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उत्तर प्रदेश

जबलपुर के व्यापारी का फ्रीज़ बैंक अकाउंट, वरिष्ठ पत्रकार संजय सिन्हा की मुहिम और सीएम के मीडिया एडवाइज़र मृत्युंजय कुमार का हस्तक्षेप!

(तस्वीर में एकदम बाएं संजय सिन्हा जी और बीच में पीड़ित व्यापारी दीपक पटेल जी)

संजय सिन्हा-

हुर्रे…हम सब जीत गए…. यह आपका साथ है, यह आपका दम है, कि Deepak Patel जी के एकाउंट फ्रीज किए जाने के खिलाफ फेसबुक पर शुरू की गई मुहिम महज़ चार दिनों में जीत में बदल गई। दीपक पटेल जी पिछले दो वर्षों से परेशान थे। उनके 18 लाख रुपये वाले करेंट एकाउंट को बैंक ने फ्रीज कर दिया था। वजह सिर्फ इतनी थी कि किसी ने उस एकाउंट में 1250 रुपये जमा करा दिए थे, जिसे बरेली पुलिस ने साइबर फ्रॉड से जुड़ा हुआ मान लिया।

दीपक जी लगातार आईसीआईसीआई बैंक से अपील कर रहे थे कि जब किसी अज्ञात व्यक्ति ने साढ़े बारह सौ रुपये जमा कराए हैं, तो पूरा एकाउंट फ्रीज करना किस न्याय के तहत है। लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही थी। अपनी पीड़ा दीपक जी ने मुझसे साझा की। मैंने उसे लिखा।

मैंने देश के प्रधानमंत्री Narendra Modi जी और वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman जी को टैग किया। लेकिन असली मोड़ तब आया, जब यह मामला उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के कार्यालय तक पहुंचा।

वहां यह बात संज्ञान में लाई गई कि बरेली साइबर क्राइम पुलिस के एक इंस्पेक्टर ने जबलपुर में स्थित ICICI बैंक, आधारताल शाखा को पत्र लिखकर किसी नागरिक का एकाउंट फ्रीज करा दिया है। एकाउंट दो साल से फ्रीज्ड था। उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस पर त्वरित कार्रवाई की।

सुबह मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार Mrityunjay Kumar जी का फोन आया कि तत्काल कार्रवाई होगी। देर शाम दीपक जी का फोन आया- “संजय जी, बैंक एकाउंट से फ्रीज हट गया है। एकाउंट चलने लगा है।”

MYogiAdityanath जी, आपका आभार। Chief Minister Office Uttar Pradesh आपका आभार। इसे कहते हैं सीएम इन ऐक्शन। और मेरे प्यारे परिजनों, आपका भी धन्यवाद। आपने इस श्रृंखला को जिस तरह लाइक किया, साझा किया, उससे बिना किसी घोषणा के ही यह एक जनआंदोलन सा खड़ा हो गया।

इस बात के लिए भी धन्यवाद कि आपने धैर्य रखा। आपने मुझसे कहानी नहीं मांगी, बल्कि कहा कि जनसरोकार की इस लड़ाई में हम सब साथ हैं। मैं एक चिड़िया हूं। आप सब के साथ मिलकर हम अनेक चिड़िया बन गए। आप सब बधाई के पात्र हैं। सबका शुक्रिया। यशवंत सिंह (Yashwant Singh) जी आपको धन्यवाद।

नोट- लड़ाई जारी रहेगी तब तक जब तक नियम नहीं बन जाता कि जिसके एकाउंट में पैसे आए हैं, उसका पूरा एकाउंट फ्रीज नहीं होगा जैसा नियम नहीं बन जाता। मेरे पास हजार से अधिक शिकायतें आई हैं, जहां एकाउंट इसी तरह फ्रीज्ड है।


पूरा मामला समझने के लिए संजय सिन्हा जी की इसके पहले की पोस्ट पढ़ें-

फॉलोअप कथा- आज एक्स्ट्रा… मैं अकेला चला था, लेकिन कारवां जुड़ता चला गया और मामला आगे तक पहुंच गया। मैंने फेसबुक पर Deepak Patel की व्यथा लिखी थी। कहानी किसी के द्वारा 1250 रुपये के एक डिपाजिट से शुरू होती है और जबलपुर के एक व्यापारी का बैंक खाता फ्रीज कर दिया जाता और उसमें उनके लाखों रुपए फंस जाते हैं।

इससे एक व्यापारी की रोजमर्रा की जिंदगी, कारोबार और आत्मसम्मान को चोट पहुंचती है लेकिन सुनने वाला कोई नहीं। बरेली साइबर क्राइम पुलिस ने यह कदम उठाया था बिना यह समझे कि सामने कोई अपराधी नहीं बल्कि एक सामान्य कारोबारी है, जिसकी पूरी मेहनत उसी खाते में कैद हो गई है। जबलपुर आधारताल स्थित ICICI बैंक ने बिना पड़ताल किए इंस्पेक्टर की चिट्ठी पर दीपक पटेल जी का एकाउंट फ्रीज कर दिया।

दीपक पटेल से मेरी मुलाकात जबलपुर एयरपोर्ट पर हुई। वहां टैक्सी वालों की रंगदारी से मैं परेशान था और दीपक जी ने मेरी मदद इस रूप में की कि वो मुझे अपनी कार में घर छोड़ने तक आए। रास्ते में यूं ही उनसे मेरी बात हुई। कोई मंच नहीं था, कोई कैमरा नहीं था। बस एक परेशान आदमी और उसकी कहानी थी, जो बातों-बातों में मेरे सामने आ गई। मैंने वही लिखा जो सुना और वही लिखा जो महसूस किया। फेसबुक पर आवाज उठी और फिर यह साबित हुआ कि अगर बात सच की हो तो वह दीवारों से टकराकर लौटती नहीं बल्कि आगे बढ़ती है।

अपने साथी Yashwant Singh ने बताया कि यह विषय Chief Minister Office Uttar Pradesh योगी आदित्यनाथ जी के कार्यालय तक पहुंच चुका है और मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार मुझसे संपर्क करेंगे। कुछ ही समय बाद मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार Mrityunjay Kumar जी का मेरे पास फोन आया। उन्होंने दीपक पटेल जी की तकलीफ को समझा और दीपक पटेल जी का पत्र मुझसे मंगवाया।

मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि बरेली साइबर क्राइम पुलिस इस प्रकरण को अब हल्के में नहीं ले पाएगी। जबलपुर के आधारताल स्थित ICICI बैंक के ब्रांच मैनेजर को पत्र लिखकर दीपक पटेल के फ्रीज खाते से रोक हटाने की प्रक्रिया जल्दी शुरू की जाएगी। जैसे ही यह होता है मैं आपको तुरंत इसकी जानकारी दूंगा।

यह पूरी घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि एक आम आदमी को अपने हक के लिए बहुत कुछ असाधारण करने की जरूरत नहीं होती। न किसी बड़े पद की जरूरत होती है न किसी रसूख की। बस जरूरी होता है खड़े होना अपनी बात कहना और चुप न रहना।

जब आदमी खड़ा होता है तो रास्ते अपने आप खुलते चले जाते हैं। “जदि तोर डाक शुने केउ ना आसे तबे एकला चलो रे”


तीन दिल मिल गए हैं, मगर खुल्लम-खुल्ला (फ्रॉड, पुलिस और बैंक)…….. मान लीजिए आपके करंट अकाउंट में पचास लाख रुपये पड़े हैं। आप बताइए, उस पर आपको कितना ब्याज मिलेगा? एक भी रुपया नहीं। करंट अकाउंट पर ब्याज नहीं मिलता।

बैंक वाले कहते हैं कि वो आपको सुविधा देते हैं। दिन में जितनी बार चाहें चेक काटिए। जितनी बार चाहें पैसे निकालिए और जमा करिए। यही सेवा है। और यही करंट अकाउंट हर व्यापारी की जिंदगी की रीढ़ है। उसी अकाउंट में व्यापार की कमाई आती है। उसी अकाउंट से भुगतान होता है।कर्मचारी, मजदूर की दिहाड़ी जाती है। टैक्स जाता है। किराया जाता है। करंट अकाउंट के बिना कोई भी व्यापार नहीं चलता। वह तिजोरी नहीं है। वह रुकने के लिए नहीं बना है। वह चलने के लिए बना है। इसीलिए उसे रनिंग अकाउंट कहा जाता है।

छोटा व्यापारी हो या मझोला व्यापारी, सब इसकी अहमियत जानते हैं। इसीलिए व्यापारी अपने करंट अकाउंट में पैसा जमा रखते हैं। जरूरत पड़ते ही निकालने के लिए। लेकिन वो यह भी जानते हैं कि उस पैसे पर उसे ब्याज नहीं मिलेगा। क्योंकि बैंक वाले उसे फिक्स्ड डिपॉजिट नहीं मानते। है भी नहीं।

अगर आपको ब्याज चाहिए तो बैंक वाले कहेंगे कि एफडी कराइए। एफडी में बैंक निश्चिंत है कि आपने पैसा एक साल या दो साल के लिए उसके हवाले कर दिया है। बैंक को उन पैसों से पैसे कमाना है। किसी को लोन देना है। ब्याज वसूलना है। और उसी कमाई का थोड़ा हिस्सा आपको भी एफडी में मिलता है।

यह कोई गूढ़ गणित नहीं है। यह कोई अर्थशास्त्र की भारी भरकम किताब का अध्याय नहीं है। यह साधारण अंक गणित है। यही बैंकिंग सिस्टम की बुनियाद है। बैंक जनता के पैसों से चलता है। उन्हीं पैसों को आगे उधार देता है। उसी ब्याज से उसका मुनाफा बनता है। उसी से बैंक की इमारतें खड़ी होती हैं। उसी से चेयरमैन से लेकर क्लर्क तक की तनख्वाह निकलती है।

इसीलिए जब आपके अकाउंट में पैसा होता है तो बैंक मैनेजर मुस्कुराता है। चाय पिलाता है। समझाता है कि इस पैसे को एफडी में डाल दीजिए। आप भी डालते हैं। जो पैसा तुरंत काम का नहीं होता। लेकिन अगर वही मैनेजर आपसे यह कहे कि आपका पैसा हम बिना ब्याज के रखेंगे और मनचाहे तरीके से इस्तेमाल भी करेंगे तो आप उसकी बात नहीं मानेंगे।

यहीं से शुरू होता है वह नया अर्थशास्त्र, जो किताबों में नहीं है। एक ऐसा गणित जो आम आदमी की समझ से बाहर रखा गया है। पिछले कुछ दिनों से मैं लगातार लिख रहा हूं कि अगर आपके बैंक अकाउंट में कोई पांच सौ या हजार रुपये भी (फ्रॉड) जमा करा देता है, तो उसकी सूचना साइबर पुलिस तक अपने आप पहुंच जाती है। आप शिकायत नहीं करते। आपको पता भी नहीं चलता। लेकिन सिस्टम में एक लाल बटन जल उठता है। शक पैदा हो जाता है।

फिर जांच शुरू होती है। जांच इस बात की नहीं होती कि पैसा कितना है। किसने जमा कराया। जांच इस बात की होती है कि अकाउंट किसका है। कौन सा अकाउंट चल रहा है। कौन सा अकाउंट जिंदा है। कहां पैसा ज्यादा है। वह अकाउंट जबलपुर के व्यापारी Deepak Patel का हो सकता है। किसी और शहर के किसी और व्यापारी का भी हो सकता है। नाम इसलिए लिया गया क्योंकि मेरे पास पहली शिकायत वहीं से आई थी। सबसे पहले उनकी कहानी लिखी गई। डीएम, सीएम, पीएम सबको टैग किया गया। लेकिन सवाल वही कि आखिर ऐसा हुआ क्यों।

बरेली की साइबर पुलिस ने जबलपुर के ICICI बैंक (जहां एकाउंट है) को एक चिट्ठी लिखी। कहा गया कि इस अकाउंट में 1250 रुपये संदिग्ध तरीके से आए हैं। इसलिए पूरा अकाउंट फ्रीज कर दिया जाए। अब यहां सवाल उठता है। बैंक मैनेजर को क्या करना चाहिए था। क्या उसे यह नहीं कहना चाहिए था कि 1250 रुपये पर संदेह है तो उन्हें लियन में डाल देते हैं? लेकिन जिस अकाउंट में 18 लाख रुपये पड़े हैं उसे पूरी तरह फ्रीज करना किस नियम के तहत है?

लेकिन बैंक मैनेजर ने सवाल नहीं किया। उसने नियम नहीं पूछा। उसने विवेक नहीं लगाया। उसने आदर्श कर्मचारी बनना चुना। और पूरा अकाउंट फ्रीज कर दिया। ग्राहक को लिख कर बता दिया कि अब आप पैसे निकाल नहीं सकते। हां, जमा करना चाहें तो कर सकते हैं। यानी पैसा आपका है। मेहनत आपकी है। टैक्स आपने दिया है। लेकिन अधिकार आपका नहीं है।

अब जरा उस व्यापारी की हालत सोचिए। बैंक से ऐसा पत्र आते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक जाती है। फ्रॉड शब्द सुनते ही डर पैदा होता है। वह सोचता है कि कहीं पुलिस न आ जाए। कहीं बदनामी न हो जाए। वह किसी से कहता भी नहीं। रिश्तेदारों से नहीं। दोस्तों से नहीं। पड़ोसियों से नहीं। क्योंकि समाज सवाल पहले करता है और सच बाद में समझता है।

और फिर वह चुप बैठ जाता है। काम प्रभावित होता है। भुगतान रुकता है। तनाव बढ़ता है। रातों की नींद जाती है। कई लोग नींद की दवाइयों पर पहुंच जाते हैं। और बैंक? बैंक जानता है कि यह पैसा अब हिलेगा नहीं। पुलिस ने उस पर ताला डाल दिया है। दो साल हो जाते हैं। तीन साल हो जाते हैं। पैसा वहीं पड़ा रहता है। अब जरा इस पर गणित लगाइए। अगर बैंक ने उन 18 लाख रुपये को सिर्फ दस प्रतिशत ब्याज पर भी आगे उधार दिया हो तो दो साल में उसकी कमाई होती है तीन लाख साठ हजार रुपये। यह रकम कहां से आई? पटेल साहब के फंसे हुए पैसों से। पटेल साहब को क्या मिला। एक भी रुपया नहीं।

और यह कहानी सिर्फ एक व्यापारी की नहीं है। आपने खुद पिछले दो दिनों में कई सौ लोगों की दर्द भरी कहानी संजय सिन्हा से सुन ली है। कई सो लोगों ने कह दिया। कई हजार लोग बोलने की हिम्मत नहीं करते। यह कोई इक्का दुक्का मामला नहीं है। यह हजारों और लाखों खातों की कहानी है। बिना एफडी, बिना ब्याज, बिना सहमति – बैंक के पास अटका हुआ पैसा। और मजे की बात यह है कि कई मामलों में कई बैंक सिफारिश पर फ्रीज आंशिक रूप से खोल देते हैं। सिर्फ लियन में डाले गए पैसे फंसे रहते हैं। बाकी पैसा चलने लगता है। मतलब नियम सबके लिए एक जैसा नहीं।

सवाल उठता है कि अगर नियम एक नहीं हैं तो न्याय कैसे होगा। यह बैंक की मजबूरी नहीं है। यह उसकी नीति है। क्योंकि इससे बेहतर सौदा और क्या हो सकता है। बिना ब्याज के पैसा बैंक के पास। और उसका इस्तेमाल पूरा। और जिसे बहुत जल्दी होती है वह लेफ्ट-राइट रास्ता ढूंढ लेता है। किसी का अकाउंट जल्दी खुल जाता है। किसी का सालों बंद रहता है। बैंक के हाथ में मुनाफा है। पुलिस के हाथ में अधिकार है। व्यापारी के हाथ में डर है।

पटेल साहब के अगर वही 18 लाख रुपये एफडी में होते तो आठ फीसदी के हिसाब से कम से कम दो लाख अठासी हजार रुपये उन्हें बतौर ब्याज मिलता। यह उसका सीधा नुकसान है। और यही बैंक का सीधा फायदा। संजय सिन्हा ने गणित जानबूझकर साधारण रखा है। क्योंकि आप जटिल आंकड़ों में उलझेंगे नहीं। आम आदमी तो चुनाव से पहले अकाउंट में आए दस हजार रुपये को ही पांच साल तक गिनता रहता है। लेकिन आप थोड़ा सा सोचेंगे, ये समझेंगे कि आप भी इसके शिकार हो सकते हैं तो समझ जाएंगे कि यह खेल हजारों करोड़ रुपयों का है। कुछ सौ रुपये का एक संदिग्ध ट्रांजैक्शन। एक इंस्पेक्टर की चिट्ठी। एक बैंक मैनेजर का हस्ताक्षर।

बिना शोर चलता हुआ अरबों का कारोबार। यही है आज का डिजिटल इंडिया। नोटबंदी के बाद का नया भारत। जहां पैसा आपका है। लेकिन कब और कैसे मिलेगा यह सिस्टम तय करता है।

नोट- यह पूरी कहानी बैंकिंग सिस्टम के भीतर से मिली जानकारी पर आधारित है। कोई अफवाह नहीं। कोई कल्पना नहीं। यह सिर्फ सवाल है। और अब इन सवालों का जवाब सरकार को देना होगा।

आइए मिल कर गाना गाते हैं- तीन दिल (फ्राड, पुलिस, बैंक) मिल गए हैं, मगर खुल्लम खुल्ला, सबको हो गई है खबर, चुपके-चुपके…


अब मन में घुसता जहरीला रसायन…. एरिन ब्रॉकोविच एक फिल्म है, लेकिन एक सच्ची कहानी। एक साधारण, बेरोजगार महिला, तीन बच्चों की अकेली मां, जिसके पास न कानून की डिग्री थी और न किसी ताकतवर पद का सहारा। वह एक वकील के कार्यालय में मामूली काम करती थी, लेकिन उसी महिला ने अमेरिका की दिग्गज बिजली कंपनी पीजी एंड ई के खिलाफ ऐसा मुकदमा खड़ा किया जिसने इतिहास बदल दिया।

कैलिफोर्निया के एक छोटे से शहर में यह कंपनी जमीन के पानी में हेक्सावेलेंट क्रोमियम जैसा जहरीला रसायन मिला रही थी। लोग कैंसर और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे। कोई कुछ कहता नहीं था। एरिन के सामने एक मामूली शिकायत भर आई थी। फिर उसने फाइलें खंगालीं, बीमार लोगों से घर घर जाकर बात की। लोगों का दर्द सामने आने लगा। सबूत इकट्ठा होने लगे और वो मामूली सी लड़की सच के साथ डट कर खड़ी हो गईं।

पूरा शासन, प्रशासन और सिस्टम उनके सामने खड़ा हो गया, लेकिन अंत में झुकना सिस्टम को पड़ा। 1996 में कंपनी को 33.3 करोड़ डॉलर का मुआवजा देना पड़ा। उस समय यह अमेरिका का सबसे बड़ा पर्यावरणीय समझौता था। इस कहानी का मूल संदेश साफ था कि सच और न्याय के लिए लड़ने के लिए न डिग्री चाहिए और न ही पद, ईमानदारी, मेहनत और साहस हो तो एक आम इंसान भी बड़ी से बड़ी व्यवस्था को झुका सकता है।

तीन दिन पहले जबलपुर एयरपोर्ट पर टैक्सी माफिया की गुंडागर्दी के बाद शहर के एक साधारण व्यापारी, एमरोन बैटरी के डीलर दीपक पटेल जी ने मुझ जैसे एक अनजान व्यक्ति की मदद की और उसे अपनी कार में बिठाकर घर तक छोड़ दिया। वह जबलपुर एयरपोर्ट पर टैक्सी माफिया की हरकतों से पहले से वाकिफ थे। रास्ते में बातचीत देश में फैलते भ्रष्टाचार और डिजिटल लेनदेन की हकीकत पर हुई। तभी Deepak Patel जी ने अपनी व्यथा साझा की। उन्होंने बताया कि किसी व्यक्ति ने ऑनलाइन भुगतान के नाम पर मात्र 1250 रुपये उनके खाते में डाले और उसके बाद उनका पूरा करंट अकाउंट फ्रीज करवा दिया गया।

बाद में एक वकील के माध्यम से संदेश भिजवाया गया कि एक या दो लाख रुपये दे दीजिए तो खाता खुल जाएगा। दीपक पटेल इसके लिए तैयार नहीं हुए। जाहिर है आईसीआईसीआई बैंक में उनका खाता आज भी फ्रीज है। अब एक साधारण व्यापारी अपराधी की तरह भटक रहा है।

उन्होंने जब ये कहानी मुझे सुनाई तब उनका एक प्रश्न था- क्या किसी के एकाउंट में कोई कुछ पैसे जमा करा कर उसका एकाउंट फ्रीज करा दे सकता है? दीपक पटेल से बात करते हुए संजय सिन्हा ने सोचा था कि यह एक व्यक्ति की कहानी होगी। सिर्फ उनकी शिकायत।

लेकिन जब यह कहानी फेसबुक पर उकेरी गई तो एक के बाद एक पीड़ित सामने आते चले गए। मैं सिर्फ उनके नाम लिख रहा हूं, जो मेरी पोस्ट पर सामने आए हैं। जिन्होंने मुझसे मेसेंजर, व्हाट्सएप पर संदेश भेज कर अपनी पीड़ा जाहिर की है, उनके नाम नहीं लिख रहा, जो कई सौ हैं। सौ रुपये, तीन सौ पचास रुपये, बारह सौ रुपये, हजार रुपये जैसे छोटे ट्रांजेक्शन के नाम पर लोगों के पूरे बैंक खाते महीनों और वर्षों से फ्रीज पड़े हैं। कोई राजस्थान का है, केस गुजरात का बताया जा रहा है और व्यक्ति कर्नाटक में रहता है। कोई दिल्ली का खाता लेकर बिहार में भटक रहा है। कोई पुणे से बेंगलुरु जाने को मजबूर है। हर जगह पुलिस, बैंक और साइबर सेल के चक्कर हैं। हर जगह या तो चुप्पी है या खुली रिश्वत की मांग।

अब यह सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट नहीं है। यह सैकड़ों पीड़ितों की सामूहिक व्यथा है। यह एक सार्वजनिक शपथपत्र है, जिसमें हर बयान एक गवाही है। सवाल सीधा है। अगर ये सभी लोग अपराधी हैं तो इन्हें गिरफ्तार कीजिए, जेल भेजिए और मुकदमा चलाइए। लेकिन अगर ये अपराधी नहीं बल्कि पीड़ित हैं तो फिर किस अधिकार से इनके खाते, इनकी मेहनत की कमाई और इनका जीवन बिना सुनवाई के फ्रीज कर दिया गया है।

वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman जी से यह विनम्र लेकिन स्पष्ट अनुरोध है कि रिजर्व बैंक को तुरंत निर्देश दिए जाएं कि जिन खातों में साइबर फ्रॉड की आशंका हो, वहां केवल संदिग्ध राशि को लियन में रखा जाए। पूरा खाता फ्रीज करना आर्थिक अन्याय है। जांच अपनी जगह चले, लेकिन आम आदमी की रोजी रोटी बंद न की जाए।

आदरणीय प्रधानमंत्री Narendra Modi जी, आपने देश में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया और यह समय की जरूरत भी थी। लेकिन अगर सिस्टम में खामी है तो उसे सुधारा जाना चाहिए, न कि किसी के खाते में किसी और द्वारा डाले गए थोड़े से पैसों के कारण उसकी पूरी जिंदगी फ्रीज कर दी जाए। आपके एक निर्देश से हजारों परिवारों को तुरंत राहत मिल सकती है। यह भी साबित हो सकता है कि सरकार फेसबुक पर उठी एक आम आदमी की आवाज को भी गंभीरता से सुनती है।

एरिन ब्रॉकोविच ने नहीं सोचा था कि एक मामूली शिकायत सिस्टम की अनदेखी और अन्याय की पोल खोल कर रख देगी। डिजिटल इंडिया की ये खामी फिल्म की कहानी नहीं। समय पर सुधार नहीं हुआ, दोषियों को दंड नही मिला तो आने वाले समय में ये शिकायत चार्जशीट बनेगी। मैं संजय सिन्हा, पत्रकारिता छोड़ कर अधिवक्ता हूं। मीडिया में रहकर भी आम आदमी की आवाज उठाई और अदालत में खड़े होकर भी यही करूंगा। यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस हर नागरिक की है जो ईमानदारी से लेनदेन करता है और फिर भी अपराधी बना दिया जाता है। अब पीड़ित अपनी व्यथा अपने शब्दों में रख रहे हैं, आप इन्हें खुला शपथ पत्र मान लें-

शपथ पत्र-

1. अमरेश गोस्वामी कहते हैं कि जब वह बैंक गए तो उन्हें बताया गया कि उनके खाते में 100 रुपये का फ्रॉड बैलेंस आया है, इसलिए पूरा अकाउंट फ्रीज कर दिया गया है।

2. सुनील मिश्रा बताते हैं कि उनके किरायेदार ने किराया भेजा और उनका अकाउंट फ्रीज हो गया। उनका खाता राजस्थान का है, केस गुजरात का बताया जा रहा है और वह कर्नाटक में रहते हैं। 22000 रुपये फंसे हैं। बैंक गुजरात से एनओसी मांग रहा है। साइबर क्राइम का इंस्पेक्टर एक साल से फोन नहीं उठा रहा। कर्नाटक पुलिस कहती है कि वह कुछ नहीं कर सकती। उनसे कहा गया कि दस हजार का वकील करो और दस हजार रिश्वत दो।

3. एडवोकेट सौरभ अग्रवाल कहते हैं कि उनके आईसीआईसीआई बैंक के ओडी अकाउंट पर किसी की झूठी शिकायत के आधार पर 20000 रुपये का लियन लगा दिया गया है।

4. पूजा सिंह बताती हैं कि उनका आईडीएफसी बैंक अकाउंट बिना सूचना के सीज कर दिया गया। बाद में पता चला कि बेंगलुरु से साइबर क्राइम की शिकायत हुई है। पुलिस ने कहा कि बेंगलुरु आना पड़ेगा या 9000 रुपये देने होंगे। वह पूछती हैं कि अगर उन्होंने फ्रॉड किया था तो पुलिस उनके घर क्यों नहीं आई।

5. रमन कुमार बताते हैं कि उनकी पत्नी का एक्सिस बैंक अकाउंट दिल्ली का है। छोटे से ट्रांजेक्शन पर लियन लगा है और बेगूसराय में रहने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हो रही।

6. एम के मंडल कहते हैं कि उनके क्लाइंट ने सॉफ्टवेयर का सोर्स कोड लिया, पैसे दिए और बाद में शिकायत कर दी। दो महीने बाद खाता खुला, लेकिन पैसा न उन्हें मिला न क्लाइंट को।

7. सुमित कुमार बताते हैं कि उनके साथ भी 1000 रुपये के लिए बेंगलुरु साइबर सेल ने अकाउंट फ्रीज कर दिया।

8. अर्पित सिंघल कहते हैं कि उनके जानने वाले का पीएनबी अकाउंट सिर्फ 1200 रुपये की एंट्री के कारण फ्रीज है।

9. कुंवर शेष कुमार सिंह बताते हैं कि उन्होंने बैंक से कहा कि सिर्फ 9500 रुपये रोके जाएं और बैंक ने मान लिया, लेकिन वह मानते हैं कि सिस्टम में सब मिले हुए हैं।

10. विवेक शर्मा बताते हैं कि उनकी मित्र रोशनी डिसूजा निर्दोष थीं, फिर भी महीनों तक परेशान होती रहीं।

11. उत्तम सिंह आनंद कहते हैं कि उनका बैंक खाता भी होल्ड पर है।

12. सकील अख्तर बताते हैं कि मंडला साइबर क्राइम विभाग ने उनके 65400 रुपये एक साल से होल्ड कर रखे हैं।

13. सिंह बंधना कहती हैं कि उनके एचडीएफसी अकाउंट में 14000 रुपये हैं, लेकिन 1400 रुपये संदिग्ध बताकर पूरा खाता फ्रीज है।

14. रणविजय झा कहते हैं कि उनका एसबीआई अकाउंट एक साल से 5000 रुपये के कारण फ्रीज है।

15. रवि मोहन दीक्षित बताते हैं कि उनके मित्र का एचडीएफसी अकाउंट 350 रुपये के कारण एक साल से फ्रीज है और 45000 रुपये फंसे हैं।

16. राजनीश पांडेय कहते हैं कि पेटीएम ने 12000 रुपये के मामले में उनके 115000 रुपये तीन साल से रोक रखे हैं।

17. आर के सिंह बताते हैं कि एक छोटे से कैश और ऑनलाइन लेनदेन के कारण पुलिस ने खाते फ्रीज कर दिए और परिवार तबाह हो गए।

18. चंद्र प्रकाश तिवारी बताते हैं कि उनका खाता बार बार संदिग्ध ट्रांजेक्शन के नाम पर फ्रीज हो जाता है।

19. अजय राय कहते हैं कि दो साल से एसबीआई ने उनके 64000 रुपये पर रोक लगा रखी है।

20. किरण पाल सिंह बताते हैं कि उनके यहां काम करने वाले दीपक ने 950 रुपये ऑनलाइन दिए और उसका खुद का अकाउंट फ्रीज हो गया।

21. तरुण अरोड़ा बताते हैं कि 1200 रुपये के ट्रांजेक्शन से मकान मालिक का खाता फ्रीज हो गया और दोनों परेशान हैं।

22. आशीष मिश्रा कहते हैं कि 1415 रुपये के कारण उनका खाता एक महीने से फ्रीज है।

23. शाह योगेश बताते हैं कि उनके 24000 रुपये छह महीने से फंसे हैं।

24. सुमित शर्मा बताते हैं कि उनके मित्र बृजेश की मोबाइल शॉप का अकाउंट 2500 रुपये के कारण पेटीएम बैंक ने सीज कर दिया।

25. राजकुमार धाभाई बताते हैं कि उनके बेटे का पीएनबी अकाउंट विदेश में पढ़ाई के दौरान बार बार फ्रीज किया जा रहा है और फीस तक फंस गई है।

यह सारी कहानियां किसी अफवाह का हिस्सा नहीं हैं। यह डिजिटल इंडिया की वह सच्चाई हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

25 नाम कल की पोस्ट पर हैं। परसों की पोस्ट पर अलग कई नाम हैं, जो पीड़ित हैं। बिना कारण अपराधी बने बैठे हैं।

नोट- एक अधिवक्ता की स्वीकारोक्ति……….. यह कहानी व्यक्तिगत अनुभवों और सार्वजनिक टिप्पणियों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि नीति और प्रक्रिया में सुधार की अपील करना है।


शर्म से कहिए, हम आज़ाद हैं…… बेंगलुरु एयरपोर्ट पर टैक्सी माफिया का अनुभव साझा करते हुए मीना दत्ता लिखती हैं, “पांच छह महीने पहले बेंगलुरु एयरपोर्ट पर टैक्सी गुंडा समूह में हम भी फंसे थे। साढ़े 500 रुपए तय किराया के बदले 1300 रुपए ले लिए। चुपचाप सहते हैं। नक्कारखाने में तूती की आवाज़ किसकी सुनी जाती है।”

अपने बैंक खाते के सीज़ होने की पीड़ा माधव रॉय इन शब्दों में बताते हैं, “मेरा भी बैंक अकाउंट सीज़ है। मुझे पैसे भेजने वाले ने किसी को मोबाइल बेचकर ऑनलाइन पैसे मंगवाए थे। गोवा पुलिस ने मेरा और उसका दोनों का अकाउंट दो साल से सीज़ कर रखा है। केस खारिज करवाने के लिए गोवा आना पड़ेगा। धन्य है अमृत काल।”

छोटे व्यापारियों की स्थिति पर अवधेश सिंह कहते हैं, “एक दुकानदार का अकाउंट साइबर क्राइम के नाम पर फ्रीज कर दिया गया। पचास हजार रुपये फंसे हैं। छोटा दुकानदार इन्हीं पैसों से धंधा चलाता है। कितना डिप्रेशन में होगा।”

भोपाल की एक पुरानी लेकिन आज भी ज़िंदा कहानी प्रकाश चंद्र सोनी बताते हैं, “जनरल स्टोर में लगे टेलीफोन से किसी अपराधी ने इंटरनेशनल कॉल कर ली। दुकानदार को पकड़ लिया गया। बीस साल हो गए, वह आज भी कोर्ट के चक्कर काट रहा है।”

ज्वेलरी व्यापार की सच्चाई प्रशांत सोनी बयान करते हैं, “कोई महिला पुराना जेवर बेचती है, बाद में पुलिस आती है कि चोरी का माल खरीदा। जेवर ज़ब्त, ऊपर से पैसे भी खाती है। दुकानदार को क्या पता ग्राहक के पैसे कहां से आए।”

मंडला की घटना याद करते हुए हनुमान तिवारी कहते हैं, “एसबीआई खाते सीज़ हो गए। पुलिस में शिकायत नहीं की, जोड़तोड़ में लगे रहे। एक सेवानिवृत्त बैंक मैनेजर के सहयोग से खाता खुला। जय हिंद जय भारत।”

हरियाणा के मेवात से रजन पाल सिंह तंवर लिखते हैं, “साइबर क्राइम करने वाले दुकानों से खरीदारी करते हैं। एक मिठाई वाले का खाता भी सीज़ हो गया। ले दे कर मामला निपटाया। अब उसने उस समुदाय को मिठाई बेचना बंद कर दिया।”

अपने बेटे की परेशानी बताते हुए मनीष सिंह कहते हैं, “350 रुपए के चक्कर में बेटे का अकाउंट फ्रीज है। 70 हजार रुपए फंसे हैं। दिल्ली से पुणे भेजा जा रहा है। मिडिल क्लास के लिए यह बहुत बड़ी रकम है।”

इसी तरह उत्कर्ष मिश्रा लिखते हैं, “1013 रुपए के कारण बैंक ऑफ बड़ौदा का खाता सीज़ है। बैंक ने FIR की कॉपी दे दी। कहा खुद साइबर सेल से बात करो। खाता न चलता है, न बंद होता है।”

कानूनी पक्ष की ओर इशारा करते हुए अशोक अनुराग कहते हैं, “धारा 102 के तहत केवल उतनी ही राशि रोकी जा सकती है जो अपराध से जुड़ी हो। पूरा अकाउंट फ्रीज करना न जरूरी है, न उचित।”

आगे की कहानी………. मैंने आपको जबलपुर के दीपक पटेल की पीड़ा सुनाई थी। उनका एकाउंट ICICI बैंक ने फ्रीज कर दिया है। कानून स्पष्ट कहता है कि सिर्फ उतना एमाउंट ही बैंक रोक सकता है, जितने पर विवाद है। मतलब उनके बैंक में 1250 रुपए को लेकर विवाद है। बैंक मानता है कि उतने पर ही विवाद है। पर बरेली के साइबर क्राइम विभाग के इंस्पेक्टर ने बैंक को लिख दिया तो बैंक ने उसे रिजर्व बैंक का आदेश मान कर उनके एकाउंट को फ़्रीज़ कर दिया। अब बैंक में जमा (बिजनेस एकाउंट) लाखों रुपए फंस गए।

संजय सिन्हा को दीपक पटेल साहब ने अपनी व्यथा सुनाई। फिलहाल कोर्ट बंद हैं, तो मैंने सोचा कि पहले जनता की अदालत में मामले को उठाया जाए। बाकी बैंक और साइबर पुलिस की हरकत से तो मैं कानूनी रूप से निपटूंगा ही। लेकिन मामला आपकी अदालत में आया (दो दिन मैंने एक आम व्यापारी की व्यथा कथा फेसबुक पर लिखी) तो आपकी पीड़ा भी सामने आई। साथ ही ICICI का पत्र भी पटेल साहब के पास आया। पत्र संलग्न है।

आप वो पत्र भी पढ़ें जिसे साइबर क्राइम विभाग, बरेली के एक इंस्पेक्टर ने बैंक को पत्र भेज कर सारी रकम फ्रीज कराई। जिसके लिए पटेल साहब को एक वकील को फीस देनी पड़ी। जिसके लिए उनसे वकील के माध्यम से संपर्क कर कहा गया कि पुलिस को पैसे दे दो, एकाउंट खुलवा लो…

(आज थोड़ा भारी हो रहा है तो गाना गुनगुना लीजिए पैसे दे दो, जूते ले लो…) कानून स्पष्ट कहता है कि बैंक पूरा पैसा नहीं रोक सकता है। वो सिर्फ विवादास्पद रकम को ही फ्रीज कर सकता है। लेकिन पुलिस, बैंक और फ्रॉड की मिली भगत से आम आदमी उलझ कर रह गया है राम राज्य में।

नोट- मान लीजिए किसी फ्रॉड ने amazon या Flipkart से ऑनलाइन कुछ खरीदा और भुगतान एकाउंट से किया तो क्या साइबर पुलिस amazon, Flipkart का पूरा एकाउंट फ्रीज करा देगी?

मान लीजिए किसी ने रिलायंस की दुकान से कुछ खरीदा और पुलिस को पता चला कि 1250 रुपए का जो तेल या कोई भी सामान लिया गया था, वो फ्रा़ड का एकाउंट था तो पुलिस रिलायंस का एकाउंट फ्रीज करा देगी और बैंक कर देगा?

मान लीजिए – आप जो चाहे मान लें, पर आप यही मानिए कि बैंक, पुलिस और फ्रॉड तीनों मिले हैं। वो दीपक पटेल की दुकान का एकाउंट फ्रीज करके उनसे उगाही कर सकते हैं, रिलायंस, क्रोमा, किसी विमान टिकट लिए विमान कंपनी का नहीं। रेलवे (IRCTC) का भी नहीं।

(समर्थ दोषी नहीं होता है)

और यह सब संभव है- आजाद देश में। इंतजार कीजिए कोर्ट खुलने का। हिसाब बराबर होगा। फिलहाल जबलपुर एयरपोर्ट पर टैक्सी माफिया के गुंडा राज से निपटना और पटेल साहब का फ्रीज एकाउंट खुलवाना – दोनों मेरे एजेंडा में नंबर एक पर हैं। बाकी आगे…


आंख में आंख डालकर सवाल पूछ रहा हूं………….. पोस्ट लंबी है। धैर्य से पढ़िएगा। आपकी ही कहानी है।

मैंने आपसे वादा किया था कि आपको वह कहानी भी सुनाऊंगा कि इंदौर से जब मैं फ्लाइट से जबलपुर आया और जबलपुर एयरपोर्ट पर उतरा, तो कैसे टैक्सी गुंडा सर्विस का सामना करते हुए किसी तरह घर पहुंचा। टैक्सी गुंडा सर्विस की शुरुआत एयरपोर्ट पर उतरते ही हो जाती है। एक काउंटर बना है जो प्री पेड टैक्सी सर्विस का है। अनजान और लाचार आदमी वहीं रुककर टैक्सी किराए पर लेने को मजबूर होता है। वहां कोई तय रेट नहीं है। उसने मुझसे मेरे घर तक के लिए 1250 रुपए मांगे थे (लगभग 60-65 रुपए प्रति किलोमीटर)।

अगर आप जबलपुर एयरपोर्ट से रामपुर चौक नर्मदा रोड तक का किराया उबर, ओला या रैपिडो पर देखें, तो पाएंगे कि अधिकतम 516 रुपये ही दिखते हैं, वह भी बड़ी गाड़ी के लिए। छोटी गाड़ी का किराया और कम दिखाई देता है। लेकिन यह सिर्फ दिखाई देता है। गालिब के शब्दों में दिल को बहलाने के लिए भर।

सच्चाई यह है कि जबलपुर एयरपोर्ट से आप किसी दूसरी टैक्सी सर्विस का इस्तेमाल कर ही नहीं सकते। आपको एयरपोर्ट के भीतर मौजूद उसी गुंडा टैक्सी सर्विस की सेवा लेनी होती है और किराया भी उनकी मर्जी से चुकाना पड़ता है। खैर, और भी गम हैं जमाने में टैक्सी रोने के सिवा।

मैंने तय किया था कि इस बार उस तकलीफ को सहूंगा और आपसे साझा करूंगा। मैंने वही किया। उसका असर हुआ। जबलपुर के सांसद से बात हुई। कलेक्टर को टैग करके फेसबुक पर समस्या लिखी गई। फिर इस शिकायत को लेकर अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों की बैठक हुई।

अखबार में खबर छपी कि इस मामले पर चिंता जताई गई। मुझे खुशी हुई कि कम से कम चिंता तो जताई गई। कायदे से मैं किसी विषय को दोहराता नहीं हूं, लेकिन मेरी उस पीड़ा कहानी पर इतनी प्रतिक्रियाएं आईं और क्योंकि मुझे वह कहानी सुनानी ही थी, जिसका मैंने वादा किया था। यह अलग बात है कि उसी वादे से जुड़ी है मेरी आज की दूसरी पीड़ा कहानी, जिसका एक हिस्सा मैंने कल आपसे साझा किया था।

हुआ यह कि वहां खड़े गुंडा टैक्सी वालों ने मुझे ललकारा कि अगर दम है तो दूसरी टैक्सी बुला लो। जाहिर है, वे आश्वस्त थे कि आदमी मजबूर होकर उन्हीं की टैक्सी में जाएगा और पैसे भी उनकी मर्जी से देगा। एक टैक्सी वाला किसी मुसाफिर को लेकर आया भी था और खाली जा रहा था, लेकिन मुझे ले जाने को तैयार नहीं हुआ। उसने बताया कि एयरपोर्ट के गुंडे उसकी पिटाई करेंगे। वे किसी दूसरे टैक्सी वाले को मुसाफिर नहीं ले जाने देते।

ओह, लगता है कहानी फिर दोहराई जा रही है। आगे की कहानी यह है।

मैंने देखा कि एक आदमी अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ वहां अपनी कार के साथ खड़ा था। मैंने उससे पूछा कि क्या वह मुझे बाहर तक छोड़ देगा। वह मेरी मजबूरी समझ रहा था। वह अपने बेटे को एयरपोर्ट छोड़ने आया था, जो दिल्ली जा रहा था। उसने कहा कि उसे अभी देर लगेगी। एक शरीफ आदमी ऐसे ही टाल सकता है। उसने यह भी कहा कि शायद वह खाली टैक्सी ले जाए, जो मुसाफिर को छोड़ने आई थी।

मैंने उनके कहने से पहले टैक्सी वाले से बात की थी। जिसने साफ मना कर दिया कि उसे एयरपोर्ट टैक्सी गुंडा सर्विस से मार नहीं खानी है। मेरे चेहरे पर मजबूरी देखकर उन्हें दया आ गई। उन्होंने कहा कि आप इंतजार कीजिए, मैं कोशिश करूंगा कि आपको बाहर तक छोड़ दूं। वे टैक्सी समस्या से वाकिफ थे। उनका बेटा एयरपोर्ट के भीतर गया और फिर मैं उनकी गाड़ी में बैठकर बाहर तक आया। उन्होंने देखा कि बाहर भी कुछ नहीं है, तो उन्होंने कहा कि उन्हें डुमना पार्क के भीतर वाले कॉफी हाउस जाना है और वे मुझे वहां उतार देंगे। मन में शायद यही रहा होगा कि जल्दी पीछा छूटे।

लेकिन वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि वहां भी सन्नाटा है। कोई ऑटो भी नहीं था। एक शरीफ आदमी मूल रूप से दयालु होता है। उन्होंने कहा कि चलिए, आपको सिविल लाइंस तक छोड़ देता हूं। मैं चुप था। औपचारिकता में मैंने कहा भी कि कहीं भी उतार दीजिए, मैं देख लूंगा। पर क्या देख लेता। वे मुझे सिविल लाइंस तक लेकर आए। सुबह का समय था। सन्नाटा था। अब अति हो चुकी थी।

मैंने कहा कि कहीं उतार दीजिए, क्योंकि आपको कॉफी हाउस जाना है। उन्होंने कहा कि हम जब भी एयरपोर्ट आते हैं, तो बाहर नाश्ता कर लेते हैं। अब सदर वाले कॉफी हाउस चलते हैं। क्या किस्मत थी। मैं अब तक जितनी बार एयरपोर्ट से आया हूं, पहले कॉफी हाउस ही गया हूं। उस दिन भी यही हुआ। मैं उनके साथ सदर कॉफी हाउस गया। अब तक हमारे बीच दोस्ती के अंकुर फूटने लगे थे।

सुबह सुबह सदर कॉफी हाउस में हम थे। उन्होंने डोसा मंगाया। मैंने सांभर बड़ा और कॉफी ली। बातचीत शुरू हुई। उन्होंने बताया कि उनका नाम दीपक पटेल है। जबलपुर में बैटरी का होलसेल का काम है। मैंने बताया कि मेरा नाम संजय सिन्हा है। पहले पत्रकार था। आजतक में।

बात टैक्सी से शुरू हुई और सिस्टम की खामियों तक पहुंच गई। उन्होंने कहा कि लोकल लोग अपनी गाड़ी में आते जाते हैं, तो उन्हें पीड़ा का अहसास नहीं होता। नेता, कलेक्टर, एसपी, जज, तहसीलदार, पुलिस और फौजी, किसी को नहीं होता।

गुंडों को पता होता है कि किसे लूटना है और किसे पीटना है। आम आदमी फंसता है। कहानी से कहानी निकली और निकली उस पीड़ा की कहानी, जिसकी चर्चा मैंने कल की थी। पटेल साहब ने बताया कि उनकी बैटरी की दुकान से किसी ने 1250 रुपये की खरीदारी की और अपने अकाउंट से उनके अकाउंट में भुगतान किया।

कुछ समय बाद बरेली (उत्तर प्रदेश) की साइबर पुलिस ने उनके बैंक को पत्र लिखा कि पटेल साहब के करंट अकाउंट में जो 1250 रुपये जमा हुए हैं, उसे जमा करने वाला साइबर फ्रॉड है, इसलिए पटेल साहब का पूरा अकाउंट फ्रीज कर दिया जाए। बैंक ने पुलिस इंस्पेक्टर के आदेश का पालन किया। जब पटेल साहब को यह पता चला, तो वे हैरान रह गए। बैंक में रखे उनके व्यवसाय के सारे पैसे निकालने पर रोक लग गई थी। उन्होंने बैंक के ब्रांच मैनेजर से मिन्नतें कीं, लेकिन बैंक अधिकारी पुलिस से पंगा नहीं ले सकते। उन्हें कहा गया कि आप बरेली जाकर साइबर क्राइम वालों से बात करें।

मैंने आपको कल कहानी सुनाई थी कि कैसे एक वकील सात हजार रुपये ले गया और फिर बताया कि पुलिस वाले को एक लाख रुपये मिलेंगे, तभी वह बैंक को अकाउंट से फ्रीज हटाने के लिए लिखेगा। पटेल साहब को कानून की जानकारी भले न हो, लेकिन न्याय पर भरोसा बहुत है।

वे एक लाख देने को तैयार नहीं हुए। जब उन्होंने यह कहानी एक पूर्व पत्रकार और वर्तमान में कानून की समझ रखने वाले व्यक्ति से साझा की तो उसने वादा किया कि वह इस मामले में उनकी मदद करेगा। पटेल साहब के अकाउंट में कारोबार के लाखों रुपये फंसे हैं। पटेल साहब ने बैंक मैनेजर से कहा कि आप 1250 रुपये को होल्ड कर लें, लेकिन पूरे अकाउंट को फ्रीज न करें। लेकिन बैंक मैनेजर पुलिस इंस्पेक्टर के पत्र से डरता है। उसे खाकी से डर लगता है।

उसने साफ कहा कि वह ऐसा नहीं कर सकता। पुलिस से पंगा कौन ले। साल भर से पटेल साहब का पैसा फंसा हुआ है। बैंक से कोई मदद नहीं मिल रही।

कानून क्या कहता है?

प्रश्न- 1. यदि कोई व्यक्ति किसी दुकानदार से सामान खरीदता है और अपने खाते से भुगतान करता है, और बाद में यह पता चलता है कि वह रकम किसी तीसरे व्यक्ति के खाते से साइबर अपराध के जरिए आई थी, तो क्या साइबर क्राइम पुलिस उस दुकानदार का पूरा बैंक अकाउंट फ्रीज करा सकती है, जबकि दुकानदार को यह जानकारी ही नहीं थी कि पैसा अपराध से जुड़ा है?

उत्तर- व्यवहार में साइबर क्राइम पुलिस ऐसा कर रही है, लेकिन कानूनी रूप से यह कार्रवाई सीमित शर्तों के साथ ही वैध है। अंधाधुंध नहीं।

पूरे बैंक अकाउंट को बिना ठोस कारण और बिना समय सीमा के फ्रीज करना कानून की भावना के खिलाफ है।

अक्सर देखा जाता है कि पुलिस पूरे अकाउंट को फ्रीज करा देती है, चाहे संदिग्ध राशि बहुत कम क्यों न हो। जबकि कानून यह नहीं कहता कि एक निर्दोष दुकानदार को अपराधी की तरह ट्रीट किया जाए, सिर्फ इसलिए कि उसके खाते में पैसा आया। पुलिस आमतौर पर यह कार्रवाई दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 102 के तहत करती है। इस धारा के तहत पुलिस किसी ऐसी संपत्ति को जब्त कर सकती है, जो अपराध से संबंधित हो या अपराध की आय हो। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट यह स्पष्ट कर चुके हैं कि बैंक अकाउंट भी “संपत्ति” की श्रेणी में आता है, इसलिए उसे फ्रीज किया जा सकता है।

लेकिन एक महत्वपूर्ण शर्त है। धारा 102 के तहत केवल उतनी ही राशि रोकी जा सकती है, जो सीधे तौर पर अपराध से संबंधित हो। पूरे अकाउंट को अनिश्चितकाल के लिए फ्रीज करना न तो आवश्यक है और न ही उचित। पुलिस को यह दिखाना होता है कि अकाउंट धारक या तो अपराध में शामिल है या अपराध से जानबूझकर लाभ उठा रहा है या मनी लॉन्ड्रिंग में सहयोगी है।

सिर्फ यह तथ्य कि पैसा खाते में आया, पर्याप्त कारण नहीं है। कानून यह भी मानता है कि जिसने सामान बेचा है, उसे यह जानने का कोई तरीका नहीं होता कि खरीदार पैसा कहां से लाया। यदि दुकानदार नियमित व्यापार कर रहा है, बिल बना रहा है, राशि छोटी है और किसी आपराधिक साठगांठ का कोई प्रमाण नहीं है, तो वह बोना फाइड रिसीवर माना जाता है।

ऐसे व्यक्ति को न तो आरोपी बनाया जा सकता है और न ही उसे उसके व्यापार से वंचित किया जा सकता है। पूरे अकाउंट को बंद रखना न्यायसंगत नहीं है।

प्रश्न- 2. फिर पुलिस पूरे अकाउंट को फ्रीज क्यों करती है?

उत्तर- कानून के कारण नहीं, बल्कि सुविधा, दबाव और डर की राजनीति के कारण। पुलिस लिख देती है, बैंक सुरक्षित खेल खेलते हुए अकाउंट फ्रीज कर देता है। दुकानदार मजबूर हो जाता है और मामला ‘सेटिंग’ की दिशा में बढ़ने लगता है।

एक कानून जानकार (संजय सिन्हा) के शब्दों में यह कानून का दुरुपयोग है, कानून नहीं।

खुला पत्र

कलेक्टर महोदय और पुलिस अधीक्षक महोदय, जबलपुर

यह पत्र किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस आम नागरिक की ओर से है, जिसका पैसा बैंक में सुरक्षित होना चाहिए और जिसकी आवाज शहर में सुनी जानी चाहिए। आज स्थिति यह है कि कोई अज्ञात व्यक्ति मात्र कुछ सौ रुपये किसी खाते में डालकर, पुलिस और बैंक की प्रक्रिया के जरिए किसी का पूरा अकाउंट फ्रीज करवा सकता है। न स्पष्ट आदेश, न समय सीमा और न ही यह जानकारी कि कब तक यह स्थिति बनी रहेगी। यह व्यवस्था नहीं, नागरिक को असहाय बनाने की प्रक्रिया है।

इसी सोच का दूसरा रूप जबलपुर एयरपोर्ट की टैक्सी व्यवस्था में भी दिखता है। दो दिन पहले आपकी बैठक में यह कहा गया कि एयरपोर्ट पर प्री पेड टैक्सी सेवा शुरू की जाएगी। लेकिन समस्या को जरा गहराई से समझने की जरूरत है। एयरपोर्ट पर प्री पेड टैक्सी सेवा पहले से मौजूद है, लेकिन वहां एकाधिकार की स्थिति है, जो व्यवहार में मनमानी और गुंडागर्दी का रूप ले चुकी है।

निवेदन है कि ऐसे स्पष्ट नियम बनाए जाएं, जिनके तहत किसी भी वैध टैक्सी सेवा को एयरपोर्ट आने और वहां से यात्रियों को ले जाने की अनुमति हो। किराया पारदर्शी हो और किसी एक समूह की मनमानी न चले। ओला और उबर जैसी टैक्सी सेवाएं पूरी तरह तकनीक और इंटरनेट निगरानी के दायरे में काम करती हैं। वे मनमर्जी का किराया नहीं वसूल सकतीं। ऐसी सेवाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। सुरक्षा और पारदर्शिता का सबसे प्रभावी साधन तकनीक है, न कि बल प्रयोग।

कलेक्टर साहब और एसपी साहब, आपने इतनी अच्छी पढ़ाई करके इस सेवा को इस संकल्प के साथ चुना है कि आप जनता के हित में काम करेंगे। निवेदन है कि उसी संकल्प को प्राथमिकता दी जाए। रोज मुख्यमंत्री या दिल्ली के मंत्री (वीआईपी) जबलपुर आते हैं। उनके प्रोटोकॉल में ऊर्जा खर्च करना प्रशासनिक मजबूरी हो सकती है, उससे पदोन्नति या सीआर में लाभ भी मिल सकता है, लेकिन उस मूल वचन को निभाना भी उतना ही जरूरी है, जिसके आधार पर आपने यह सेवा चुनी थी।

आज के लिए प्रशासन के सामने दो साफ जिम्मेदारियां हैं।

  • पहली, पटेल साहब के अकाउंट से अनावश्यक फ्रीज हटवाया जाए।
  • दूसरी, जबलपुर में एयरपोर्ट टैक्सी व्यवस्था को दुरुस्त किया जाए।

दोनों काम किसी बड़े आदेश या लंबी प्रक्रिया के मोहताज नहीं हैं। इच्छाशक्ति हो तो एक दिन में भी हो सकते हैं। मैं तीन चार दिनों में दिल्ली जाऊंगा और अगले ही दिन फिर लौटूंगा। तब देखूंगा कि इन मुद्दों पर क्या बदला और क्या नहीं। अंत में, मैं संजय सिन्हा, अपने उन परिजनों से माफी मांगता हूं, जिन्हें सुबह-सुबह कहानी का इंतजार रहता है। लेकिन जब लोगों की तकलीफ सामने हो, तो आदमी मनोरंजन नहीं कर सकता।


कहानी पूरी पढ़ें, ऐसा आपके साथ भी हो सकता है………. मान लीजिए आपकी कोई दुकान है, बिजनेस है, कारोबार है, तो आप क्या करेंगे? आपकी दुकान में जो भी चीज होगी, आप उसे बेचेंगे और बदले में पैसे लेंगे। पैसे लेने के कई तरीके हो सकते हैं। आप नकद ले सकते हैं, क्रेडिट कार्ड से ले सकते हैं, कोई डेबिट कार्ड से दे सकता है या फिर कोई पेटीएम, फोन पे या किसी भी तरह से आपके अकाउंट में पैसे ट्रांसफर कर सकता है।

यही होगा न? नोटबंदी के बाद दावा किया गया था कि कैश का काम कम होगा और डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दिया जाएगा। लोगों ने डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दिया भी। आज आप दो रुपए की सिगरेट भी (हालांकि दो रुपए में सिगरेट नहीं आती) डिजिटल पेमेंट से खरीद लेते हैं। आलू-प्याज बेचने वाला तक QR कोड लगाए खड़ा है। यानी सरकार चाहती है कि हर लेनदेन डिजिटल हो और नागरिक भी उसी दिशा में चल पड़े हैं।

अब प्रश्न यह है कि संजय सिन्हा इतनी भूमिका बांधकर कहानी किसकी सुनाने जा रहे हैं?

एक राजा था। उसका एक कर्मचारी भ्रष्ट था। जब उसका भ्रष्टाचार लोगों के सिर के ऊपर से गुजर गया तो लोगों ने राजा से शिकायत की। “महाराज, इसे हटाइए। यह हर काम में ऊपर से पैसे लेता है।” राजा ने उसे हटा दिया। उसका ट्रांसफर सागर किनारे कर दिया। कोई काम नहीं। बस यह आदेश कि सारा दिन समंदर में कितनी लहरें उठती हैं, यह गिनो। कर्मचारी ने उफ तक नहीं कहा। वह सागर किनारे चला गया। कुर्सी लगाकर बैठ गया। सारा दिन लहरें गिनता रहा। डायरी में नोट करता रहा।

अब उस सागर तट से गुजरने वाले नाविकों और जहाज वालों की मुसीबत शुरू हो गई। वह उन्हें किनारे तक आने ही नहीं देता। कहता कि इधर मत आओ, लहरों की गिनती बिगड़ जाती है। राज आदेश है, उसके पालन में मुश्किल आती है। नाविक और जहाज वाले परेशान हो गए।

अंत में वही हुआ जो होना था। वे उसे पैसे देते और तब वह लहरों की गिनती रोककर उन्हें आने देता। कहानी लंबी है। नतीजा कम में ही आपके सामने आ चुका है। मुहावरा चल पड़ा कि जिसे ऊपर से कमाने की आदत लग गई, वह लहरें गिनकर भी कमा लेगा।

दीपक पटेल जी जबलपुर में गाड़ियों की बैटरी बेचते हैं। उनकी अपनी दुकान है। कुछ साल पहले अचानक उनका बैंक अकाउंट फ्रीज कर दिया गया। फ्रीज का मतलब आप समझते हैं। अपने अकाउंट से आप पैसे नहीं निकाल सकते। सोचिए, एक कारोबारी के अकाउंट से पैसे निकालने और चेक काटने पर रोक लग जाए तो उसके धंधे का क्या होगा? पटेल साहब भागकर CICI बैंक (जहां खाता था) गए यह पूछने कि उनके अकाउंट पर रोक क्यों लग गई है।

बैंक मैनेजर ने बताया कि बरेली से साइबर क्राइम पुलिस की ओर से पत्र आया है कि आपके अकाउंट में किसी ने एक बैटरी खरीदने के बदले में जो 1250 रुपए डिजिटल ट्रांसफर किए हैं, उस व्यक्ति पर बरेली में साइबर क्राइम करने का आरोप है। मतलब उसने किसी के साथ पैसों का धोखा किया है और उन पैसों से आपसे 1250 रुपए का सामान खरीदा है।

पटेल साहब हैरान थे। भाई, किसी ने मेरी दुकान से कुछ खरीदा, उसने मुझे पैसे दिए। अब वह चोर हो, उससे मेरा क्या? मैंने तो माल बेचा, पैसे लिए। उसने अपने अकाउंट से मुझे पैसे ट्रांसफर किए, तो इसमें मैं क्या करूं? आप उसका अकाउंट फ्रीज कीजिए। मैं थोड़े ही हिसाब रख सकता हूं कि मेरे पास आने वाले ग्राहक के पैसे कहां से आए हैं।

बैंक मैनेजर ने कहा कि वे कुछ नहीं कर सकते। आपको बरेली पुलिस से बात करनी होगी। हम तो आदेश के गुलाम हैं। अब पटेल साहब का बिजनेस अकाउंट ठप हो गया। बिजनेस के पैसे उसी में थे, लेकिन एक ग्राहक के भुगतान के कारण बैंक से पैसों की निकासी रुक गई है। न किसी को चेक दे सकते हैं, न कैश निकाल सकते हैं।

जबलपुर का कारोबारी बरेली जाए, तो बिजनेस कैसे होगा? इसी बीच बरेली से एक वकील साहब का फोन आया। कहा कि सुना है ऐसी समस्या आई है, मेरी सेवा लीजिए। कितनी फीस? सात हजार रुपए। पटेल साहब ने उनसे मदद ली और सात हजार रुपए दिए।

वकील साहब ने बताया कि पुलिस वाले नाम कटवाने के लिए एक लाख रुपए मांगते हैं। मामला यह है कि बरेली में साइबर क्राइम को पता चला कि किसी ने किसी के साथ फ्रॉड किया है। पुलिस उसे पकड़ नहीं पाई, लेकिन उसके अकाउंट का पता लगा लिया। उसने फ्रॉड के जरिए कमाए पैसों से जिन-जिन दुकानों से खरीदारी की थी, पुलिस ने उन दुकानों को परेशान करना शुरू कर दिया। किसी दुकान से उसने कमीज खरीदी थी तो उस दुकान का अकाउंट फ्रीज करा दिया गया। इसी चक्कर में जबलपुर के बैटरी विक्रेता की दुकान का अकाउंट भी फ्रीज हो गया।

आदमी व्यापार करे या पुलिस कचहरी के चक्कर लगाए, वह भी बरेली जाकर? तो क्या करे? नाम हटवाना है तो पैसे दो। एक लाख दोगे तो अकाउंट से नाम हट जाएगा। पटेल साहब परेशान हैं। किससे कहें? काम छोड़कर बरेली साइबर क्राइम वालों के पास जाएं?

पता चला कि लहरें गिनकर पैसे कमाने का यह नया तरीका साइबर अपराध की जांच करने वालों ने तलाशा है। आखिर जो साइबर क्राइम करेगा, वह उन पैसों को डिजिटल तरीके से कहीं न कहीं खर्च करेगा। किसी दुकान से सिगरेट लेगा, किसी से कमीज, कहीं से बैटरी, कहीं से आलू-प्याज।

पुलिस उसे नहीं पकड़ेगी। उसे पकड़ने से कोई लाभ नहीं। पुलिस लहरें गिनने लगी है। आम थाने की पोस्टिंग में तो सीधे कमाई हो जाती है, लेकिन साइबर विभाग तो पुलिस वालों की पनिशमेंट पोस्टिंग मानी जाती है। वहां कमाई कैसे हो? साइबर अपराधी को पकड़कर क्या मिलेगा?

तो पकड़ो उन्हें, जहां उसने खरीदारी की है। पटेल साहब उसी में उलझ गए।

एक आम आदमी क्या करेगा? अपने बैंक के पास जाएगा और यही कहेगा कि अगर 1250 रुपए के भुगतान पर संदेह है तो उसे रोक लो, लेकिन बाकी पैसे तो निकालने दो। बैंक वाले बहुत ईमानदार होते हैं। वे पुलिस के पत्र के बाहर नहीं जाते। कहते हैं कि पुलिस लिखकर दे दे तो अकाउंट खोल देंगे। और पुलिस? वह तो लहरें गिन रही है। उस फ्रॉड ने जिन-जिन दुकानों से कुछ खरीदा, पुलिस ने हर जगह से लाख-लाख रुपए वसूले।

पटेल साहब पैसे नहीं दे रहे। उनका कहना है कि एक बैटरी बेचकर इतना नहीं कमाता कि ऐसे लाख-लाख रुपए पुलिस को देता फिरूं। आज दे दूं, तो कल फिर कोई कुछ खरीदेगा और वही कहानी दोहराई जाएगी।

वह मुझसे पूछ रहे थे कि संजय जी, कानून क्या कहता है? कानून कहता है कि राजा का आदेश है लहरें गिनने का, तो कर्मचारी लहरें गिनेगा। आपको तट पर उतरना है लेकिन इससे लहरों की गिनती बाधित होगी। और लहरों की गिनती बाधित होगी तो…

समझ गए न। यह है नए भारत का डिजिटल युग। अपराधी आज़ाद है और व्यापारी परेशान है।

नोट- आप किसी से बिना ये जांचें पैसे न लें कि उसने पैसे कैसे कमाए हैं। अगर आप कभी फंस ही गए तो आपको इतना करना है कि ईमानदारी से कमाए नोट (जिन पर गांधी जी की फोटो होती है), पुलिस के पास भिजवाएं। इससे जांच पूरी हो जाएगी और साइबर पुलिस आपके बैंक को लिखकर भेज देगी कि अकाउंट खोल दिया जाए।

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