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आज के अखबार : इंडिगो संकट की प्रस्तुति में सरकार का पूरा प्रचार लेकिन कंपनी का पक्ष नहीं के बराबर!

संजय कुमार सिंह

इंडिगो के संकट के बारे में आपकी राय जो भी हो, मुझे हमेशा याद आता है कि जनसत्ता में हमलोग हवाई यात्रा से संबंधित खबरें को बहुत महत्व नहीं देते थे। हमारे संपादक प्रभाष जोशी का मानना था हिन्दी का पाठक विमान यात्रा नहीं करता है। इसलिए विमान यात्रा की खबरों से उसका क्या मतलब। यह 1990 के दशक की बात है। 35 साल बाद स्थितियां काफी बदल गई हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह वादा कौन भूला होगा कि वे हवाई चप्पल वालों को हवाई यात्रा कराएंगे। पर स्थिति यह है कि सरकार ने पायलट और क्रू के सदस्यों के आराम का ख्याल रखने के लिए नए नियम बनाए हैं। ये नियम ऐसे हैं कि इससे विमान सेवा मुहैया कराने वाली कंपनियों का खर्च काफी बढ़ जाएगा। विमान सेवा कंपनियों को यह पैसा यात्रियों से ही वसूलना होगा और किराया बढ़ जाएगा तो हवाई चप्पल वालों की हवाई यात्रा कैसे संभव होगी? यही नहीं, सरकार ने नए नियम लगभग बिना मांग, बिना जरूरत और जरूरी प्राथमिकता को छोड़कर बनाए हैं। इससे विमान यात्रा महंगी होगी। इस संकट में इंडिगो जेट एयरवेज या इंडियन एयरलाइंस की गति प्राप्त कर ले तो उससे भारत में व्यवसाय के संकट का पता चलेगा लेकिन वह मुद्दा ही नहीं है। वैसे भी, सरकार के लिए किसी एक क्षेत्र के श्रमिकों या कामगारों के लिए “नियम बनाना” पर्याप्त नहीं है। ना ही किसी एक क्षेत्र के कामगारों की सुविधाओं का ही ख्याल रखना उसका काम है। नियमों को व्यावहारिक रूप से लागू करना उतना ही ज़रूरी है। वास्तविकता यह है कि सरकार इसमें बुरी तरह नाकाम रही है लेकिन अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रही है और यही प्रचार किया जा रहा है। हमेशा की तरह मीडिया के बड़े वर्ग का भरपूर सहयोग है। यह स्वेच्छा से और मजबूरी में भी है। लेकिन वह अलग मुद्दा है। इंडिगो संकट से विमान यात्रियों को हो सकने वाली परेशानी का ख्याल सरकार को भी रखना था और पहले से पता होना चाहिए था — लेकिन जो हुआ और हो रहा है वह सबको मालूम है। इंडिगो के सीईओ ने वीडियो जारी कर स्थिति बताई है। सरकार ने अपना पक्ष रखा हो तो मुझे पता नहीं चला लेकिन डीजीसीए ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया है। जांच के आदेश तो दिए ही हैं जबकि वे माफी मांग चुके हैं।

तथ्य यह है कि देश की विमान सेवा कंपनियों में इंडिगो के पास लगभग 65 प्रतिशत यात्री हैं और रोज उसकी उड़ान की संख्या दूसरी सबसे बड़ी सेवा प्रदाता इंडियन एयरलाइंस के मुकाबले तीन गुना से भी ज्यादा है। ऐसे में नए नियम लागू करना उसके लिए महंगा तो है ही, नहीं लागू कर पाने का नतीजा यह हुआ कि उसे उड़ान कैंसल करने पड़े और बड़ी संख्या में हवाई यात्रियों को भारी संकट का सामना करना पड़ रहा है। कई दिन हो चुके, सरकार लगभग लाचार है और भिन्न आदेश जारी करके अपना बचाव कर रही है। प्रचारक अखबारों ने आज भी सरकार के प्रचार का पूरा ख्याल रखा है। हालांकि, द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है – सरकार ने विमान किराए की सीमा तय की परेशानी की नहीं। फ्लैग शीर्षक से यह बात और स्पष्ट होती है – टिकट की कीमत पर नियंत्रण लेकिन इंडिगो की उड़ान रद्द होना जारी। एक और खबर का शीर्षक है, सामान और टिकट के पैसों की वापसी ट्रांजिट में खो गए। जाहिर है, इस संकट में हर यात्री के लिए अपने गंतव्य पर पहुंचना जरूरी है और भारत देश में ही एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए एक टिकट के 50 से 80 हजार रुपये तक मांगे गए हैं। सरकारी प्रतिबंध इसके बहुत बाद आया। अब इससे यात्रियों के पैसे भले ज्यादा नहीं लगे तकलीफ कम नहीं हुई या समय पर पहुंचने की व्यवस्था नहीं ही हुई। इसमें दो सूचनाएं खास हैं। मेरे एक परिचित को कल बिहार के एक शहर से पटना पहुंचना था। पटना से उन्हें कोलकाता और कोलकाता से बंगलूर तथा बंगलूर से अंतरराष्ट्रीय उड़ान लेनी थी। पटना से उड़ान रद्द नहीं हुई पर लेट चली और डर था कि बंगलूर से अंतरराष्ट्रीय उड़ान छूट जाएगी। पर मिल गई भले अंतरराष्ट्रीय सेवा प्रदाता के विशेष सहयोग से संभव हुआ हो। मुझे लगता है कि यात्रियों की परेशानी की खबरें बढ़ा-चढ़ाकर भी बताई जा रही हैं। इसमें तथ्य यह है कि इंडिगो के सीईओ ने अपने वीडियो संदेश में कहा है, यात्रियों को उड़ान रद्द होने की सूचना भेजी जा रही है और उनसे कहा जा रहा है कि यात्रा के लिए एयरपोर्ट न आएं। इसपर मैंने लिखा था, (अब) भीड़ नहीं होगी, फोटो नहीं होगी, वीडियो नहीं होगा, खबर नहीं होगी पर समस्या बनी रहेगी। और जैसा मैंने ऊपर लिखा, विदेशों में भारत का प्रचार होगा कि इस संकट में भी अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट मिल गई।

कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा (और उसकी सरकार भी) जो करती है वह पूरी तैयारी से होता है और इसका पता प्रधानमंत्री के पूरे साल चुनाव मोड में रहने से भी चलता है। चुनाव जीतने के लिए पार्टी और उसके समर्थक-प्रचारक जो सब करते हैं उसमें छवि बनाने या इलेक्टोरल बांड के जरिए धन जुटाने के लिए जो सब किया गया है उसका ट्रेलर हम देख चुके हैं। वोट चोरी से संबंधित राहुल गांधी के आरोप और भाजपा का उससे निपटने का तरीका अपनी जगह है। कहने की जरूरत नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट से लेकर तमाम संवैधानिक संस्थाओं पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाने की कोशिशें और उसका असर भी साफ दिख रहा है। अभी वह सब मुद्दा नहीं है लेकिन मोदी है तो मुमकिन है – यह चुनावी नारा ही नहीं था। भाजपा के प्रचार का हिस्सा भी है। ऐसे में मेरी दूसरी सूचना यह है कि इंडियन एयरलाइंस के एक नियमित यात्री के अनुसार, आज उसे हवाई अड्डे पर भीड़ नहीं मिली, एक्स-रे, सुरक्षा जांच सब जल्दी हो गया और परेशानी कम हुई। जाहिर है यह इंडिगो की उड़ान कम होने के कारण हुआ होगा लेकिन इसका मतलब यह भी है कि हवाई अड्डे पर सुविधाएं जरूरत से कम हैं। पर यह भी अलग मामला है। मैं सिर्फ यह रेखांकित करना चाहता हूं कि इन विषयों पर इन दिनों खबरें नहीं हो रही हैं। इंडिगो मामले से संबंधित इस पृष्ठभूमि में तथ्य यह भी है कि इंडिगो के सीईओ को जारी कारण बताओ नोटिस सार्वजनिक कर दिया गया है। इसमें कहा गया है, … इतने बड़े पैमाने पर ऑपरेशनल फेलियर का कारण प्लानिंग, ओवरसाइट और रिसोर्स मैनेजमेंट में बड़ी चूक है। एयरक्राफ्ट रूल्स, 1937 तथा ड्यूटी पीरियड, फ्लाइट ड्यूटी पीरियड, फ्लाइट टाइम लिमिटेशन और तय रेस्ट पीरियड आदि के साथ निर्धारित एयर ट्रांसपोर्ट ऑपरेशन्स के लिए फ्लाइट क्रू के प्रावधानों का पहली नज़र में पालन नहीं किया गया है। एयरलाइन अपने यात्रियों को सीएआर के तहत बताई गई ज़रूरी जानकारी और सुविधाएं देने में नाकाम रही है। इसमें बोर्डिंग से मना करने, फ्लाइट्स कैंसल करने और फ्लाइट्स में देरी के कारण एयरलाइंस द्वारा पैसेंजर्स को दी जाने वाली सुविधाएं शामिल हैं।

सीईओ के तौर पर आप एयरलाइंस के असरदार मैनेजमेंट को पक्का करने के लिए ज़िम्मेदार हैं, लेकिन आप भरोसेमंद ऑपरेशन्स के लिए समय पर इंतज़ाम और पैसेंजर्स को ज़रूरी सुविधाएं देने की अपनी ड्यूटी में फेल रहे हैं। इसलिए, अब आपको यह बताने का निर्देश दिया जाता है कि ऊपर बताए गए उल्लंघनों के लिए एयरक्राफ्ट रूल्स और सिविल एविएशन ज़रूरतों के नियमों के तहत सही कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए। तय समय के अंदर अपना जवाब न देने पर मामले पर एकतरफ़ा फ़ैसला किया जाएगा। इससे जाहिर है कि सरकार कार्रवाई और सख्ती के लिए तैयार है। इससे कंपनी को होने वाले नुकसान और उसके भविष्य के संबंध में इस सरकार के शासन में तरह-तरह के उदाहरण हैं और इसका हश्र इनमें से कोई या कुछ नया हो जाए तो वह मुमकिन है और बहुत कुछ हो चुका है। इसका असर रोजगार की संभवनाओं पर पड़ता है लेकिन वह मुद्दा ही नहीं है। अभी जब रद्द उड़ान के टिकट के पैसे, यात्रियों का सामान सब फंसा हुआ है, ढेरों यात्री अटके हुए हैं तो मुझे 90 का वह दशक याद आता है जब किराया भी बढ़ता था तो यात्रियों की राय ली जाती थी और मीडिया में दिखाया जाता था। एक साथी पत्रकार ने प्रतिक्रिया जो दी हो, बाद में मुझसे कहा था कि मैं क्या प्रतिक्रिया देता टिकट मैं अपने पैसे से थोड़े खरीदता हूं। जो टिकट के पैसे देता है उसे पता होगा कि किराया बढ़ने से कैसा लगता है। उन दिनों जो टिकट प्रायोजित करते थे उनका हाल यह था कि एक दफा फ्लाइट रीशिड्यूल हुई तो मुझे लौटने के लिए दूसरा टिकट मिला। बताया गया कि पहले वाला टिकट जहां से लिया गया था, वहीं लौटाया जा सकेगा। लौटकर मैं टिकट देने वाले के दफ्तर गया तो उनका कहना था कि आप यहां क्यों आए फलां को लौटाकर पैसे रख लेते। ये तो हुई पुरानी बात अब जमाना बदल गया है। खाते से भुगतान होता है और वापसी का पैसा उसी खाते में चला जाता है, अपने आप।

ऐसे में आज अखबारों में छपे सरकारी आदेश का जो मायने हो, इसका प्रचार ज्यादा है, सूचना कम। आइए अब आज की खबर और शीर्षक बता दूं। अमर उजाला का फ्लैग शीर्षक है, पांचवें दिन भी संकट बरकरार ….. देश भर में हवाई अड्डों पर अफरा-तफरी का माहौल। मुख्य शीर्षक है – इंडिगो की 800 से अधिक उड़ानें रद्द, सांसत में यात्री। उपशीर्षक के साथ बड़े फौन्ट से रिवर्स में लिखा है, मनमानी पर अंकुश। इसके तहत बताया गया है कि सरकार ने तय की किराये की सीमा – 500 किमी के 7,500 रुपये ही वसूल सकेंगी विमानन कंपनियां। आज रात तक यात्रियों को रिफंड व 48 घंटे में सामान सौंपे इंडिगो। मुख्य खबर के साथ छपी एक खबर का शीर्षक है – पीएम मोदी ने ली हालात की जानकारी…. इंडिगो के सीईओ को मिला नोटिस। यहां यह बताना प्रासंगिक रहेगा कि मोदी सरकार देश में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का दावा भी करती है। इससे किन कंपनियों को क्या लाभ हुआ, कौन सी नई कंपनियां खुलीं यह सब नहीं बताया जाता है लेकिन इंडिगो देश की सबसे बड़ी विमानन कंपनी हो गई है और इतनी बड़ी या एकाधिकार वाली हो गई है कि सरकार यह नहीं कह सकी कि उसे नए नियम लागू करने ही होंगे। उल्टे 10 फरवरी तक टाल दिया गया है। मुझे लगता है कि यह स्थिति और मीडिया ट्रायल जैसी यह खबर बताती है कि भारत में उद्योग धंधे चलाना कितना मुश्किल है और जीडीपी फिर भी बढ़ रहा है।

देशबन्धु का मुख्य शीर्षक है, इंडिगो संकट से यात्री बेहाल। उपशीर्षक है, देश भर में हवाई अड्डों पर अफरा-तफरी का माहौल। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, इंडिगो संकट पर एक्शन में सरकार। मुख्य शीर्षक है, मनमाने किराए पर रोक। रिफंड आज देने को कहा। सिंगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, प्रधानमंत्री को दी गई रिपोर्ट। एक शीर्षक और है, एयरपोर्ट पर इंतजाम नाकाफी। ऐसे में मुख्य शीर्षक गौरतलब है। एयरपोर्ट पर इंतजाम – सरकार को करना है। नाकाफी है तो शीर्षक छोटा है। रिफंड देने के लिए कहा जरूर गया है, दे पाएगा कि नहीं, राम जानें पर खबर बड़े फौन्ट में है। इस तथ्य के बावजूद कि उसे देना है जिसके पास उसके मूल काम के लिए स्टाफ (पायलट या क्रू) नहीं है। उसके पास इतनी बड़ी संख्या में रिफंड लौटाने की व्यवस्था होगी ही नहीं और जाहिर है कि आदेश का बहुत मतलब नहीं है। इमरजेंसी में अगर पायलट की व्यवस्था नहीं हो सकती है तो पैसे लौटाने के लिए स्टाफ की व्यवस्था करना और मुश्किल है। पर वह अलग मुद्दा है। यहां याद आता है कि कॉरपोरेट में कर्मचारियों के पोचिंग का मामला अब पुराना हो चुका है और सुनने में नहीं आता है। इंडिगो का संकट मुझे शुरू में क्रू की पोचिंग के कारण हुआ लग रहा था और मुझे याद है कि 1988-89 में जब पटना से नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान टाइम्स का प्रकाशन शुरू हुआ था तब पीटीएस ऑपरेटर (मोटे तौर पर कंप्यूटर ऑपटेर) की इतनी कमी थी कि पहले पन्ने की खबरें पुराने मैनुअल टाइपराइटर की लिखी हुई छपी थी। लेकिन वो स्किल इंडिया का जमाना नहीं था और बेरोजगारी अभी जैसी नहीं थी। पर स्टाफ की कमी का सामना अखबार भी कर चुके हैं। और यह उपलब्धता का मामला भी हो सकता है और इसलिए पायलट की कमी और पायलट को ट्रेन करने वाली कंपनी को खरीदने (या बिकने) का मामला भी खबरों में है। लिंक आखिर में।

अंग्रेजी अखबारों में टेलीग्राफ का शीर्षक पहले बता चुका हूं। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक बताता है कि सरकार इंडिगो के खिलाफ किसी बड़ी कार्रवाई की योजना बना रही है। फ्लैग शीर्षक भी सरकारी पक्ष ही है। इसमें नागर विमानन मंत्री की यह चेतावनी शामिल है कि नियमों से विचलन हुआ तो कार्रवाई होगी। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, सरकार ने विमान किराए की सीमा तय की, इंडिगो के सीईओ से 24 घंटे में स्पष्ट करने के लिए कहा गया। इस खबर का फ्लैग शीर्षक यही है कि, आपदा में अवसर ढूंढ़ रही विमान सेवा कंपनियों से यात्रियों की रक्षा के लिए किराए की सीमा तय की गई है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, सरकार ने विमान किराए की सीमा तय की, इंडिगो को सेवा सामान्य करने के लिए दो दिन का समय दिया। इस खबर का इंट्रो है, आज रात आठ बजे तक रिफंड प्रोसेस किया जाए, दो दिन में सामान दिए जाएं। द हिन्दू में भी यह खबर लीड है, जब संकट जारी है तब सरकार ने विमान किराए की सीमा तय की। उपशीर्षक ने इंडिगो ने शनिवार को 1500 उड़ानों का परिचालन किया। सीईओ ने कहा, 15 दिसंबर तक संभवतः 2200 उड़ान की पूर्ण क्षमता पर वापस पहुंच जाएगी। अंतर्देशीय किराए की अधिकतम सीमा 7,500 से 18,000 तय की गई है और यह दूरी पर निर्भर करेगा। अकले हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर लीड है। हालांकि खबर पहले पन्ने पर है और शीर्षक है, सरकार ने इंडिगो के सीईओ को कारण बताओ नोटिस दिया, विमान सेवाओं के लिए अधिकतम किराया तय किया। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड आज अखबार के लीडरशिप सम्मेलन में प्रधानमंत्री का भाषण है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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