विश्व दीपक-
ईरान की बर्बादी की कीमत पर अमरीकी प्रभुत्व को खत्म करने का सपना देखने वाले लोग मानसिक रूप से बीमार हैं. सैडिस्ट हैं. चूंकि इस युद्ध में उनका नाखून भी नहीं कटना है इसलिए ईरान के पक्ष में युद्धोन्माद फैलाकर अपनी राजनीतिक कुंठाओं और ऐतिहासिक हीनताबोध की भरपाई कर रहे हैं.
आगे जो मैं कहने जा रहा हूं वह कहने के लिये किसी को भविष्यवेत्ता होने की ज़रूरत नहीं है. सामान्य बुद्धि का आदमी भी बता सकता है कि शक्ति संतुलन, तकनीक आदि किसके पक्ष में है.
अमरीका-इजराइल छोड़ दीजिये. ईरान के सारे पड़ोसी मुल्क तक उसके दुश्मन हैं. कहीं से कोई मदद की उम्मीद नहीं. सऊदी-यूएई भी हमला करने की तैयारी कर रहे हैं.
रूस और चीन जैसे देश जो ईरान को अमरीका के खिलाफ चढ़ा रहे थे वो या तो युद्ध से लाभ कमा रहे हैं या चुप मारकर बैठे हैं. ईरान की बर्बादी की कीमत पर रूस प्रतिदिन 150 मिलियन डॉलर कमा रहा है.
रुबल या युआन नहीं 150 मिलियन अमरीकी डॉलर. यह बात ईरान का नाम लेकर युद्ध की चियरलीडिंग करने वालों को याद रखनी चाहिये. युद्ध न हवा में लड़ा जाता है, न जीता जाता है.
दुनिया के सभी शक्तिशाली संगठन यूएन से लेकर 57 देशों का मुस्लिम संगठन ओआईसी तक ईरान के विरुद्ध हैं लेकिन तीसरी दुनिया के चौथे दर्जे के देश भारत के लो आईक्यू वाले क्रांतिकारियों को लगता है कि ईरान मिसाइल मारकर अमरीकी प्रभुत्व खत्म कर देगा.
जो काम सोवियत संघ नहीं कर सका और अंतत: करने का प्रयास करते हुये बिखर गया, चीन की हिम्मत नहीं कि वह मुंह खोल दे वह काम भारत के फर्जी क्रांतिकारी चाहते हैं कि ईरान पूरा करे. यह उनकी निजी कुंठा है. सचाई इस सदिच्छा से कोसों दूर है.
सचाई यह है कि ईरान अंदर से बेहद कमजोर और बिखरा हुआ है. अगर कोई वास्तव में ईरान का शुभचिंतक है तो उसे कहना चाहिये कि लड़ लिये बहुत. अब बातचीत की टेबल पर बैठो.
युद्ध अगर केवल साहस से जीते जाते तो दुनिया का रूप-रंग कुछ और होता. अगर किसी की निगाह में मिसाइल लॉन्च करना किसी देश की ताकत का पैमाना है तो फिर मूर्खता शब्द के लिये पर्यायवाची खोजने की ज़रूरत नहीं.
जो मिसाइलें ईरान से दागी जा रही हैं उन मिसाइलों से हो क्या रहा है? सही मायने में वो मिसाइलें अमरीकी सत्ता को क्या और कितना नुकसान पुहंचा रही हैं? यह सोचने की ज़रूरत है. इजराइल पहुंचने वाली औसतन 10 में से 7-8 मिसाइलें इंटरसेप्ट हो रही हैं. जो नुकसान हो रहा है वह वॉरहेड गिरने से या क्लस्टर मिसाइलों से हो रहा है. डायरेक्ट हिट बहुत कम है.
यूएई, बहरीन, दुबई में ड्रोन की टक्कर मारने वाले विजुअल देखकर युद्ध के चियरलीडर्स अभी से नतीजा निकाल रहे हैं. ईरान में बर्बादी का क्या आलम होगा – कभी सोचा है. अमरीकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल गिराने से अमरीका डर कर भाग जाएगा? अमरीका मानव सभ्यता की सबसे कुटिल और सबसे बड़ी हार्ड पॉवर है.
पूरे ईरान के अंदर अमरीका-इजराइल के सैकड़ों विमान रात भर बॉम्बिंग करते हैं. वहां क्या हाल होगा यह सोचकर सिहर उठता हूं. इंटरनेट पर प्रतिबंध है इसलिये तस्वारें सामने नहीं आ पा रही हैं. लेकिन भारत में मौजूद युद्ध के चियरलीडर्स को इसकी चिंता कम है. उनको अपनी कुंठा भरपाई की चिंता ज्यादा सता रही है.
जिस देश की टॉप लीडरशिप 20 दिन में खत्म हो गई उस देश के बिखराव का अंदाजा है? तुम मारते जाओ,हम मरने के लिये तैयार हैं – यह नारेबाजी है.
मसूद पेजेश्कियन के बेटे ने टेलीग्राम पर लिखा कि पूरी लीडरशिप खौफ के साये में जी रही है. बाहर निकलने की हिम्मत नहीं किसी की. खामनेई की हत्या और लारिजानी के मारे जाने का दर्द क्या होता है यह ईरान की जनता जानती होगी.
भारत में मौजूद युद्ध के चियरलीडर्स इस बात पर उछल रहे हैं कि इजराइल-अमरीका असली सूचनायें छिपा रहे हैं. युद्ध में हर देश छिपाता है लेकिन सामान्य विवेक क्या कहता है? रिपोर्टिंग के लिये कहां ज्यादा आज़ादी और सुविधा होगी? यह समझने के लिये न्यूटन होने की ज़रूरत नहीं है.
दुनिया को किसने बताया कि अमरीका ने बच्चियों के स्कूल पर आपराधिक हमला किया? अमरीकी चैनल सीएनएन ने. फेक न्यूज़ और फेक नैरेटिव के अलावा गलत फहमियों का प्रचार भी कम बड़ा अपराध नहीं.
यह युद्ध जितना जल्दी समाप्त होगा खुद ईरान के लिये, अमरीका-इजराइल के लिये, अरब के लिये और शेष दुनिया के लिये उतना ही बेहतर होगा.
ईरान को अपनी कुंठा की भरपाई का माध्यम मत बनाइये. अमरीकी प्रभुत्व को खत्म करने का बोझा ईरान पर मत डालिये. अकेले उसके वश का नहीं है. इसके लिये पूरी दुनिया को इकट्ठा होना होगा. जिस दिन यह बात युद्ध के चियरलीडर्स को समझ आ जाएगी उस दिन इस युद्ध को देखने का नज़रिया बदल जाएगा.


