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आज के अखबार : जम्मू कश्मीर विधानसभा के विशेष सत्र और केंद्र की चुनावी राजनीति का अंतर नहीं बताते

2014 के शपथग्रहण में नवाज शरीफ का मेहमान होना और अब पाकिस्तान तथा पाकिस्तानियों के वीजा रद्द करना दोनों तरफ के हिन्दुओं की भलाई की अलग कहानी है जो अखबारों में ढूंढ़े नहीं मिल रही है। टेलीविजन दिखाते नहीं, यूट्यूब चैनल पाकिस्तान के तो बंद किये ही गये, भारत के भी नहीं बचे।

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में दो बड़ी खबरें हैं। पहली तो यह कि कश्मीर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर आतंकवाद के खिलाफ प्रस्ताव पास किया गया है। इसमें मुख्य मंत्री ने कहा, लाशों पर सियासत नहीं करूंगा यह अवसर पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग का नहीं (अमर उजाला का शीर्षक)। दूसरी ओर प्रधानमंत्री सर्वदलीय सभा में शामिल नहीं हुए। बिहार में चुनाव है तो वहां की रैली न तो रद्द हो सकती थी ना स्थगित और विपक्ष (कोई नेता भी) सरकार के खिलाफ बोले तो दिक्कत। दूसरी ओर, कश्मीर राज्य का दर्जा वापस चाहता है। पुरानी बात हो गई। उसपर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है और नहीं करना है या कर पा रहे हैं तो उसका कारण नहीं बताया गया है। सरकार को कश्मीर पर और आतंकवाद से निपटने की अपनी रणनीति तो बतानी ही चाहिये और इसमें तथ्य है कि केंद्रीय गृहमंत्री कह चुके थे कि आतंकवाद खत्म हो चुका है। उनकी सरकार ने इसे नेस्तनाबूद कर दिया है आदि। इसके बावजूद यह वारदात हुई तो जिम्मेदार केंद्र सरकार ही है और इसमें राज्य सरकार का कहना कि वह लाशों पर राजनीति नहीं कररेगी, अभी राज्य का दर्जा देने की मांग नहीं करेगी, उसका बड़प्पन है लेकिन केंद्र सरकार को चाहिये कि वह बताये कि राज्य का दर्जा अभी नहीं दिया जायेगा या हफ्ते भर में दिया जा सकता है। मुझे लगता है कि इसकी मांग नहीं करके पर ऐसी चर्चा करके उमर अब्दुल्ला ने शर्मिन्दा करने वाली अपनी राजनीति की है और इंडियन एक्सप्रेस के साथ टाइम्स ऑफ इंडिया तथा द हिन्दू ने इसे पूरा महत्व दिया है।

दूसरे अखबारों की लीड अगर यह बता रही है कि सरकार युद्ध की तैयारियों में है तो यह भी पर्याप्त चिन्ता की बात है। वह इसलिए कि सेना में खाली पद, अग्निवीर के बाद पक्की नौकरी करने वाले जवानों की संख्या और उनकी मानसिक दशा के बीच वायु सेना प्रमुख का लड़ाकू विमानों की कमी बताना। पुरानी खबर है, वायु सेना प्रमुख ने 35-40 जेट विमान की जरूरत बताई है कहा है कि भारत को हर साल कम से कम 35-40 लड़ाकू विमान बनाने की क्षमता विकसित करने की जरूरत है ताकि पुराने हो रहे बेड़े को बदलने की जरूरतें पूरी की जा सकें। दूसरी ओर, आज ही खबर छपी है कि (कई साल बाद) 26 रफाल विमान के लिए 64,000 करोड़ रुपये के समझौते हुए हैं। जाहिर है, भारत की स्थिति बहुत मजबूत नहीं है। फिर युद्ध की तैयारी किस दम पर और अगर कुछ है तो वह बताया क्यों नहीं ही जा रहा है। मुझे लगता है कि इस मामले में भी कहानी बनाने की कोशिश चल रही है और यह वैसे ही है जैसे आतंकवाद खत्म होने की कहानी बनाई गई थी। कहने की जरूरत नहीं है कि इस सरकार में न तो जिम्मेदारी लेने का रिवाज है ना ही अपनी गलती मानने का। फिर भी अखबार न तो सच बताते हैं और ना पूरी बात। स्थिति यह है कि तमिलनाडु के दो मंत्रियों ने अदालत की सख्त टिप्पणी के बाद इस्तीफा दिया (या उनसे लिया गया) है। मुख्यमंत्री ने राज्यपाल से इस्तीफा मंजूर करने की सिफारिश की और यह विडंबना ही है कि राज्यपाल आरएन रवि वही हैं जिनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की और पहली बार 10 कानून राज्यपाल या राष्ट्रपति की सहमति के बिना, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से लागू हुए। इस मामले में राज्यपाल का इस्तीफा मुद्दा ही नहीं बना जबकि तमिलनाडु के मंत्रियों के इस्तीफे की खबर राजभवन की ओर से विज्ञप्ति जारी करके दी गई है। इसमें कहा गया है, “तमिलनाडु के माननीय मुख्यमंत्री ने विद्युत, मद्यनिषेध एवं उत्पाद शुल्क मंत्री वी. सेंथिलबालाजी तथा वन एवं खादी मंत्री डॉ. के. पोनमुडी का इस्तीफा स्वीकार करने की सिफारिश तमिलनाडु के राज्यपाल से की है। राज्यपाल ने सिफारिश को मंजूरी दे दी है।” आप समझ सकते हैं कि सरकार के खिलाफ और सरकार के पक्ष में खबरों को छपवाने के लिए कितने पापड़ बेले जाते हैं। उसमें कितनी राजनीति और कितना श्रम होता है।

कहने की जरूरत नहीं है कि विपक्ष के नेताओं के खिलाफ ईडी, सीबीआई की कार्रवाई, उन्हें बदनाम करने से लेकर हर संभव उपाय और भाजपा के बचाव के लिए उपराष्ट्रपति का कूद पड़ना। कितना गंभीर मामला है। तमिलनाडु के राज्यपाल ने जो किया वह निश्चित रूप से गंभीर था। समझा जा सकता है कि भाजपा आलाकमान के समर्थन के बिना नहीं किया होगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति सुधारनी और सार्वजनिक करने की कोशिश की तो क्या हुआ। मुझे भाजपा की राजनीति से दिक्कत नहीं है लेकिन उपराष्ट्रपति ने जो किया उससे है। इसके लिये सलाह को आदेश बनाकर बात का बतंगड़ बनाया गया। उसका मकसद समझना मुश्किल नहीं है हालांकि अभी वह मुद्दा नहीं है। कुल मिलाकर बताना था कि भाजपा के लिए न सिर्फ चाल, चरित्र और चेहरा बल्कि नैतिकता की परिभाषा भी अलग है। वह अक्सर दिखता है पर मीडिया में उसे रेखांकित नहीं किया जाता है। चीजें हमेशा या अक्सर भाजपा के अनुकूल दिखाई जाती हैं। यह सब तब जब हिन्दू हित के लिए सत्ता में होने का दावा करने के बावजूद उसकी लड़ाई विपक्ष के हिन्दुओं से ही है। भले हिन्दू वोट एकजुट करने के लिए मुसलमानों के बाद अब पाकिस्तान को निशाना बनाया जा रहा है।

ऐसे में आज इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर का शीर्षक है, “भाजपा ने हल्ला बोला : टिप्पणियां शर्मनाक, क्या खरगे, राहुल अपनी पार्टी को नियंत्रित करते हैं?” कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा के लोग सरकार और देश को छोड़कर कांग्रेस से भिड़े रहते हैं और उसके आंतरिक मामलों में भी परेशान होते हैं। भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद की तस्वीर के साथ छपी इस खबर में कांग्रेस पर पाकिस्तान की भाषा बोलने का आरोप लगाया गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि 2014 के शपथ ग्रहण समारोह में नवाज शरीफ को बुलाने और उसके बाद उनसे पारिवारिक संबंध बनाने की कोशिशों पर कांग्रेस तो छोड़िये भाजपा ने भी कुछ कहा हो तो मुझे याद नहीं है। सरकार के आलोचकों ने भी इसपर कुछ खास कहा हो ऐसा ध्यान नहीं है। जाहिर है, सब चाहते थे कि प्रधानमंत्री अपने हिसाब से देश चलायें। नरेन्द्र मोदी तीसरी बार चुनाव जीत गये तो मानना पड़ेगा कि उनकी लोकप्रियता बनी हुई है लेकिन पाकिस्तान से संबंध का क्या हुआ? 2019 घुस कर मारूंगा कहकर जीते और अब युद्ध की तैयारियां बताने वाली खबरें छप रही हैं। भाजपा को कश्मीर के आतंकी वारदात पर कांग्रेस नेताओं की टिप्पणी अनुचित लग रही है लेकिन उसकी कोई टिप्पणी सुनी आपने?

ऐसे में आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, भारत के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे 16 पाकिस्तानी यूट्यूब चैनलों पर प्रतिबंध। पाकिस्तान से भारत का तनाव पहले भी रहा है लेकिन चैनल अपना काम करते रहे हैं। चीन के समय भी कर ही रहे थे। पाकिस्तानी चैनल भारत की तारीफ नहीं करेंगे, खिलाफ ही रहेंगे। इसके बावजूद वे क्या बोल रहे हैं जानना दिलचस्प होता है और उससे हम पाकिस्तानी नहीं हो जायेंगे भले हमें पता चल जाये कि भारत सरकार जो कर रही है या करना चाह रही है वह सही है या नहीं। पर यहां स्थिति अलग ही है। खबर है कि भारत के सरकार विरोधी चैनल भी बंद कर दिये गये हैं। दूसरी ओर, इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड से साफ है कि केंद्र सरकार ने पहलगाम की घटना की रिपोर्टिंग से संबंधित जिन तथ्यों पर एतराज नहीं किया उसकी जम्मू कश्मीर विधान सभा में आलोचना की गई। यह भी कहा गया कि इस घटना के बाद जो (राज्य के लोगों में जो) नाराजगी है उससे पता चलता है कि यह आतंकवाद के अंत की शुरुआत है। मुख्यधारा की मीडिया में यह बात प्रमुखता से नहीं कही गई है कि मामला हिन्दू मुसलमान का नहीं है और कश्मीर के मुसलमानों ने खुलकर घटना का विरोध किया है। दूसरी ओर सरकार ने इसे भारत पाकिस्तान का मुद्दा बना दिया है और पाकिस्तान जाने वाले पानी को रोकने की कोशिश कर रही है। इस तथ्य के बावजूद कि रोकना लगभग असंभव है। कायदे से उसे आतंकियों का आना रोकने के लिये काम करना चाहिये था पर वह तो बांग्लादेश सीमा से घुसपैठियों को नहीं रोक पा रही है। वीजा लेकर आने-जाने पर प्रतिबंध और वीजा रद्द करने से जो परेशानी है उसके बारे में किसी ने सोचा ही नहीं। कहने की जरूरत नहीं है कि इससे परेशान होने वालों में सिर्फ मुसलमान नहीं हिन्दू भी हैं।  

नवोदय टाइम्स की लीड 26 राफेल और मिलेंगे है। द टेलीग्राफ की खबर है, प्रधानमंत्री से कहा गया, सेना तैयार है। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, पाकिस्तान के साथ तनाव के बीच राजनाथ सिंह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने प्रधानमंत्री को जम्मू और कश्मीर की स्थिति पर जानकारी दी। लगभग ऐसा ही शीर्षक हिन्दुस्तान टाइम्स का है। दि एशियन एज में ली के साथ छपी खबर में बताया गया है कि आम जनता को जानकारी देने वाले 16 पाकिस्तानी यू ट्यूब चैनल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और बीबीसी को भी चेतावनी दी गई है। अब आप इस सूचना और खबर का मतलब लगाते रहिये। आप जानते हैं कि दो पूर्व सेना प्रमुखों की किताबें रुकी पड़ी हैं। पुलवामा पर आईपीएस अधिकारी दनेश राणा की किताब उसी समय आ गई थी। उस समय वे सेवा में थे और नौकरी में रहते हुए किताबें लिखने के लिए अनुमति लेनी होती है। इससे सेना की ‘तैयारी’ आप समझ सकते हैं। आज की खबरों में सबसे अलग और महत्वपूर्ण खबर है, 2024 में भारत का सैनिक खर्च  पाकिस्तान के मुकाबले लगभग नौ गुना है और दुनिया में पाँचवां सबसे ज्यादा। यह हिन्दुस्तान टाइम्स के पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है। इसके नीचे की खबर है, मध्य प्रदेश के वैज्ञानिक अध्ययन कर रहे हैं कि यज्ञ से बारिश हो सकती है कि नहीं। इससे पहले आपने सुना ही होगा कि बादलों में हवाई जहाज का पता लगाना मुश्किल होता है। इन सब कारमों से मुझे युद्ध की तैयारियों पर चिन्ता हो रही है हालांकि भारत सरकार ने खर्च कर ही दिया है तो चिन्ता करके भी क्या करूंगा। टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिन्दू ने इंडियन एक्सप्रेस की तरह कश्मीर विधान सभा के विशेष सत्र की खबर को लीड बनाया है। हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों की दुनिया माफ कीजियेगा, लीड अलग है और उसकी चर्चा पहले कर चुका हूं।

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