अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-
- लगभग तय हो चुका है ग्लोबल ऑर्डर में द्वितीय विश्व युद्ध जैसा ही महाबदलाव
- ईरान को तबाह करके जीत मिल भी गई तो भी हो जाएगा अमेरिकी चौधराहट का अंत
- अब मॉस्को और पेइचिंग से ही तय होंगी दुनिया की नीतियां
दुनिया आज ठीक उसी ऐतिहासिक मुहाने पर खड़ी है, जहां 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध की राख से एक नया विश्व ढांचा निकला था। जिस तरह उस महायुद्ध ने ब्रिटेन का ‘सुपरपावर’ ताज छीनकर अमेरिका और उसके प्रतिद्वंदी के रूप में नंबर दो का ताज सोवियत संघ के सिर रख दिया था, आज होर्मुज का यह युद्ध अमेरिका की वैश्विक चौधराहट को हमेशा के लिए खत्म कर रहा है।
यही नहीं, आंकड़े और जमीनी हकीकत साफ बता रहे हैं कि इस आर्थिक और सैन्य तबाही के बाद दुनिया की ताकत वाशिंगटन से खिसक कर मॉस्को और पेइचिंग के गठजोड़ के पास जा रही है।
आर्थिक तबाही के पैमाने की बात की जाए तो यह युद्ध मिसाइलों से कहीं ज्यादा खौफनाक साबित हो रहा है, जिसने सीधे तौर पर पश्चिमी दुनिया की कमर तोड़ दी है।
होर्मुज चोक होने से कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल के खतरनाक स्तर की ओर हैं, जिससे समूचा यूरोप और अमेरिका भयंकर मंदी (Recession) में डूब चुके हैं। सप्लाई चेन पूरी तरह टूटने से जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों के औद्योगिक हब ठप पड़ रहे हैं और वहां की अर्थव्यवस्थाएं सिकुड़ रही हैं।
जहां तक मिसाइलों और हथियारों से हो रहे सीधे नुकसान की बात है, तो इस भीषण टकराव ने ईरान और इजरायल के बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) को सबसे ज्यादा नेस्तनाबूद किया है। अमेरिकी और इजरायली हवाई हमलों ने ईरान के बंदर अब्बास जैसे अहम नौसैनिक अड्डों, तटीय रडार नेटवर्क और ऊर्जा संयंत्रों को भारी नुकसान पहुंचाया है।
दूसरी तरफ, ईरान की असमेट्रिक युद्ध नीति और मिसाइल हमलों से इजरायल के अशदोद और हाइफा जैसे रणनीतिक बंदरगाहों का व्यापारिक इंफ्रास्ट्रक्चर बुरी तरह चरमरा गया है।
अगर युद्ध का दायरा बढ़ता है, तो सऊदी अरब के ‘अबकैक’ (Abqaiq) जैसे दुनिया के सबसे बड़े तेल शोधन संयंत्र भी इस आग में स्वाहा होने की कगार पर हैं।
हालांकि इन्हीं देशों यानी ईरान, इस्राएल और खाड़ी के कुछ देशों को आर्थिक तबाही भी अभी झेलनी है। युद्ध का भारी खर्च उठा रहे इजरायल की टेक-आधारित अर्थव्यवस्था से विदेशी पूंजी का भारी पलायन हुआ है और उसकी जीडीपी विकास दर औंधे मुंह गिर गई है।
ईरान की अपनी अर्थव्यवस्था पहले ही वेंटिलेटर पर है; उसकी मुद्रा (रियाल) रसातल में जा चुकी है और आम जनता हाइपर-इन्फ्लेशन झेलने को मजबूर है।
इस पूरे परिदृश्य से स्पष्ट है कि युद्ध में हुई पूरी वैश्विक तबाही के बीच रूस और चीन कूटनीतिक और आर्थिक रूप से सबसे बड़े और निर्विवाद विजेता बनकर उभर रहे हैं।
रूस को सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम बेकाबू होने से उसकी ऊर्जा से होने वाली कमाई अप्रत्याशित रूप से कई गुना बढ़ गई है।
क्रेमलिन की रणनीति पूरी तरह सफल हो रही है; वह अमेरिका को मिडिल ईस्ट के दलदल में जलाकर यूरोप और यूक्रेन के मोर्चे पर वाशिंगटन को आर्थिक रूप से थका रहा है।
दूसरी तरफ चीन बिना एक भी गोली चलाए महाशक्ति अमेरिका के ‘पेट्रो-डॉलर’ सिस्टम की कब्र खोद रहा है और ग्लोबल ट्रेड में अपनी मुद्रा ‘युआन’ (Yuan) का दबदबा बढ़ा रहा है।
बीजिंग को इस अफरातफरी में रूस और ईरान से भारी डिस्काउंट पर तेल मिल रहा है, जिससे पश्चिमी देशों की मंदी के बावजूद उसका अपना औद्योगिक पहिया बेरोकटोक घूम रहा है।
निष्कर्ष एकदम साफ है कि यह बदलाव कोई मामूली कूटनीतिक घटना नहीं है, बल्कि ‘अमेरिकन सेंचुरी’ (अमेरिकी सदी) के पतन का आधिकारिक ऐलान है।
अमेरिका ने अपनी बेतहाशा सैन्य ताकत के नशे में होर्मुज में ठीक वही ‘सेल्फ गोल’ किया है, जो सेकंड वर्ल्ड वार और बाद में 1956 में ब्रिटेन ने स्वेज नहर में अपनी ताकत के अहंकार में करके अपना सुपरपावर का रुतबा खो दिया था।
जब होर्मुज के पानी से बारूद का धुआं छंटेगा, तो दुनिया का पावर सेंटर पश्चिमी देशों से पूरी तरह खिसक कर यूरेशिया (रूस-चीन) के नए ध्रुव के हाथों में कैद हो चुका होगा।
होर्मुज के रास्ते पर अटकी उज्ज्वला योजना
- आयातित गैस पर टिकी देश की सबसे बड़ी कल्याणकारी योजना कैसे बन गई है देश के खजाने के लिए अब आर्थिक फांस
होर्मुज जलडमरूमध्य में सुलग रही युद्ध की आग अब सीधे भारत के करोड़ों गरीब घरों की रसोई तक पहुंच चुकी है। जिस ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ (PMUY) को महिला सशक्तिकरण और स्वच्छ ईंधन की सबसे बड़ी ढाल माना गया था, आज वही योजना भारत के लिए एक आर्थिक ‘टाइम बम’ बन गई है।
यह वैश्विक अर्थशास्त्र का एक निर्मम सच है कि जब भी कोई विशाल घरेलू कल्याणकारी योजना पूरी तरह से ‘आयातित और अस्थिर’ संसाधनों पर निर्भर होती है, तो संकट के समय वह ढाल के बजाय गले की फांस बन जाती है।
उज्ज्वला योजना का तो मूल ढांचा ही इस अदूरदर्शी मुगालते पर टिका था कि मिडिल ईस्ट में हमेशा शांति रहेगी और विदेशी गैस हमेशा सस्ती मिलेगी। जबकि भारत अपनी कुल एलपीजी (LPG) खपत का लगभग 60 से 64 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इस विशाल आयात का सबसे बड़ा हिस्सा कतर, सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देशों से आता है, जिसका रास्ता उसी होर्मुज चोकपॉइंट से गुजरता है जिसे ईरान ने बंधक बना रखा है।
चिंता की बात यह है कि उज्ज्वला योजना के तहत आज देश में 10 करोड़ से ज्यादा गरीब परिवारों को गैस कनेक्शन देकर एक नया और स्थायी उपभोक्ता वर्ग तैयार किया जा चुका है।
यहीं वह सबसे बड़ी रणनीतिक चूक हुई; सरकार ने देश के सबसे गरीब तबके को एक ऐसे आयातित जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) पर निर्भर कर दिया, जिसकी सप्लाई भारत के नियंत्रण में है ही नहीं।
अब जब ईरान और अमेरिका के युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के साथ-साथ गैस की कीमतें बेकाबू हो रही हैं, तो नई दिल्ली एक जानलेवा दोराहे पर खड़ी है।
अगर सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार की इस महंगाई का बोझ सीधे आम जनता पर डालती है, तो सिलेंडर गरीब आदमी की पहुंच से बाहर हो जाएगा। नतीजतन, करोड़ों ग्रामीण महिलाएं मजबूर होकर वापस लकड़ी और गोबर वाले उसी ‘जहरीले चूल्हे’ पर लौट जाएंगी, जिससे उन्हें निकालने के लिए अरबों रुपये खर्च किए गए थे।
दूसरी तरफ, अगर सरकार इस महंगाई को खुद झेलती है और उज्ज्वला लाभार्थियों की सब्सिडी बढ़ाती है, तो देश का राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) सारी हदें पार कर जाएगा। अचानक से बढ़ा हुआ यह हजारों करोड़ का भारी-भरकम सब्सिडी बिल भारत के बजट को खोखला कर देगा और इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को रोक देगा।
जब तक भारत इलेक्ट्रिक कुकिंग, सोलर स्टोव या बायोगैस के पूरी तरह स्वदेशी और आत्मनिर्भर विकल्प युद्ध स्तर पर तैयार नहीं करता, तब तक वैश्विक स्तर पर हुई कोई उठापटक ऐसे ही हमारे देश के करोड़ों लोगों की रसोई की आंच धीमी करती रहेगी।
भारत तय करता है तेल बाजार की कीमत
रूस से तेल खरीद रोकने की कोशिश है ट्रंप की आत्मघाती भूल
अगर डोनाल्ड ट्रंप ईरान संकट के खत्म होने के बाद भी भारत को रूस से सस्ता तेल खरीदने से रोकते हैं, तो यह अमेरिका का अब तक का सबसे बड़ा ‘सेल्फ-गोल’ होगा।
पश्चिमी देशों को यह कड़वा सच स्वीकार करना होगा कि भारत का रूस से तेल खरीदना असल में वह ‘शॉक एब्जॉर्बर’ है, जिसने पूरी दुनिया को तेल की आग से बचा रखा है।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार का एक निर्मम नियम है कि जो ग्राहक बाजार का एक बड़ा हिस्सा खरीदता है, वही परोक्ष रूप से उसके दाम भी तय करता है। भारत ही वह विशाल ग्राहक है, जिसके बाजार में रहने या न रहने से ग्लोबल इकॉनमी का पूरा संतुलन बदल जाता है।
अगर वाशिंगटन ने कूटनीतिक अहंकार में इस ग्राहक को हल्के में लेने की गलती की, तो दुनिया की कोई भी ताकत पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं को भयंकर मंदी से नहीं बचा पाएगी।
ईरान से युद्ध के दौरान वह खुद देख रहे हैं कि भारत का रूसी तेल खरीदना कोई भू-राजनीतिक अपराध नहीं है, बल्कि ग्लोबल मार्केट की लाइफलाइन है। यह रूस से तेल न खरीदने देने का ही नतीजा है कि खाड़ी में होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट आते ही अमेरिका समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का गला घुटने लगा।
भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत तेल आयात करता है और हर दिन लगभग 50 लाख बैरल कच्चे तेल की खपत करता है। मौजूदा समय में इस विशाल खपत का एक बड़ा हिस्सा, यानी करीब 15 से 20 लाख बैरल प्रतिदिन, सीधे रूस से आ रहा है।
अगर ट्रंप प्रशासन के दबाव या किसी नए प्रतिबंध के कारण भारत की यह रूसी सप्लाई लाइन कट जाती है, तो देश का ऊर्जा आयात शून्य नहीं होगा।
अपनी जरूरत पूरी करने के लिए भारत को तुरंत यह विशाल मांग लेकर खाड़ी देशों, यूरोप या अमेरिकी तेल बाजार में उतरना पड़ेगा।
जैसे ही भारत जैसा दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता अपनी पूरी ताकत के साथ खुले बाजार में आएगा, डिमांड और सप्लाई का पूरा गणित चरमरा जाएगा।
अचानक पैदा हुई इस कृत्रिम और भारी मांग से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल रातों-रात 150 डॉलर प्रति बैरल के खतरनाक स्तर को पार कर जाएगा। इस बेलगाम महंगाई और सप्लाई चेन के टूटने की सबसे भयानक सजा यूरोप और खुद अमेरिका की जनता को अपने गैस स्टेशनों पर भुगतनी पड़ेगी।
होर्मुज का संकट ईरान की पैदा की हुई मुसीबत हो सकती है, लेकिन रूस पर भारत को रोकना ट्रंप की अपनी चुनी हुई तबाही होगी।
ईरान से दोस्ती हो या दुश्मनी, भारत के लिए दोनों हैं महंगी !!!
- होर्मूज का रास्ता जब तक ब्लॉक रहेगा, तेल 200 डॉलर तक जाने का रहेगा दबाव
- एकमात्र विकल्प है रूस से तेल खरीदते रहना और ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ाना
खाड़ी के इस भीषण युद्ध के बीच भारत को लेकर ईरान का रुख न तो पूरी तरह दुश्मनी का है और न ही पक्की दोस्ती का।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आ रही मिली-जुली खबरों का कूटनीतिक सच यह है कि ईरान भारत को एक ‘जरूरी लेकिन अवसरवादी’ देश मान रहा है।
ईरान के शीर्ष नेतृत्व को भारत की अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ती सैन्य और रणनीतिक नजदीकियों से भारी चिढ़ है।
खासकर जब भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में ईरान से कच्चा तेल खरीदना पूरी तरह बंद कर दिया था, तब तेहरान ने इसे एक धोखे के रूप में देखा था। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज ईरान दुनिया में इतना अलग-थलग पड़ चुका है कि वह भारत को अपना खुला दुश्मन बनाने का जोखिम बिल्कुल नहीं ले सकता।
ईरान अच्छी तरह जानता है कि भारत का ‘चाबहार पोर्ट’ में निवेश और मध्य एशिया तक पहुंचने की उसकी नीतियां ईरान के लिए एक बड़ी आर्थिक जीवनरेखा हैं। इसलिए ईरान का मौजूदा रुख भारत के प्रति ‘संदेह और मजबूरी’ वाला है; वह नाराज जरूर है लेकिन भारत से कूटनीतिक दरवाजे बंद नहीं करना चाहता। अब अर्थशास्त्र के नजरिए से समझिए कि ईरान के इन दोनों ही रुख (सहयोगी या विरोधी) की स्थिति में भारत के ऊर्जा संकट का भविष्य क्या है।
पहली स्थिति: अगर ईरान पूरी तरह भारत का विरोधी बन जाता है, तो चाबहार पोर्ट का हमारा रणनीतिक निवेश रातों-रात शून्य हो जाएगा। ऐसी स्थिति में खाड़ी देशों से आने वाले भारत के कमर्शियल जहाज सीधे तौर पर ईरानी ड्रोन्स और मिसाइलों के निशाने पर आ सकते हैं। तब भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए बहुत महंगी माल ढुलाई देकर अमेरिका या अफ्रीकी देशों से तेल मंगाना पड़ेगा।
दूसरी स्थिति: अगर ईरान भारत के प्रति सहयोगी या नरम रुख रखता है, तब भी हमारे ऊर्जा संकट और अर्थव्यवस्था का कोई भला नहीं होने वाला। ईरान भले ही भारतीय जहाजों को निशाना न बनाए, लेकिन होर्मुज का रास्ता ब्लॉक होने से ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर के पार जाना तय है।
भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम भड़कने से देश में भयंकर महंगाई और मंदी आनी तय है। तथ्य एकदम साफ है कि होर्मुज का यह संकट जब तक खत्म नहीं होता, ईरान की दोस्ती या दुश्मनी दोनों ही स्थितियों में भारत को भारी आर्थिक कीमत चुकानी होगी। भारत के पास फौरी तौर पर खुद को बचाने का इकलौता विकल्प रूस से तेल आयात को और बढ़ाना और अपने रणनीतिक तेल भंडारों (SPR) का इस्तेमाल करना है।
स्वेज नहर से होर्मुज तक, ट्रंप ने दोहराई ऐतिहासिक भूल
1956 की जिस गलती ने डुबोया था ब्रिटेन को, आज उसी जाल में फंसा अमेरिका
इतिहास खुद को दोहराता नहीं है, बल्कि जो देश इतिहास से सबक नहीं सीखते, उन्हें वह बेरहमी से सजा देता है। इसकी पूरी संभावना है कि ईरान ने 1956 के ‘स्वेज नहर संकट’ का गहराई से अध्ययन किया है और आज होर्मुज में बिल्कुल वही अचूक आर्थिक रणनीति लागू कर दी है।
1956 में जब मिस्र ने स्वेज नहर को ब्लॉक किया था, तब तत्कालीन सुपरपावर ब्रिटेन, फ्रांस और इजरायल ने अपने सैन्य घमंड में मिस्र पर हमला कर दिया था। लेकिन नहर बंद होने से यूरोप में कच्चे तेल और जरूरी सामान की सप्लाई रातों-रात ठप हो गई।
नतीजा यह हुआ कि कुछ ही हफ्तों में ब्रिटेन और फ्रांस की अपनी ही अर्थव्यवस्था भयंकर मंदी की चपेट में आकर चरमराने लगी।
अपनी अर्थव्यवस्था को कोलैप्स (Collapse) होता देख इन पश्चिमी ताकतों को भारी बेइज्जती के साथ सेना वापस बुलानी पड़ी और हार माननी पड़ी। इसी इकलौती घटना ने ब्रिटेन और फ्रांस का ‘ग्लोबल सुपरपावर’ होने का रुतबा दुनिया से हमेशा के लिए खाक में मिला दिया था।
आज सात दशक बाद, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी ठीक उसी ऐतिहासिक और रणनीतिक भूल का शिकार हो रहे हैं। ईरान यह अच्छी तरह समझता है कि अमेरिका को हथियारों से हराना नामुमकिन है, इसलिए उसने 1956 की तरह सीधे अर्थशास्त्र की दुखती रग दबोच ली है।
होर्मुज का रास्ता आज की स्वेज नहर है, जिसे चोक करके ईरान ने दुनिया के 20 प्रतिशत तेल व्यापार और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बंधक बना लिया है। ट्रम्प का सैन्य घमंड उन्हें ईरान पर भारी बमबारी करने के लिए उकसा रहा है, लेकिन 150 डॉलर का कच्चा तेल उनके खुद के घरेलू बाजार को तबाह कर देगा। अमेरिका में गैस स्टेशनों पर हाहाकार और सप्लाई चेन का टूटना ठीक वैसा ही आर्थिक कोलैप्स लाएगा, जिसने 1956 में ब्रिटेन को घुटनों पर ला दिया था। ईरान ने इतिहास से अपना सबक बखूबी सीख लिया और यह ज्यादा पुरानी बात भी नहीं थी, लेकिन वाशिंगटन के नीति-निर्माता इसे पूरी तरह भूल गए।
यह कूटनीति का सबसे कड़वा सच है कि हथियारों की अंधी ताकत कभी भी चरमराती हुई अर्थव्यवस्था को बचा नहीं सकती।
सस्ते तेल की अफीम और अमेरिका की चौधराहट ले डूबी ग्लोबल इकॉनमी को !!! होर्मुज की कमजोरी का अब क्या है इलाज?
पूरी दुनिया आज होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसी अपनी अपनी इकॉनमी को लेकर जिस खौफ में है, उसकी इकलौती वजह खुद दुनिया के ज्यादातर देशों की लालची और अदूरदर्शी नीतियां हैं।
यह सवाल उठना एकदम लाजिमी है कि दशकों से इस समुद्री ‘चोकपॉइंट’ की जानलेवा कमजोरी पता होने के बावजूद दुनिया ने इसके ठोस विकल्प क्यों नहीं तलाशे। इस रणनीतिक भूल का यही सच है कि सस्ते ट्रांसपोर्टेशन का लालच और अमेरिका की सैन्य चौधराहट पर आंख मूंदकर किया गया अंधविश्वास।
समुद्र के रास्ते विशालकाय सुपरटैंकरों में लाखों बैरल तेल ढोना, हजारों किलोमीटर लंबी जमीनी पाइपलाइन बिछाने के मुकाबले हमेशा बेहद सस्ता और आसान रहा है। पूरी दुनिया को यह मुगालता था कि अमेरिकी नौसेना का जंगी बेड़ा हमेशा इस इलाके में मुस्तैद रहेगा और कोई भी देश होर्मुज को ब्लॉक करने की जुर्रत नहीं करेगा।
इसी गुमान में यूरोप से लेकर एशिया तक के देशों ने वैकल्पिक रास्तों पर अरबों डॉलर फूंकने के बजाय सस्ते तेल के मुनाफे पर ही अपना पूरा अर्थशास्त्र टिकाए रखा। अब जब ईरान ने इस ग्लोबल सप्लाई चेन की गर्दन मरोड़ दी है, तो पूरी दुनिया को अपनी इस ऐतिहासिक भूल की बहुत भारी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ रही है।
भविष्य के लिए दुनिया के पास अब पहला रास्ता यही है कि वह अपने तेल आयात को मिडिल ईस्ट से हटाकर अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की तरफ मोड़े। इसके अलावा, फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता खत्म करके अक्षय ऊर्जा (Renewable Energy) के इंफ्रास्ट्रक्चर को युद्ध स्तर पर तैयार करना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि वजूद बचाने की मजबूरी बन चुका है।
इस भयंकर वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत के लिए भी यह एक सीधा और सख्त ‘वेक-अप कॉल’ (चेतावनी) है कि वह मिडिल ईस्ट के भरोसे नहीं बैठ सकता। भारत के पास फौरी विकल्प यही है कि वह रूस, अमेरिका और अफ्रीकी देशों से अपने तेल आयात को और ज्यादा डायवर्सिफाई करे ताकि खाड़ी देशों पर निर्भरता न्यूनतम हो जाए।
घरेलू स्तर पर भारत को अपने ‘रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार’ (SPR) की क्षमता को तुरंत कई गुना बढ़ाना होगा, ताकि ऐसी किसी भी नाकेबंदी में देश महीनों तक बिना रुके चल सके। लंबे समय के समाधान के तौर पर नई दिल्ली को इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, सोलर एनर्जी और बायोफ्यूल के अपने राष्ट्रीय लक्ष्यों को तय समय से बहुत पहले हासिल करना ही होगा।
अब वक्त आ गया है कि दुनिया और भारत सस्ते तेल की इस अफीम से बाहर निकलें, वरना भविष्य में भी कोई न कोई देश ऐसी ही कमजोर नस दबाकर वैश्विक अर्थव्यवस्था को ब्लैकमेल करता रहेगा।
अब ये दिन आ गए हैं ट्रंप के। अमेरिका, भारत समेत दुनिया से भीख मांग रहा है कि वह रूस से तेल खरीदे। टैरिफ के बहारे सारी दुनिया को जूते की नोक पर रखने वाले ट्रम्प के सामने आखिर ये नौबत क्यों आ गई? दरअसल ईरान युद्ध से दुनिया का ऊर्जा बाजार अस्थिरता के कुएं में गिर रहा है और अमेरिका का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार तेजी से खाली हो रहा हैं। अमेरिका बुरी तरह से घबरा गया है क्योंकि धीरे-धीरे अमेरिका की ऊर्जा की आपूर्ति में कमी आ रही है। इससे देश में ऊर्जा की कीमतें बढ़ेगी। जिसका अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इससे अमेरिकी उपभोक्ताओं और उद्योगों की लागत बढ़ेगी। और अमेरिका आर्थिक तबाही के रास्ते पर आ जाएगा। इसलिए अब ट्रम्प ने भारत के बाद अब 30 अन्य देशों से कहा कि वह रूस से तेल खरीदें।
भारत तटस्थ दिखने की कोशिश करता है पर वह है नहीं। ईरान के मामले में उसने जल्दबाजी की। खामेनेई की हत्या की निंदा नहीं कर सकते थे तो न करते पर स्कूल में मिसाइल दाग कर बच्चियों के नरसंहार की निंदा की जानी चाहिए थी। ईरान पुराना साथी है। फिर भी ईरानी राजदूत ने भारत को दोस्त कह कर और जहाजों को रास्ता दे कर सकरात्मक संदेश दिए हैं।
-दया शंकर शुक्ल सागर



