टॉप की इस खबर के साथ की है कि महाराष्ट्र में मतदान 30 साल में सबसे ज्यादा हुआ है। सामान्य तौर पर इसका मतलब बहुत साफ है। लेकिन अंतिम नतीजा मतदान के बाद बढ़ने वाले वोट से बदल सकता है। इसलिए नतीजे के संबंध में अब कुछ अनुमान लगाना पहले के मुकाबले काफी मुश्किल होगा। सामान्य तौर पर इसका दोनों मतलब हो सकता था – भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलेगा या उसकी सीटें इतनी कम हो जायेगी कि वह तोड़फोड़ करके भी सरकार नहीं बना पायेगी। लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा ने पिछले पांच साल जो राजनीति की है, विपक्षी दलों में तोड़फोड़ के बाद उसके अपने उम्मीदवार कितने हैं और सहयोगी दलों के कितने और कहां किसे जिताना है इसमें आम मतदाता भ्रमित नहीं होगा तभी स्पष्ट बहुमत की संभावना बनेगी। पत्ता साफ करना आसान है। पर नतीजा तो वही माना जायेगा जो 23 को सुनाया जायेगा।
अमर उजाला में एक्जिट पोल की खबर सेकेंड लीड है और वही खबर है। झारखंड में सोरेन सरकार इनकमबेंसी फैक्टर के कारण हार जाये यह तो संभव है लेकिन महाराष्ट्र में किस बात के लिए जीतेगी – यह मैं नहीं समझ पा रहा हूं। लेकिन भाजपा के बारे में कहा जाता है कि वह जीतने के हर संभव उपाय करती है और इसमें बंटेंगे तो कटेंगे से लेकर चुनाव आयोग की मेहरबानी और समर्थन शामिल है। इसलिए कुछ भी हो सकता है और मेरे लिये यह सर्वेक्षण बेमतलब है। नवोदय टाइम्स में एक्जिट पोल लीड है। उपशीर्षक के अनुसार चार एजेंसियों ने दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार बनने का दावा किया है जबकि एक्सिस माई इंडिया ने झारखंड में कांग्रेस सरकार बनने की भविष्यवाणी की है। जैसा मैंने कहा, मुझे भाजपा के जीतने का कोई कारण नजर नहीं आता है लेकिन भाजपा जीतने के लिए हर संभव उपाय करती है। ऐसे में भाजपा नहीं भी जीते तो बाद में सरकार बना लेगी इसलिए टेंशन होना ही नहीं चाहिये। जहां तक चुनाव परिणाम की बात है, नवोदय टाइम्स के अनुसार झारखंड में 68 प्रतिशत वोट पड़े हैं और महाराष्ट्र में 60 प्रतिशत। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार रात 1145 तक महाराष्ट्र में 65.1 प्रतिशत वोट पड़े थे। दो अखबारों में पांच प्रतिशत वोट का यह अंतर चाहे जिस कारण से हो सामान्य नहीं है। इससे नतीजे उलट-पलट सकते हैं। द टेलीग्राफ में एक्जिट पोल या मतदान से संबंधित कोई खबर पहले पन्ने पर नहीं है।
वैसे तो इन चुनावों में भाजपा के जीतने का कोई कारण नहीं है और होता तो उसके आधार पर वोट मांगा जाता पर वोट मांगा गया – एक हैं तो सेफ हैं और घुसपैठियों के नाम पर – जिसका कोई अस्तित्व नहीं बताया गया। छापेमारी हुई वह अलग है लेकिन वोट के लिए नोट के मामले की जानकारी सरकारी एजेंसियों को नहीं हुई। ऐसे में जो चल रहा है उसे समझना मुश्किल नहीं है। इस बीच कैलाश गहलोत आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा में चले गये तो यह संदेश गया है कि भाजपा में कुछ अच्छाई या संभावना होगी जिससे प्रेरित होकर आम आदमी पार्टी का एक वरिष्ठ नेता भाजपा में जा रहा है। मामला वाशिंग मशीन का नहीं है। इसलिए मेरा मानना है कि मीडिया का यह काम था कि उनसे बातचीत करता और जनता को बताता कि भाजपा से क्या उम्मीद है जो उनकी पुरानी पार्टी में नहीं थी या अब खत्म होती लगी। ऐसे इंटरव्यू की जरूरत भाजपा से समर्थन वापस लेने वाले एनपीपी के नेता से भी थी। इंडियन एक्सप्रेस ने पहले उनका इंटरव्यू किया था लेकिन किसी और ने कैलाश गहलोत का किया हो तो मुझे नहीं दिखा। आज इंडियन एक्सप्रेस में उनका इंटरव्यू है पर वह वैसा नहीं है जैसा होना चाहिये था। ना सवाल वैसे हैं ना जवाब और न काउंटर सवाल। करोड़ों अरबों के घोटाले में मुख्यमंत्री का सरकारी घर मुद्दा नहीं हो सकता है। वैसे भी केजरीवाल उसे पद के साथ छोड़ चुके हैं। वर्तनान मुख्यमंत्री को उसे देने से पहले उसपर कब्जे की कोशिश के लक्षण सार्वजनिक हैं और फिर भी कब्जा नहीं किया गया – से लगता है कि शोर कुछ ज्यादा ही था। भले वह मुद्दा नहीं है।
आप जानते हैं कि केंद्र में सत्तारूढ़, डबल इंजन वाली भारतीय जनता पार्टी की वाशिंग मशीन राजनीति (किसी को भी धो-पोंछ कर भाजपाई बना लेना) के तहत आम आदमी पार्टी के नेता कैलाश गहलोत हाल में भाजपा में शामिल हुए हैं। पहले उन्होंने आम आदमी पार्टी पर आरोप लगाये और फिर भाजपा में शामिल हो गये। इसपर मैं पहले लिख चुका हूं और मैंने कहा था कि इससे संबिधत बहुत से सवाल पाठकों और मतदाताओं के मन में होंगे। अखबारों का काम है कि वह उनसे पूछकर लोगों को बताये। इंडियन एक्सप्रेस में आज जो छपा है वह इंटरव्यू के नाम पर औपचारिकता है और पूरा पढ़कर लगा कि उनसे वो सवाल पूछे ही नहीं गये जो पूछे जाने चाहिये थे। यह तो पहले पन्ने की खबर और दूसरे पन्ने पर उसके टर्न की बात है। शहर की खबरों के पन्ने पर जो इंटरव्यू छपा है उसका शीर्षक है, “केजरीवाल अब आम आदमी नहीं रहे”। मुझे लगता है कि यह कोई अजूबा नहीं है। सवाल है कि वे आम नेताओं के मुकाबले जनता के करीब हैं कि नहीं और उन तक पहुंचना आम आदमी के लिए अन्य नेताओं के मुकाबले आसान है कि नहीं। कैलाश गहलोत की पसंद या राय अलग हो सकती है और जरूरी नहीं है कि वह सही ही हो। इस इंटरव्यू के बारे में मेरी राय पहले पन्ने पर छपे शीर्षक से बनी है। मेरा मानना है कि शीर्षक सर्वश्रेष्ठ तथ्य को ही बनाया जाता है। अगर वह यह है कि, “गहलोत ने आप को काउंटर किया : (कहा,) स्वतंत्रता दिवस पर झंडोत्तोलन केजरीवाल मैडम की सहमति के बाद किया” तो इंटरव्यू में कुछ नहीं है। मैंने पढ़ भी लिया है।
आप जानते हैं कि 15 अगस्त को केजरीवाल जेल में थे और खबर थी कि उन्होंने कहा है कि उनकी अनुपस्थिति में आतिशी (जो अब मुख्यमंत्री हैं) झंडा फहरायेंगी। पर दिल्ली के उपराज्यपाल (केंद्र की भाजपा सरकार के प्रतिनिधि) ने उनका नाम सुझाया था। इसमें गहलोत की भूमिका हो या नहीं आतिशी या सुनीता क्या कर सकती थीं? ऐसे में अब उनके यह कहने का भी कोई मतलब नहीं है कि उन्होंने केजरीवाल मैडम की सहमति के बाद झंडा फहराया। आम आदमी पार्टी या उस समय के उनके नेता केजरीवाल के प्रति गहलोत का समर्थन यह होता कि वे कहते कि नहीं मैं नहीं फहराउंगा मेरे नेता ने जो कहा है वही होना चाहिये। ऐसा उन्होंने नहीं कहा और सहमति के बाद फहराया यह उनकी खासियत हो सकती है लेकिन केजरीवाल मैडम को घसीटने का क्या मतलब जब वे पद पर नहीं हैं। आतिशी के बारे में ये बात कही गई होती तो फिर भी समझ में आता। इंडियन एक्सप्रेस का यह शीर्षक इस इंटरव्यू को पढ़वा भले देता है पर इंटरव्यू पढ़ने से पता चलता है कि उसमें कुछ है नहीं। दूसरे शब्दों में इंटरव्यू ऐसा नहीं है जैसा होना चाहिये था या हो सकता था।


