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जम्मू के एक हिन्दू परिवार ने जिस तरह एक मुस्लिम पत्रकार की मदद की, वो मामूली बात नहीं है!

यूसुफ किरमानी-

दो वीडियो, लेकिन देखने से कुछ समझ नहीं आएगा। मेरी इस पोस्ट को पूरा पढ़िए। बहुत लाभान्वित होंगे। ये जम्‍मू के पत्रकार अरफ़ाज़ अहमद डैंग हैं। आम जनता की खबरें देने का जुनून सवार रहता था। इनकी पत्रकारिता से सबसे ज्यादा स्थानीय प्रशासन परेशान था। जब अधिकारी अरफाज़ अहमद को खरीद नहीं पाए तो 27 नवंबर को सुबह उनका घर गिरा दिया गया। गिराने से पहले कोई नोटिस वगैरह नहीं दिया गया। अपने घर पर कार्रवाई की रिपोर्टिंग का वीडियो भी उन्होंने बनाया।

लेकिन ज़रा ठहरिए, ये कहानी यहीं खत्म नहीं होती है।

उस इलाके में सिर्फ अरफाज़ का घर नहीं था। लेकिन प्रशासन ने सिर्फ अरफाज़ के घर को गिराया। हालांकि उसी इलाके में और भी घर हैं, जिन्हें उसी आधार पर प्रशासन ने छुआ तक नहीं।

यह सब जम्मू का एक हिन्दू परिवार देख रहा था। उसे प्रशासन की ये हरकत पसंद नहीं आई। वो आगे आया। उसने शुक्रवार को उनके घर को फिर से बनाने के लिए 5 मरला ज़मीन दान कर दी। परिवार का कहना है, “अगर वे उनका 10 मरला का प्लॉट तोड़ दें, तो हम उन्हें 20 मरला देंगे।” जम्मू कश्मीर में ऐसी मिसाल दुर्लभ है। इसीलिए दोनों वीडियो आप लोगों के लिए लगा रहा हूं। दरअसल, हमारे देश की खूबसूरती यही है। ये ज़रूरी कहानी सभी को बताइए।

दूसरी खास बात ये है कि सच्चे और ईमानदार पत्रकारों के साथ जनता नहीं खड़ी होती। यह चिन्ता का विषय है। लेकिन जम्मू के इस हिन्दू परिवार ने जिस तरह एक पत्रकार की मदद की है, वो मामूली बात नहीं है।

आप उस पत्रकार का मुस्लिम होना भूल जाएं। जम्मू के इस परिवार ने जो ज़मीन उन्हें दी, उस परिवार को नमन तो बनता है। जम्मू के उस हिन्दू परिवार की यही पहल हम जैसे पत्रकारों को पीड़ितों के साथ खड़े होने, अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए प्रेरित करती है।

ये छोटे शहर के पत्रकार की खबर थी। लेकिन बात बहुत आगे तक जा रही है। आगे जो लिखने जा रहा हूं, उसे गहराई से समझने की ज़रूरत है।

भारत के नए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कल सुप्रीम कोर्ट में ऑनलाइन कंटेंट पर तमाम आपत्तियां जताईं। उन्होंने सरकार को आदेश दिया है कि वो 4 हफ्ते में इस कंटेंट को नियंत्रित करने के लिए एक संस्था बनाए और उसके नियम भी बनाए। उसी दौरान उन्होंने कहा कि राष्ट्र विरोधी कंटेंट को रोकना होगा। ऑनलाइन कंटेंट का अर्थ ये है कि आप और हम लोग जो कुछ भी फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, शेयर चैट, वेबसाइट पर लिखते हैं या कुछ कहते हैं तो वो ऑनलाइन कंटेंट कहलाता है। जिसमें वीडियो और फोटो भी शामिल है।

सवाल ये है कि ये कौन तय करेगा कि कौन सा कंटेंट राष्ट्रविरोधी है। क्या किसी शहर में मुहल्ले का बीजेपी नेता यह तय करेगा। इशारा उसी तरफ है। सरकार से जुड़ा कोई भी आदमी हमारे-आपके कंटेंट को देश विरोधी घोषित कर देगा।

आप सरकार की किसी नीति की आलोचना नहीं कर पाएंगे। क्योंकि सरकार की आलोचना को अब देश विरोधी माना जाएगा।

आप लोग सोचिए कि एक तरफ जम्मू का पत्रकार है जिसे सच बोलने के लिए दंडित किया गया, घर गिरा दिया गया। लेकिन अब आप सोशल मीडिया पर अगर सरकार की आलोचना करते पाए गए तो नाप दिए जाएंगे।

फिलहाल इतना ही। मुल्ले टाइट हो रहे हैं। लेकिन छब्बे जी तक भी आंच पहुंचने वाली है। छब्बे जी अपने घर के सामने की नाली चोक होने के लिए स्थानीय पार्षद या सभासद की शिकायत करने की स्थिति में नहीं होंगे। जय हिन्द।

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