रांची: झारखंड में राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर नई बहस छिड़ गई है। लंबे समय से खाली पड़े पदों को भरने के लिए हाल ही में चयन प्रक्रिया पूरी की गई, जिसमें सैकड़ों आवेदनों में से कुछ नामों को अंतिम रूप देकर राज्यपाल के पास भेजा गया है। इसी सूची में वरिष्ठ पत्रकार अनुज सिन्हा का नाम भी शामिल है।
जानकारी के मुताबिक, राज्य सरकार द्वारा गठित चयन समिति ने विभिन्न क्षेत्रों से आए सैकड़ों आवेदनों की जांच के बाद कुछ उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया। सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत ऐसे पदों पर उन व्यक्तियों की नियुक्ति का प्रावधान है, जिन्हें जनजीवन, प्रशासन, कानून, पत्रकारिता, समाजसेवा या संबंधित क्षेत्रों में व्यापक अनुभव और प्रतिष्ठा हासिल हो।
सूत्रों और जानकारों का कहना है कि अनुज सिन्हा पत्रकारिता के क्षेत्र में लंबे अनुभव के कारण इस दायरे में आते हैं, इसलिए उनके नाम को लेकर अपेक्षाकृत कम सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, विवाद का केंद्र सूची में शामिल कुछ अन्य नाम बन गए हैं, जिनकी पृष्ठभूमि और योग्यता को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
RTI कार्यकर्ताओं और नागरिक समूहों का आरोप है कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही और कुछ ऐसे नामों को आगे बढ़ाया गया, जिनकी पहचान मुख्य रूप से राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में रही है। उनका कहना है कि यदि उम्मीदवारों की योग्यता निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है, तो उन्हें प्रारंभिक स्तर पर ही बाहर कर दिया जाना चाहिए था।
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब झारखंड का सूचना आयोग लंबे समय से लगभग निष्क्रिय स्थिति में रहा है और हजारों RTI अपीलें लंबित पड़ी हैं। ऐसे में नई नियुक्तियों से पारदर्शिता और जवाबदेही मजबूत होने की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन चयन प्रक्रिया पर उठे सवालों ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
फिलहाल राज्यपाल की मंजूरी के बाद ही इन नियुक्तियों पर अंतिम निर्णय होगा, लेकिन उससे पहले ही यह मुद्दा प्रशासनिक निष्पक्षता और चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
प्रकरण पर पत्रकार आनंद कुमार ने उठाए सवाल-
ये बेईमानी है.. कि जिनका फॉर्म स्क्रूटिनी में रद्द हो जाना चाहिए था, उनका नाम राज्यपाल को भेज दिया गया..
अनुज सिन्हा जी पत्रकार हैं। इसी रूप में उनकी ख्याति है। वे शिक्षक बन जायें, चुनाव लड़ जायें या किताबों के गट्ठर लिख डालें, उनकी पहचान पत्रकार की ही रहेगी। जैसे हरिवंश जी राज्यसभा के सांसद बने, उप सभापति रहे, लेकिन देश में उनकी ख्याति एक पत्रकार के रूप में ही है। कपिल सिब्बल की पहचान वकील होने से है और शशि थरूर की लेखक और डिप्लोमेट के तौर पर… हालांकि ये लोग राजनीतिक दलों से भी जुड़े हैं…
अनुज जी ने पत्रकारिता क्षेत्र से अपना आवेदन भरा होगा, ऐसा मुझे विश्वास है। इसलिए उनके चयन पर कोई सवाल नहीं है।
लेकिन बाकी तीन सज्जन शिवपूजन पाठक. तनुज खत्री और अमूल्य नीरज खलखो किस क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं? अगर वे समाजसेवा से हैं – तो किस क्षेत्र में सक्रिय हैं… या किसी NGO से जुड़े हैं? सिमोन उरांव की तरह जल संरक्षण से जुड़े हैं.. छुटनी महतो की तरह अंधविश्वास के खिलाफ काम कर रहे हैं या जमुना टुडू की तरह पर्यावरण संरक्षण में लगे हैं। क्या भोजन के अधिकार, कुपोषण आदि के क्षेत्र में हैं। और उनकी समाजसेवा से समाज को क्या हासिल हुआ? कितने लोगों का जीवन बदला? समाजसेवा के लिए उन्हें कितने सम्मान मिले… उनकी समाज सेवा के बारे में सार्वजनिक जानकारी किस प्लेटफार्म पर उपलब्ध है?
ऐसे ही अगर बाकी क्षेत्रों से आवेदन दिया तो उसमें क्या ख्याति और उपलब्धि रही? कोई आविष्कार, कोई तकनीकी शोध, कोई प्रबंधकीय कौशल जिसका लोहा समाज ने माना हो… हमें तो ऐसा कुछ नहीं पता.. मैंने कोल्हान से संथाल तक दर्जनों लोगों से पूछा.. ज्यादातर तो इनका नाम भी नहीं जानते थे..
सनद रहे, अर्हता में राजनीति, शिक्षण, कला-साहित्य आदि क्षेत्र नहीं हैं। न ही संबंधित विषयों में राजनीतिक दलोंं के संगठन में पद या दायित्व धारण करना, उच्च शिक्षा हासिल करना, पीएचडी या अन्य डिग्री हासिल करना या किताब लिखना सूचना आयुक्त के पद हेतु कोई योग्यता है..
पाठकजी, खत्रीजी और खलखोजी तीनों के तीनों विशुद्ध और खांटी राजनीतिक व्यक्ति हैं। जो भी लोग इनको जानते हैं, वे इन्हें राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में ही जानते हैं। नेता के अलावा किसी और रूप में इनकी पहचान न तो है और न ही पहले कभी रही है…
तो अव्वल इनका आवेदन स्क्रूटिनी में छांट दिया जाना था.. अगर कूढ़मगज और मूढमति सरकारी बाबुओं ने इनका आवेदन शॉर्टलिस्ट कर भी दिया था, तो चयन समिति को आवेदन देख कर ही रद्दी में फेंक देना चाहिए था।
लेकिन घोर आश्चर्य कि चयन समिति को यही लोग योग्य लगे… क्यों? क्योंकि बेईमानी करनी थी.. खुद को कानून से ऊपर दिखाना था.. सूचना आयोग को अपने इशारे पर चलाना था..


