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सुख-दुख

भविष्य में ईश्वर लुप्त हो जाएगा!

अमिता नीरव-

कुछ साल पहले एक खबर पढ़ी थी कि दुनिया में नास्तिकों की संख्या बढ़ रही है। गूगल पर सर्च किया तो पाया कि दुनिया में नास्तिक या धर्म निरपेक्ष तीसरी बड़ी जनसंख्या है, पहले नंबर पर क्रिश्चियंस और दूसरे पर इस्लाम है। इस तथ्य ने चौंकाया था। हमारे आसपास, बल्कि दक्षिण एशिया तक में धार्मिकता उफान पर है तो फिर ये कहाँ के लोग हैं जो नास्तिक हो रहे हैं?

इसी दौरान पढ़ा कि दुनिया में इस्लाम छोड़ने वाले लोग भी तेजी से बढ़ रहे हैं औऱ वे खुद को एक्स-मुस्लिम कहलाना पसंद करते हैं। थोड़ा सर्च किया तो सबसे पहली खबर धुर दक्षिणपंथी वेबसाइट पर मिली। जाहिर है उसे तो खारिज ही कर दिया। पिछले वक्त में मेरे अपने संपर्क में एक-दो एक्स-मुस्लिम आए तो लगा कि यह तथ्य खारिज करने योग्य तो नहीं ही है।

इन दोनों खबरों ने इस ट्रेंड के बारे में औऱ जानने की उत्सुकता पैदा की। थोड़ा सर्च करना और पढ़ना शुरू किया तो पाया कि नास्तिक जनसंख्या यूरोप और एशिया के उन देशों में तेजी से बढ़ रही हैं, जहाँ जीवन में कम संघर्ष हैं, सोशल सिक्योरिटी सिस्टम मजबूत है, हर तरफ समृद्धि और शांति है। वहीं एक्स मुस्लिम भी वही हो रहे हैं जिन्हें जीवन की मूलभूत सुविधाएँ, बल्कि लग्जरी सहज रूप से उपलब्ध हैं।

इसी बीच क्या भविष्य में ईश्वर लुप्त हो जाएगा इस विषय पर एक लेख नजरों के सामने से गुजरा। इसमें लेखक ने ईश्वर के निकट भविष्य में गायब हो जाने की संभावना को सिरे से नकार दिया। इसके लिए उन्होंने कई सामाजिक औऱ मनोवैज्ञानिक कारण दिए। रैचेल न्युअर के बीबीसी पर प्रकाशित इस लेख में रैचेल बताते हैं कि ईश्वर इस अनिश्चित दुनिया में सुरक्षा का आश्वासन जैसा है।

वे बताते हैं कि जिन राज्यों में नास्तिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही हैं वहाँ आर्थिक, राजनीतिक स्थायित्व और व्यक्तिगत सुरक्षा बाकी जगहों से बेहतर है। इस सिलसिले में रिसर्च करने वाले समाजशास्त्री और धर्म निरपेक्षता के अध्येता फिल जुकरमेन कहते हैं कि, सामाजिक सुरक्षा धार्मिक विश्वासों को खत्म करती है। पूँजीवाद, तकनीक औऱ शिक्षा का विस्तार भी धार्मिकता को कम करने में भूमिका निभाते हैं।

जापान, ब्रिटेन, कनाडा, दक्षिण कोरिया, नीदरलैंड, चेक रिपब्लिक, एस्टोनिया, जर्मनी, फ्रांस और उरूग्वे जैसे देशों में नास्तिकों की संख्या बढ़ रही है। यहीं लगभग दो दशक पहले लोग धार्मिक हुआ करते थे। इसकी वजह यह है कि यहाँ शिक्षा का प्रसार हुआ है, सोशल सिक्योरिटी सिस्टम मजबूत है, असमानता कम है। इसी सिलसिले में लेख बताता है कि क्राइस्टचर्च के आतंकी हमले के बाद न्यूजीलैंड में एकाएक लोग आस्तिक होने लगे थे।

थोड़ा गंभीरता से देखेंगे तो पाएँगे कि अक्सर ईश्वर के होने या न होने पर वे ही लोग बहस करते हैं जो सुविधासंपन्न होते हैं। जो हर दिन जीवन की जद्दोजहद में लगे होते हैं, वे इस किस्म की बहस का हिस्सा नहीं होते हैं। वे इस बात की कल्पना करने के लिए भी तैयार नहीं होते हैं कि इस दुनिया में ईश्वर नहीं है। अब इस पर विचार कीजिए कि क्यों? क्यों वे ईश्वर के न होने पर विचार करने के लिए तैयार नहीं होते हैं?

हम बुद्धि के शिकंजे में फँसे लोग समझ ही नहीं सकते हैं कि ईश्वर गरीबी, दुख, अभाव, रोग से संघर्ष करते लोगों के लिए क्या है? ईश्वर विचार है, मगर ये विचार उन लोगों के जीवन में किस कदर रोशनी और उम्मीद देता है इसे हम बुद्धि के इस्तेमाल से नहीं समझ पाएँगे। यूँ ही नहीं बड़े बुजुर्गों ने कहा है कि ‘हारे को हरि नाम…’ इसके गहरे निहितार्थ है औऱ उतना ही गहरा दर्शन भी है। नाउम्मीद लोगों के जीवन में उम्मीद का दीया है ईश्वर का विचार।

अपनी इस हायपोथिसिस पर मैं पहले भी लिख चुकी हूँ औऱ एक भयंकर रेशनलिस्ट ने इसे अंधविश्वास फैलाने वाली पोस्ट कहकर मुझे अनफ्रेंड कर दिया था। मैं उसके बाद से लगातार इस विषय पर सोचती रही हूँ और पा रही हूँ कि समाजशास्त्र की किताबों में ईश्वर भय की संतान है, बाद के वक्त में ईश्वर कई सारे प्रश्नों का उत्तर हुआ और जैसे जैसे दुख बढ़े, वैसे-वैसे ईश्वर उम्मीद का केंद्र हुआ।

दस दिन पहले मैंने मशहूर डच पेंटर विन्सेन्ट वान गॉग की जीवनी पढ़ी। विन्सेन्ट जब बेल्जियम में बोरीनाज की कोयला खदानों के मजदूरों के बीच इवांजेलिस्ट के तौर पर जाने की तैयारी कर रहा था, तब उसे ग्रीक औऱ लैटिन पढ़ाने के लिए एक टीचर मेंडेस के पास भेजा गया। मेंडेस उसे एक दिन कामगारों की एक बस्ती की तरफ ले गए।

यहाँ बेशुमार आरा मशीनें थीं, कामगारों की लकडी की बनी छोटी कॉटेजों में आबादी की बहुतायत थी, पूरे इलाके में कई नहरों का जैसे ताना-बना बिछा हुआ था।
‘ऐसे क्षेत्र के लोगों का पादरी होना बहुत दिलचस्प होता होगा!’, विन्सेंट ने कहा।

‘हाँ…’, मेंडेस ने जवाब दिया, अपना पाइप भरने के बाद उन्होंने तंबाकू की शंक्वाकार थैली विन्सेंट की ओऱ बढ़ाई, ‘हाँ उधर शहर वाले हमारे दोस्तों की बनिस्बत इन लोगों को धर्म औऱ ईश्वर की ज्यादा जरूरत है।’

वे एक छोटा-सा लकड़ी का पुल पार कर रहे थे जो जापानी हो सकता था। विन्सेन्ट ने ठिठककर पूछा, ‘क्या मतलब है आपका श्रीमान?’

‘इन कारीगरों को…’, मेंडेस ने अपनी बाँह धीमे से झुलाते हुए कहा, ‘बहुत कठिन जिंदगी बितानी होती है। जब ये बीमार पड़ते हैं, इनके पास डॉक्टर तक जाने का पैसा नहीं होता। कल का खाना आज की मेहनत से ही आता है औऱ बहुत कड़ी मेहनत से, इनके घर, तुम देख सकते हो, गरीब औऱ छोटे हैं। अपराध और सजा से ये लोग बस हाथ भर के फासले पर होते हैं, जिंदगी के साथ इन्होंने बहुत खऱाब सौदा किया, शांति के लिए इन्हें ईश्वर के बारे में सोचने की आवश्यकता होती है।’

विन्सेंट ने पाइप जलाया और तीली नीचे नहर में फेंकी, ‘और ऊपर शहर में रहने वाले?’, उसने पूछा।

‘उनके पास अच्छे कपड़े हैं, अच्छे पद हैं, संकट के समय के लिए पर्याप्त पैसा है, जब वे भगवान के बारे में सोचते हैं, वे एक खाते-पीते संभ्रांत लोग होते हैं, जिन्हें अपनी बनाई दुनिया में हर चीज को ठीक-ठाक चलता देखकर खुशी होती है।’

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‘दे बोरीनाज’, वे बोले, ‘कोयला खदानों का इलाका है। तकरीबन हरेक आदमी खान के भीतर काम करने जाता है। वे हजारों, लगातार घटने वाले खतरों के बीच जीते हैं। औऱ उन्हें उतनी मजदूरी मिलती है कि वे बमुश्किल अपने शरीर औऱ आत्मा को इकट्ठा रख पाएँ। उनके घर जर्जर झोंपड़े होते हैं, जहाँ उनके बीवी-बच्चे साल भर ठंड, बुखार और भूख से काँपते रहते हैं।’

विन्सेन्ट की समझ में नहीं आया कि वे उसे यह क्यों बता रहे थे, ‘कहाँ है यह द बोरीनाज?’, उसने पूछा।

‘बेल्जियम के दक्षिण में, मोन्स के पास मैं कुछ समय वहाँ रहकर आया हूँ और विन्सेन्ट अगर दुनिया में किसी को ईश्वर के उपदेशों की जरूरत है तो वहाँ के रहने वालों को!’

पढ़कर लगा कि मेरी हायपोथिसिस सही है, दुख ईश्वर के विचार को पोषित करता है।

नोट – पोस्टकर्ता खुद आस्तिक है।


शीतल पी सिंह- चूँकि पोस्टकर्ता ने कहा कि वह आस्तिक है , इसलिए उसके तार्किक विचलन की वजह सरल हो गई ।
इस विस्तारित टिप्पणी में ईश्वर का अस्तित्व किसके हित साधने का उपक्रम है और किसको शिकार करने का, यह अनुपस्थित है । उसकी जगह एक पश्चिमी विचारक की लेखक की राय से मिलती जुलती (पुरानी दार्शनिक व्याख्या) धारणा का लंबा संदर्भ नत्थी है । ईश्वर पर दार्शनिक जगत में अब बेहद विस्तार से काफ़ी बड़ा काम हो चुका है । समस्या यह है कि आज के युग में हम तक सूचना पहुँचने के स्त्रोत संगठित तौर पर उनके क़ब्ज़े में हैं जिनके क़ब्ज़े में दुनियाँ है, दुनिया के संसाधन हैं इसलिए किसी नारवेजियन की तुलना में किसी तीसरी दुनियाँ के नागरिक को दर्शनशास्त्र के पिछले दशकों के वे काम जो मानवहित के हैं प्राप्त होना असंभव है । यह परिस्थिति दरअसल दर्शनशास्त्र ही नहीं हर प्रकार के ज्ञान के बारे में है । नतीजतन हमारे निष्कर्ष पिछड़े हुए हैं जैसे हम पिछड़े हुए हैं । ईश्वर की रक्षा में यही अंतर्विरोध प्रमुख कारक है और लंबे समय तक बना रह सकता है ।

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